निराला की कविताओं में अध्यात्म और भक्ति का समन्वय

- संगम वर्मा
डॉ. संगम वर्मा 
छायावादी परम्परा में निराला का जहाँ प्रकृति के चितेरे कवि  हैं  उतना ही उनकी कविताओं में अध्यात्म और भक्ति का सुन्दर समन्वय दिखलाई पड़ता है।  यह समन्वय उनकी किसी एक रचना पर आधृत न होकर बहुविध में दृष्टिगोचर होता है।  निराला की कविताओं में अध्यात्म और भक्ति के अनेक चित्र मिलते हैं। इस दृष्टि से राम की शक्ति-पूजा, तुलसीदास, गीतिका, अनामिका, अणिमा, अर्चना और आराधना के गीत विशेष रूप से द्रष्टव्य हैं। इसमें अध्यात्म और भक्ति का मणिकांचन संयोग मिलता है। निराला ने राम की शक्ति पूजा में अपने वस्तु योजना के लिए पौराणिक आधार लिया है और उसे युग-संदर्भ से जोड़ने का स्तुत्य प्रयास किया है। राम की शक्तिपूजा का पौराणिक आधार देवी-भागवत है। देवी-भागवत की कथा है कि अंतिम दिन के युद्ध के पूर्व राम ने देवी की पूजा की थी। नारद के आदेश पर रामचन्द्र ने नवरात्रि का व्रत लिया था और देवी को प्रसन्न किया था। राम की शक्ति-पूजा का मूल आधार यही पौराणिक आख्यान है। शिव महिम्न स्त्रोत में विष्णु द्वारा शिव की भक्ति का उल्लेख है। पूजा के अवतार पर एक कमल की कमी पड़ने पर विष्णु ने पुंडरीकाक्ष होने के नाते अपना एक नयन अर्पित करने का उद्यम किया था और शिव प्रसन्न हुए थे। पवन पुत्र का शैशवावस्था में सूर्य को निगलने, आकाश ग्रसने का उल्लेख परिचित ‘हनुमान-चालिसाʼ में मिलता है और रावण को युद्ध में शक्ति का वरदान भी प्राप्त हुआ था। इन पौराणिक धार्मिक उल्लेखों पर राम की शक्ति-पूजा की वस्तु-योजना आधारित है। तात्पर्य यह है कि निराला ने देवी भागवत, शिव महिम्न स्त्रोत और हनुमान चालीसा से आध्यात्मिक सूत्रों को एकत्रित किया है और इन्हीं के आधार पर राम की शक्ति-पूजा की वस्तु योजना स्थितर होती है। इस अध्यात्म वर्णन में निराला को सफलता प्राप्त होती है।

जहाँ तक भक्ति-तत्व का प्रश्न है, हनुमान इस शक्ति-पूजा में अपनी शक्ति का परिचय देते हैं। हनुमान स्वामी को खिन्न देखकर विचलित हो उठते हैं। उन्हें दुख है कि उनके प्रभु राम के नेत्र सजल हैं। वे प्रभु को दुखी नहीं देख सकते। फलतः वे आकाश में उर्ध्वगमन करते हैं और समस्त दिशाओं में उनकी विषय का पराक्रम छा जाता है। वे महा-काश को समेट लेने के लिए उद्यत होते हैं। इस महानाश से शिव भी चंचल होते हैं और शक्ति को सावधान करते है। आकाश में अंजना-रूप में शक्ति का अवतरण होता है और वह पवन पुत्र को समझा-बुझा कर वापस करती है। हनुमान पुनः प्रभपाद ग्रहण करते हैं-
‘‘यह महाकाश है, जहाँ वास शिव का निर्मल
पूजते जिन्हें श्रीराम, उसे ग्रसने को चल
क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ?-- सोचो मन में,
क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रघुनन्दन ने?
तुम सेवक हो, छोड़ कर धर्म कर रहे कार्य--
क्या असम्भाव्य हो यह राघव के लिये धार्य?
कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन,
उतर धीरे-धीरे, गह प्रभु-पद हुए दीन।ʼʼ1

