निराला का गद्य-साहित्य और नवजागरण

सर्वेश्वर प्रताप सिंह, शोध छात्र (चलभाष: +91 759 817 6087)
हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय - 605014
ईमेल - sarveshvarpratap779@gmail.com
कवि, आलोचक, निबंधकार, कथाकार और पत्रकार निराला का साहित्यकार व्यक्तित्व बहुआयामी है। निराला के गद्य में एक ओर छायावादी रोमांटिक भाव बोध है तो दूसरी तरफ प्रगतिवादी चेतना के यथार्थवादी प्रवृत्ति का संस्कार भी है, तो प्रयोगशील चेतना का विकास भी है। फ्रंचेस्का आर्सिनी ने इसी को दृष्टि में ही रखकर लिखा है- “ ‘छायावाद’ के सबसे अधिक प्रयोगात्मक और विस्तृत कवि, और मौलिक रेखाचित्रों, कहानियों, तथा लघु उपन्यासों के लेखक ‘निराला’ को अब इस शताब्दी के सबसे अग्रणी हिंदी साहित्यकारों में गिना जाता है।” (हिंदी का लोकवृत्त , फ्रंचेस्का आर्सिनी, अनु. नीलाभ ,वाणी प्रकाशन, 2011, पृ.सं.175)

छायावादी कवियों के साहित्यिक विश्लेषण और अनुसंधान में उनके गद्य कर्म को उतना विश्लेषित नहीं किया गया जितना उनके कवि कर्म को विश्लेषित किया गया है। यह चूक निराला के गद्य कर्म के प्रति भी हुई है। निराला का गद्य लेखन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि प्रेमचंद और शुक्ल का। “निराला का गद्य अन्य छायावादी कवियों के गद्य से अलग है। ...निराला का गद्य बुद्धि प्रवण और तर्कमूलक है।” (हिंदी आलोचना:विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, 2013, पृ.सं.-90) निराला के साहित्यकार व्यक्तित्व का सही आकलन तभी संभव है जब उनके गद्य तथा काव्य दोनों को बराबर तौला जाय, अन्यथा निराला को समझना अंधेरे में तीर चलाना ही साबित होगा, कारण यह कि निराला अपने गद्य के माध्यम से कला और जीवन जगत दोनों की समस्यायों से टकराते है और मध्यदेश की जातीयता के नवजागरण स्वरुप का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी कारण रामविलास शर्मा उनके गद्यकार रूप के सन्दर्भ में लिखते हैं, “गद्य लेखक निराला ने बालमुकुन्द गुप्त और प्रेमचंद की परंपरा को और ऊँचा उठाया है। उसने गद्य लेखन को काव्य रचना के सामान ही सरस और कलापूर्ण बना दिया है। हिंदी पर भाषा की नयी क्षमता निराला के गद्य में प्रकट हुई।” (हिंदी आलोचना का विकास : नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2015) पर यहाँ शर्मा जी एक बात जिसको कहना चाहिए था वह यह कि हिंदी भाषा और मध्यदेशीय नव जागरण की नयी क्षमता निराला के गद्य में प्रकट हुई है। जिसका विकास स्वातंत्रोत्तर साहित्य में निरंतर हो रहा है। यही कारण है छायावादी लेखकों में जितने प्रासंगिक निराला है उतना अन्य नहीं।

शिवकुमार मिश्र अपने लेख ‘निराला और नवजागरण’ निराला के विषय में लिखते हैं, “हिंदी में नवजागरण की चेतना के सबसे पहले प्रवक्ता थे भारतेंदु बाबु हरिश्चंद्र, और कहना होगा कि बंगाल के सारे प्रभावों के बावजूद निराला हिंदी के उन रचनाकारों में पहली पंक्ति के हक़दार हैं, जिन्होनें अपनी जमीं, अपनी रचनात्मक संवेदना और अपने औजारों के बल पर नवजागरण की भारतेन्दुकालीन चेतना के एक विरासत के रूप में हिंदी में न केवल संरक्षित किया है, अपने समय की चिंताओं और मुक्ति आन्दोलन से जोड़ते हुए, उसे समृद्ध और विकसित भी किया है।” (निराला: एक पुनर्मूल्यांकन – सं. पी. अरविन्दाक्षन, पृ.सं. 12)

