लोकोक्ति साहित्य में स्वास्थ्य सूक्त

- मृदुल कीर्ति

मृदुल कीर्ति
   जीवन की आचार संहिता के सन्दर्भ में नैतिक, धार्मिक और संस्कारों के उपदेशों से हम सब परिचित हैं किन्तु स्वस्थ जीवन के लिए कुछ ऐसे अनमोल सूक्त हैं जो दैनिक बोलचाल में अनायास ही हमारे संरक्षक पीढ़ी दर पीढ़ी कहते आये है और हम सुनते आये हैं किन्तु इन्हें  कभी गहराई से नहीं लिया। स्वस्थ जीवन शैली के लिए लोकोक्तियों में निहित आहार संहिता कभी हमारे चिंतन का विषय नहीं रहा। जैसे, एक प्रचलित लोकोक्ति है -

जैसा खाये अन्न वैसा बने मन।

हमने भी दोहरा दिया बात आई गई हो गयी। आज जब गहराई से दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रंथों से जाना तो इस लोकोक्ति में समाहित मर्म उजागर हुआ। तब जाना कि यह पंचकोशों से सम्बंधित आहार संहिता है।
   जैसा खाये अन्न वैसा बने मन -- को यह पाँच कोष सिद्ध करते हैं। जिसका क्रम है --
   अन्नमय कोष - आहार शक्ति
   प्राणमय कोष - प्राण शक्ति, ऊर्जा
   मनोमय कोष - विचार शक्ति
   ज्ञानमय कोष - ज्ञान शक्ति
   आनदमय कोष - ऋत शक्ति, सत्य-चित-आनंद शक्ति

 कितनी गहरी बात है जिसका मूल्यांकन नहीं करते और न ही व्यवहार में लाते हैं। अन्न से आनंदमय कोष तक की यात्रा -- बहुत गहरा दर्शन है।

लोकोक्तियों के प्रति हमारी उदासीनता एक और कारण है जिसके हम ही उत्तरदायी हैं।  हमारा स्वभाव सा बन गया है कि किसी तथ्य की पुष्टि के लिए हम पाश्चात्य विद्वानों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों की मोहर से ही आश्वस्त होते हैं।  अब पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने माना कि हल्दी हेल्दी है तो हल्दी महत्वपूर्ण हो गयी वरना साधारण सा मसाला था। हमारे आयुर्वेदाचार्य जब वात, पित्त और कफ़ के संतुलन की बात करते हैं तो नहीं समझ में आती वही बात  anabolism, catabolism and metabolism से समझ आती है।  अर्वाचीन ज्ञान मानवता के हित के लिए था।

अधिक मिठाई में कीड़े - अर्थात अत्यधिक प्रेम, दोस्ती, प्रगाढ़ता को सामान्यता झगडे और कटुता में बदलते देखा गया है। इसे लोकोक्ति में मिठाई से तुलना  देकर बताया है क्योंकि गुड़  में कीड़े पैदा हो जाते हैं।

अधिक खटाई में कीड़े - अर्थात बहुत कटुता और वैमनस्य भी दुःखदायी है।  साबुत खटाई की सूखी फांकों में कीड़े हो जाते हैं।

अधिक कडुवाहट में कीड़े - अर्थात अधिक शत्रुता भी दुष्परिणाम ही लाती है।  करेले में भी कीड़े पड़ जाते हैं।
 खाद्य पदार्थों के उपालम्भों से जीवन के सूक्त देने की क्षमता इन छोटे-छोटे मुहावरों में छुपे हैं.

इस लोकोक्ति में तो पूरे वर्ष के भोजन की नियमावली है देखें -

 चैते गुड़ बैशाखे तेल, जेठे पंथ आषाढ़ में बेल,
 सावन साग न भादों मही, क्वार करेला न कार्तिक दही।

अगहन जीरा पूसे धना, माघे मिश्री फाल्गुन चना। 
 ये बारह जो देय बचाय , ता घर वैद्य कबहुँ न जाय। 

चैत में गुड़ नहीं - गरम होने के कारण नाक से खून निकलने की संभावना होती है।
बैशाख में तेल नहीं, क्योंकि नई सरसों के कारण बहुत गरम तासीर तेल की मानी जाती है।
जेठे पंथ अर्थात तीव्र गर्मी में यात्रा न करें।
आषाढ़ में बेल न खाएं, अपच होने के साथ-साथ यह मान्यता भी है कि तब बेल में कीड़े पड़ जाते हैं।
सावन में साग अर्थात हरे पत्ते की सब्जियां न खाएं।  पत्तों में छोटे-छोटे कीड़े होते हैं।
 भादों में बरसात होती है अतः इन दिनों मट्ठे का प्रयोग वर्जित है।
 क्वार में करेला नहीं क्योंकि इसमें भी इन दिनों कीड़े होते हैं और अधिक पित्त बनता है।
 कार्तिक में दही खाने से कफ बनता है।
 अगहन में जीरा वर्जित है। पौष में धान, माघ में मिश्री और फागुन में चना निषेध है।
 इन बारह खाद्य से इन बारह महीनों में जो स्वयं को बचा ले उसके घर वैद्य कभी नहीं जाता।

आरोग्य का आश्वासन, स्वास्थ्य के सूक्त, वात, पित्त, कफ का संतुलन और ज्ञान आदि आयुर्वेद में निहित है जिसे जनसामान्य में उतारने के लिए मुहावरों का प्रयोग कितना हितकारी है इसे समझना और पालन करना लाभदायक है।

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