इस उद्धरण में निराला ने हनुमान की भक्ति-भावना को प्रदर्शित किया है। राम की भक्ति-पूजा में निराला का चिंतन भी प्रगट होता है और इसकी रचना राम-कृष्ण मिशन से प्रभावित है। राम की शक्ति-पूजा में, शक्तिपूजा की कल्पना रामकृष्ण परमहंस के अनुकूल है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस शक्ति के इसी रूप के उपासक थे। बंगाल में यह देवी प्रचंडता, करालता और असुर विनाशिनी शक्ति के रूप में कल्पित है।

महाकवि निराला द्वारा रचित तुलसीदास एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण काव्य है। कवि ने इसमें अपने विचारों को नाटकीय ढंग से व्यक्त करने की चेष्टा की है। निराला रामकथा का उपयोग कई रचनाओं में करते हैं- यह आकर्षण तुलसीदास की काव्यभूमि के प्रति निराला के सर्जनात्मक लगाव का ही परिणाम है। तुलसीदास छायावादी काव्यकला का परम परिष्कार है। छायावादी काव्य की एक परिणति कामायनी है, तो दूसरी परिणति निश्चय ही तुलसीदास है। निराला ने ‘तुलसीदास’ में वस्तु-योजना के लिए ऐतिहासिक आधार को लिया है। तुलसीदास का आरंभ भारतीय संस्कृति के संध्याकाल से होता है।
‘‘भारत के नभ का प्रभापूर्य
शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूर्य
अस्तमित आज रे-समस्तूर्य दिड्मंडल,
उर के आसन पर शिरस्त्राण
शासन करते हैं मुसलमान,
हे उर्मिलजल, निश्चलत्प्राण पर शतदल।ʼʼ2

मुसलमानों के आक्रमण से हिन्दी संस्कृति का ह्नास हो गया था। भारतीय नभ में प्रकाश करने वाली, शीतल हवा छाया देने वाली संस्कृति का प्रताप अवसान पर था। विदेशी आक्रमण से निराशा व्याप्त हो रही थी। हिन्दू प्रजा पर अत्याचार हो रहे थे। भारतीय जीवन की अभासित गति के पीछे प्राणहीन निस्पंदता का राज्य था। तुलसीदास का मूल उसका चिंतन है, उसका दर्शनही उसका केन्द्र है। तुलसीदास में निराला का अध्ययन मननशील-चिंतक कवि का रूप शक्ति होता है। तुलसीदास के चिंतन पक्ष पर विचार करते हुए डॉ. धनंजय वर्मा ने लिखा है कि - ‘‘तुलसीदास में निराला का चिंतन-पक्ष हृदय और मस्तिष्क के इस दृढ़ समन्वय और प्रकृति से एकान्तयन का परिणाम है। वहां चिंतन शुद्ध बौद्धिक अथवा उपदेश के रूप में नहीं आता। भावना और कल्पना के काव्यात्मक परिवेश से ही चिंतन की आभा विकीर्ण होती है। इसमें निराला के प्रौढ़ चिंतन और विस्तृत ज्ञान का प्रमाण मिलता है। यह चिंतन भी संकेतात्मक और सूक्ष्म शैली में आया है। एक दृष्टि से उसे रहस्य काव्य की शैली का चिंतन भी कहा जा सकता है। तुलसीदास की मूल चेतना दार्शनिक-सांस्कृतिक है। आरंभ से लेकर अंत तक इसी चेतना का विकास तुलसीदास में हुआ है। सांस्कृतिक ह्नास के चित्र से आरंभ होकर प्राकृतिक दर्शन और उध्र्वगमन का केन्द्र यही चितन है और अंत भी इसी के आग्रह से होता है।ʼʼ3

