व्यर्थ संकल्प - निबंध

प्रोफेसर (डॉ.) हरदीप सिंह
व्यर्थ संकल्प फैलते हैं जंगल की आग की तरह


आजकल देखा जाता है कि मानव की संकल्पों की गति बहुत तीव्र हो गई है जिस कारण उसे मन का चैन नहीं है, बहुत शीघ्र क्रोधित होता है, उसे शांति नहीं मिलती। इसकी जांच हम सब कर सकते हैं। आप ट्रेफिक में जा रहे हैं आगे लाल बत्ती हो जाए तो क्या होता है? सबसे पहले हम देखते हैं कि क्या कोई ट्रैफिक पुलिस वाला ड्यूटी पर तो नहीं खड़ा है? अगर वह दिखाई नहीं देता है तो हमारे संकल्पों की गति दौड़ने लगती है कि किस तरफ से हम  लाल बत्ती का उल्लंघन करके आगे जा सकते हैं? आगे मान लीजिए ट्रैफिक पुलिस वाला ड्यूटी पर खड़ा है तो हम लाल बत्ती को कोसते हैं कि पता नहीं कब हरी बत्ती होगी। सिगनल पर डिजिटल घड़ी होते भी हमारे संकल्प उन सेकंडों से भे तेज दौड़ते हैं जो घड़ी दिखा रही होती है। ट्रैफिक का ही दूसरा दृश्य देखिए मान ली जिए कि ट्रैफिक जाम लगा है और आपकी बगल से एक मोटर साइकिल वाला जबरदस्ती घुस कर आगे निकलने का प्रयास करता है तो संकल्पों की एक दूसरी दौड़ शुरू हो जाती है – ‘ये बाइक वाले तो पागल होते हैं, इनका पता नहीं चलता कब गाड़ी के सामने आ जाएँ, पता नहीं क्या आफ़त आई रहती है इनको।’ इस तरह एक से एक संकल्प चलते ही रहते हैं।

एक दूसरा उदाहरण लीजिए, आपके लैपटॉप या कंप्यूटर का नेटवर्क बड़ा धीमा चलता है लेकिन संकल्पों की गति बहुत तीव्र चलने लगती है, ‘अब इसे क्या मौत आ गई, पता नहीं ये इन्टरनेट वाले इतनी कम स्पीड क्यों कर देते हैं जबकि हमारा पैकेज हाई स्पीड वाला होता है, इन्टरनेट की स्पीड तो हाई होती नहीं लेकिन संकल्पों की गति बहुत हाई हो जाती है। अगर कोई दूसरा गलती करता है तो हम तुरंत ही जज बन कर मन ही मन कुढ़ कर उसकी सजा निश्चित करने लग जाते हैं। मान लो कि आप किसी सरकारी ऑफिस में अपना कोई कागज लेने गए हैं। वहाँ जिसकी डीलिंग है वह कहता है कि कल आना, आज मैं आपकी फाइल ढूढ़ कर रखता हूँ। हालांकि कि आप देखते हैं कि वह बिलकुल फ्री बैठा है, यह देख कर आप मन ही मन अशांत हो जाते हैं और शायद उसे कोसते भी हैं। अगले दिन आप जाते हैं तो वह उस दिन छुट्टी पर होता है। अब सोचिए आपके संकल्प कितनी स्पीड से सोचने लगते हैं। इसी तरह एक और उदहारण देखिए मान लें कि आपकी ड्यूटी कहीं लगी है। आप तो समय पर पहुँच गए लेकिन जिन्होंने आपके साथ ड्यूटी देनी थी वे नहीं पहुंचे, न ही उन्होंने आपको फोन द्वारा या किसी अन्य साधन द्वारा देरी से आने की सूचना दी। तो निश्चित रूप से आपके संकल्पों के घोड़े बहुत तेज़ी से दौड़ेंगे कि ‘किसी को अपनी जिम्मेवारी का एहसास ही नहीं है, पता नहीं अपने को क्या समझते हैं, इनको तो कोई पूछने वाला ही नहीं है’। आपने अपनी परीक्षा की तयारी नहीं की तो परीक्षा से पूर्व मन में कितनी हलचल होती है यह विद्यार्थी जानते हैं।

यह संकल्पों की गति अति तीव्र होना, यह भी अपनी एनर्जी को व्यर्थ करना है। जैसे मुख द्वारा अति तीव्र गति से और सदा ही बोलते रहने से शरीर की शक्ति व एनर्जी व्यर्थ होती है। अगर कोई सदा बोलता रहे और जोर से बोले तो उसे कहते हैं – ‘भाई, धीरे बोलो, कम बोलो’। ऐसे ही संकल्पों की तीव्र गति रूहानी एनर्जी को व्यर्थ गंवा देते हैं। इस बात का अनुभव सब को होगा कि जब व्यर्थ संकल्प चलते हैं तो संकल्पों की गति कितनी होती है! और जब कोई ज्ञान का समर्थ चिंतन करता है तो संकल्पों की गति क्या होती है! वह एनर्जी व्यर्थ करता है  और वह एनर्जी बनाता है। व्यर्थ संकल्पों की तेज गति के कारण व्यक्ति को अपने अंदर  शक्ति का अनुभव नहीं कर सकता। जैसे शरीर की शक्ति गायब होने से बहुत लोग कहते हैं कि ‘हमारा माथा खाली-खाली है’। ऐसे आत्मा सर्व प्राप्तियों से - सुख शांति से -  अपने को खाली अनुभव करती है।

