संख्या और संख्या प्रतीक - अनुराधा शर्मा

अनुराधा शर्मा

संख्यापरक प्रतीक: अभिप्राय तथा स्वरूप:

भाषा मानव को प्रकृतिप्रदत्त अमूल्य निधि है। मानव इस सृष्टि का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी है। वह अपने भावों के प्रकटन हेतु भाषा का व्यवहार करता है। यही नहीं, अपने भावों का प्रभावोत्पादक प्रकाशन करने के निमित्त मानव भाषा को विभिन्न उपदानों से संशोधित संवर्धित कर अपने मनोभावों का उद्घाटन और आधिक प्रभान्वित रूप में प्रस्तुत करता रहा है। मानव ने भाषा को कभी गद्य तो कभी पद्य रूप में प्रस्तुत किया है, इस गद्य एवं पद्य रूप मे भी अनेक भाषिक प्रयोग करने में निरंतरता से जुटा रहा है, कभी छन्द कभी अलंकार का प्रयोग कर वह भाषा को अपने अभीष्ट भावों के वहन योग्य बनाता रहा है। उसका मनोरथ सदैव अपने भावों का स्पष्टीकरण ही रहा है, इसी प्रक्रिया में उसने प्रतीकों का प्रयोग किया। वास्तव में यह जीवन ही प्रतीक है। इसलिए इस जीवन से संबंधित वस्तु घटना आदि भी किसी प्रतीकार्थ को ही संकेत करती है। प्रतीकों का भी मानव ने अनेक प्रकार से प्रयोग किया है, जिन में संख्याओं का प्रतीकात्मक रूप भी दर्शनीय है। प्रत्येक संख्या को मनुष्य ने हर क्षेत्र में अपने भावों एवं सुविधानुसार अर्थ दे दिया है, वह क्षेत्र चाहे आध्यात्मिक हो या दार्शनिक, सामाजिक हो या राजनैतिक, सांस्कृतिक हो या साहित्यिक अथवा वैज्ञानिक, इन सभी क्षेत्रों में संख्यापरक शब्दावली अपने भिन्न-भिन्न प्रतीकार्थों को लेकर चलती है। यह शब्दावली प्रतीक रूप में प्रत्येक क्षेत्रांतर्गत अपना अलग-अलग अस्तित्व रखती है। परन्तु साहित्यिक क्षेत्र में इसका विशेष स्थान है। इसका प्रयोग वैदिक साहित्य से प्रारम्भ होकर अब तक एक लंबी परंपरा में होता रहा है। मनुष्य अपनी जिज्ञासु मनोवृति के प्रभावांतर्गत ही विभिन प्रकार से प्रतीकों का प्रयुक्तिकरण करता है, संख्याओं को प्रतीक रूप में प्रयुक्त कर वह इसी जिज्ञासु प्रवृति का शमन करता है।


संख्या प्रतीक में 'संख्या' शब्द क्या स्थान रखता है, उसका क्या भाव है - इन विभिन्न दृष्टिकोणों का पर्यालोचन करना आवश्यक हो जाता है जिस से संख्यापरक प्रतीक का स्वरूप निर्धारित हो सके।


संख्या अर्थ तथा महत्व:

संख्या शब्द का विभिन कोशों से पर्यवलोकन करने के उपरांत स्वरूप निर्धारण किया जा सकता है। इसके लिए संख्या शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ, विभिन्न कोशगत अर्थ, प्रचलित अर्थ, संख्या का सांख्य से सम्बंध एव संख्या और अंक का अंतर आदि दृष्टिकोणों का पर्यवेक्षण करना आवश्यक हो जाता है।


संख्या अर्थ:

'संख्या' शब्द के अर्थ को तीन दृष्टिकोणो से निर्वचित किया जा सकता है- व्युत्पत्तिपरक अर्थ, कोशगत अर्थ एव प्रचलित अर्थ। इनको उद्घाटित करने के उपरांत ही संख्या शब्द का स्वरूप स्पष्ट होने में सहायता प्राप्त होगी।


व्युत्पत्तिपरक अर्थ:

विभिन व्युत्पत्तिपरक कोशों के अनुसार'सम' पूर्वक 'ख्य' धातु से अंङ् प्रत्यय और टाप्* होकर संख्या पद व्युत्पन्न हुआ है- सम् + ख्य + अंङ् + टाप्। इस व्युत्तपति में 'सम्' एव 'ख्या' शब्द ध्यान देने योग्य हैं सम् से भाव है2 कोई कुछ, हर एक सब, नि:शेष, समग्र समतल, समान, सदृश्य, समानांतर, निष्पक्ष, सामप्रतीक, उचित। दूसरी और 'ख्या' से भाव है (प्रकथने, ख्याति, ख्यात), कहना, बताना।3 इस प्रकार 'संख्या' पद की व्युत्पति पर विचार करने के उपरांत जो अर्थ सामने आता है वह है - 'पूर्ण विचार जिसे 'सम्यक विचार' भी कह सकते हैं अथवा किसी के सदृश्य, समानांतर कुछ कहना, माना जा सकता है।


कोशगत अर्थ:

