कुछ कविताएँ

दीप प्रकाश (दीपक कुमार)

विभागाध्यक्ष, हिंदी; गोरूबथान गवर्नमेंट कॉलेज; कलिम्पोंग, पश्चिम बंगाल

मेड़ों पर की घास
कुछ दबी सी थी
गेहूँ की बल्लियां भी
कुछ झुकी हुई थीं
हवाएँ स्तब्ध थीं
शायद!
इन मेड़ों से होती हुई
तुम गुजरी थी।
तुम्हारे स्वांसों के ताप से
दाने फूट पड़े थे
सोते सूख चुके थे
किरणें संतप्त थीं
किसानों के हाथ
तेज़ हो गए थे
दरातियां चलने लगीं थी
बैलों के गले में
घंटियों का शोर
बढ़ने लगा था
सारे के सारे खेत
इक जानी पहचानी सी
धुन पर थिरकने लगा था
शायद!
इन मेड़ों से होती हुई
तुम गुजरी थी।
2. मैं लिखना चाहता हूँ।
इसलिए नहीं कि
मुझे मानवीय संवेदनाओं से प्रेम है
बल्कि इसलिए कि
मैं सीखना चाहता हूँ वो हुनर।
जिससे शब्दों के भंवरजाल में

'सत्य' को डुबोया जाता है।
जिससे आजकल
कविता के ठेके चलते हैं।
ईंट, गारे, बालू, सीमेंट
की तरह शब्दों को
तोड़ा या मिलाया जाता है।
व्यक्त को छोड़ अव्यक्त की
अट्टालिका खड़ी की जाती है।
कि कैसे कविता विचार से
उत्पन्न होती है
विचार दल से
और दल राजनीति से।
मुझे भी सीखना है कि
कैसे कविता से राजनीति सधती है।
भावों को छोड़ विचारों पर
नधती है।
शायद,
यही कविता के नए प्रतिमान हैं
जहाँ विचार मूलभूत है
सौंदर्य पिछड़ा।
राजनीति ही सर्वोपरी हैं
फिर चाहे,
वो मानवीयता के लाश पर ही क्यों न हो।
मैं भी विचार करना चाहता हूँ
कविता पर, उसके संसाधनों पर
खोजना चाहता हूँ
उन सकरात्मक पहलुओं को
जिनमे कविता हो।
जिनमे रस हो, गंध हो।
जो भावसिक्त कर सकें।
जो किसी के खालीपन को भर सकें।
3. कांच के फर्शों पर नहीं

गाँव की मिटटी में पला हूँ
इसलिए जूतों की रगड़ से
छाले नहीं पड़ते.
होश संभाला तो मिटटी देखि
क्यारिदार मेड़ों पर चलते हुए
लहलहाते गेहूं की बालियाँ देखीं
कंधों पर हल उठाये
हाथों में बैलों की डोर थामे
उन खेतों को नापा है
जिसपे पड़ा तुम्हारा डाका है
अब तो हलों में जंग लग आई है
हाथों में फावड़े आ गये हैं
लेकिन पसीना अब भी गिरता है
गला अब भी सूखता है
चिलचिलाती धुप में खड़ा हूँ
अपनी ही जिद पे अडा हूँ
छांव जब आनी होगी आवेगी
मैं पहले भी खड़ा था
मैं अब भी खड़ा हूँ.

4. द्वंद!
पैदा होने के लिए द्वन्द
जीने के लिये द्वन्द
कुछ करने के लिए द्वन्द
और अंततः
मरने के लिए भी द्वन्द.


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