रामवृक्ष बेनीपुरी के निबंधों में नारी विमर्श


विवेक कुमार 
सुप्रसिद्ध उपन्यासकार प्रेमचंद का कथन है “साहित्यकार बहुधा अपने देश काल से प्रभावित होता है। जब कोई लहरें देश में उठती हैं तो साहित्यकार के लिए उससे अविचलित रहना असंभव हो जाता है। उसकी विशाल आत्मा अपने देश-बंधुओं के कष्टों से विकल हो उठती है और इस तीव्र विकलता में वह रो उठता है, पर उसके रुदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक रहता है।”1 रामवृक्ष बेनीपुरी का साहित्य प्रेमचंद के उपरोक्त कथन की अनुगूंज है। बेनीपुरी जी के साहित्य में हमें तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण की जीवंत तस्वीर दिखाई देती है। वे अपने साहित्य में क्रांतिकारी विचारों को अभिव्यक्त कर जर्जर हो चुकी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। वे केवल किसी तस्वीर को प्रस्तुत भर कर देने वाले साहित्यकार नहीं थे, बल्कि उनकी कोशिश थी कि सूरत बदलनी चाहिए।

भारतीय समाज पुरातन काल से ही पितृसत्तात्मक समाज रहा है। समाज में पितृसत्तात्मकता का अत्यधिक महत्व होने के कारण सामान्य नारी ही नहीं अपितु शिक्षित एवं आधुनिक नारी को भी पुरूष की अधीनता स्वीकार करनी पड़ती है। इस सब का मूल कारण पुरुष की सामन्तवादी मनोवृति एवं अहंकार है। आधुनिक होने के वाबजूद पुरुष वर्ग स्वार्थ केंद्रित परम्परागत और संस्कारों का दास है। ऐसे पितृसत्तात्मक समाज की स्त्रीविरोधी सोच के तहत महिलाओं को सदैव पुरुषों के हाथ की कठपुतली मात्र समझा गया और उसके अस्तित्व को पुरुष वर्ग की सेवा हेतु माना गया तथा उसके मस्तिष्क में यह बात बिठा दी गई कि पति परमेश्वर होता है। लैंगिक भिन्नता के कारण महिलाओं को दोयम दर्जे का समझ कर चिरंतन काल तक परिवार और समाज में अपनी वर्चस्वता कायम रखना पुरुषों का प्रायोजित षडयंत्र था, जिसके कारण वर्षों से औरतें अपने ही बट्टों से पीसी जाने वाली सिलें बनी रहीं। स्त्रियों को शिक्षित बनकर समाज में अपना व्यक्तिगत स्थान बनाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की राह में पुरुषों ने हमेशा ही अवरोध पैदा किया है, क्योंकि सामाजिक-आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्त्रियों में स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा होता है इसलिए वे अनुचित बातें सहन नहीं करतीं। इसका नतीजा जब तलाक के रूप में सामने आता है तो पितृसत्तात्मक सोच वाला समाज कहता है कि जिस घर में महिलाएं कमाएंगी उसे इस तरह की बदनामी तो झेलनी ही पड़ेगी। ऐसे ही समाज में जन्मी लड़की जीवनपर्यंत बंदिशों में जीती है तथा बेटी, बहन और पत्नी के रूप में बाप, भाई और पति पर अपनी सुरक्षा के लिए निर्भर रहती है। 1945 में सिमोन द बउआर ने अपनी विख्यात पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ में सही ही कहा है ‘नारियां बनी हैं, वे पैदा नहीं हुई हैं’। धीरे-धीरे समय बदला, युग बदला और नारी को समान अधिकार देने की लड़ाई ने जोर पकड़ा। 1951 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारी बहुमत से महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों का नियम पारित किया, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नारी मुक्ति आंदोलन का आरंभ तभी से माना जाता है। वर्तमान युग ‘नारी सशक्तिकरण’ का युग है। आज जबकि ये बात सर्वविदित है कि महिलाएं किसी भी मामले में पुरुषों से कमतर नहीं हैं, इसके बावजूद वे आज भी यदा-कदा अवसरों से वंचित की जाती हैं।

