ओ मेरे बचपन के साथी - प्राण शर्मा

प्राण शर्मा

 - प्राण शर्मा

ओ मेरे बचपन के साथी
तेरी चिट्ठी के उत्तर में
तुझको कुछ बातें लिक्खी हैं
जिनको पढ़कर,जिनको गुन कर
शायद तुझ में हिम्मत जागे
शायद तेरी किस्मत जागे
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मन के अनचाहे कोने से
कंकर - पत्थर ही ढोने से
अपनी किस्मत को रोने से
केवल तन को ही धोने से
आठों पहरों ही सोने से
दुःख को हरना नामुमकिन है
दुःख से उबरना नामुमकिन है
ओ मेरे बचपन के साथी
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पस्ती के नग़मे मत गाना
असफलता से मत घबराना
आलस का पुतला दफ़नाना
धुंध मिटाना , राह बनाना
सोच - समझ कर बढ़ते जाना
बढ़ते जाना , भूल न जाना
रस्ता जाना और पहचाना
ओ मेरे बचपन के साथी
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क्यों खोया सा हो तेरा मन
क्यों ना फुरतीला सा हो  तन
जीवन में कठपुतली मत बन
बन जैसे होता है चन्दन
ख़ुशी करे तेरा अभिनन्दन
तेरी हर इक चाह खिलेगी
तुझको वांछित चीज़ मिलेगी
ओ मेरे बचपन के साथी
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जब भी कोई मीत बनाना
सच्चे मन से साथ निभाना
साथ निभाना, भूल न जाना
अच्छे दिनों का सब याराना
हर इक के मन को तू भाना
हर साथी का साथ मिलेगा
यारी का हर रंग खिलेगा
ओ मेरे बचपन के साथी
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जब तेरे मन में बल होगा
उजला तेरा हर पल होगा
पल तो क्या उजला कल होगा
हर मसले का ही हल होगा
जीवन भी मीठा फल होगा
तेरी जीत का शंख बजेगा
एक नया इतिहास रचेगा
ओ मेरे बचपन के साथी
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धोते जाना पथ की काई
भरते जाना हर इक खाई
खुश हो तुझ पर श्रम की माई
तेरा जीवन हो सुखदाई
होती है जैसे पुरवाई
तेरे सिर पर ताज सजेगा
चारों तरफ संगीत बजेगा
ओ मेरे बचपन के साथी।