तुलसीदास में राष्ट्रीय और मानवतावादी विचारों का समन्वय है। राजनीतिक सामाजिक पक्षों का भी समाहार है। तुलसीदास का आध्यात्मिक भाव का उदात्त कल्पना-पक्ष निराला के व्यक्तित्व से प्रेरित है। तुलसीदास में भाषा, चित्रण और भाव-गाम्भीर्य के कारण महाकाव्य के औदात्य की रक्षा हो सकी है। इतिहास, समाज और दर्शन के साथ एक सांस्कृतिक चेतना का ग्रहण भी यह काव्य करता है। तुलसीदास की महाकाव्यात्मक शैली के उपकरणों में सर्वप्रथम परम्परा का नाम लिया जा सकता है। तुलसीदास में भारतीय काव्यों की उपलब्धि के दर्शन भी होते हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है -
‘‘देश काल के शर से बिंध कर
यह जागा कवि अशेष-छविधर
इसका स्वर भर भारती मुखर होयेंगी।ʼʼ4

अतः निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि तुलसीदास सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर चिंतन-प्रधान दार्शनिक काव्य है और अपने भाव तथा शैली के कारण उसमें महाकाव्य के गुणों का अंतर्भाव हो सकता है।
गीतिका के अनेक गीत सांस्कृतिक संदर्भ में युक्त है, जहां कवि ने माँ भारती से प्रार्थना की है कि वह उसे इतनी शक्ति प्रदान करे कि वह भवसागर को आसानी से पार कर जायें।
‘‘दें, मैं करूं वरण
जननि, दुखहरण पद-राग-रंजित मरण।
भीरुता के बँधे पाश सब छिन्न हों,
मार्ग के रोध विश्वास से भिन्न हों,
आज्ञा, जननि, दिवस-निशि करूँ अनुसरण।ʼʼ5

इस भाव से संबद्ध निराला ने अनेक गीतों की रचना की है, जिनमें ‘वर दे’, वीणावादिनी वर दे, ‘बन्दूँ, पद सुन्दर तव, ‘भारति, जय, विजय करे’ और ‘अनगिनत आ गये शरण में’, ‘प्रात तव द्वार पर’ आदि कविताएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस पक्ष पर विचार करते हुए डॉ. धनंजय वर्मा ले लिखा है कि - ‘‘निराला का काव्य मानवीय और लौकिक होते हुए भी अलौकिक और रहस्यात्मक संकेत से भावान्वित है। एक अंत-निहित आध्यात्मिक स्वर उसमें है। यह एक रहस्यवादी कवि का परिवेश है। परोक्ष रहस्य सत्ता की व्यंजना उनके काव्य में सर्वत्र मिलती है। यह रहस्यानुभूति और अलौकिकता लौकिक आधार लेकर ही व्यक्त हुई है।ʼʼ6
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
उनकी दिव्य अनुभूतियों का आधार की पार्थिव है। विजय और मुक्ति के साथ ही ‘गीतिका’ में अद्वैतवाद के प्रतिपादक दार्शनिक गीत हैं, जहाँ आभासित द्वैत को अद्वैत माना गया है और सम्पूर्ण व्याप्ति में, जड़-चेतन में, एक ही तत्व की प्रधानता मानी गयी है। जग का देखा एक तार इसे हम निर्गुण कहें अथवा अद्वैत-दर्शन, यह निराला के दार्शनिक गीतों का प्रतिपाद्य है। वह परमात्मा या ब्रह्म सर्वत्र है और कस्तूरी के मृग की सी स्थिति जीव की है। परमात्मा का वास वहाँ भी है, लेकिन प्राप्ति के लिए वह अन्यत्र भटकता फिरता है। ‘पास ही रे हीरे की खानʼ, ‘कहीं भी नहीं सत्य का रूपʼ, ‘अखिल जग एक अंधतम-कूप’ में ज्ञानमार्गी मायावाद अथवा शंकराचार्य के  ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ का सा भाव आया है। लेकिन इस गीत में वेदांत का वह आत्मवाद ही केन्द्र भाव हैं जिनमें ब्रह्म की भांति आत्म भी शाश्वत और अनंत माना जाता है। यह सकल आदान-प्रदान उसी की ज्योति है और व्यक्ति में सकल सृष्टि का सार।

