साक्षात्कार: हिंदी के विख्यात सम्पादक अरविंद कुमार


हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अरविंद कुमार का एक अनन्य स्थान है। सरिता, मुक्ता, कैरेवान, जैसी प्रसिद्ध पत्रिकाओं के सम्पादन के साथ-साथ माधुरी, तथा रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तम’ के प्रथम सम्पादक बनने के लिये प्रसिद्ध अरविंद जी हिंदी शब्द सम्पदा के प्रसार के लिये निर्मित अपने समांतर कोश व अरविंद लेक्सिकॉन के लिये प्रसिद्ध हैं। सेतु के लिये सेतु के प्रमुख सम्पादक अनुराग शर्मा ने उनसे यह विशेष साक्षात्कार किया है।

अरविंद कुमार
अनुराग: कृपया अपनी सम्पादकीय यात्रा के बारे में कुछ बताइये, आपने कितनी भाषाओं में किन-किन पत्रिकाओं का सम्पादन किया है?

अरविंद: मेरा पत्रकार-संपादन काल शुरू हुआ बहुत पहले – सन 1949-50 के आसपास। मैं 19-20 साल का था। मैट्रिक पास था, शाम के समय एफ़. ए. की पढ़ाई कर रहा था। दिन में प्रूफ़रीडर था, छुट्टी पर शिमला गया था। लौटा तो पता चला कि उसी कंपनी में सरिता में उपसंपादक बना दिया गया हूँ। कई काम करने होते थे। प्रकाशनार्थ आई रचनाओं पर राय देना, छपने जा रही रचनाओं का संपादन करना। मुझ से ऊपर स्वदेश कुमार सहायक संपादक थे और सब से ऊपर संपादक और प्रकाशक  विश्वनाथ। एक बार मुझे इंग्लिश की एक बाल कथा का अनुवाद करने का काम मिला। लेखक थीं फ़्रैडा बेदी, अभिनेता कबीर बेदी की माँ, जो बाद में बौद्ध नन बन गई थीं। कहानी का नाम शायद फिरहन था। अनुवाद बेहद लचर था। स्वदेश कुमार ने उस का हर वाक्य काटछाँट दिया। विश्वनाथ जी से कह दिया, यह लड़का नहीं चलेगा। विश्वनाथ जी मुझे रखने पर अड़े थे। मैं ने स्वदेश से कहा, छः महीने बाद आप मेरी किसी रचना में कौमा तक नहीं बदल पाएँगे। मेरा लिखा बिना पढ़े सीधे छापेख़ाने भेजेंगे। ऐसा ही हुआ। स्वदेश भी मेरे शुभचिंतक बन गए। वे नृत्य और नाटक के शौक़ीन थे। मुझे भी उस क्षेत्र में ले गए – दिल्ली आर्ट थिएटर में।

इस बीच वहीं से मेरी देखरेख में डाइजेस्ट जैसी मुक्ता का आरंभ हुआ और सरिता का उर्दू संस्करण भी निकला।
बाद में मैं सरिता से वहीं से प्रकाशित होने वाले इंग्लिश मैगज़ीन तक पहुँचा। सरिता में तो विश्वनाथ जी का दृष्टिकोण सुस्थापित था। परंतु 1957 तक आते आते कैरेवान की दशा बिगड़ने लगी। विश्वनाथ जी उसे कभी एक अमेरिकी पत्रिका जैसा बनाना चाहते कभी दूसरी, एक बार तो लेडीज़ होमजर्नल तक भी। सब बेसूद। बंद करने की सोचने लगे। एक शाम उन के कमरे में मैं ने कहा, आप मुझ पर पूरा भरोसा कर के मुझे कमान सौँप दीजिए। उन्होंने पूछा, क्या करोगे। मैंने समझाया कि हम उन से प्रतियोगिता कर रहे हैं जिन के जैसा हम हो ही नहीं सकते। मैं उसे वैसा बनाऊँगा जिस के जैसा वे हमारे बाज़ार में नहीं हो सकते – यानी पूरी तरह भारतीय, भारत की समस्याओं पर विचारोत्तेजक रचनाएँ, सीधा-सादा लेआउट। इस नीति के लागू होते ही हमारा ग्राफ़ ऊपर जाने लगा। 1963 में निजी मतभेदों के कारण मैं ने त्यागपत्र दे दिया।


अनुराग: माधुरी जैसी, भारत की सर्वोत्तम पत्रिकाओं का सम्पादक होना बड़े गौरव की बात है। आपने वहाँ ऐसा क्या किया जो माधुरी ने उन्नति के सोपान छुए?