2
प्राचीन काल से लेकर आज तक के साहित्य, संस्कृति और समाज में नारी संबंधी धारणाएं पुरुष मानसिकता और दृष्टिकोण से प्रभावित रही है, किन्तु नारी मुक्ति आन्दोलन और स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय नारियों की अग्रिम भूमिका से साहित्य में नारी के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन दिखाई देने लगा। हिंदी साहित्य में भी नारी विमर्श और नारी मुक्ति को केंद्र में रखकर बहुत कुछ लिखा गया। साहित्य में ‘नारी विमर्श’ के अंतर्गत स्त्री के विषय में स्त्री द्वारा लिखा गया साहित्य ही ‘साहित्यिक नारी विमर्श’ माना जाता रहा है और इसके पीछे अनुभव की प्रामाणिकता को ठोस तर्क के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। महादेवी वर्मा ने भी कहा “पुरुष के लिए नारीत्व अनुमान है और नारी के लिए अनुभव, अतः अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र हम दे सकेंगी, वैसा पुरुष बहुत साधना के उपरांत भी शायद ही दे सकें”। 1997 में इंडिया टुडे की साहित्यिक वार्षिकी में स्त्री लेखन पर स्त्रियों के एकाधिकार पर काफी बहस हुई और ध्यातव्य है कि इस बहस में पुरुषों की भागीदारी नहीं थी, तत्पश्चात, यह स्वीकृत हुआ कि ‘लेखन, लेखन होता है, नर मादा नहीं’। उसे बांटकर देखने वाली दृष्टि पूर्वाग्रह से ग्रस्त है।2

रामवृक्ष बेनीपुरी
रामवृक्ष बेनीपुरी ने 1949 में प्रकाशित ‘नई नारी’ पुस्तक के अंतर्गत इतिहास और पुराणों में वर्णित स्वाधीनचेता भारतीय नारियों के चरित्र की व्याख्या द्वारा नैतिकता के पुराने मानदंडों को चुनौती देकर नारियों के प्रति अपने दृष्टिकोण की व्याख्या की तथा नारी विमर्श के जरिए नारी स्वतंत्रता के यज्ञ में अपनी आहुति दी। रामवृक्ष बेनीपुरी के मन में नारियों के प्रति अक्षय सहानुभूति और सराहना थी। मिथिला की नारियों की दुर्दशा को उन्होंने भली-भांति देखा था। बेनीपुरी जी का मानना था कि ‘नारी जागरण से परंपरा के पोषक वर्गों में एक खलबली मच गई और इस खलबली को देख वह बहुत खुश होते थे ‘हमारी पढ़ी-लिखी बहनों ने, इतने थोड़े दिनों में ही, अपने स्वतंत्र-व्यक्तित्व, अपनी आजाद तबियत की ऐसी धाक जमा दी है कि हम पुरुषों को उनसे डर-सा लगने लगा है, हम स्त्रियों पर के अपने एकाधिपत्य के साथ ही अपने पैर की जमीन भी खिसकती हुई देखने लगते हैं। ... पुरुषों की इस घबराहट, इस बौखलाहट में स्त्रियों की विजय, उनकी स्वतंत्रता का उदय, मैं देखता हूँ, इसी से खुश होता हूँ’।3

