साक्षात्कार - कहानी

आनंद कुमार शुक्ल

धनीराम का चयन बोर्ड में साक्षात्कार था। वह प्रातः 10 बजे ही चयन बोर्ड की इमारत के ग्राउंड फ्लोर में पहुँच गया। वहाँ रखी कुर्सियों पर धूल जमीं हुई थी। धनीराम ने कोने की कुर्सी अंगौछे से साफ की और बैठकी ली। वहाँ कई अन्य अभ्यर्थी भी थे। कुछ खड़े थे। कुछ लाइन में लगे थे। नाम पुकारने वाला व्यक्ति बड़ा सा तिलक लगाए मुँह में पान चबाते हुए केवल एक बार नाम पुकार रहा था। पहली बार में संज्ञान न लेने वाले अभ्यर्थी को डाट खाते हुए 2 घंटे इन्तजार की सजा उसी ने निर्धारित की थी। आधा नाम मुँह में आधा थूक के साथ बाहर। थोड़ी देर बाद ‘धनीराम’ शब्द सुनाई दिया। धनीराम ने साथ लिए झोले में देखा। सभी मूल प्रमाणपत्र और उनकी छायाप्रतियाँ वहीं थीं। वह खड़ा होकर लाइन में लग गया। एक हाथ में छायाप्रतियों को और दूसरे हाथ में मूल प्रमाणपत्रों का झोला लिए उसने पीठ पास की दीवाल से टिका दी। करीब आधे घंटे बाद उपस्थिति पत्र पर हस्ताक्षर करके वह प्रथम तल में गया। वहाँ भी लाइन ही लगी थी। जाते ही गार्ड ने उसे भरने के लिए एक प्रपत्र दिया। वह प्रपत्र लेके किनारे रखी कुर्सी पर बैठ गया। और सिर को थोड़ी देर के लिए कुर्सी पर बैठे हुए ही ढीला कर दिया। शिथिलता ने उसे आ घेरा। असल में विगत कई दिनों से साक्षात्कार के सभी आवश्यक कागजों को इकठ्ठा करने में वह थक गया था। सबसे अधिक उसे गुस्सा उस डॉक्टर पर आया जिसने स्वास्थ्य प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर के बदले सौ रुपयों की मांग की। जब धनीराम ने मना किया तो डॉक्टर ने कहा, “एक रुपये की पर्ची कटाकर आफिस में जमा कर दीजिए और पाँच दिन बाद आइए।” मजबूरीवश उसने स्वस्थ रहने का प्रमाण पत्र उसी दिन लिया।

धनीराम के घर से चयनबोर्ड 60 किमी की दूरी पर था, सो उसे सुबह ही निकलना पड़ा। माँ ने गुड़-दही खिलाकर भेजा। पिता ने जेब टटोलकर कोई 200 रुपये तक दिए और कहा, “पैसेंजर लेट रहै तौ रोडवेज पकड़ लिहा।” धनीराम की तन्द्रा वापस लौटी। उसने झोले से पेन निकाली और प्रपत्र भरना शुरु किया। बगल में बैठे अभ्यर्थी ने पूछा, “कौन सा विषय है?”
धनीराम ने उत्तर दिया, “हिंदी।”
“अरे, कितना सही है?” उसने दुबारा पूछा।
“115 ...” धनीराम ने कहा।
“अमानत तो आपने पहुँचा दी होगी” उसने फिर कहा।
धनीराम, “नहीं, मैंने नहीं दिया”
अभ्यर्थी ने कहा - “अरे ... आपने रिस्क क्यों लिया? यदि पैसे देते तो श्योर हो जाता। यदि न होता तो पैसे वापस। मेरा तो 112 ही सही है परन्तु मैंने अमानत दे दी है। आगे भगवान की मर्जी।”
धनीराम ने पूछा, “आपने कितना दिया है?”
कुछ धीरे से उत्तर मिला, “ढाई लाख ... नहीं हुआ तो वही नोट वापस हो जाएगी। यहाँ तो बेईमानी भी ईमानदारी से होती है ... हा, हा, हा।”
धनीराम ने फिर कुछ नहीं कहा। वह प्रपत्र भरने लगा। प्रपत्र भरकर उसने लाइन लगा ली। पंक्ति में वही अभ्यर्थी उसके पीछे खड़ा था। उसने फिर कहा, “देखिए... यदि आपका साक्षात्कार अध्यक्ष वाले बोर्ड में पड़ता है, तो ठीक है क्योंकि उसमे पैसा नहीं चल रहा। यदि दूसरे में पड़ा तो... दिक्कत है।”
“अध्यक्ष वाले में ” धनीराम ने कहा।
अभ्यर्थी, “हाँ ... इस बार अध्यक्ष के बोर्ड में पैसा नहीं चल रहा। पर नंबर नहीं मिलता है।... बाकी बोर्डों में पैसा बोल रहा है। वे 50 में 45 से ऊपर दे देते हैं।”
तब तक धनीराम का नंबर आ गया। जाँचबाबू ने सभी प्रमाण पत्रों की जाँच की। फिर अनुक्रमांक मिलाते हुए धीरे से बोला, “आप 10 मिनट बाद आएँ।” धनीराम दुबारा उसी किनारे वाली कुर्सी में बैठ गया। सामने की तरफ और ऊपर कैमरे लगे थे। वह उन्ही को देखने लगा। तभी वही अभ्यर्थी फिर धनीराम के पास आया और बोला, “हमारा तो नंबर आ गया। छठवें बोर्ड में पड़ा है। और आपका?”
धनीराम, “जी ... मुझे 10 मिनट बाद आने को कहा है। अभी नंबर नहीं दिया।”
अभ्यर्थी, “ओहो ... देखिए, शायद बातचीत करने को रोक लिया हो। अगर बोले तो कह देना कि मुझे पता नहीं था। इंटरव्यू होते ही दे दुँगा। खैर ... मेरा नाम धीरज कुमार है। यहीं फाफामउ का रहने वाला हूँ। आप अपना मोबाइल नंबर दे दें। बातचीत होती रहेगी।”
“जरूर” कहकर धनीराम ने अपना मोबाइल नंबर दिया और उसका नंबर लिया जिसके बाद धीरज चला गया। लगभग 10 मिनट बाद धनीराम जी उठकर खिड़की के पास गए। बाबू ने उन्हें देखा और रुकने का इशारा किया। वह वहीं थोड़ा हटके खड़े हो गए। जब पंक्ति में लगे अंतिम अभ्यर्थी का बोर्ड निर्धारित हो चुका तो उसने धनीराम को बुलाकर कहा, “आपके लिखित परीक्षा में अंक तो अच्छे हैं। आपने किसी को कुछ दिया है?”
धनीराम ने कहा, “नहीं सर, मुझे पता नहीं था। पहली बार आया हूँ। आप इंटरव्यू हो जाने दीजिये। मैं बाद में दे दूँगा।”