अरविंद: दिल्ली प्रेस में त्यागपत्र देने के तुरंत बाद ही मुझे टाइम्स आफ़ इंडिया के लिए मुंबई से माधुरी का समारंभ करने का निमंत्रण मिला। किसी क़िस्म की सौदेबाज़ी किए बिना, वेतन तक तय किए बिना, मैं वहाँ जा पहुँचा। मेरे लिए महत्वपूर्ण था कुछ नया करने का अवसर। मैं यह कर दिखाना चाहता था कि सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा कर के, सस्ती गासिप से दूर रहकर भी कोई फ़िल्म पत्रिका सफल हो सकती है। मैं फ़िल्मों और कलाकारों के बारे में कम ही जानता था। मैं ने पत्रिका में वह सब छापने की नीति बनाई जो फ़िल्मों के बारे में मैं जानना चाहता था। वही आम आदमी भी पढ़ना चाहता है। लेकिन किसी भी कलाकार के बारे में कोई सस्ती जानकारी नहीं दूँगा। माधुरी के पहले कवर पेज पर मीना कुमारी की तस्वीर थी। संयोगवश उसी समय मीना जी ने कमाल अमरोही का घर छोड़ दिया और कवि गुलज़ार के घर आ गईं। इस से बढ़िया चटखारेदार मसाला क्या हो सकता था। माधुरी में बस एक पैराग्राफ़ में तथ्य ही दिए गए।

सभी फ़िल्म पत्रिकाओं के पन्ने स्टार मैटीरियल से भरे होते थे। स्टार का मतलब होता था लोकप्रिय हीरो हीरोइन – बस। न कोई चरित्र अभिनेता, न दारासिंह जैसा अत्यधिक लोकप्रिय हीरो। महमूद जैसे कलाकार को एक फ़ोटोग्राफ़र ने ग्रुप तक में से हटने के लिए कह दिया था। नए कलाकारों पर उन के शीर्ष पर पहुँच जाने तक डाक टिकट जितना फ़ोटो भी नसीब नहीं होता था। माधुरी में हम ने सिनेमा के हर क्षेत्र के पन्ने खोल दिए, निर्देशक, निर्माता, संगीतकार, गायक, वादक, गीत की स्वरलिपि, नर्तक, नृत्यनिर्देशक, सिनेमाघर। निर्माणाधीन अच्छी फ़िल्में... सत्यजित राय या वी. शांताराम, लता मंगेशकर, आशा भोसले, मुकेश आदि इत्यादि पर कवर स्टोरी कोई सोच भी नहीं सकता था। फ़िल्म इंस्टीट्यूट से आने वाले शत्रुघ्न या रेहाना सुल्तान जैसों की ओर ध्यान आकर्षण हमारा लोकप्रिय फ़ीचर बन गया। कला फ़िल्मों की तो माधुरी मुखपत्रिका ही बन गई थी। ज़्यादा लिखना आत्मश्लाघा माना जाएगा।


अनुराग: अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाली रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण का प्रथम सम्पादक बनना एक ऐतिहासिक घटना है। इस संस्करण का तो नाम ही सर्वोत्तम था। क्या वह नाम आपने दिया था?