भारतीय समाज में पुरुषों द्वारा महिलाओं का शोषण कोई छुपी हुई बात नहीं है। बाल विवाह, सती प्रथा, भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा जैसी कुप्रथाओं का संस्कृतिकरण कर महिलाओं को गुलामी का जीवन जीने के लिये अभिशप्त कर दिया गया। इन सब कुप्रथाओं से समाज को मुक्त करने के लिए ही नारी जागरण की आवश्यकता हुई। बेनीपुरी जी ने भारतीय समाज में नारी विमर्श और नारी जागरण की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा, नारी विमर्श की आवश्यकता इसीलिए है ‘क्योंकि आज घर में हमें रहते हुए भी वे बेघरबार की हैं। गृहस्वामिनी का सुन्दर नाम पाकर भी वे घर की गुलाम-मात्र रह गई हैं। परिवार में उनका कोई स्वतंत्र स्थान नहीं समाज में उनकी कोई स्वाधीन सत्ता नहीं। कभी वे अर्धांगिनी रही हों, आज वे अंग की छाया ही रह गई हैं।.....और, वे ज्यों ही जगह खोजने लगती हैं, हमारे समाज के सूत्रधारों के मुँह से आवाज निकलती है -आगे क्या देखती हो, पीछे देखो। देखो हमारे इतिहास को, हमारे वेद-पुराण को, हमारी आर्य-संस्कृति, हमारी आर्य सभ्यता को। आर्य सभ्यता- दुनिया में इतनी पुरानी सभ्यता कहीं की है, किसी की है? धन्य हैं हम धन्य है हमारी सभ्यता।’4 