“बंगाल नवजागरण की चेतना का संवाहक ही नहीं उसका सूत्रधार और प्रवर्तक भी है।” (निराला: एक पुनर्मूल्यांकन – सं. पी. अरविन्दाक्षन, पृ.सं. 12) निराला का किशोरावस्था बंगाल के ही वातावरण में बिता जिसके कारण वहाँ की नवजागरण के चेतना का प्रभाव निराला पर स्वाभाविक रूप से पड़ा। इसके साथ ही रामकृष्ण, विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ के व्यक्तित्व का प्रभाव भी बंगाल से मिला। यही नहीं निराला ने ‘बंकिम ग्रंथावली, के ग्यारह खण्डों का अनुवाद भी किये।

शिवकुमार मिश्र अपने लेख ‘निराला और नवजागरण’ में लिखा है- “छायावाद का अतिक्रमण किया है तो निराला ने, और इस अर्थ में कि छायावाद से आगे जाकर जिन नई जमीनों में इन्होने संचरण किया उनमें उन्होंने नए रस्ते तलाशे, नया प्रवर्तन किया, आगे की रचनाओं के लिए नयी दिशाएं सुझाई, उन दिशावाओं में खुद भी चले और नयी उपलब्धियाँ की। छायावादी होकर भी निराला छ्यावाद में निःशेष नहीं हुए, उससे भिन्न मनोलोकों में गए ही नहीं, वहाँ रमे और टहरे भी।” (निराला: एक पुनर्मूल्यांकन – सं. पी. अरविन्दाक्षन, पृ.सं. 11) परन्तु मिश्र जी का यह विवेचन उनके काव्य पर केन्द्रित होने के कारण एकांगी ही कहा जायेगा। निराला का छायावाद से अतिक्रमण उनके गद्य में प्रारंभ से ही विद्यमान है। निराला के गद्य में नयी जमीनों का विकास ज्यादा हुआ है और उसकी अभिव्यक्ति भी ज्यादा। 