अरविंद: माधुरी की सफलता के बावजूद मेरा मन फ़िल्म जगत से अटका नहीं था। दस बारह साल में ऊबने लगा। मन में पुरानी चाहत उभरने लगी। हिंदी में थिसारस बनाना। उसे पूरा करने मैं वापस दिल्ली चला आया। बचत ज़्यादा नहीं थी। कहीं से किसी की ओर से अनुदान नहीं था। दाल रोटी खिचड़ी पर भी आर्थिक अवस्था संतोषजनक नहीं थी। तभी स्वर्गीय ख़ुशवंत जी की मार्फ़त उन के बेटे इंग्लिश रीडर्स डाइजेस्ट के भारतीय संपादक राहुलसिंह का संदेश आया कि क्या मैं उस के हिंदी संस्करण का संपादक बनना स्वीकार करूँगा। मैंने डाइजेस्ट बरसोंं से देखा नहीं था। लिखा उस के कुछ अंक मुझे भेज दें। देखूँगा कि क्या वह हिंदी में हो भी पाएगा या नहीं। अंततः मैं राज़ी हो गया। सर्वोत्तम नाम मैं ने सुझाया था। उस के साथ जोड़ दिया गया रीडर्स डाइजेस्ट। मतलब की रीडर्स डाइजेस्ट में से चुनी गई उत्तम रचनाओं की पत्रिका।

सर्वोत्तम के साथ भी वही समस्या थी, जो पहले कैरेवान में थी। भारत के हिंदी मध्यम वर्गीय पाठक से सीधा संबंध स्थापित करने की समस्या। उस का एक मात्र हल था भारत संबंधी और भारत के दृष्टिकोण से लिखी रचनाएँ। एक उदाहरण लेता हूँ। श्रीलंका पर कोई अमेरिकन अपने नज़रिए से लिखेगा। वह serendipity की बात करेगा। मेरे पाठक के लिए बेकार। मैं कह सकता हूँ कि हम सर्वोत्तम में हिंदी पाठक के लिए हर अँक में कुछ न कुछ दे पाए, जैसे गोपाल प्रसाद जी का मथुरा और ब्रज संस्कृति पर अनुवादित लेख, रामकथा के लेखक कामिल बुल्के पर लेख जो डाइजेस्ट के डच संस्करण में भी छपा। ताज महल पर चित्रावलि जो डाइजेस्ट के सभी संस्करणों तक पहुँची, जलियाँवाला बाग़ कांड पर पुस्तक संक्षेप जो भी हर संस्करण तक पहुँचा।
यह संपादकीय आग्रह सब में नहीं होता।


अनुराग: मैंने कहीं पढ़ा था कि आपने अपनी व्यावसायिक यात्रा एक बाल-श्रमिक के रूप में आरम्भ की थी। क्या यह सच है?

अरविंद: यह सही है। मेरे पिताजी आज़ादी की लड़ाई में जुटे रहते थे। अपने लिए बहुत कुछ नहीं कर पाए। 1942-43 तक उन का हाथ ख़ाली था। बेहद कम मासिक आय वाली सरकारी नौकरी करनी पड़ी। हम पाँच भाई बहनोँ का पालन पोषण बस के बाहर था। मैट्रिक करते ही मुझे कुछ कमाना होगा। 15 साल का हुआ ही था। पिताजी ने बस एक काम अच्छा किया। मुझे किसी दुकान में मुंशी बनाने के बजाए दिल्ली प्रैस नाम के छापेख़ाने में कंपोजीटरी सीखने दाख़िल कर दिया। जब कभी कोई इंस्पैक्टर आता तो मुझ जैसे बालश्रमिकों को पिछले दरवाज़े से बाहर निकाल दिया जाता। साथ ही अच्छी बात यह थी दिल्ली प्रैस से कैरेवान निकलता था, सरिता शुरू होने वाली थी। मैं ने शाम के समय आगे पढ़ना शुरू कर दिया। कंपनी बढ़ रही थी। मैं असफल कैशियर सिद्ध हुआ, उस से कुछ कम असफल टाइपिस्ट, लेकिन बहुत कुशल प्रूफ़ रीडर माना गया। मेरे संपादकों जैसे करेक्शन से संपादक जी प्रभावित हुए और... यह मैं बता ही चुका हूँ...