3
बेनीपुरी जी समाज में स्त्रियों की नारकीय स्थिति को देखकर बहुत आहत थे। पश्चिम के देशों में निरंतर हो रहे बदलाव की तुलना में भारतीय समाज ठहराव की स्थिति में था और इसमें चिंतनीय बात यह थी कि देश की आधी आबादी शताब्दियों से गुलाम रहकर अपने अस्तित्व को, अपने जन्म को स्वयं ही गुलामी का पर्याय समझने लगी थी। वास्तव में जो लोग हरेक घटना के पीछे भगवान की इच्छा को ही सबसे बड़ा कारण समझते हैं और हरेक परिस्थिति को सहज रूप में स्वीकार करते हैं उनमें पुनर्जागरण की भावना का उदय करना टेढ़ी खीर है। ऐसी दुर्व्यवस्था को देख-देखकर बेनीपुरी जी बहुत विचलित रहते थे। जंजीरें और दीवारें में उन्होंने लिखा है ‘तुम तुरंत-तुरंत ससुराल आयी हो। नैहर में जो कुछ भी थोड़ी स्वाधीनता थी, उसका सपना भी छोड़ो। आँगन रूपी जेल में नहीं, किसी कोठरी रूपी जेल में तुम्हें दिन-रात रहना है। ... एक पूरा ‘पेनल और प्रोसिजियर कोड‘ है, जिसके अनुसार प्यारी बहनों, तुम्हें चलना है। तुम्हें किससे बोलना चाहिए, किससे नहीं, किससे मुँह खोलना चाहिए, किससे नहीं। कैसे खाना चाहिए, कैसे सोना चाहिए। सबके बँधे-बँधाए नियम हैं, जिन्हें तुम्हें बरतना है इनमें जरा भी व्याघात हुआ कि तुम गयीं। चारों ओर तुम्हारी बदनामी, चारों ओर कानाफूसी। तुम्हारी जिन्दगी, हराम‘।5
भारतीय समाज में लोगों द्वारा स्वयं को मनु की संतान कहने की परंपरा रही है। इसके प्रमाण के रूप में  ‘मनु‘ शब्द की व्युत्पत्ति से मनु की संतान को ‘मैन, मनुज, मानव और ‘मनुष्य‘ कहे जाने को ठोस तर्क के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। ऐसे समाज में मनु द्वारा बनाये गए विधान को अक्षरशः पालन करने को ही मानव धर्म समझा जाना लाजिमी है। मनु ने यह विधान दिया कि स्त्रियाँ कभी भी स्वतंत्र न रखी जाएँ, बचपन में माँ-बाप उनकी निगरानी करें, यौवन में पति उन पर शासन करें और बुढ़ापे में पुत्र उनकी देखभाल करें। मनु के इस विधान की ओट में पुरुषों ने इस व्यवस्था को हथियार बनाकर महिलाओं को जबरन गुलाम बना लिया। वास्तव में कोई भी स्वाभिमानी महिला ऐसे विधान को आग लगा देगी जिसमें उसकी जाति को सदा गुलामी में रखने का इतना बड़ा षडयंत्र रचा गया हो। संसार के सभी देशों में स्त्री-शिक्षा का प्रसार बढ़ा तो हमारे देश पर भी इसका प्रभाव पड़ा। स्त्रियाँ शिक्षित हों, यह प्रायः हर पुरुष चाहता है। इस चाहत के पीछे की मानसिकता का पर्दाफाश करते हुए बेनीपुरी जी कहते हैं ‘मैकाले ने हमें अंग्रेजी पढ़ाने की सिफारिश की थी क्योंकि वह सोचता था कि अंग्रेजी पढ़-लिखकर हम अच्छे क्लर्क हो सकेंगे और अंग्रेजी राज्य के स्तंभ साबित होंगे। यों ही हमने स्त्रियों को पढाना लिखाना शुरू किया तो इसीलिए कि वे पढ़-लिखकर केवल सहूलियत के साथ गृह-प्रबंध और हमारा मनोरंजन कर सकें अर्थात वे सुशील गृहिणी बन सकें। किन्तु, जिस प्रकार मैकाले का उद्देश्य विफल हुआ, उसी तरह हमारा उद्देश्य भी विफल हो रहा है। अंग्रेजी शिक्षा ने जहाँ बहुत से क्लर्क और अंग्रेजी राज्य के स्तंभ पैदा किए, वहां उसने गांधी और जवाहर की भी सृष्टि की है। यों ही हमारी स्त्री-शिक्षा ने जहाँ बहुत सुशीला गृहिणियों की सृष्टि की है, वहीं उसने विद्रोही स्त्रियों की भी सृष्टि की है, जो अपनी वर्तमान परिस्थिति को अच्छी तरह समझ गयी हैं और इससे उद्धार पाने के लिए व्यापक प्रयत्न कर रही हैं‘।6 इस नारी जागरण का सबसे मुख्य प्रभाव ये हुआ है कि स्त्रियों में स्वावलंबी बनने की भावना प्रबल होने लगी। घर के अंदर बंद रहकर अपने बच्चों की देखरेख करने और अपने पतिदेव के भोजन, शयन की व्यवस्था में ही अपने को तल्लीन रखने की भावना नष्ट होने लगी।  स्वावलंबी बनने की भावना से उनमें रोजगार करने की चाहत पैदा हुई। आर्थिक स्वतंत्रता ने धीरे-धीरे कुत्सित सामाजिक व्यवस्था की नींव में पलीता लगाना शुरू कर दिया।
4
विश्व के किसी भी देश का इतिहास पलट कर देख लीजिए, गुलामी को स्थायी बनाने के लिये आप लाख प्रयत्न कर लें किन्तु परिवर्तन की लहर के आगे बड़े से बड़ा अवरोध भी क्षणभंगुर साबित हो जाता है। जिस तरह राजनीतिक गुलामियों का अंत हुआ, उसी प्रकार सामाजिक गुलामी का अंत भी निश्चित है। वेश्या बनाम सती में बेनीपुरी जी का वक्तव्य है, ‘इस समय संसार के हर देश में सामाजिक क्रांतियों की धूम है। युग-युग की कड़ियाँ टूट रही हैं। निचली सतह में सड़नेवाले प्राणियों की करवट से बड़े-बड़े प्रासाद ढह रहे हैं। पीड़ितों, पददलितों का बोलबाला है।’7