विभिन्न संस्कृत कोशों में संख्या शब्द के अनेक अर्थ दिये गए हैं गणना, गिनती, अंक, जोड़, हेतु, अंकबोधादि, शब्दकल्पद्रुम आदि विविध कोशों में संख्याशब्द के अथों में कुछ विलक्षण अर्थ भी उद्घाटित हुये हैं जिनका उल्लेख आगे किया जाएगा।


हिन्दी शब्दसागर के अनुसार,‘संख्या शब्द वस्तुओं का वह परिणाम है जो गिनकर जाना जाए, जैसे एक, दो तीन चार आदि की गिनती। एक अन्य अर्थ मे संख्या, वैद्यक में संप्राप्ति के पाँच भेदों में से एक भेद है, यही नहीं, संख्या के लिए संग्राम भी एक अर्थ कहा गया हैमानक हिन्दी कोश में भी संख्या के लिए गिनती तादाद, राशि आदि अर्थ मिलते हैं।


हिन्दी विश्वकोश में ऐतिहासिक संबद्ध दृष्टिकोण से संख्या की विचारधारा प्राकृतिक संख्याओं 1,2,3, के अनुक्रम से है सामान्यत: संख्या का अर्थ घनात्मक पूर्णांक वास्तविक राशि या घनात्मक पूर्णांकों या वास्तविक संख्या के विन्यास के अनेक अमूर्त, गणितीय व्यापकीकरणों में से एक से संयोजित तत्व है।7


राम चंदर वर्मा के अनुसार संख्या उसी ख्या’ से बना हुआ शब्द है, जिसका अर्थ है ज्ञात या परिचित कराना, नाम स्थिर करना, पुकारना आदि। इसी से आख्या, उपाख्यात, ख्याति सरीखे शब्द बने हैं। इसका मुख्य अर्थ है – वह मान या राशि जो गिनने या हिसाब लगाने पर निश्चित हुई हो8। इसके अतिरिक्त पालि9 एवं अपभ्रंश10 में संख्या शब्द के लिए `संखाशब्द प्रयुक्त हुआ जिसका अर्थ गिनती कहा गया है।


प्रचलित एवं नवीन अर्थ:

`संख्या' शब्द के इन कोशगत अर्थों के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि मुख्य रूप से संख्या शब्द गिनती, तादाद, राशि, अंक आदि के लिए हैं, यथा अवलोकनीय हैं – प्रेक्षा, प्रज्ञा, प्रतिभा, धी:, धिषणा, मनीषा, बुद्धि, मति, मेघा, संवृत, उपलब्धि, विचारणा11

अमरकोश में संख्या पद को चर्चा और विचारणा पदों का पर्याय कहा है - `चर्चा संख्या विचारणाजिसका भाव है सम्यक प्रकथन या विचार12


इस प्रकार विभिन्न अर्थों का अवलोकन करते हुये संख्या शब्द के लिए `गिनती'एवं `प्रज्ञाके रूप में मुख्य अर्थ उद्घाटित होते हैं, जिनमें `गिनतीपरंपरागत अर्थ और `प्रज्ञाविलक्षण एवं नवीन अर्थ है।


संख्या परिभाषाएँ:

संख्या को परिभाषित करने का प्रयास विभिन्न दृष्टियों से किया गया है। सर्वप्रथम महाभारत में और उसके बाद सांख्यशास्त्र से संबन्धित विवेचन के अंतर्गत ही संख्याशब्द को परिभाषित किया गया है -


क) किसी वस्तु के दोषों एवं गुणों का विवेचनपूर्वक ज्ञान प्राप्त करना संख्या कहलाता है। महाभारत में यह उल्लेख प्राप्त होता है।

दोषाणाम च गुणाणाम च प्रमाणम प्रविभागत:।

कञचदर्थमभिप्रेत्य सा संख्येत्त्युपधार्यताम13


ख) `संख्यासे भाव है `तत्वज्ञान– सांख्यशास्त्र में संख्या (तत्वज्ञान) को मोक्ष का साधन

मानकर मूलभूत सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया गया है।

संख्याम प्रकुर्वतेचैव प्रकृति च प्रचक्षते।

तत्वानि च चतुर्विंशत्तेन सांख्या: प्रकीर्तिता :14


ग) संख्या को ज्ञानार्थक पद भी कहा गया है 15


घ) प्राय: गणनार्थक संख्या से सांख्य शब्द की व्युत्पत्ति मानी जाती है परंतु इसका सुन्दरतम और वास्तविक अर्थ है विवेक ज्ञान16


ढ़) ''संख्या की सुन्दरतम व्याख्या है विवेक ज्ञान''17


इस प्रकार विभिन्न परिभाषाओं में `संख्यापद के लिए एक ध्वनि `ज्ञानके भाव में मानस पटल में उद्वेलित होती है। इस `ज्ञानमें प्रज्ञा एवं विवेक अंतर्निर्विष्ट हैं।


समग्रत: `संख्या'को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है - `संख्यामानव मस्तिष्क से उद्बुद्ध वह उद्गार अथवा विचार बिन्दु है जो प्रज्ञा विवेक एवं प्रतिभा का समुज्ज्वल रूप उद्घाटित करता है। भाव यह कि संख्या में मानव की ही बुद्धि,विवेक एवं प्रतिभा के सार तत्व का साक्षात्कार होता है।