इस से यह स्पष्ट हो जाता है कि गीतिका के गीत जहाँ एक तरफ विभिन्न राग-रागिनियों में बंधे हुए हैं, वहीं निराला की सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यंजित करते हैं। संस्कृति के प्रति निराला के मन में जो राग का भाव था, वह वहाँ छलकता हुआ दिखाई पड़ता है। वेदांत से प्रभावित होने के कारण निराला के इन गीतों में वेदांती स्वर ध्वनित हुआ है।

अनामिका के अनेक गीतों में सांस्कृतिक स्वर ध्वनित हैं। अनामिका में सांस्कृतिक कलाकार का परिवेश भी मिलता है। यहाँ निराला भारतीय संस्कृति के आश्याता के रूप में प्रतिष्ठित हैं। भारतीय संस्कृति के मूल-तत्वों को उन्होंने समझा है और उनका अभिव्यंजन काव्य में किया है। ‘खंडहर के प्रति’ में भारत के अतीत गौरव का अध्ययन है। उस गौरव के प्रति यह भावात्मक संयोग है। यह खंडहर भारतीयों को उनके विस्मृत गौरव की याद दिला कर जागृति की प्रेरणा देता है। यह बीते युग में भारत की सांस्कृतिक विजय है। कवि ने इस कविता में अपने सांस्कृतिक प्रेम को व्यक्त किया है। भारतीयों में अपनी सांस्कृतिक-निधि को विस्मृत करने की प्रवृत्ति पर खंडहर के आँसू कवि की वेदना को ध्वस्त करते हैं।
‘‘खंडहर! खड़े हो तुम आज भी?
अदभुत अज्ञात उस पुरातन के मलिन साज।
विस्मृति की नींद से जगाते हो क्यों हमें
करुणकर, करुणामय गीत सद गाते हुए।7

निराला ने अनामिका की अनेक कविताओ में जैसे ‘राम की शक्ति-पूजा’, ‘सरोज-स्मृति’ आदि में अपने सांस्कृतिक प्रेम को बड़ी सफलता के साथ व्यंजित किया है। कल्पना और व्यक्त,  अव्यक्त सूक्ष्म सौंदर्य है चित्रकार सृष्टा कवि से लेक गीतकार, अद्वैतवादी दार्शनिक, रहस्यवादी कवि, प्रगतिशील तत्वों और यथार्थवादी शैली के कवि तथा सांस्कृतिक कलाकार के इन परिवेशों के साथ महत् काव्य के औदात्य के समन्वित रचनाओं के कारण ही हम अनामिका केा उनका प्रतिनिधि काव्य-संग्रह कहते हैं। जहां तक इस काव्य की सांस्कृतिक चेतना का संबंध है, यह चेतना पग-पग पर व्यंजित हुई है। कभी वह अतीत का गुणगान करता है, तो कभी वह वर्तमान दुर्दशा को देख कर आंसू भी बहाता है। यह सब कुछ उसके सांस्कृतिक प्रेम का परिणाम है।