नई नारी निबंध संग्रह में नारी विमर्श से संबंधित बेनीपुरी जी के विचारों में पुरानी परंपराओं के प्रति उनका विद्रोह और उन सबको जड़-मूल सहित उखाड़ देने की कटिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। यह बेनीपुरी जी जैसे मनीषियों के सफल लेखन का ही परिणाम है कि नारी विमर्श और नारी जागरण में जितनी प्रगति उस काल में हुई उससे पूर्व कभी नहीं हुई। भारत में स्त्री-शिक्षा का प्रसार और नवीन प्रौद्योगीकियों के कारण धीरे-धीरे स्त्रियों का दखल सिलाई, कटाई, बुनाई जैसे कुटीर उद्योग से आगे बढ़कर शारीरिक दृष्टि से कमजोर होने पर भी हर उस क्षेत्र में हुआ है जहाँ केवल पुरुषों का वर्चस्व होता था। अब स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के खेलों में हिस्सा ले रही हैं, फायटर प्लेन उड़ा रही हैं और यहाँ तक कि सेना के विभिन्न जिम्मेवार पदों पर भी पूरी कार्यकुशलता के साथ अपने काम को अंजाम दे रही हैं। नारी विमर्श और नारियों में अपने अधिकारों के प्रति चेतना के विकास होने से नारी आज सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, व्यावसायिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में पुरुष के समान ही नहीं, बल्कि पुरुष से आगे बढ़कर समाज के चहुंमुखी विकास में अपना योगदान दे रही हैं। बेनीपुरी जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से यह साबित किया कि वर्तमान युग की नारी उनमें से नहीं है जो परंपरागत पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पोषण के लिए और यथास्थितिवादियों के क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने व्यक्तित्व का बलिदान कर दे। आज की नारी वैसी नहीं जिनके चरित्र पर-पुरुष की हवा लगते ही खराब हो जाते हैं। आज की नारियों में एक तरफ स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता हैं, तो दूसरी तरफ पति और परिवार के साथ सामंजस्य बनाने की शक्ति भी। कॉलेज की लड़कियाँ निबंध में बेनीपुरी जी बड़े हर्ष के साथ कहते हैं ‘इस युग ने, युग की पुकार ने हमारी बहनों की आँखें खोल दी हैं - इन ढोंगों को वे पहचानने लगी हैं और लगी हैं पहचानने अपने आपको, अपने व्यक्तित्व को।’ 8

यहाँ पर यह विचारणीय है कि इतना सब होने के बावजूद भी वर्तमान समय में हमारे देश में नारी जागरण और नारी विमर्श पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारत जैसे देशों में, जिसे गांवों का देश कहा जाता है, लगभग सत्तर फीसदी आबादी आज भी गांवों में रहती है। तकनीकी क्रांति के इस युग में हमारे देश के सुदूर इलाकों में रहने वाली देश की अधिकांश स्त्रियाँ, जिन्हें उचित शिक्षा नही मिलती है और जो नारी विमर्श और नारी जागरण से आज भी सर्वथा अनभिज्ञ हैं, परंपरा पोषक पुरुषों के षडयंत्रों के मकड़जाल में उलझकर अवसरों से वंचित की जाती हैं। इसीलिए हमारे देश की अधिकांश स्त्रियाँ आज भी सामाजिक रूप से पारंपरिक गुलामी का जीवन जीने के लिये अभिशप्त हैं। एक तरफ तो शहरों में रहने के कारण कुछ फीसदी स्त्रियाँ शिक्षित होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक दिखाई देती हैं, दूसरी तरफ, देश की अधिकांश स्त्रियाँ अपने अधिकारों से वंचित कर दी जाती हैं।
5
पारिवारिक जिम्मेवारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन करने के उपरांत भी दुःखद यह है कि सामाजिक विधान बनाने वालों ने स्त्रियों के साथ ही घोर अन्याय किया है। बेनीपुरी जी अपने एक निबंध में कहते हैं,‘संतानोत्पत्ति की सभी पीड़ाएँ स्त्रियाँ ही बर्दाश्त करती हैं, उनके लालन-पालन का सभी कार्य स्त्रियों के ही द्वारा संपन्न होता है, तो भी आज ‘तुम किसके लड़के हो’ के जवाब में बाप का ही नाम लिया जाता है - यह पुरुषों के एकाधिकार का ही सूचक है, इसमें न्याय तो है ही नहीं।9 