उक्त विवेचन से यह भी सिद्ध होता है कि संख्या सांख्य से अंतर्ससंबंधित है तथा संख्या और गिनती अथवा अंक में अन्तर हैउसका विवेचन भी आवश्यक है।


संख्या तथा सांख्य:

सांख्य षड्दर्शन कहे जाने वाले दर्शनों में से एक हैजिसके प्रणेता कपिल मुनि हैं। सांख्य शब्द संख्या पद से अत्यधिक संबन्धित है, अत: संख्या पद का संख्या के सन्दर्भ में सम्बन्ध उद्घाटित करना आवश्यक है जिससे संख्या के स्वरूप की दिशा को गति मिलेगी।


सांख्य शब्द संख्या पद से तस्येदमसूत्र द्वारा अण प्रत्यय करने पर निष्पन्न होता है,जिसका अर्थ है गणना से संबन्धित अथवा गणना से जानने योग्य18। सांख्य दर्शन में प्रकृति के चौबीस तत्वों का परिगणन है जो मानव बुद्धि का स्वभावत: विषय है

संख्याम प्रकुर्वेतेचैव प्रकृति च प्रचक्षते

तत्वानि च चतुविंशत्तेन सांख्या: प्रकीर्तिता:14


प्राय: यह धारणा रही है कि सांख्य दर्शन में तत्वों की गणनात्मक संख्या को महत्व दिया गया है और इसीलिए इस शास्त्र को सांख्य कहा गया है, परन्तु यह मानना उचित नहीं है क्योंकि तत्वों का परिगणन अन्य दर्शनों में भी किया गया है, परंतु कुछ विद्वानों ने इस दर्शन में व्यवहृत संख्या को सम्यक प्रकाशन या विचार कहा है, जो तत्व ज्ञान में सहायक है। संख्या से भाव तत्वज्ञान कहा गया है। अत: इस दर्शन का नाम सांख्य इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी विवेचना का मुख्य उद्देश्य तत्व विचार है20इस प्रकार संख्या पद का संख्या से गहरा सम्बंध बैठता है।


संख्या तथा अंक:

विविध कोशों में संख्या के लिए अंक भी पर्याय रूप में प्रस्तुत हुआ है परंतु अंक और संख्या में अन्तर देखा गया है। संख्या और अंक में ध्यान रखने योग्य दो मुख्य अन्तर हैं।21 एक तो संख्या मूलत: अर्थ की दृष्टि से वहीं तक सीमित है जहाँ तक हम उसके वाचक शब्दों का उच्चारण करते हैं अर्थात यह उच्चारण ध्वनि मात्र का वाचक है परन्तु इन ध्वनियों के लिखित रूप अंक कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त तात्विक दृष्टि से 1 से 9 तक लिखे जाने वाले सब शब्द और दहाई की सूचक बिंदी ही अंकों के अन्तर्गत आती हैपरन्तु संख्या के सन्दर्भ में ऐसा कोई भी बन्धन नहीं, संख्याएँ सैकड़ों

हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों और इससे भी अधिक तक हो सकती हैं। सांख्य दर्शन में कदाचित इसीलिए अंक शब्द का व्यवहार नहीं हुआ है। आज चाहे अंक एवं संख्या एक दूसरे के पर्याय के रूप में चल पड़ेे हैं परंतु सूक्ष्मतर दृष्टि से संख्या तथा अंक में अन्तर विद्यमान है।


