साक्षात्कार: बाल साहित्य लेखिका उषा छाबड़ा का सफ़र

उषा छाबड़ा
साहित्य एवं कला सम्बंधित साक्षात्कार के इस स्तम्भ में आज हम आपको मिलवायेंगे बाल साहित्य की प्रसिद्ध लेखिका उषा छाबड़ा जी से, जो पिछले बीस वर्षों से दिल्ली पब्लिक स्कूल रोहिणी में हिंदी भाषा के अध्यापन के साथ साथ साहित्यसेवा करती रही हैं और आजकल अपने विद्यालय के बच्चों के साथ-साथ, दूर-दूर तक जाकर बच्चों को कहानियाँ सुना रही हैं। उषा जी साहित्यिक अभिरुचि वाली अध्यापिका हैं। उन्होंने कक्षा नर्सरी से कक्षा आठवीं तक के स्तर के बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तकें एवं व्याकरण की पुस्तक श्रृंखला भी लिखी हैं। वे बच्चों एवं शिक्षकों के लिए वर्कशॉप लेती रहती हैं। बच्चों को कहानियाँ सुनाना उन्हें बेहद पसंद है। उनकी कविताओं की पुस्तक 'ताक धिना धिन' और उस पर आधारित ऑडियो सीडी प्रकाशित हो चुकी हैं। आप उनसे उनके ब्लॉग अनोखी पाठशाला पर मिल सकते हैं।

वार्ताकार: अनुराग शर्मा
अनुराग शर्मा: उषा जी, नमस्कार! सेतु सम्पादन मण्डल की ओर से आपका स्वागत है। कहते हैं कि हर इंसान की जिंदगी अनुभवों की कहानी है। आप बच्चों को कहानियाँ सुनाती हैं पर आज हम आपके बारे में जानना चाहते हैं। आप हमारे पाठकों को अपने बारे में बताइए।
उषा छबड़ा: अपनी बात कहूँ तो मैं आरंभ से बहुत ही संकोची थी। मैं कलकत्ते में जन्मीं थी। पढाई में होशियार थी लेकिन किसी से बात करने में बहुत डर लगता था। घर पर मेहमान आने हों,तो मेरे पसीने छूटने लगते थे। अपने विद्यालय और कालेज में भी मेरी ऐसी ही स्थिति थी।

अनुराग: लेकिन मैंने आपके कथापाठ के बहुत से विडियो देखे हैं। आपके ब्लॉग के अलावा, रेडियो प्लेबैक इंडिया पर भी आपकी पढ़ी हुई कहानियाँ सुनी हैं। आप इतने लोगों के सामने इतने अच्छे से अपनी बात रख पाती हैं, आपके स्वभाव में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आया?
उषा: शादी के बाद मेरा दिल्ली आना हुआ और कुछ वर्षों बाद मैं अध्यापन कार्य से जुड़ गई। विद्यालय में कई तरह के काम करने पड़े जैसे कभी किसी प्रतियोगिता के लिए, तो कभी प्रार्थना सभा के लिए, तो कभी वार्षिक दिवस के लिए नाटक का आलेख लिखकर बच्चों को उसके लिए तैयार करना। जब से विद्यालय में मैंने पढ़ाना शुरू किया तब से ही मैं रंगमंच के साथ और रंगमंच मेरे साथ जैसे जुड़ गया था।बच्चों के साथ जब उन्हें कुछ सिखाने का प्रयास करती तो स्वयं ही कुछ सीख जाती। उन्हें सिखाने के लिए मैं इन्टरनेट पर पढ़ती और वहाँ से सीखकर बच्चों को नाटक सम्बंधित गतिविधियाँ सिखाती। दिल्ली में बहुत नाटक होते रहते हैं अतः कई बार नाटकों का मंचन देखती, उनसे भी सीखती। रंगमंच अभिव्यक्ति का बहुत ही प्रभावशाली माध्यम है। मैंने इसके द्वारा अपने एवं कितने बच्चों के व्यक्तित्व को बदलते हुए देखा है।

अनुराग: यह जानकार अच्छा लगा कि आप एक अनजाने क्षेत्र में सीखने की ललक से आप कहाँ से कहाँ पहुँच गयीं। यह सबके लिए एक प्रेरक एवं रोचक प्रयोग है। आप तो शिक्षिका हैं, तो लेखन के क्षेत्र में आपका आना किस प्रकार हुआ?
उषा: जैसा कि मैंने बताया कि विद्यालय के विभिन्न कार्यों के लिए हिंदी में कुछ - कुछ लेखन आरम्भ हुआ। धीरे- धीरे लेखन में रूचि बढ़ती गई। कुछ कविताएं लिखने लगी। विद्यालय में बच्चों के लिए अभ्यास पत्र बनाती। इसी दौरान मैंने हिंदी भाषा में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। एक तरफ खुद एक विद्यार्थी बनना और दूसरी तरफ अध्यापन करना। तभी एक प्रकाशक से मुलाक़ात हुई और उन्होंने मुझसे बच्चों की पाठ्यपुस्तक लिखने का आग्रह किया। मैं थोड़ा झिझकी लेकिन फिर मैंने स्वीकृति दे दी। पाठ्यपुस्तक लिखने से पहले मैंने बच्चों की मानसिकता पर बहुत कुछ पढ़ा। विद्यालय में भी बच्चों से प्रतिदिन संपर्क होता था, इसलिए अब मुझे बेहतर समझ आ रहा था। पहले कक्षा एक से कक्षा पांचवी तक के बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तक श्रृंखला लिखी। मैंने फिर दूसरे प्रकाशक के लिए कक्षा नर्सरी से आठवीं कक्षा के बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तक श्रृंखला लिखी।