अनुराग: भारत जैसे विकासशील देश के आर्थिक रूप से वंचित वर्ग में बाल-श्रम सामान्य रहा है। आज जब यह एक बड़ा राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय गरिमा का मुद्दा बन चुका है, इस विषय पर आपके विचार जानना महत्वपूर्ण है। इस समस्या के बारे में आप क्या सोचते हैं?

अरविंद: जब तक देश में ग़रीबी है मैं बालश्रम का समर्थक हूँ। बालश्रम पर पाबंदी लगाने का मतलब है पूरे परिवार को ग़रीबी में रखना। माँ बाप आर्थिक रूप से संपन्न होंगे तो बच्चों से काम कराएँगे ही क्यों?


अनुराग: एक सम्पादक के रूप में आपने हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों क्षेत्रों में काम किया है। सर्वोत्तम के कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय सम्पादकों (और शायद लेखकों से भी) और अनुवादकों से भी आपका साबका पड़ा होगा। हिंदी और अंग्रेज़ी के लेखन में आपने क्या अंतर पाया? आपके विचार से भारतीय और विदेशी पत्रकारिता में मुख्यतः क्या अंतर है?

अरविंद: अंगरेजी के संपादकों का वैश्विक ऐक्सपोज़र ज़्यादा होता है, अतः वे ज्यादा गहरी जानकारी दे पाते हैं। वे पूर्वनिश्चित आयोजन से लिखते हैं, पूरी जानकारी देते हैं। न्यू यार्क टाइम्स के टामस एल फ्राइडमैन जैसा एक भी पत्रकार हिंदी में नहीं हुआ। सभी हिंदी वाले नहीं, लेकिन अधिकांश दुनिया को कुछ कम जानते हैं। यही बात अनुवादकों पर भी लागू होती है। वे इंग्लिश की कई शब्दकोटियों से परिचित नहीं होते। एक और भारी अंतर यह है कि हिंदी वालों के लिए साहित्य ही सब कुछ है। आज का पाठक बहुत कुछ जानना चाहता है। भारतीय और विदेशी पत्रकारिता में भी मुख्यतः यही अंतर है।


अनुराग: एक ज़माना था जब हिंदी के पास सारिका, माधुरी, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएँ थीं। वे सब कहाँ गईं? आज की हिंदी पत्रकारिता को क्या हो गया है?

अरविंद: पत्र-पत्रिका निकालना अंततोगत्वा व्यवसाय है। यदि उस के हर अंक में घाटा होता हो तो कोई मालिक कब तक छापता रह सकता है। जिन पत्रिकाओं के नाम आप ने लिए वे उस ज़माने की हैं जब हिंदी पाठक को ग़रीब समझा जाता था और विज्ञापन दाता हिंदी वालों से कतराते थे। तब विज्ञापन संस्थानों के नेता हिंदी को हिक़ारत की नज़र से देखते थे। जिन पत्रिकाओं के नाम आप ने लिखे वे बहुत बिकती थीं, पर विज्ञापन नहीं मिलते थे। उन्हें चलाते रहना प्रकाशकों के भारी पड़ रहा था।


अनुराग: क्या आपको लगता है कि हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा संकट विशेषज्ञता का अभाव है?

अरविंद: विशेषज्ञता का बेहद अभाव है। एक बार मुझ से नवभारत टाइम्स के लिए सुझाव माँगे गए थे। मेरा प्रस्ताव था कि चाहे इंग्लिश के हों, विशेषज्ञों को संपादकीय पृष्ठ पर लिखने के लिए रखा जाए। उन के साथ अच्छे अनुवादक रखे जा सकते हैं।


अनुराग: मेरा अनुभव यह है कि प्रामाणिकता का अभाव भी हिंदी पत्रकारिता की एक बड़ी समस्या है। आप क्या कहते हैं?