संख्या: महत्व

संख्या की महती चिन्तनधारा को सर्वप्रथम गति देने वाले भारतीय थेजिन्होंने सर्वप्रथम `शून्य'को महत्वपूर्ण सथान प्रदान कर तत्सम्बन्धी विचारों के प्रयोजनों में वृद्धि की। भारतवर्ष में संख्या का प्रतीक रूप में व्यवहृत करने तथा वस्तुओं को संख्याओं में बांधने की कला परम्परा से विद्यमान है जिसे भारतीय संस्कृति ने सादर स्वीकृत किया है। अत: संख्याओं में भारतीय संस्कृति के विशद दर्शन होते हैं। संख्याओं द्वारा प्रस्तुत प्रतीकों को व्याख्यायित करना एक जटिल कार्य है क्योंकि उनका कोई ठोस आधार सिद्ध नहीं किया जा सकता। संख्याएँ लौकिक, मिथकीय एवं अभिप्रायपरक विचारों को आधार बनाकर प्रतीकों को प्रस्तुत करती हैं। मिथक एवं अभिप्राय में भारतीय संस्कृति को सुरक्षित भी माना गया है। हर संख्या भारतीय साहित्य एवं संस्कृति में अपना अस्तित्व बनाए हुये हैं। जिस प्रकार इस अति वैज्ञानिक युग में मानव विभिन्न शक्तियों का स्वामी बन चुका है, सृष्टि के पहलुओं से परिचित हो गया है परन्तु इस सृष्टि की चालक शक्ति को मानव ने ईश्वर का नाम दिया है – वह परम नियंता ही सृष्टि को नियंत्रित एवं चालित करता हैं – ऐसा मात्र विश्वास के आधार पर माना गया है, इसका कोई ठोस आधार सिद्ध नहीं किया जा सकता,उसी प्रकार संख्याएँ भी विश्वास पर आधारित हैं तथा यही आधार सर्वोच्च है। यदि संख्या के महत्व को न्यून करके आँका जाये अथवा कहा जाये कि संख्या का महत्व शून्य है, तो यह उचित न होगा क्योंकि यदि इन संख्याओं को परंपरा से चले आ रहे साहित्य से अलग कर दिया जाए तो परिणामत: पूर्व का प्रभाव एवं वैशिष्ट्य जो संख्यओं के प्रयुक्तिकरण से निर्मित हुआ है वह नष्ट हो जाएगा। क्या यह संभव है कि, वेदों में व्यवहृत “एकोsहम बहुस्वामी” में से एक” संख्यावाचक को अलग करने के उपरांत भी वही प्रभावोत्पादक अर्थ प्रतिपादित हो सके अथवा द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षम परिषस्वजाते'' मंत्र में द्वा संख्यावाचक को हटाकर उसी पूर्व अर्थ एवं सौंदर्य को उद्घाटित किया जा सके? यदि ऐसा किया जाए तो यह शलोक अधूरे एवं अनर्थ प्रस्तुत करने वाले प्रतीत होंगे। इस प्रकार संख्याएँ भारतीय साहित्य, समाज एवं संस्कृति में अपना स्थान दृढ़ कर चुकी हैं। उनके महत्व को शून्य मानकर चलना उचित न होगा। प्रत्येक संख्या दूसरी संख्या से भिन्न है कोई संख्या किसी दूसरी संख्या का स्थान ग्रहण नहीं कर सकती जैसे एक से भाव है, ईश्वर एक है दूसरी तरफ 'तीन' संख्यावाचक त्रिदेव का प्रतीक प्रस्तुत करता है। दोनों संख्याएँ भिन्न-भिन्न संकेत देती हैं परन्तु एक अभिप्रायपरक है तो दूसरी मिथक पर अधारित है। समग्रत: संख्यापरक शब्दावली प्रज्ञावानों, कवियों, लेखकों आदि को अपने भाव अधिक प्रभान्वित ढंग से प्रस्तुत करने का आधार देती है इसलिए वेदों, पुरानों महाकवियों से ले कर अब तक संख्यापरक शब्दावली के प्रयोग में नैरर्न्त्य के दर्शन होते हैं। संख्याओं को कवि शिक्षा हेतु वर्णित करने का भी संकेत प्राप्त होता है रीतिबद्ध परंपरा के क्रम में आचार्य पदुमनदास कृत काव्य मंजरी तथा अरिसिंह अमरचंद यति कृत कव्य कल्पलातासूत्रवृत्ति कवि-शिक्षा के महत्वपूर्ण ग्रंथो में से है। कल्पलातासूत्रवृत्ति के अर्थ सिद्ध प्रतान के षष्ठ स्तबक के अंतर्गत, संख्याधृत अर्थोत्पत्ति का विवरण दिया गया है। एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह, तेरह, चौदह, पंद्रह, सोलह, सत्रह, अठारह, उन्नीस, बीस, सौएवं सहस्र तक संख्याओं के विभिन्न अर्थों को कवि शिक्षा हेतु वर्णित किया गया है 22


'प्रतीक' मनुष्य के अन्तर्मन से यथार्थ जगत में प्रकृति, जीवन, परम्परा, समाज, संस्कृति, विचार, अनुभव आदि के सहचर्य से उत्पन्न विविध भावनाओं आदि के प्रस्तुतिकरण का माध्यम है, जो अपने में व्यापक भावों को समेट कर सहृदय पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है, जिससे तुरन्त ही वह भाव उद्घाटित हो जाता है। संक्षेप में, 'प्रतीक' बहुत कुछ को `कुछ' में प्रस्तुत करने की शैली है।

संख्या – प्रतीक:
संख्या-प्रतीक से क्या भाव है, उसकी प्रकृति अथवा क्षेत्र क्या हैं, उनका उद्गम स्रोत कौन सा है एवं क्या यह प्रतीक अपनी अभिव्यंजना में सफल हैं तथा इनका स्थान क्या है– इन विविधेन अपेक्षाओं का विवेचन ही संख्या प्रतीक के महत्व को प्रतिपादित करने में सहायक सिद्ध होगा।