भारतेंदु के विषय में रामविलास शर्मा लिखते हैं- “भारतेंदु ने जिस संस्कृति का निर्माण किया, वह जनवादी थी। उन्होंने धर्म, संस्कृति, साहित्य, शिष्टाचार पर पुरोहितों-मौलवियों का इजारा तोड़ने के उपाय बताये। विधवा-विवाह का समर्थन किया, बाल-विवाह का विरोध किया। कुलीनता, जातिप्रथा, छुआ-छूत आदि का ज़ोरदार खंडन किया, लोगों के धार्मिक अंधविश्वासों की कड़ी आलोचना की और स्त्री-शिक्षा पर खासतौर से जोर दिया।” (भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ –रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, 2014, 94) निराला के गद्य में भारतेंदु की इस नवजागरणकालीन-चेतना का विकास किस प्रकार हुआ है उसका अंदाज़ा उनके द्वारा समय-समय पर लिखे लेखों, युगावतार भगवान श्री रामकृष्ण, वेदांत केसरी स्वामी विवेकानंद, वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति, वर्तमान हिन्दू-समाज, भारत की नविन प्रगति में सामाजिक लक्ष्य, बाहरी स्वाधीनता और स्त्रियाँ, सामाजिक पराधीनता, साहित्यिक सन्निपात या वर्तमान धर्म, शून्य और शक्ति, हिंदी के गर्व और गौरव श्री प्रेमचन्द जी, हमारा समाज, कला और देवियाँ, हिंदी के आदि प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र, समाज और स्त्रियाँ, प्रातःकालीन घोषणा, वायसराय की विज्ञप्ति, राष्ट्र की युवक-शक्ति, हिन्दू-अबला, इंग्लैंड और भारत का सम्बन्ध, राष्ट्र और नारी, रूप और नारी, हिंदी की अभिनय-कुशलता, समाज और मनुष्य, राष्ट्र-भाषा का प्रश्न, भारत की राष्ट्रभाषा, साइमन कमीशन की रिपोर्ट,, वर्तमान आन्दोलन में महिलाएँ, सामाजिक व्यवस्था, वस्त्र समस्या, राजा और प्रजातंत्र, कविवर रविंद्रनाथ और वर्तमान आन्दोलन, हिन्दू या हिन्दवी, उपाधियों की व्याधि, समाज और महिलाएँ, धार्मिक एकदेशियता, साम्राज्यवाद और सत्याग्रह, देशी रियासतों का रंग, हिन्दुओं का जातीय संगठन, विज्ञानं और वैज्ञानिक पात्र-कला, हमारे हिन्दू और मुसलमान, भारतीय ऑफर अंग्रेजी साहित्य, किसान और उनका साहित्य, मनुष्यता, राजनीति और समाज,साहित्य में प्रोपोगैंडा, विद्यार्थियों में अपव्यय, सनातन धर्म और अछूत, हिन्दू विधवाओं पर अनाधिकार चर्चा, अधिकार-समस्या, टर्की की समुन्नति, सौन्दर्य और विवाह, शिक्षा-समस्या और हिंदी, चीनी महिलाओं का भारतीय आदर्श, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, फिल्म-व्यवसाय, कला और हिंदी, के विविध आयामी परिदृश्य से चलता है।निराला के विषय में रमेशचंद्रशाह लिखते हैं –“ ‘बहुस्पर्शिनी’ संवेदना और कल्पना है निराला की; और फिर भी एकाग्र और यथातथ्य।” (निराला संचयिता: सं. रमेशचंद्रशाह, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005)  निराला ने हिंदी गद्य का विकास कई गद्य विधाओं के रूप में किया है। निराला ने गद्य को ‘जीवन संग्राम की भाषा’ कहा है। वास्तव में निराला की दृष्टि संकीर्णता के घेरे में न रहकर व्यापक रही है और उन्होंने अपने लेख ‘साहित्य की समतल भूमि’ में लिखा है-“ जब कोई एकदेशिक दृष्टि से किसी गंभीर प्रश्न पर रायजनी करता है तब ह्रदय को बड़ी कड़ी चोट पहुँचती है। एकदेशीयता स्वरूपतः संकीर्णता है।....सीमा के अन्दर घिर कर बंद रहना जिस तरह मनुष्यों की प्रकृति है उसी तरह सीमा के संकीर्ण बंधनों को पार कर जाना भी मनुष्यों की ही प्रकृति है, पहली एकदेशिक है, दूसरी व्यापक।” (निराला राचनावली भाग-5, पेज 166)निराला जीवन में स्वतंत्रता के समर्थक हैं और संकीर्णता के बंधन के तोड़ना उनका उद्देश्य रहा है वह चाहे साहित्यिक क्षेत्र में हो या जीवन और समाज की हो। संकीर्णता को तोड़ स्वतंत्रता और व्यापकता की भावना की चाहत नवजागरण की चेतना का मूलबिंदु है जो निराला में कई रूप में मिलता है।  

निराला ने वर्णाश्रम व्यवस्था की जमकर खिचाई की है। उन्होंने सवर्णों की दंभ भावना अर्थात् ‘arrogance of superiority’ की भावनापर प्रहार किया और उनकी वास्तविक स्थिति और भविष्य का भी ज्ञान दिया है। अपने निबंध ‘वर्णाश्रम धर्म की वर्तमान स्थिति’ शीर्षक में उनका कहना है : “ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने घर में ऐंठने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य रह गये। बाहरी प्रतिघातों ने भारतवर्ष के उस समाज-शरीर को, उसके उस व्यक्तित्व को, समूल नष्ट कर दिया; ब्रह्म – दृष्टि से उसका अस्तित्व ही न रह गया। भारतवर्ष की तमाम सामाजिक शक्तियों का यह एकीकरण-काल शूद्रों और अन्त्यजों के उठने का प्रभातकाल है। प्रकृति की यह कैसी विचित्र क्रिया है, जिसने युगों तक शूद्रों से अपर तीन वर्णों की सेवा करायी और एस तरह उनमें एक अदम्य शक्ति का प्रवाह भरा, और अब अनेकानेक विवर्तनों से गुजरती हुई, उठने के लिए उन्हें एक विचित्र ढंग से मौका दिया है, भारतवर्ष का यह युग शूद्र-शक्ति के उत्थान का युग है। और देश का पुनरुद्धार उन्हीं के जागरण की प्रतीक्षा कर रहा है।” (निराला रचनावली-६  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.-16) और ‘वर्तमान हिन्दू समाज’ शीर्षक निबंध में वे यह कहते हैं कि पराधीन देश के सभी नागरिक शूद्र ही होते हैं, ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य नहीं : “ अब यवन और गौरांगों के 800 वर्षों के शासन के बाद भी हिन्दोस्थान में ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं, जो लोग ऐसा कहते हैं, वे झूठ तो बोलते ही हैं,, ब्राह्मण और क्षत्रिय का अर्थ भी नहीं समझते। इस समय भारत में न ब्राह्मण हैं, न क्षत्रिय, न वैश्य हैं सब शूद्र ही। ” (निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.-16)