अनुराग: आप कहानियों की दुनिया में कैसे आईं?
उषा: स्नातकोत्तर करने के बाद मैंने हिंदी एम फिल में दाखिल ले लिया और मेरा शोध मुंशी प्रेमचंद की मानसरोवर की कहानियों पर आधारित था।धीरे-धीरे मैंने कहानियों की दुनिया में प्रवेश किया। मेरे विद्यालय का पुस्तकालय मेरा संसाधन स्रोत था। मैंने कितनी ही कहानियाँ वहाँ पढ़ डाली। बच्चों से सम्बंधित कई अच्छे लेखक एवं लेखिकाओं की कहानियाँ पढ़ीं। मैंने अब अपने कक्षा के विद्याथियों को अभिनय कर, अलग अलग पात्र बनकर कहानियाँ सुनाना आरम्भ किया। धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया। अब मुझे लगने लगा कि मैं बाहर भी कहानियाँ सुना सकती हूँ ताकि स्कूल से बाहर भी बच्चे इससे लाभान्वित हो सके। अब मैं कई जगह अभिनय करके कहानियाँ सुनाती हूँ, जिससे कि कहानियाँ बच्चों के मानसपटल पर अंकित हो जाती हैं।

अनुराग: उषा जी जैसे ही माँ -पिता, दादा-दादी, नाना-नानी या कोई भी व्यक्ति कहता है ,चलो एक कहानी सुनाते हैं, सब के कान खड़े हो जाते हैं। कहानी में ऐसा क्या है कि बच्चे उन्हें सुनना पसंद करते हैं?
उषा: मैं आपको यहाँ बताना चाहूँगी कि सिर्फ बच्चे ही नहीं बड़े भी उतने ही शौक से कहानियाँ सुनते हैं, जितने कि बच्चे। कहानी में एक राजा हो या भिखारी, परी हो या शहज़ादी, सुर हो या असुर और ऐसे सजीव कोई न भी हो तो भी एक निर्जीव सी पेंसिल की भी एक कहानी बन जाती है। कहानी सबको एक अलग ही दुनिया में ले चलती है, कहानी का अपना अलग ही आनंद है। इसे सुनने का भी एक अलग मज़ा है। कहानी में हम कई बार किसी किरदार से ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे कि वह हमारा ही अक्स हो। उसे दुःख पहुँचता है तो हम दुखी होते हैं, वह खुश होता है तो हम भी खुश हो जाते हैं। कहानी में ही हम अपने जीवन के प्रश्नों का हल खोजने लगते हैं। कई बार कहानी हमें ऐसे कल्पना लोक में ले जाती है कि उसी में समय बिताने का मन करता है।

अनुराग: बच्चों को कहानियाँ सुनाते समय आप किन बातों का ध्यान रखती हैं?
उषा: कहानी सुनाना भी एक कला है। कहानी सुनाते समय सबकी आँखें, सबके कान बस कहानी सुनाने वाले की तरफ ही लगे होते हैं। कहानी सुनाने से पहले बच्चों की उम्र का ध्यान रखा जाता है। बिलकुल छोटे बच्चों के लिए ऐसी कहानियाँ जिसमें खूब सारे जानवर हो,कल्पना हों, कुछ लयात्मकता हो, कुछ गीत हों। ऐसी कहानियाँ जो बहुत सरल हों और उनके पात्र भी वही सोचते हों जैसा वे सोचते हैं। ज्यादा शिक्षाप्रद न होकर मनोरंजन से भरपूर कहानियाँ सुनाती हूँ. कहानियों में बच्चे साथ गा सकें तो उन्हें और आनंद आता है। अपेक्षाकृत बड़े बच्चों की कहानियाँ मूल्य आधारित होती हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पूछा जाता कि क्या सीखा। बच्चे शिक्षा से दूर भागना चाहते हैं, अनजाने में मनोरंजन के साथ शिक्षा देना सही रहता है।