संख्या प्रतीक: अर्थ एवं प्रकृति:
`संख्या' से संबन्धित विवेचन से यह स्पष्ट हुआ कि मूलत: `संख्या' से भाव - `प्रज्ञा' है जो वस्तुत: ज्ञान और विवेक का समुचित समन्वय है, साथ ही प्रज्ञा का यह रूप कालांतर में अंकों के रूप में अधिक अभिव्यक्त हुआ और आगे चलकर मात्र अंक ही संख्या के द्योतक बने, और `प्रतीक' मानव मन की सूक्षमतर भावनाओं का एक मूर्त विधान है जो, अप्रस्तुत को प्रस्तुत के माध्यम से इस प्रकार व्यक्त करने की क्षमता वहन करता है कि उसमें अभीष्ट भाव की व्यापकता का उद्घाटन हो जाता है। अत: 'संख्या' और 'प्रतीक' के योग से निर्मित संख्या-प्रतीक वह प्रतीक कहे जा सकते हैं, जो ज्ञान और विवेक से समादृत होने के उपरांत ही मानव मस्तिष्क की उर्वर विचार भूमि से उसके मन में उद्वेलित सूक्ष्म भावनाओं को मूर्त कर उन्हें एक वैचारिक आयाम प्रदान करते हैं। भाव यह है कि मन के विचार जो एक सम्पूर्ण एवं प्रभावोत्पादक प्रबल व्यंजना की अपेक्षा करते हैं, वहाँ बुद्धि की समग्रता अथवा उसका निचोड़ अपेक्षित होता है। ऐसा नहीं है कि मात्र संख्या-प्रतीक ही प्रभावोत्पादक आभिव्यंजना के माध्यम हैं, बल्कि अन्य प्रतीक भी उसमें सक्षम हैं, साथ ही भावाभिव्यक्ति के अन्य साधन भी उपलब्ध हैं। परंतु जहाँ बुद्धि का प्रबलतम कार्य हो, जहाँ भावनाओं का साम्राज्य नहीं बल्कि बुद्धि का एकछत्र प्रयोग हो, जो बाद में मानस धरातल पर अवतरित होकर उसमें उत्पन्न भावनाओं का नेतृत्व कर सके, वह संख्या प्रतीक ही हैं। उदाहरणार्थ यदि सम्पूर्ण इंद्रियों को प्रतीक रूप में निरूपित करना हो तो, कलाकार अपनी `प्रज्ञा' के साहचर्य से जाँच-परख कर दस संख्यावाचक के सहयोग से उसे प्रस्तुत करता है। जब एक विद्वान पाठक, उस दस संख्या को इंद्रियों के संदर्भ में खोलता है तो उसमें पाँच कर्मेन्द्रियों तथा पाँच ही ज्ञानेन्द्रियों का योग प्रत्यक्ष होता है। इंद्रियों की यह दोनों कोटियाँ अपनी प्रकृति और कार्य के कारण पृथक कही जाती हैं। साधारण पाठक इसे दस इंद्रियाँ कहकर व्याख्यायित कर देगा, परंतु वह कलाकार द्वारा निरूपित सम्पूर्ण सम्यक विचार को समझ नहीं पाता। अत: कलाकार अपने इस प्रयोग की सूक्ष्म दृष्टि से विवेचना की उपेक्षा करता है। यहाँ यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि,कलाकार इन प्रतीकों के निर्माण के लिए अपनी प्रज्ञा को प्रस्तुत करता है।

संख्या प्रतीक अपने आप में भावभिव्यंजना का एक विलक्षण माध्यम हैं, परंतु इसे विद्वानों ने मात्र अंक-प्रतीक समझ कर ही व्याख्यायित किया है, जो न के बराबर है, संख्या-प्रतीकों की इस महती विचारधारा को कम करके आंकना समीचीन नहीं है।

संख्या-प्रतीक: उद्गम स्रोत:
वेद साहित्य को प्रदत्त अमूल्य एवं अक्षय निधि कोश हैं, जिनमें दर्शन, विज्ञानादि जैसे अनुपम एवं अद्वितीय माणिक-मोती बिखरे पढ़े हैं। वेद साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ हैं। अत: उनमें निहित समस्त ज्ञान, मंत्र, यज्ञादि, उनमें व्यवहृत भाषा और उसके अलंकरण, साहित्य की प्रथम प्रयुक्ति कहे जा सकते हैं। इसलिए वेद विभिन्न दर्शनों एवं प्रयोगों उद्गम स्रोत भी हैं, संख्या प्रतीक के संदर्भ में यदि वेदों की ओर दृष्टिपात किया जाये तो यह प्रत्यक्ष होता है कि इस सम्पूर्ण सृष्टि के आदितम और सर्वशक्तिमान परमतत्व-परमात्मा को संबोधित करने के लिए `एक' संख्यावाचक को प्रयुक्त कर भाव व्यक्त किया गया है, यथा अवलोकनीय है –एक सद विप्रा बहुधा वद्न्ति23, भाव यह कि वह परमात्मा एक ही सत्त तत्व है पर उसका वर्णन ज्ञानी अनेक तरह से करते हैं, वह तो दिव्य सुपर्ण और गुरुतमान है। दो संख्यापरक शब्दावली को प्रतीक रूप में व्यवहृत करते हुए द्वा सुपर्णसयुजा सखाया सामानं वृक्षम परिवस्वजाते:24। कहकर परमात्मा और जीवात्मा का अन्योन्य सम्बंध प्रकाशित किया गया है कि दो पक्षी (परमात्मा-जीव) प्रकृति रूपी वृक्ष पर एक साथ रहते हैं। परमात्मा संसार से निर्लिप्त है मात्र प्रकाशित होता रहता है तथा सदैव दूसरे पक्षी (जीव) की मित्रवत सहायता करता है जबकि दूसरा पक्षी संसार में आसक्त है। ऋग्वेद का सूक्ष्म अधयन करने के उपरांत उनमे छिपे संख्या प्रतीक प्रत्यक्ष होते जाते हैं जो भाव कि सुंदरता को द्विगुणित कर देते हैं यथा सूर्य के संदर्भ दो उदाहरण द्रष्टव्य हैं25

