साइकिल चोर - लघुकथा

कांता रॉय
- कान्ता रॉय

"देखो, वो रही साइकिल, जरूर चोर भी यहीं आस-पास होगा।"

"बाबा, आपने इस साइकिल रखने वाले को देखा है क्या?"

"नीली शर्ट वाला था कोई बेटा।"

"नीली शर्ट वाला? बाबा, वो सामने वाला लडका तो नहीं?"

"हाँ, शायद वही है।" चश्मे को ठीक करते हुए आँख चुराकर उसने जबाव दिया।

"देख रे गंगाधर, पकड़ उस चोर को, बाबा कह रहे हैं, तो जरूर वो ही होगा। चल झट से, धर-पकड़ इस तरफ दौड़ कर।"

"बाल-बाल बचा आज तो, इस ढलती उम्र में साSSला... चोरी करना भी मुश्किल हो गया है। जरा अधिक सावधानी रखनी होगी अगली चोरी में। अब आज की दारू तो रह गयी।" पेपर तह कर बगल में खोंस, हाथ आई साइकिल को बेबस नजरों से जाते हुए देखता रहा वह।