अरविंद: प्रामाणिकता नाम की कोई चीज़ अभी तक नहीं पाई जाती। सर्वोत्तम में छपे एक-एक शब्द की प्रामाणिकता जाँची जाती थी। समाचार पत्रों में ही नहीं, हिंदी टीवी समाचार चैनल भी प्रामाणिक नहीं होते। साथ में किसी न किसी पार्टी के पैरोकार होते हैं। उनकी रिपोर्टिंग में संपादकीय बोल रहा होता है। एक उदाहरण दलितों के साथ भोजन करने पर – राहुल का एक और ड्रामा, एक और फ़ोटो अपोर्चुनिटी। यही काम जब अमित शाह करते हैं तो ऐसा कोई विशेषण नहीं लगाया जाता। अकसर रिपोर्टिंग एकांगी होती है, जिसे इंग्लिश में tendentious कहा जाता है।


अनुराग: हिंदी के साथ दोयम दर्ज़े की भाषा जैसा व्यवहार हो रहा है। हिंदी के समाचार चैनल पर आने वाले लोग ठीक से हिंदी बोल भी नहीं पाते हैं। साथ ही उन्हें देश के इतिहास-भूगोल की भी जानकारी नहीं होती है। कई बार तो देश के शहरों के नाम तक ठीक से नहीं बोलते हैं। बीबीसी जैसी ख्यात संस्था भी अपनी हिंदी साइट पर व्यवसायिकता और निपुणता के मामले में बेहद लापरवाह दिखती है। जब कभी भी किसी मित्र के उल्लेख आदि के कारण वहाँ कुछ पढ़ने गया, हमेशा व्याकरण, वर्तनी आदि की त्रुटियाँ रसभंग करती हुई मिलीं। कई वाक्य अधूरे ही छोड़ दिये गये होते हैं तो कई इतने बेतुके ढंग से लिखे गये होते हैं कि वे लगभग विपरीतार्थक हो जाते हैं। हिंदी के प्रति इस दुर्व्यवहार के क्या कारण हो सकते हैं?

अरविंद: हुआ यह है कि यकायक समाचार चैनल बढ़ने लगे। उन में काम करने वाले जो भी मिले उसे रख लो प्रणाली पर भरती हुई। हमारे यहाँ हिंदी ऐमए भी अनपढ़ नहीं तो कुपढ़ होते हैं। सामान्य ज्ञान शून्य होता है। राजनीतिक इतिहास जानते ही नहीं। उन से क्या अपेक्षा की जा सकती है। हो सकता है पाँच दस साल में हालात सुधरें। ऐसे आरोप हमारे इंग्लिश समाचार वाचकों पर भी लगाए जा सकते हैं।


अनुराग: आपने गीता की व्याख्या भी की है। उसके बारे में कुछ विस्तार दीजिये।

अरविंद: मैने गीता की व्याख्या नहीं की है। छोटे-छोटे आसान वाक्यों  में उस का अनुवाद किया है। किसी भी श्लोक पर अपनी राय नहीं दी है। मेरा उद्देश्य था महर्षि व्यास और पाठक के बीच पुल बनना। व्यास क्या कहना चाहते थे – यह व्याख्या हर पाठक पर छोड़ दी है।


अनुराग: क्या यह आपका आध्यात्मिक सफ़र है?

अरविंद: मेरा आध्यात्मिक सफ़र बचपन में सनातन धर्मी परिवार से शुरू हुआ। रामायण और महाभारत मेरी रुचि का विषय रहे हैं। पिताजी के प्रभाव से कट्टर आर्य समाजी हुआ। और स्वतंत्र और विशद पठन से नास्तिक हुआ और अभी तक हूँ।


अनुराग: गीता में अद्रोह की बात है, लेकिन आज के भारत में असंतोष बढ़ रहा है। क्यों?

अरविंद: मेरी राय में गीता तमाम रूढ़िवादी मान्यताओं का विरोध करती है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों की समानता का उद्घोष करती है। जब किंकर्तव्यविमूढ़ता हो तो कर्म का और संघर्ष का आवाहन करती है,


अनुराग: सम्पादन से इतर भी आपने हिंदी भाषा के क्षेत्र में बहुत काम किया है। क्या इस विषय में आप हमारे साथ कुछ महत्वपूर्ण बिंदु साझा करना चाहेंगे?