ऊपर संकल्पों की गति तीव्र होने के जो उदहारण दिए हैं वे सामान्य स्थितियों के हैं। लेकिन जीवन में आने वाली गंभीर स्थितियां भी होती हैं जिनमे मन में चलने वाले संकल्पों की गति कई गुना तीव्र हो जाती है, इतनी कि ऐसा लगता है जैसे सिर की नसें फटने वाली हो गई हैं। जैसे पति-पत्नी में इस हद तक अनुभव को जाए कि दोनों एक दूसरे को मजा चखाने के लिए शत्रुता की हद तक नुकसान पहुँचाने के बारे में सोचने लगे – ‘ये अपने को क्या समझता या समझती है, मैं इसकी अकड़ तोड़ दूंगा या तोड़ दूँगी। अब तो इससे छुटकारा लेकर ही चैन मिलेगा’ इस तरह मामला अदालत में चला जाता है और तलाक की नौबत आ जाती है। भारत में तो एक समुदाय में ‘तलाक,तलाक,तलाक’ कहने भर की देर है कि अदालत में जाए बिना काम हो जाता है उस रिश्ते का जिसकी उम्मीद हर कोई लगा कर रखता है। किसी की प्रेमिका किसी और से शादी कर ले तो भी बहुत तेज़ संकल्प चलते हैं – ‘उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया’? विदेश में कोई अपनी पीआर की इंतज़ार कर रहा हो तो उसके संकल्प भी बहुत तेज़ चलते हैं – ‘मैं पक्का होऊंगा कि नहीं’, ‘क्या मुझे अपने देश लौटना तो नहीं पड़ेगा’। इसी तरह मान लीजिए किसी ने नौकरी के लिए आवेदन किया है लेकिन इंटरव्यू की तारीख न आने से संकल्पों की गति बहुत तेज़ हो जाती है। किसी को बिज़नेस में घाटा पढ़ जाए या कोई करजई हो जाए तो अनेक बार आत्म-हत्याओं के समाचार मिलते हैं। इसका कारण एक ही है अपने संकल्पों को बेलगाम छोड़ देना।

इसलिए संकल्पों की गति पर कंट्रोल करना बहुत आवश्यक है। लेकिन इसके लिए पुरुषार्थ क्या करना है उसकी समझ का होना आवश्यक है। जैसे शारीरिक शक्ति के लिए इंजेक्शन लगाकर ताकत भरते हैं या ग्लूकोज़ की बोतल चढ़ाते हैं; ऐसे रूहानियत से कमज़ोर आत्मा को अपनी स्मृति में यह लाना होगा कि ‘मैं मास्टर सर्व शक्तिवान हूँ’। यह स्मृति इंजेक्शन का काम करेगी। लेकिन इस स्मृति के इंजेक्शन से कुछ समय के लिए तो शक्तिशाली हो जाएँगे या श्रेष्ठ शक्तिशाली लोगों, या मित्र संबंधियों के विशेष साथ के द्वारा गुलुकोज़ चढ़ा लेते हैं। इस तरह थोड़े समय तो अपने शक्ति महसूस करेंगे लेकिन संकल्पों की गति तीव्र होने के अभ्यास के कारण फिर कमजोर बन जाएँगे। जैसे मुख के बोल के लिए कहा जाता है कि दस के बजाए दो शब्द दो शब्द बोलो जो दो शब्द ऐसे समर्थ हों कि सौ बोल का कार्य सिद्ध कर दें। ऐसे मन में संकल्प भी वही चलने चाहिए जो आवश्यक हों। संकल्प रुपी बीज सफलता के फल से सम्पन्न हो। खाली बीज न हो जिससे फल न निकले। इसलिए सदा समर्थ संकल्प हो, व्यर्थ संकल्प न हो। समर्थ संकल्पों की संख्या कम होगी लेकिन शक्तिशाली होगी जबकि व्यर्थ संकल्पों की संख्या ज्यादा होगी लेकिन प्राप्ति कुछ नहीं होगी। व्यर्थ संकल्प ऐसे समझो जैसे बांस का जंगल, जो एक से स्वतः पैदा होते जाते हैं और आपस में टकराकर आग लगा देते हैं और स्वयं ही अपनी आग में भस्म हो जाते हैं। ऐसे ही व्यर्थ संकल्प भी एक दो से टकरा के कोई न कोई विकार की अग्नि प्रज्ज्वलित करते हैं और स्वयं ही स्वयं को परेशान करते हैं। इसलिए संकल्प की गति को धैर्यवत बनाओ। इसका तरीका अपनी सोच के आधार को बदलना है। वास्तव में व्यक्ति जब अपनी दैहिक चेतना के धरातल पर सोचता है तो संकल्पों की गति अति तीव्र हो जाती है, इतनी तीव्र कि उसपर ब्रेक भी नहीं लग पाती। इस दैहिक चेतना को आत्मिक चेतना में बदल कर यह संकल्प शुरू में प्रयास करके रचना होगा कि ‘मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ, शांत स्वरूप हूँ, अनादि और अविनाशी हूँ’ यह संकल्प करते हुए अपने मस्तक के बीचों बीच अपने दिव्य ज्योति बिंदु रूप को देखना है। अपना यह ज्योति बिंदु रूप देखते देखते सोच का स्तर आत्मिक चेतना में बदल जाएगा और संकल्पों की तीव्र गति पर फुल स्टॉप लग जाएगा। यही आध्यात्मिकता है। संकल्प का यह खजाना बहुत कीमती है, इसका प्रयोग अपनी एनर्जी को पहचान कर कार्य में लगाना चाहिए तब ही सर्व संकल्प सिद्ध होंगे और आप सफलतामूर्त बन जाएँगे।