अनुराग: कई बार पाया गया है कि अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चे हिंदी की किताबें नहीं पढ़ना चाहते। आप अपना कोई अनुभव हमसे साझा करना चाहेंगीं?
उषा: यह बात काफ़ी हद तक सही है। जब भी अभिभावक मुझसे मिलते, यही शिकायत करते। इस बार मैंने कुछ अलग सोचा। मैं अपने घर से बाल भारती पत्रिका के कुछ अंक और कुछ अपने संग्रह से किताबें घर से लेकर गई और कक्षा में बच्चों के सामने रख दीं। बच्चों को बताया कि ये सब मेरी किताबें हैं और पूछा कि इन्हें कौन पढ़ना चाहता है। कुछ बच्चों ने हामी भरी और किताबें ले लीं। मैंने इन्हें घर ले जाने के लिए दे दीं। अगले दिन कुछ बच्चों ने आकर बताया कि उन्होंने उन किताबों में से कहानियाँ पढ़ी हैं। एक बच्चे को मैंने कहानी सुनाने को कहा। जब उसने कहानी सुनाई तो सबको कहानी बहुत अच्छी लगी। अब कुछ और बच्चे भी मुझसे किताबें माँगने लगे। अब मुझे भी उन्हें देखकर आनंद आने लगा। अब तो कक्षा में होड़ सी शुरु हो गई कि आज कौन कहानी सुनाएगा। धीरे-धीरे अब कक्षा के बच्चे अपने घर में रखी किताबें भी लाने लगे। कक्षा में बच्चे अब इंतज़ार करते हैं कि आज मैम किसे मौका देंगी। मैंने उनसे पूछा कि उनका अनुभव कैसा रहा तो बच्चों ने बताया कि जब हम पुस्तकालय से हिंदी की किताबें लेकर जाते हैं तो किताबें पढ़ने का अधिक मन नहीं करता लेकिन जब आपने अपनी किताबें दीं तो उसे पढ़ने अहसास अलग था। उन्हें पकड़ते ही आपकी बातें याद आतीं और पढ़ने का अधिक मन करता। कक्षा में उन कहानियों को सुनाने का अलग आनन्द है।

एक बार बच्चों को किताबें पढ़ने की रुचि जागृत हो जाएगी, तो वे अवश्य ही अब पुस्तकालय से भी किताबें पढ़ेंगे। यह एक छोटा सा प्रयोग था और आशा है आने वाले दिनों में इसके परिणाम और बेहतर होंगे। समय-समय पर कक्षा के अनुसार अपने प्रयोग करते रहने चाहिए। बच्चों को खुश देखकर मन आनंदित हो उठता है।

अनुराग: आपका यह प्रयोग तो वाकई बड़ा रोचक लगा। क्या कहानियाँ बच्चों के लेखन में भी बदलाव ला सकती हैं?
उषा: जी, बिलकुल ला सकती हैं।अक्सर यह देखा गया है कि जिन बच्चों के माता-पिता ने उन्हें बचपन से ही किताबों की दुनिया से जोड़े रखा है, उनकी कल्पनाशक्ति बहुत बढ़ जाती है और इसका प्रभाव उनके आचार- विचार में, उनके लेखन में भी झलकने लगता है। मैं तो लगभग बीस वर्षों से हिंदी अध्यापन से जुड़ी हुई हूँ और बच्चों के उत्तर,उनके सृजनात्मक लेखन से पता लगा लेती हूँ क़ि कौन सा बच्चा अतिरिक्त पठन करता है।

अनुराग: क्या आप अभिभावकों को कुछ सलाह देना चाहेंगीं?
उषा: जी, मैं बस इतना कहना चाहूंगी, बच्चों को छोटी उम्र में ही किताबों से जोड़ें, उन्हें तरह- तरह की कहानियाँ सुनाएँ। यह पूरा संसार कहानियों का ही तो पिटारा है। यहाँ हर पल एक नई कहानी बुनी जाती है! कहानी सुनें और सुनाएँ।

अनुराग: उषा जी,आपसे वार्ता करने पर बहुत सारी बातें उभर कर आईं। आपसे हमने सीखा कि बच्चों की उन्नति के लिए उनके साथ समय बिताना आवश्यक है, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के विकास के लिये उन्हें  पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त भी बहुत कुछ चाहिये। आपका बहुत बहुत शुक्रिया।आप भविष्य में इसी प्रकार कहानियाँ सुनाती रहिए, और नए -नए प्रयोग से शिक्षा जगत में बदलाव लाने का प्रयास करती रहें।
आपने हम सबका मार्गदर्शन किया, इसके लिए आपका हार्दिक आभार।
उषा: जी, बच्चों को पाठ्यक्रम की पुस्तकों के साथ-साथ अन्य किताबों से भी रूबरू कराना चाहिए। उनके लेखन कौशल को बढ़ावा देने के लिए कहानियाँ एक सशक्त माध्यम साबित हो सकती हैं। आपने अपना कीमती समय निकाला, इसके लिए आपका और सेतु के प्रबुद्ध पाठकों का भी हार्दिक धन्यवाद।