अरविंद: एक ज़माने में मैं ट्रेडयूनियनिस्ट हुआ करता था। हर आदमी बराबर है – यह मेरा अटूट विश्वास है।
मैं अपने को सैक्यूलरिस्ट मानता हूँ। आजकल के उग्र हिंदुत्व का विरोधी हूँ – मेरा विचार है - इंग्लिश शब्द secular के कुछ अर्थ हैं- temporal, worldly यानी worldly rather than spiritual or religious; इहलोकतांत्रिक, अदिव्य, इहलोकतंत्रपूर्ण, इहलौकिक, पार्थिव, लौकिक, संक्षेप में कहें तो धर्मतंत्र से भिन्न लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष। अनेक ऐतिहासिक कारणोँ से हमारे राजनीतिक क्षेत्रों में इस का मतलब हो गया 'हिंदू, मुस्लिम आदि संप्रदायवादि यों से तटस्थ राज्यतंत्र'। आज के उग्र हिंदूराष्ट्रवाद में secular या secularist शब्द गाली बन गए हैं।


अनुराग: माधुरी के सम्पादनकाल की कोई महत्वपूर्ण घटना?

अरविंद: अब बहुत कुछ याद नहीं आता।


अनुराग: सर्वोत्तम का प्रकाशन हिंदी प्रकाशन के क्षेत्र में एक अविस्मरणीय घटना थी। चाय और डिटर्जेंट के डब्बों के साथ मिली पहली प्रतियों से लेकर मेरे भारत निवास के अंतिम क्षण तक के सभी अंक मैंने खरीदे थे। सर्वोत्तम के सम्पादक के रूप में आपका हस्ताक्षरित एक पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित है। उस कार्यकाल के बारे में आज आप क्या सोचते हैं? उस उत्तरदायित्व की प्रमुख चुनौतियाँ और पुरस्कार क्या थे?

अरविंद: पुरस्कार था पूरी तरह प्रामाणिकता पर टिकाव। फ़ेसबुक पर भी मैं या तो अपनी राय लिखता हूँ, स्पष्ट लिखता हूँ, चैक कर के लिखता हूँ। जिस पर भरोसा नहीं होता वह किसी न किसी के उद्धरण के तौर पर साझा करता हूँ।


अनुराग: सुना है आपके कार्य में आपकी श्रीमती कुसुम जी का गहन सहयोग रहा है? इस बारे में कुछ बताइये

अरविंद: हम दोनों ने 27 दिसंबर 1973 की सुबह हैंगिंग गार्डन में समांतर कोश पर काम करने का फ़ैसला किया था। शुरू से ही वह किसी न किसी तरह मेरे काम से जुड़ी रहींं। जब से डाटा में इंग्लिश जोड़ने का काम शुरू हुआ तब से उन की भूमिका समाप्त हो गई।


अनुराग: शब्द सम्पदा सर्वोत्तम धन के बारे में कुछ बताइये?

अरविंद: अब क्या कहूँ। जितनी यह सौग़ात पाठकों के लिए है, उस से कहीं अधिक मेरे लिए है। इस ने मेरे जीवन को सार्थक दिशा दी। तंगी में भी लगे इस लिए रहे क्योंकि यह हमारा स्वधर्म बन गया था। इस से द्वारा हमने अपने आप को खोजा।



अनुराग: आपके जीवन का सबसे बड़ा उल्लासमय क्षण क्या था? 

अरविंद: उल्लास का सब से बड़ा क्षण था – राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा को समांतर कोश की प्रति भेंट करना।


अनुराग: आपके जीवन का सबसे कठिन क्षण क्या था? 

अरविंद: कोई कठिन क्षण मुझे याद नहीं आता। हाँ एक दुःखी क्षण याद है मुझ से छोटी बहन का रीढ़ की तपेदिक़ से मर जाना (शायद सन 1953)। उस की अंतिम इच्छा थी – एक पैसे की मिठाई की गोली।


अनुराग: जानकर दुख हुआ, मेरी सम्वेदनाएँ। यदि किसी कारणवश आप पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े न होते तो क्या करते?

अरविंद: क्या पता क्या करता?