‘अनामिका’ में विषयों का वह वैविध्य है, कला की वह व्यापकता है और कविकर्म के प्रति वह सचेत जागरूकता है। ‘सरोज-स्मृति’ और ‘राम की शक्तिपूजा’ में महाकाव्यात्मक विशेषताओं का समन्वय है। निराला के सारे परिवेश, व्यापक दृष्टि और असाधारण व्यक्तित्व की व्यंजना में अनामिका का संग्रह सूक्ष्म है। रवीन्द्र और विवेकानन्द की रचनाओं के कुछ अनुवाद भी इसमें संग्रहित हैं। लेकिन उन्हें स्वतन्त्र कलाकृति न मान कर हमें छोड़ना पड़ता हे। कल्पना और व्यक्त अव्यक्त सूक्ष्म सौंदर्य के चित्रकार सृष्टा कवि से लेकर गीतकार, अद्वैतवादी-दार्शनिक, रहस्यवादी कवि, प्रगतिशील तत्वों और यथार्थवादी शैली के कवि तथा सांस्कृतिक कलाकार के इन परिवेशों के साथ महत् काव्य के औदात्य से समन्वित रचनाओं के कारण ही हम ‘अनामिका’ को उनका प्रतिनिधि काव्य-संग्रह कहते हैं। क्यों इनमें सांस्कृतिक बोध एवं दर्शन के विभिन्न आयाम हैं। उनकी ‘अनामिका’ कविता में ‘हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र’ की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-
‘‘मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज
तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन
मैं हूँ केवल पदतल-आसन
तुम सहज विराजे महाराज।8

अणिमा की भूमिका में कवि ने गीतों के विषय में गाने की अनुकूलता और स्वर के सौंदर्य के साथ श्रुति-मधुरता का उल्लेख किया है। अपनी प्रकृत दार्शनिकता, उदात्त और विराट कल्पना और आध्यात्मिक सम्मान को वे यहाँ भी व्यक्त करते है। शक्ति के स्वर भी प्रकृति के उपादानों की प्रतीक बना कर व्यक्त हुए हैं जिसमें उनका आत्म निवेदन है, अपनी साधना का आख्यान है। आत्मसमर्पण और जन से सहानुभूति और भक्ति की आर्तवाणी भी इन गीतों में मिलती है। निराभिमान, निस्संशय, निरामय जीवन की कामना और ईश्वर कृपा का अनन्य आश्रय इन्हें अर्चना अराधना की पूर्व भूमि बनाता है। ‘गहन है यह अंधकाराʼ में कवि को समस्त जगत स्वार्थमय लगता है। न दिन का प्रकाश है न चंद्रिका की ज्योति। पूरे गीत में व्यक्तिगत निराशा के स्थान पर निवृत्ति मार्गी दार्शनिक चिंतन का रूप अधिक निखरता है। ज्ञानमार्गी शाखा के साधक का तो यह भावोच्छवास है, पर यह व्यक्ति-संपर्क से शून्य भी नहीं है। ‘मैं अकेला’ में यह विषाद प्रगाढ़ हो जाता है। जीवन की अंतिम दिन आ गये से लगते हैं। निराशा की यह अभिव्यक्ति मार्मिक है। और निराला सरीखे पौरुष व्यक्तित्व की यह वाणी सुन कर आश्चर्य होता है - लेकिन आत्मतोष मिटा नहीं है -
‘‘जानता हूँ, नदी-झरने,
जो मुझे थे पार करने
कर चुका हूँ, हँस रहा यह देख
कोई नहीं मेला।9

अणिमा के कुछ गीतों में जैसे ‘गहन है यह अंधकारा’, ‘मरण को जिसने वरा है’, और ‘दलित जन पर करो करुणा’ आदि कविताओं में कवि ने भारतीय संस्कृति का चित्र अंकित किया है। कवि एक भक्त की तरह भगवान से आर्तनाद करता हुआ कहता है कि हे भगवान! तुम दलित जनों पर करुणा करो क्योंकि ये तुम्हारे शरण में आ गय हैं। तुम उन पर प्रीति करो ताकि वह सुख और शांति को प्राप्त कर सकें। वे दीन और मलिन हैं, वे अक्षम हैं। जब तक तुम्हारी करुणा उन पर नहीं होगी, तब  तक वे कुछ भी नहीं कर सकते। हे प्रभु! तुम उन पर करुणा करो।
‘‘दलित जन पर करो करुणा।
दीनता पर उतर आये
प्रभु, तुम्हारी शक्ति अरुणा।
देख वैभव न हो नत सिर,
समुद्धत मन सदा हो स्थिर,
पार कर जीवन निरंतर,
रहे बहती भक्ति-वरुणा।ʼʼ10