निराला ने परंपरा के रूढ़िगत और जड़ पक्ष पर जमकर प्रहार किया है। निराला के इस विरोध का फल उनके सामाजिक जीवन पर पड़ा। ‘चतुरी चमार’ में निराला ने लिखा है –“ गुरु मुख ब्राम्हण आदि मेरे घड़े का पानी छोड़ चुके हैं। गाँव के तथा पड़ोस के अपने-अपने पिता-पितामहों से को समझा चुके थे  कि ‘बाबा (मैं) कहते हैं, मैं पानी-पांडे थोड़े ही हूँ, जो ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे सबको पानी पिलाता फिरूँ।” (चतुरी चमार: निराला राजकमल प्रकाशन सं. 2014) निराला ने समाज में व्याप्त  जातिप्रथा का विरोध किया और बिल्लेसुर बकरिहा उपन्यास में उनके नायक बिल्लेसुर ने ब्राह्मण होकर भी बकरी का व्यापार किया। किसी ब्राह्मण के द्वारा किया गया यह व्यवहार ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना का निषेध करना है। 

अम्बेडकरवादी जातीय चिंतन जिसमें असवर्ण विवाह को जातिप्रथा को अंत करने में सहायक माना गया है, कुछ ऐसी ही स्थापना वे अपने निबंध ‘वर्तमान हिन्दू समाज’ में ‘असवर्ण विवाह’ के प्रचलन से वर्ण-समीकरण की कल्पना करते हुए दिखाई पड़ते हैं : “ वर्ण – समीकरण की इस स्थिति का ज्ञान विद्या के द्वारा ही यहाँ के लोगों को हो सकता है। इसके साथ-ही-साथ नवीन भारत का रूप संगठित होता जाएगा, और यही समाज की सबसे मजबूत श्रुंगला होगी। यही साम्य पश्चात् वर्ण-वैषम्य से – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के रूपों में पुनः संगठित होगा।” यहाँ यह बात उठाना उल्लेखनीय होगा कि जातिप्रथा पर निराला से पहले भातेंदुयुगसे काफी उठाया गया है परन्तु वहाँ  ज्यादातर रुझान समझौतावादी और सुधारवादी ही रहा है। प्रेमचंद के साहित्य में कुछ इस विषय को लेकर पैनापन और नवचेतना मिलता है पर धार तो निराला के ही यहाँ मिलता है और नवजागरण के चेतना के विकसित रूप का निर्भीक प्रतिफलन होता है। 

 वास्तव में निराला के गद्य का जीवन संग्राम उनके कथासाहित्य में ही दीखता है। निराला के कथा-साहित्य की विशेषता यह है कि उन्होंने कथा को केवल लिखा ही नहीं है बल्कि उसके पात्र भी है और अन्य पात्रों के साथ उसको जिया भी है। गोपाल राय ने लिखा है- “ निराला की कहानियाँ बेहत आत्मपरक है। आत्मवृत्ति में कल्पना की चासनी डालकर समकालीन जीवन पर व्यंग्य करना निराला की अपनी विशेषता कही जा सकती है।....’स्वामी शारदानंद महाराज और मैं’, और ‘देवी’ इसी प्रकार की कल्पना मिश्रित आत्मकथाएँ हैं।” (हिंदी कहानी का विकास : गोपाल राय,राजकमल प्रकाशन, 2011, पृ.सं. 232-233) निराला प्रत्यक्षानुभव के साहित्यकार हैं। निराला के कहानियों में जो रूढ़ीविरोधी चेतना दिखती है वह किताबी अक्षरों तक ही सीमित नहीं है उसके प्रत्यक्ष भोक्ता भी हैं। निराला के साहित्य में जो नवजागरण की चेतना व्याप्ति है वह उनके जीवन का अंग भी है। 