अनुराग: यदि आपको एक अवसर और मिले तो क्या आप अपने जीवन के बारे में कुछ बदलना चाहेंगे?

अरविंद: बिल्कुल नहीं। वह जीवन मेरा नहीं किसी और का होगा।


अनुराग: आपकी प्रिय फ़िल्म, कलाकार, राजनेता?

अरविंद: फ़िल्म – श्रीमान चार सौ बीस। कलाकार राज कपूर। नेता गाँधी जी और नेहरू


अनुराग: क्या सोशल मीडिया से लगाव हमें कर्म-विमुख कर रहा है?

अरविंद: नहीं। हमें ऐसे लोगों से मिला रहा है जिन से हम जीवन भर कभी नहीं मिल पाते। जैसे आप स्वयं


अनुराग: जी आभार, मेरे लिये भी आपसे परिचय और वार्ता होना सोशल मीडिया का उपकार है। सूचना-बाहुल्य, फ़ेक न्यूज़ और सोशल मीडिया की अनियंत्रित अभिव्यक्ति के काल में एक पाठक सत्य कैसे जाने?

अरविंद: कोई रास्ता नहीं है। आज भारत सरकारी तंत्रों से संचालित संकुचित भावनाओं के और घृणा के नाज़ीशाही प्रचार तंत्र से आक्रांत है।


अनुराग शर्मा
अनुराग: सेतु जैसे अंतरराष्ट्रीय द्वैभाषिक मासिक के सम्पादकों को आप जैसे अनुभवी सम्पादक की क्या सलाह है?

अरविंद: सेतु का जैसा नाम है, उसी के अनुरूप अमेरिका और भारत के बीच उन्नत विचारधाराओं का सेतु बनना चाहिए। संपादक लोग अकसर वही छापते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है। लेकिन हर अच्छी रचना हर पाठक वर्ग के लिए अच्छी हो – यह नहीं होता। संपादक को अपने पाठक की सुनिश्चित पहचान होनी चाहिए। अच्छी रचना वही होती है जो पाठक वर्ग के काम की होती है। ताजमहल की वास्तुकला पर लेख आर्कीटैक्टों के लिए सही है, आप के या मेरे लिए नहीं। संपादक को अपने पाठक की इंटैलीजैंस पर भी भरोसा होना चाहिए। उसे जानना चाहिए कि हर पाठक समझदार है, उसे बच्चा या अज्ञानी समझ कर रचना नहीं लिखी जानी चाहिए, उस की जानकारी या मनोरंजन उद्देश्य होना चाहिए।


अनुराग: जी धन्यवाद! सेतु के प्रबुद्ध पाठकों के लिये आपका संदेश?

अरविंद: सेतु के पाठकों से मैं बस इतनी सी बात कहूँगा कि आप को पुल बनाने हैं। आप सौभाग्यशाली हैं कि आप ऐसे देश पहुँच गए हैं, जिस ने हर देश के आगंतुकों का स्वागत किया, उन्हें बढ़ने के अवसर दिए और इस तरह वह स्वयं भी बढ़ा और संसार का सब से शक्तिशाली देश बन गया। आप को जो पुल बनाने हैं, वे हैं, भारतवंशियों में परस्पर सौहार्द के, और एक तरफ़ अमेरिका की जातीय वैविध्य के बीच। अपने को संकीर्णता की रौ में बहने न दें।

अनुराग: आपके समय के लिये, और अनुरोध का मान रखने के लिये, आपका हार्दिक आभार आदरणीय अरविंद जी।

                                                                                                                                     सेतु, जुलाई 2017

4 comments :

  1. हिंदी पत्रिकाओं का स्वर्णिम युग स्मरण हुआ...
    दिलचस्प साक्षात्कार.

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  2. विचारोत्तेजक संवाद।

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  3. वरिष्ठ पत्रकार और समांतर कोश के लेखक के जीवन, जीवट एवं संघर्षो से परिचित कराता सशक्त, सम्पूर्ण, उत्प्रेरक साक्षात्कार ।
    बधाई ।

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