बाबू ने कहा, “ऐसे नहीं होता सर ... मैंने सोचा शायद किसी के मार्फ़त दिए हों और यहाँ न लिखा हो| आपको कम से कम महीने भर पहले देना चाहिए| इंटरव्यू थोड़ी कोई रोक सकता है, वह तो होगा ही ... लीजिये, निर्देश पढ़कर दूसरे तल पर जाइए।” धनीराम ने देखा, बोर्ड नंबर 6 की उसे पर्ची मिली हुई थी। पर्ची के पीछे लिखा था - ‘यह पर्ची केवल परीक्षक द्वारा ही खोली जाएगी। अभ्यर्थी द्वारा खोले जाने पर दंडनीय अपराध है।’

धनीराम द्वितीय तल पर बोर्ड नंबर 6 वाले कमरे के सम्मुख खड़ा हो गया। वहीँ फिर धीरज कुमार दिखा। जैसे ही उसने धनीराम को देखा, पास आया और बोला, “अरे! आपका इसी बोर्ड में है क्या?” धनीराम ने हाँ में सिर हिलाया। धीरज ने फिर कहा, “यदि आपका अध्यक्ष वाले में पड़ता तो ठीक रहता। खैर देखिए, सारे प्रश्नों के उत्तर दीजिएगा।” धनीराम ने ‘हूँ’ में उत्तर दिया।

एक किनारे खड़े होकर उसने झोले में से नोट्स निकाली और उन्हें देखने लगा। अगल-बगल खड़े कई अन्य अभ्यर्थी भी पास आकर उसी की कॉपी देखने लगे। एक ने कहा, “आपने अच्छी मेहनत की है। नोट्स बनाकर मुझे पढना अच्छा नहीं लगता।” धनीराम ने कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ देर बाद धीरे-धीरे सभी हट गए। केवल धीरज कुमार ही उसके पास खड़ा होकर कॉपी देख रहा था। उसने धनीराम से नोट्स के एक ज़ेरॉक्स की मांग की। धनीराम ने उसकी ओर बिना देखे ही पन्ने पलटना जारी रखा। तभी चपरासी ने धीरज कुमार का नाम पुकारा और वह बोर्ड नंबर 6 के साक्षात्कार कक्ष में चला गया। थोड़ी देर बाद वह बाहर आया। तब तक धनीराम ने पढ़ना बंद कर दिया था। कॉपी झोले में थी। लंच ब्रेक हो चुका था। धनीराम के पूछने पर धीरज कुमार ने कहा कि उससे कोई भी कठिन प्रश्न नहीं पूछे गए, क्योंकि उसने कोड बता दिया था। कोड के विषय में जब धनीराम ने पूछा तो उसने कहा, “जिसने पैसे दिए हैं, उसे कोड मिले हुए हैं। मुझे भी मिला है। मैंने वही बोला तो उन्होंने फिर कोई कठिन प्रश्न नहीं किया।”

धनीराम ने कहा, “मैंने सुना वीडियो रिकॉर्डिंग हो रही है?”