‘चतुरी चमार’ कहानी निराला का आत्मवृत्त ही है और इसमें जिस बेबाक तरीके से सामाजिक रूढ़ियों का विरोध है वह सत्य वृतांत भी है। निराला ने इसमें लिखा है –“समय-समय पर लोध, पासी, धोबी और चमारों का ब्रह्म भोज भी चलता रहा। घृतपक्व मसालेदारलार मांस के खुशबू से जिसकी भी लार टपकी, आप निमंत्रित होने को पुछा। इस तरह मेरा मकान साधारण जनों का अड्डा, बल्कि house of commons हो गया।” (चतुरी चमार: निराला राजकमल प्रकाशन सं. 2014) आगे फिर लिखते हैं “ जब मैं डाकखाना या बहार गाँव से लौटता हूँ में चिरंजीव अर्जुन के यहाँ होते हैं, या घर ही पर उसे घेरकर पढ़ाते रहते। चमारों के टीले में गोस्वामी जी के इस कथन को ‘मनहु मत्त गज्पन निरखि सिंह किशोरहिं चोप’ वह कई बार सार्थक करते दिख पड़े। मैं ब्राहमण-संस्कारों की सब बातों को समझ गया। पर उसे उपदेश क्या देता ? चमार दबेंगे, ब्राहमण दबायेंगे। दवा है दोनों की जड़े मार दी जाय, पर यह सहज साध्य नहीं।” (उपर्युक्त, पृ.सं. 17)

मधुरेश ने लिखा है, “निराला के उपन्यास रचनातंत्र और संघटन की दृष्टि से किसी बड़ी उपलब्धि के नहीं है। उनका महत्व साम्राज्यवादी और सामंती उत्पीड़न के सक्रिय प्रतिरोध की दृष्टि से है। नारी मुक्ति के सवाल को वे अपने उपन्यासों में विस्तार से अंकित करते हैं और उनकी तेजस्वी नारियां अपनी मुक्ति को पूरे समाज की राष्ट्र की मुक्ति से जोड़कर देखती हैं।” (निराला: एक पुनर्मूल्यांकन – सं. पी. अरविन्दाक्षन, पृ.सं. 175)
निराला ने नारी पात्रों को सबला के रूप में अंकित किया हो। चाहे ‘तोड़ती पत्थर’ की पत्थर तक को तोड़ देने वाली नायिका हो या ‘अप्सरा’ उपन्यास की नायिका ‘कनक’ के व्यक्तित्व का जिक्र हो-“ बिना किसी इंगित के ही जनता की क्षुब्ध तरंग शांति हो गयी। सबके अंग रूप की तड़ित से प्रहत निश्चेष्ट रह गए। सर्वेश्वरी का हाथ पकडे हुए कनक  मोटर से उतर रही थी। सबकी आँखों के संध्याकाश जैसे सुन्दर इन्द्रधनुष अंकित हो गया है।सबने देखा मूर्तिमती प्रभात की किरण है।” (निराला रचनावली भाग 3- सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन,2006, पृ.सं.-27) ये जो ‘प्रभात’ कनक में लोगों ने देखा वह नारी की नवीन जीवनशक्ति की जिजीवषा है जिसे निराला जी नारियों में देखने के आकांक्षी थे। इसी तरह निराला जी ‘बाहरी स्वाधीनता और स्त्रियाँ’ शीर्षक निबंध में स्त्रियों की सामाजिक स्वतंत्रता का प्रश्न उठाते हुए कहा है  कि “ जो जीवन बाहरी स्वतंत्रता नहीं प्राप्त कर सकता, वह मुक्ति-जैसी सार्व भौमिक स्वतंत्रता कब प्राप्त कर सकता है ? उसकी धर्म की साधना भी ढोंग है। धर्म तो वह है जिससे अर्थ, काम, तथा मोक्ष, तीनों मिल सकें। सच्चा धर्म इस समय स्त्रियों के सब प्रकार के बंधन ढीले कर देना, उन्हें शिक्षा की ज्योति से निर्मल कर देना ही है, जिससे देश की तमाम कामनाओं की सिद्धि होगी और स्वतंत्र-सुखी जीवन बाह्य स्वतंत्रता से तृप्त होकर आत्मिक मुक्ति के संधान में लगेगा।” (निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.-17)

