रामवृक्ष बेनीपुरी

"स्वर्गीय पंडित रामवृक्ष बेनीपुरी केवल साहित्यकार नहीं थे, उनके भीतर केवल वही आग नहीं थी जो कलम से निकल कर साहित्य बन जाती है। वे उस आग के भी धनी थे जो राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों को जन्म देती है, जो परंपराओं को तोड़ती है और मूल्यों पर प्रहार करती है। जो चिंतन को निर्भीक एवं कर्म को तेज बनाती है। बेनीपुरी जी के भीतर बेचैन कवि, बेचैन चिंतक, बेचैन क्रान्तिकारी और निर्भीक योद्धा सभी एक साथ निवास करते थे।" ‍‍-रामधारी सिंह "दिनकर"
रामवृक्ष बेनीपुरी (23 दिसंबर 1899 - 9 सितंबर 1968)

हिन्दी साहित्य के शुक्लोत्तर युग के प्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी भारत के एक मननशील क्रान्तिकारी साहित्यकार, पत्रकार, और संपादक थे। लम्बी कहानियों के अलावा उन्होंने नाटक, निबंध, और उपन्यास भी लिखे हैं। मुज़फ्फरनगर, बिहार के बेनीपुर नामक ग्राम में जन्मे रामवृक्ष बेनीपुरी भारत के स्वाधीनता संग्राम के सक्रिय सेनानी थे। उन्होंने जीवन के आठ वर्ष अंग्रेज़ी राज्य की कारा में काटे थे। स्वतंत्रता के साथ-साथ उन्होंने कुरीतियों एवं अंधविश्वासों के विरुद्ध सामाजिक चेतना लाने का प्रयास किया और तत्कालीन समाज में नारियों की स्थिति को सुधारने के लिए कलम की लड़ाई लड़ी।

सन् 1929 में उन्होंने "युवक" समाचारपत्र का श्रीगणेश किया। उन्होंने विद्यापति की पदावली का सम्पादन, बिहारी सतसई पर टीका, वन्दे वाणी विनायक शीर्षक से ललित गद्य तथा राजनीतिज्ञ जयप्रकाश नारायण की जीवनी भी लिखी। उनके अन्य उल्लेखनीय प्रकाशन निम्न हैं:

नाटक
अम्बपाली, सीता की माँ, संघमित्रा, अमर ज्योति, तथागत, सिंहल विजय, शकुन्तला, रामराज्य, नेत्रदान, गाँव के देवता, नया समाज, विजेता, बैजू मामा, शमशान में अकेली अन्धी लड़की के हाथ में अगरबत्ती

संस्मरण तथा निबन्ध
पतितों के देश में, चिता के फूल, लाल तारा, कैदी की पत्नी, माटी, गेहूँ और गुलाब, जंजीरें और दीवारें, उड़ते चलो उड़ते चलो