यहाँ कवि आत्म-प्रधान शैली में भारतीय संस्कृति के तत्वों को व्यंजित करता है और भारतीयों में सुख-शांति का संचार करता है।

अर्चना के गीत भक्तिपरक हैं, जो सांस्कृतिक स्वर को प्रेरणा देते हैं। निराला द्वारा समन्वित ‘अर्चना’ में गीति-सृष्टि का दूसरा मोड़ देखने को मिलता है। यहाँ निराला का स्वर हिन्दी की भक्तियुगीन भावधारा की निकटता ही नहीं, समता भी करता है। ‘अर्चना’ और ‘अराधना’ की केन्द्रीय तृप्ति प्रार्थनापरक है, भक्तिपरक है। ‘अर्चना’ में ‘भव-अर्णव की तरुणी तरुणा’ गीतिक की ‘वीणावादिनी पर दे’ की तरह काव्य-प्रार्थना सरस्वती वंदना है। अर्चना में ‘दुरित दूर करो नाथ, ‘‘भव-सागर से पार करो है, ‘‘दो सदा सत्संग मुझको, ‘‘हरि का मन से गुणगान करो, ‘‘तनमन धन वारे हैं, ‘तू दिगम्बर विश्व है धर’, ‘‘कौन फिर तुमको परेगा, ‘‘हे जननि, तुम तपश्चरिता’ और ‘माँ, अपने आलोक निखरो’ आदि गीत भक्तिपरक गीत हैं, जो सदैव अविस्मरणीय रहेंगे। ‘माँ अपने आलोक निखारोʼ, के कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य हैं-
‘माँ अपने आलोक निखारो,
नर को नरक-त्रास से वारो।
पल्लव में रस, सुरभि सुमन में
फल में दल, कलरव उपवन में,
लाओ चार-चयन चितवन मे,
स्वर्गधारा के कर तुम धारो।11

गीत-गूंज के गीत ‘अर्चना’ और ‘अराधना’ की नृत्य-गीत परम्परा के हैं और उनकी भूमि भी उन्हीं की तरह सहज, संवेदृय, सरल बोधगम्य है। प्रतीक, भाव, व्यंजना, शैली और अभिव्यक्ति सब में ये गीत लोक-गीतों से अधिक निकट हैं।

‘आराधना’ के सभी गीत भक्तिपरक हैं। अराधना का प्रथम गीत भी ‘अर्चना’ के ‘भव अर्णव की तरुणी-तरुणा’ और गीतिका की ‘वीणा वादिनी वर दे’ की तरह प्रार्थनापरक है। इन गीतों में सामान्यतः वर्णनात्मकता होती है और किसी काव्यात्मक कल्पना का अवसर कम ही मिलता है। यही अर्चना अराधना के गीतों में विषय में कहा जा सकता है। भक्ति की नाम-स्मरण और कीर्तन-संबंधी विशेषताओं से समन्वित कई गीत अर्चना-अराधना में है। उनमें मुक्ति और भक्ति की ऐकांतिक कामना के साथ भी भक्त का विश्वात्मक मानवतावादी दृष्टिकोण नहीं छूट पाया है। शक्ति का मातृ-रुप निराला के लिए प्रारंभ से वंदनीय रहा है। कुछ गीतों में भक्तिकालीन वैष्णव-तन्मयता की ध्वनि मिलती है। निराला ने अनेक विनय के पद लिखे हैं। तुलसीदास के बाद ऐसे मर्गबेधी विषाद के स्वर केवल निराला के गीतों में सुनाई देते हैं। जिन गीतों में उन्होंने राम को पुकारा हो, उनकी संख्या कम है। जिनमें मृत्यु और शक्ति का आह्वान किया हो, उनकी संख्या अधिक है - विनय में भी चुनौती का भाव है। निराला की विनय अधिकांशतः जीवन-संघर्ष में जूझने के लिए शक्ति के उद्देश्य से है। भक्ति ही जहां साध्य हो, ब्रह्म में लीन हो जाने का भाव मुक्ति का जहाँ श्रेष्ठ रूप हो - वह भक्ति या मुक्ति निराला की नहीं है। जब वह सरस्वती की वंदना करते हैं, तब वह वरदान मांगते हैं-
प्रिय स्वतन्त्र रव अमृत मन्त्र नव भारत में भर दे।