सूर्य का बरहमासा वाला चक्र निरंतरता से घूमता है, इतनी गति के पश्चात वह टूटता नहीं है न ही शिथिल होता है। इस सूर्य के दिन और रात रूपी सात सौ बीस जोड़े पुत्र (360 दिन एवं 360 रात) सदैव कार्य करते रहते हैं। सूर्य पिता कहा गया है जिसके पाँच पैर हैं एवं बारह आकृतियां हैं, पाँच पैर से भाव है अयन, मास, ऋतु, पक्ष दिन तथा बारह आकृति से भाव बारह महीने हैं। एक अन्य उदाहरण में काव्यमयी वाक26 से सम्बनिधत अत्यंत सुंदर संख्यापरक प्रतीक वेदों मे देखा जा सकता है—काव्यमयी वाक’ (काव्य-वाणी) को, दो, चार, आठ, नौ एवं हजारों पदों वाली गौ का प्रतीक दिया गया है, इसकी सीमा अनंत है, समस्त व्योम में व्याप्त होने वाली है। एक अन्य उदाहरण में – प्रकृति के सात पुत्र उल्लेखित हुए हैं 27। मन, प्राण एवं पंचभूत - जिनसे यह समस्त सृष्टि निर्मित है। विश्व में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो मन प्राण एवं पंचभूतों से रहित हो इन सब उदाहरणों से यह प्रत्यक्ष होता है कि संख्या–प्रतीकों के उद्गम वेद ही हैं।

इनका उद्गम वेद ही कहे जा सकते हैं, इतना अवश्य है कि काल परिवर्तन के साथ-साथ प्रभाव- ग्रहण में भी अंतर स्वत: आता गया। उनके द्वारा नि:सृत प्रयोग तो शुद्ध एवं पवित्र प्रतीत होते हैं, अत: भारतीय संस्कृति के प्रत्येक पक्ष पर वेदों की शाश्वत भावना का ही प्रथम प्रभाव है अन्यत्र किसी का नहीं।

संख्या-प्रतीक: महत्व निरूपण:
संख्या-प्रतीक, अभिव्यंजना के सफल माध्यम रूप हैं अथवा असफल, इनका साहित्य को क्या योगदान हैएवं वर्तमान साहित्य में इनका कोई अस्तित्व शेष हैं अथवा नहीं? इन सब प्रश्न-अपेक्षाओं का उतर निर्धारण करना आवश्यक हो जाता है।

मानव-प्रकृति सदैव विशिष्ट से भी विशिष्ट की कामना करती रही है। नवीन से भी नवीन प्राप्त हो जाए तो पहले वाला अपेक्षाकृत कम महत्व का अधिकारी हो जाता है। समय के चक्र के साथ कई नवीनताओं का समावेश हो जाता है और पहले वाला बहुत पीछे रह जाता है परंतु फिर भी उसका महत्व यथास्थान बना रहता है। इसी प्रकार संख्या-प्रतीक भी पुरातन कालों से व्यवहृत होते आ रहे हैं यद्यपि वर्तमान समय ने इनका प्रयोग महत्व नहीं पा रहा तद्यपि ये प्रतीक भारतीय प्राचीनतम संस्कृति के द्योतक हैं। इनके प्रयुक्तिकरण की यात्रा वेदों से आरम्भ होकर एक लंबी परंपरा में अपना स्थान निर्धारित कर चुकी है। जहाँ ' काव्य', धर्म एवं भक्ति से संबन्धित था, वहाँ काव्य को सँवारने के साधनों की उपेक्षा, काव्यों के भावों को प्रभावी रूप से व्यंजित करने के साधनों को खोजा जाता है। यदि इन प्राचीन कालों की ओर देखा जाये तो यह स्पष्ट होता है कि उन कालों के काव्य में संख्या प्रतीक पूर्णतया रच बस गए थे क्योंकि यह प्रतीक एक साथ बहुत कुछ अवभिव्यक्त करने में सक्षम थे। उदाहरणार्थ एक कलाकार द्वारा प्रयुक्त पाँच तत्व प्रतीक रूप को पाठक मात्र यह मानकर संतुष्ट नहीं होता की, तत्व पाँच होते हैं, अपितु वह पाँच में समाये हुये एक, दो, तीन एवं चार (तत्वों) को जानने का भी प्रयास करता है, कलाकार को इसी की अपेक्षा होती है। प्राचीन कालों में धर्म, संस्कृति एवं भक्ति को जानने वाले इन प्रतीकों का सार ग्रहण कर लेते थे। समय-समय पर पंडितों, संतों द्वारा इनकी व्याख्याएँ होती रहती थीं। श्रोता अथवा पाठक इन प्रतीकों को उत्सुकता-वश सुनते या पढ़ते थे, वक्ता अथवा रचनाकार भी सहज रूप से समस्त विचारों को इनके माध्यम से स्पष्ट करता था और श्रवण करने वाला भी रोचकता के साथ सम्पूर्ण प्रभाव ग्रहण कर लेता। संख्या-प्रतीक अपनी अभिव्यक्ति में सफल थे, तभी इनका प्रयोग बहुलता से हुआ। यदि सम्पूर्ण संत-काव्य का अध्ययन संख्या प्रतीकों के संदर्भ में किया जाये तो इन प्रतीकों के प्रयोग का स्वत: एक ग्रंथ निर्मित हो जाएगा। वास्तव में यह प्रतीक-शैली रोचकता को बनाए रखती है, क्योंकि निगूढ़ एवं दार्शनिक विषयों को ग्रहण करना सहज नहीं है, रोचक तत्वों के माध्यम से प्रस्तुत करने पर ही उक्त विषय सामान्य जन द्वारा ग्रहित हो सकते हैं।