धीरज ने कहा, “अरे भाई वीडियो-वूडियो कुछ नहीं हो रहा। सब ढकोसला है। केवल अध्यक्ष के बोर्ड में वीडियो चल रहा है, बाकी सभी कैमरे बंद हैं। और वह भी इसीलिए कि इसी महीने चुनाव होनें हैं। कुछ तो इमानदारी बरतनी होगी। सो कैमरे लगा दिए, वह भी बंद ... हाहाहा!” थोड़ी आवाज धीमी करके वह फिर बोला, “... और सुनने में आ रहा है कि एक लड़के का प्रवक्ता में बिना इंटरव्यू दिए ही हो गया।” धनीराम ने फिर कुछ नहीं कहा, बस एक लम्बी सांस खीची और छोड़ दी।

दिन के कोई ढाई बज रहे थे। लंच का समय समाप्त होने वाला था। चपरासी साक्षात्कार कक्ष के दरवाजे के पास ही बैठा था। तभी घंटी बजी। चपरासी तुरंत अन्दर गया। कुछ समय बाद हाथ में जूठे-पत्तलों की पालीथीन लेकर बाहर निकलते हुए उसने धनीराम को अन्दर जाने का इशारा किया। धनीराम ने कक्ष में घुसते ही प्रणाम किया, और सामने रखी कुर्सी पर बैठते हुए प्रमाणपत्रों का झोला पास में रख लिया। वहाँ उसे केवल दो ही परीक्षक दिखे, एक पुरुष और दूसरी महिला। पुरुष परीक्षक ने धनीराम के हाथ से पर्ची लेकर देखी, फिर उसे खोला, फिर धनीराम को देखा और पूछा, “आपकी क्या योग्यता है?”
“जी मैं ... परास्नातक हूँ।”
“अच्छा, परास्नातक में आपने मुख्य कवि के रूप में किसे रखा?”
“जी ... सूर्यकांत त्रिपा...” धनीराम वाक्य भी पूर्ण न कर पाया था कि पुरुष परीक्षक का मोबाइल बज उठा। धनीराम ने प्रत्यक्ष दूरभाष से यही सुना –
            “जी ...जी ...अरे हो जाएगा... आप चिंता न करें... अभी तो नहीं आया ...क्या नाम बताया आपने ...रामेश्वर सिंह ... ओके सर ... जी गया था मैं वहाँ... हाँ हाँ, अब याद आ गया ...वही लड़का... हाँ ... ओके सर ...ओके... ओके।” दूरभाषवार्ता पश्चात पुरुष परीक्षक ने कहा, “अभी कितने ‘कंडीडेट’ हैं बाहर?”
“जी... दो-तीन...” धनीराम ने कहा।
“अच्छा ठीक है, जाओ। अगले को भेज दो।”

कुर्सी से उठते हुए धनीराम ने प्रमाणपत्रों का झोला लिया और पुरुष परीक्षक की ओर देखा। वे ‘पेंसल’ से अंकपत्र पर अंक चढ़ा रहे थे। महिला परीक्षक मोबाइल पर कुछ देख रही थी।

करीब दो महीने बाद साक्षात्कार के परिणाम की जानकारी धीरज कुमार के फोन आने से प्राप्त हुई। धीरज ने कहा, “मित्र...  मैं धीरज... हाँ... जो माध्यमिक चयन बोर्ड में मिला था। रिजल्ट आ गया। मेरा चयन हो गया है, और आपका? धनीराम ने कहा, “अभी नहीं देखा... देख के बताउँगा।” फोन करने का आश्वासन देकर धनीराम ने फोन काट दिया। पास में ही धनीराम के पिता छपरा के नीचे ओरचावन* कस रहे थे।
उन्होंने पूछा-“का... रेजल्ट आइ ग का?”
धनीराम ने कहा, “हाँ ”
“का भा?” पिता अधिक जानने को उत्सुक थे।
“जात अही चौराहा, कंप्यूटर पै देखाई ” धनीराम जी बोले
“दुकनिया खोले होई अबहिन”
“खोल तौ देत हा उ तीनै बजे... चार बजत अहैं ”
“तनी मंदिरी मा हाथ जोड़े जाया ” पिता ने कहा।

थोड़ी देर बाद धनीराम जी लौटे। माता-पिता दोनों छपरा के नीचे ओरचावन कसी हुई खटिया में बैठे थे। धनीराम ने बिना किसी से कुछ कहे ही, प्रतिदिन की भाँति द्वार पर बंधी हुई गाय के गले से गेराईं** खोली। डंडा लिया। और उसे नदी की तरफ हाँकते हुए पीछे-पीछे चलने लगे।

ग्रामीण शब्द –
  *ओरचावन - चारपाई को कसने की उसी में बंधी हुई विशेष प्रकार की रस्सी।
   **गेराईं - गाय के गले की रस्सी जिससे उसे बाँधा जाता है।