अधिकार-समस्या शीर्षक टिप्पणी में वर्णाश्रम व्यवस्था परउन्होंने लिखा है कि, “ वर्णाश्रम-धर्म एक ऐसी सामाजिक स्थिति है, जो चिरंतन है। स्वाधीन समाज की इससे अच्छी वर्णना हो नहीं सकती।” (निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन,2006, पृ.सं.-16)परन्तु ‘हमारे समाज का भविष्य रूप’ शीर्षक टिप्पणी में उन्होंने रूढिग्रस्त जन्मना वर्णाश्रम व्यवस्था के स्थान पर कर्मणा आधारित वर्णाश्रम व्यवस्था को स्थापित करते हुए टिपण्णी की है कि- “ हर मनुष्य में ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र भाव है, मात्रानुसार, यहाँ तक की आसुरी और दिव्य भाव भी। किसी भी जाति में पैदा हुआ मनुष्य हो, जब वह पढ़ता-पढ़ाता है- ज्ञानानुशीलन करता है, ब्राह्मण है; जब उसके अन्दर देश, जाति, विश्व या किसी की भी रक्षा के भाव उठते हैं, तब वह क्षत्रिय है; जब जीविकार्जन के लिए वह व्यवसाय-बुद्धि का उपयोग करता है, तब वह वैश्य है; जब वह अपने सांसारिक सुख की प्राप्ति के लिए दूसरों की परिचर्या करता है, तब वह शूद्र है।” (निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006,पृ.सं.-16)‘हमारा समाज’ शीर्षक निबंधमें कर्मणा आधारित वर्ण-व्यवस्था से प्राप्त होने वाले परिणाम के सन्दर्भ में लिखा है-“ राजनीतिक तथा सामाजिक प्रवर्तनों से जो सच्चे मनुष्य निकलेंगे वे ही यथार्थ नेताओं की तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों की सृष्टि अपने गुण क्रमानुसार करेंगे और उस स्वतंत्र भारत में इस वर्ण-व्यवस्था से केवल परिचय ही प्राप्त होगा, उच्च-नीच निर्णय नहीं। ”।” (निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.-16)

निराला हिन्दू सवर्णों के द्वैध प्रकृति के विषय में ‘हिन्दुओं का जातीय संगठन’ शीर्षक टिप्पणी में कहते हैं -“ वे दूसरी स्वतंत्र जाति (अंग्रेज़-संपादक) से बराबरी के अधिकार लेना चाहते हैं, पर घर में उन्हीं के भाई पैरों पड़े हुए ऊँचे अधिकारों के लिए रो रहे हैं। उस दिन तक चमार उच्च वर्णवालों के कुएँ में पानी नहीं भर सकता था। अब भी अधिकांश जगह नहीं भर सकता। मुसलमान और ईसाई वहीँ डाँटकर हिन्दुओं को रोककर पहले अपना पानी भर ले सकते हैं। ”।” (निराला रचनावली-6: सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.-16) निराला ने इस तरह की सामजिक स्थिति को स्वाधीनता-प्राप्ति के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा स्वीकार किया  और लिखा है -“ गुलामों की एक जाति होती है, चाहे अंग्रेजी ढंग से कह लीजिये या हिन्दोस्थानी ढंग से। पर जब गुलामों के भीतर भी गुलाम जातियाँ निकलती रहती हैं,तब समझना चाहिए कि गुलामी के कितने पेच काटकर उससे निकलने की जरूरत है।।” (निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006,पृ.सं.-17)

‘किसान और उनका साहित्य’ शीर्षक लेख में निराला ने जाति की व्याख्या मार्क्सवादी लहजे में (“ ‘वैश्य’ की व्याख्या ‘पूँजीपति’ और ;शूद्र’ की व्याख्या ‘किसान’ और ‘मजदूर’के रूप में” - निराला रचनावली भाग 6- सं. नंदकिशोर नवल ) में की और नवीन किसानी शक्ति के उदय की बात कहा-“ ब्राह्मण धर्म की दुर्बलता के कारण क्षात्र धर्म का जोर बढ़ा, और अंतिम महावीर नेपोलियन को पतन के बाद वैश्य-धर्म की विजय हुई-विज्ञान ने वैश्य-धर्म की ही वृद्धि की, जिसका आज तक संसार पर आधिपत्य है, और जो संसारव्यापी दरिद्रता का एकमात्र कारण है। इस प्रकार अब यह वैश्य-धर्म अपने तमाम विज्ञान के साथ होकर भी संसार की शान्ति को सहारा नहीं दे रहा- इसके भी दिन पूरे हो गये। नया उदाहरण रूस है, जिसने किसानों का राज्य स्थापित किया। आज संसार के बड़े-बड़े प्रायः सभी मनुष्य किसानों के युग का स्वागत कर रहे है। इस प्रकार, हम देखते हैं, अब वैश्य-युग भी मनुष्यों के मन से दूर हो गया है – अब किसान या मजदूरों का युग है। ” (निराला रचनावली-6: सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006,पृ.सं.-17)