आज के समय में पुरुषों को अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाने की जरुरत है। इसीलिए हम सभी परंपरावादियों से अपील करते हैं कि युग की आवाज को सुनें। हम समझें कि स्त्रियाँ भी मनुष्य हैं, उनमें भी हृदय और दिमाग है। बेनीपुरी जी के शब्दों में ‘हम इन दिमागों, इन हृदयों का सदुपयोग क्यों न करें? एक मनुष्य में, एक छोटी चहारदीवारी में अपने सारे विचारों, विवेकों, भावनाओं और अनुभूतियों को हम क्यों केन्द्रित, आबद्ध, अवरुद्ध किए रहें‘। हम अपनी सामाजिक व्यवस्था और विधान के इतिहास को पलट कर देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय समाज अगर जीवित रहा है, तो केवल इसलिए कि परिस्थिति के अनुसार अपने को बदलते रहने की शक्ति इसमें थी। आज हमारा समाज जड़ हो गया है, निर्जीव सा मालुम पड़ता है, तो वह इसलिए कि हमने अपने पूर्वजों के इस गुण का परित्याग कर दिया है। अगर हम एक जीवित समुदाय के रुप में रहना चाहते हैं तो हमें अपने विचार और दृष्टिकोण बदलने होंगे और बदलते हुए युग के साथ कदम ताल मिलाकर आगे बढ़ना होगा। हम अपने लिए जिस अधिकार को चाहते हैं, स्त्रियों को भी वही अधिकार देना पड़ेगा। बेनीपुरी जी ने ‘नई नारी’ की भूमिका में स्पष्ट किया है ‘नारियों के बारे में हमारी कितनी मूढ़ धारणाएँ हैं, जिन्हें दूर किए बगैर हम अपने देश में नई मानवता की सृष्टि और विकास नहीं कर सकते’। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह वह देश है जहाँ नारी पूजनीया मानी गई हैं, यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।

बेनीपुरी जी ने समकालीन युग एवं जीवन को, विशेषकर नारी समस्या से संबंधित विषय को अपनी रचनाओं में यथार्थ रूप में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने समाज में फैली विषमताओं, जो संक्रामक रोग की तरह फैल रही हैं, को भरसक हटाने और आने वाली पीढ़ी की नारियों में चेतना की जाग्रति का सफल प्रयास किया है। नारी विमर्श एवं नारी जागरण की अभिव्यक्ति बेनीपुरी जी की रचनाओं में यत्र-तत्र दिखाई देती है। बेनीपुरी जी की रचनाएं नारी विमर्श, नारी अस्मिता, नारियों में आत्मचेतना, अन्याय के विरोध का, अस्तित्व बोध का और अपने ऊपर होने वाले अत्याचार कें विरोध में खड़े होकर डटकर मुकाबला करने का घोषणापत्र है।

संदर्भ
1. कुछ विचार -प्रेमचंद, पृष्ठ -6
2. इंडिया टुडे, साहित्यिक वार्षिकी 1997 
3. कॉलेज की लडकियाँ - रामवृक्ष बेनीपुरी 
4. सीता और द्रौपदी - रामवृक्ष बेनीपुरी
5. जंजीरें और दीवारें - रामवृक्ष बेनीपुरी
6. वेश्या बनाम सती - रामवृक्ष बेनीपुरी
7. वेश्या बनाम सती - रामवृक्ष बेनीपुरी
8. कॉलेज की लडकियाँ - रामवृक्ष बेनीपुरी 
9. नारी-जागरण और विवाह-बंधन - रामवृक्ष बेनीपुरी
                                                                                                                                      सेतु, जुलाई 2017

2 comments :

  1. सारगर्भित आलेख !!

    ReplyDelete
  2. बहुत ही अच्छा

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।