गीत - अनिता मण्डा

अनिता मंडा

संदेह का झाड़

मन की बगिया में उग आया
संदेहों का झाड़
छोटी-छोटी बातें बनती
पल में तिल का ताड़।

राम-भरत सम साथ पले थे
सुख-दुख में मिल साथ चले थे
अब उनकी आँखें तक न मिलें
मिलते जो हर रोज गले थे।

अँगना को दीवार बाँटती
खेत जकड़ती बाड़
छोटी-छोटी बातें बनती
पल में तिल का ताड़।

करते बुराई पीठ पीछे
आगे करते वाह-वाह जी
होठों पर झूठी मुस्कानें
दिल में होती भरी आह ही।

बने भेड़िये नोचें खायें
दांत देह में गाढ़
छोटी-छोटी बातें बनती
पल में तिल का ताड़।