वर्तमान युग की जटिलताओं एवं दुरूहताओं के बीच यथार्थ-दुनिया को भुगतते हुए संवेदनात्मक अभिव्यक्ति के क्षेत्र में आज के कवि को गहरे स्तर पर जूझना पड़ता है। अनुभव का नयापन, अभिव्यक्ति प्रक्रिया में एक सर्वथा नए अभिव्यक्तिगत संसाधनों की मांग करता है, संख्या प्रतीक की यह पुरातन अभिव्यंजना शैली इस नवीन संसार में अपने को अजनबी ही मानेगी। आज संख्या प्रतीकों का पुरातन अर्थों में प्रयोग तो नहीं है परंतु परिवर्तन के साथ उनके प्रतीक नवीन हो गए हैं। उदाहरणार्थ कैलाश वाजपायी की कविता संक्रान्त28 से कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -
त्रस्त सभ्यता के विक्रांत अंधकार में / वहाँ जहाँ अभी एक
तटस्थ किरण फूटी थी / देखता हूँ अकस्मात
`एक सर्प' सरक आया है

यहाँ `एक सर्प' से भाव है `मृत्यु', जो मानव की सम्पूर्ण सुरक्षा को डस लेता है। इस प्रकार वर्तमान कवियों ने संख्याओं को प्रतीक रूप में प्रयुक्त किया भी है तो उनके ज्ञान युक्त भावों को पूर्ण रूपेण परिवर्तित कर दिया है इस परिवर्तित काव्यमायी सृष्टि में डा नरेश रचित अध्यातम सतसई, ऐसी रचना है जो इस नव्य आधुनिक काव्य जगत में पुरातन संस्कृति को जागृत-जीवंत करने का प्रयास करती दिखाई देती है। आज छंदों के बंधन से मुक्त हो चुकी कविता परिवर्तित होकर अकविता का दायरा भी पार कर चुकी है, वहाँ पहुँच कर डा. नरेश द्वारा दोहा-शैली के माध्यम से संख्या-प्रतीकों का प्रयोग कर सतसई की रचना करना सर्वथा श्लाघनीय कार्य है। अध्यात्म सतसई में शरीर ज्ञान के अंतर्गत वे -
''पंचभूत तन में पंचतत्व भण्डार,
ध्यान योग से चेतना जाने इनका सार 29'' 158
के द्वारा शरीर के अंतर्गत पाँच कोष एवं पाँच तत्वों का वर्णन करते हैं। शरीर में ही विध्यमान सप्त-चक्र को उन्होंने–
''सूक्षम प्राण के केंद्र हैं चक्र सात तन माहिं,
सुप्त अधोमुख पदमवत जगे ध्यान बिनु नाहिं 30'' 164
कहकर प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त देह के तीन आभूषण (हृदय, चेतना, बुद्धि), धर्म के दस लक्षण, तीन वृतियाँ, चित के तीन रूप (जागृत, स्वप्न, सुशुप्त) त्रेः गुण, अष्टांग योग, पाँच यम, पाँच नियम, पन्द्रह तिथि के अंतर्गत – तीन ताप, पाँच इंद्रियाँ षट दर्शन, सात स्वर, आठों याम, नवग्रह, दश द्वार, ग्यारह रूद्र, द्वाद्श सूर्य, चौदह भुवन का उल्लेख मिलता है31 पाँच तलों 32 को वर्णित करते हुए वे कहते हैं –
पूर्व साधना चार तल जब तक हों नहीं पार,
पंचम तल की कामना तब तक है बेकार॥ 451

यह पाँच तल हैं – जागृति, चेतना, संकल्प, दीक्षा, साधना। कोटि चतुष्ट्य के संदर्भ में वे कहते हैं –
'चार कोटियों में बँटा यही साधना पंथ।
जिनके वर्णन के लिए लिखे गए शत ग्रन्थ33॥ 582

निष्कर्ष
समग्रत: यह स्पष्ट हो जाता है कि संख्या-प्रतीक शैली को रचनाकार वर्तमान बोध के संदर्भ में भुला चुके हैं परंतु संख्या-प्रतीक अपना महत्व यथास्थान बनाए हुए हैं। डा. नरेश का प्रयास इसका अन्यतम उदाहरण है। इन प्रतीकों जैसी संक्षिप्तता, सारगर्भिता, सटीकता एवं पैनापन चिरस्मरणीय है, जो पुरातन संस्कृति के दर्पण सदृश्य हैं। यह प्रतीक सांस्कृतिक एवं तात्विक महत्व को प्रतिपादित करने वाले हैं तथा इनका आधार निसन्देह आत्मज्ञान ही है इसलिए इन में अध्यात्म, चिंतन-धारणागत अनुभूति तथा अंतर्दृष्टि का सम्मिश्रण प्रत्यक्ष होता है। अत: संख्या-प्रतीक अनेकत्व में एकत्व की स्थापना करने वाले हैं।