‘अराधना’ के ‘नील नयन, नील पलक’, ‘हारता है मेरा मन’, ‘मग्न मन, रुग्ण मन, ‘मरा हूँ हजार मरण’, ‘दुखता रहता है अब जीवन’ आदि गीत भक्तिपरक हैं, जो सांस्कृतिक चेतना से युक्त हैं। ‘अश्रण-शरण राम’ की कुछ पंक्तियां द्रष्टव्य हैं--
‘‘अशरण-शरण राम,
काम के छवि-धाम।
जानकी-मनोरम,
नायक सुचारुतम,
प्राण के समुद्रयम्,
धर्म धारण श्याम।12
अतः सारांश में यह कहा जा सकता है कि अराधना के गीत अपने आप में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, जिसमें विशेषतः भक्ति-परक गीत लिखे गये हैं और सांस्कृतिक चेतना को प्रेरणा देते हैं।


सन्दर्भ ग्रंथ सूची

1. रमेशचंद्र मेहरा, ‘ निराला का परवर्ती काव्य’ अनुसंधान प्रकाशन, कानपुर, 1963
2. संपादक डॉ. प्रेम नारायण टंडन, ‘ महाकवि निराला व्यक्तित्व और कृतित्व’ हिन्दी साहित्य भंडार, 1962
3. डॉ॰ भगीरथ मिश्र, ‘ निराला: काव्य का अध्ययन’ राधाकृष्ण प्रकाशन,  दिल्ली, 1965
4. अवध प्रसाद वाजपेयी, ‘ टैगोर और निराला’ युगवाणी प्रकाशन,  कानपुर, 1965
5. रेखा खरे, ‘ निराला की कविताएँ और काव्य भाषा’ लोकभारती प्रकाशन,  इलाहाबाद, 1976
6. विष्णुकांत शास्त्री, ‘ कवि निराला की वेदना तथा अन्य निबंध (प्रथम संस्करण)’  हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय, वाराणसी, 1963
7. डॉ. कुमारी शांति श्रीवास्तव, ‘ छायावादी काव्य और निराला’ गं्रथम,  रामबाग, कानुपर-61, अक्तूबर, 1966
8. डॉ. रामविलास शर्मा, ‘निराला की साहित्य साधना’ राजकमल प्रकाशन 
दिल्ली (तीन खंडों में)
पहला खंड 1969
दूसरा खंड 1972
तीसरा खंड 1976
9. डॉ. निर्मल जिंदल, ‘निराला का गद्य साहित्य’ आर्य बुक डिपो,  दिल्ली-1, 1973
10. परमानंद श्रीवास्तव, ‘ निरालाः भारतीय साहित्य के निर्माता (द्वितीय संस्करण)’ साहित्य अकादमी,  दिल्ली, 1988
11. सूर्य प्रसाद-दीक्षित, ‘ निराला का गद्य’ राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली-61, 1968
12. दूधनाथ सिंह, ‘ निराला: आत्महंता आस्था’ नीलाभ प्रकाशन, इलाहाबाद, 1972


सहायक  प्राध्यापक 
स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग 
सतीश चन्द्र धवन राजकीय महाविद्यालय लुधियाना 
ज़िला - लुधियाना, राज्य - पंजाब (भारत)
पिन-141001 
चलभाष-+91 946 360 3737 
ईमेल-sangamve@gmail.com

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