संदर्भ ग्रंथ/ उद्धरण सूची

1 क) शब्दकल्पद्रुम, भाग-5 सम्पादक राजा राधाकांतदेव (वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सीरीज ऑफिस, सं. 2024), पृ. 216
ख) संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ, सम्पादक चुतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा, पंडित तारणीश झा, (इलाहाबाद: रामनारायन लाल बेनी प्रसाद, 1977), पृ. 162
ग) हलायुध कोश सम्पादक जयशंकर जोशी (लखनऊ: हिन्दी समिति, 1967) पृ. 68
2 संस्कृत-हिन्दी-इंग्लिश कोश सम्पादक सूर्यकांत (नई दिल्ली: ओरिएंट लॉन्गमैन, 1975), पृ. 618।
3 वही, पृ. 172
4 क) शब्दकल्पद्रुम भाग-5 संपादक राजा राधाकांत देव (वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सिरीज़ ऑफिस सं. 2014) पृ. 216
ख) संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ संपादक चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा पंडित तारणीश झा इलाहाबाद : रामनारायण लाल बेनी प्रसाद, 1977), पृ. 201
5 हिन्दी शब्द सागर, भाग-10 संपादक श्याम सुंदर दास (वाराणसी): काशी नागरी प्रचारिणी सभा, 1973), पृ. 4844
6 मानक हिन्दी कोश, सम्पादक रामचन्द्र वर्मा (प्रयाग, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, 1966), पृ. 211
7 हिन्दी विश्वकोश, भाग' - ॥, सम्पादक राम प्रसाद त्रिपाठी (वाराणसी: नागरी प्रचारणी सभा, 1969), पृ. 348
8 शब्दार्थ विचार कोश, सम्पादक रामचन्द्र वर्मा (दिल्ली: राजपाल एंड संज, 1993), पृ. 110
9 पालि हिन्दी कोश, सम्पादक भदंत आनंद कौसल्यायन (दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 1975), पृ. 314
10 अपभ्रंश हिन्दी कोश, सम्पादक नरेश कुमार (गाजियाबाद: इंडो विजन,प्रा0 लि0, 1983), पृ. 1052
11 क) शब्दकल्पद्रुम, भाग-5, सम्पादक राजा राधकांत्देव (पूर्वोकत), पृ. 216
ख) संस्कृत-शब्दार्थ-कौस्तुभ, सम्पादक चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा,पण्डित तारणीश (पूर्वोकत), पृ. 1201
ग) हलायुद्ध कोश, सम्पादक जयशंकर जोशी, पृ. 684
12 अमरकोश, सम्पादक पण्डित शिवदत्त (दिल्ली: चौखम्बा संस्कृत प्रातिष्ठान, 1984), पृ. 56
13 श्रीमन्महाभारतम श्लोकनुक्रमणी, 12.320.82 सम्पादक नागशरणसिंघ (दिल्ली: नाग प्रकाशक, 1992), पृ. 410
14 श्रीमन्महाभारतम श्लोकनुक्रमणी, 12.306.43 सम्पादक नागशरणसिंघ (दिल्ली: नाग प्रकाशक, 1992), पृ. 410
15 सांख्यकारिका, राकेश शास्त्री (दिल्ली: संस्कृत ग्रान्थागार) पृ. 8
16 षडदर्शनम, अनुवादक परमहंस परिव्राजकाचार्य, जगदीशवरानंद (दिल्ली: गोविन्द रामहासानंद, 1988), पृ. 91
17 भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय (वाराणसी: चौखम्बा ओरिएंटियल, 1984), पृ. 251
18 शब्दकल्पद्रुम, भाग-5, सम्पादक राजा राधाकान्तदेव (वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सिरीज़ ऑफिस सं0 2024 ),पृ. 216
19 श्रीमन्महाभारतम श्लोकनुक्रमणी, 12.306.43 सम्पादक नागशरणसिंघ (दिल्ली: नाग प्रकाशक, 1992)
20 सांख्य दर्शनम कपिल मुनि, गजानन शास्त्री (वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत संस्थान,1987), पृ. 9
21 शब्दार्थ विचार-कोश, सम्पादक रामचंद्र वर्मा (दिल्ली: राजपाल एण्ड संस, 1993), पृ. 110
22 अरिसिंह अमरचंदर यति, काव्यकल्पलतासूत्रवृति, 1.5.45-94, सम्पादक पं० जगन्नाथ
शास्त्री (होशिंग: चौखम्बा प्रकाशन, 1931), पृ. 141
23 ब्रह्मऋषि म. म. पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, ऋग्वेद का सुबोध- भाष्य (प्रथम-खंड) (किल्ला पारडी: स्वाध्याय मण्डल, 1983) पृ. 444
24. वही 164/1735/20, पृ 436
25. वही 169/11,164/1727/12 पृ. 433
26. वही 164/1756/41 पृ. 443
27. वही 164/1751/36, पृ. 441
28 कैलाश वाजपेयी, संक्रांत (कलकत्ता भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 1964), पृ. 31
29 नरेश, अध्यात्म सतसई (चंडीगढ़ अनुराग किताब घर, 1996), पृ. 31
30 वही, पृ. 32,
31 वही, पृ 25 से 65
32 वही, पृ. 71
33 वही, पृ. 87

* सम्पादकीय नोट: टाप् = 'अजाद्यतष्टाप्' नियम द्वारा पुल्लिंग संज्ञा में प्रत्यय अा जोड़कर उसे स्त्रीलिंग बनाना

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