निराला किसानों के शोषण के बारे में बतलाते है कि, “भारत अंग्रेजी माल के खपाने के लिए अंग्रेजों का सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ से कच्चे माल की जितनी पैदावार होती है, उसका अदिकांश वहीँ के व्यापारियों के हाथ लगता है, जिसके एक-एक के सैकड़ों वसूल होते है ............... किसान लोगों में माल रोक रखने की दृढ़ता नहीं, और उस दृढ़ता की जड़ भी काट दी गयी है। कारण, लगान उन्हें रुपयों से देना पड़ता है, खेत की तिहाई-चौथाई हिस्सा नहीं। समय पर लगान देने के तकाजे का ख्याल उन्हें विवश कर देता है, वे मुह मांगे भाव पर माल बेच देते है। यह इतनी बड़ी दासता है, जिसका उल्लेख नहीं हो सकता।” (निराला रचनावली-6: सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.- 18)

निरालाजी साहित्य में व्याप्त प्रचारवादी वृत्ति का विरोध करते है और अपने लेख ‘साहित्य में प्रोपेगैंडा’ में लिखते है, “विषय की दाल में नमक के बराबर ही  प्रोपेगैंडा अच्छा होता है, क्योंकि इससे विषय की रोचकता बढ़ जाती है। पर जब वह पान में चूने की तरह ज्यादा हो जाता है तब अपना उद्धेश्य भी खो बैढ़ता है, हानिकर भी हो जाता है।” (निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.- 420)यही कारण है कि निराला बनारसीदास चतुर्वेदी की आलोचना करते हैं और साहित्य के विकास के विशेषकर ‘उग्र’ के साहित्य विकास के सम्बन्ध में अवरोध भी घोषित करते हैं। 

नवजागरण के दौरान राष्ट्रभाषा की समस्या सभी के सामने विकट रूप में थी। भारतेंदु ने  हिंदी के जिस जनसामान्य रूप की कल्पना की थी , उससे भी अधिक जनसामान्य रूप और समग्र भारतीय रूप का समर्थन निराला करते हैं। राष्ट्र-भाषा समस्या पर निराला ने 1923 ई. में ‘समन्वय’ पत्रिका में ‘हिंदी भाषा कैसी होनी चाहिए’ निबंध में हिंदी के स्वरुप पर लिखा है, “राष्ट्र-भाषा की दृष्टि से हिंदी को सरल और तेजस्वी होना चाहिए। भाषा भाव को प्रकट करने का एक साधन है। इसलिए सब प्रकार के उच्च-उच्च भावों को प्रकट करने की शक्ति हिंदी में होनी चाहिए। पहले संस्कृत के खजाने से, फिर उसमें न मिलने पर और किसी प्रांतीय भाषा से- क्योंकि प्रांतीय भाषाओं की चर्चा देश में होती ही रहेगी और इसीसे वे उतने कठिन न होंगे –और अंत में फारसी, अंग्रेजी आदि विदेशी भाषाओं से। इसमे सरलता और उपयोगिता का ध्यान रखना होगा। आपस की फूट बढाना बुद्धि का काम नहीं। यों तो कुच्छ न कुच्छ त्रुटि रहा करती है। तो व्यर्थ की मनमानी हाँकने के बदले एक राष्ट्रीय भाषा के बनने में मदद देना केवल उचित ही नहीं परमावश्यक है। और – और प्रान्तवासी भाई-बहनों पर दृष्टि रखते हुए हिंदी-प्रेमियों को एक सरल, सुन्दर और जोरदार देशभाषा बनाने के लिए कमर कसे रहना चाहिए, जिससे हिमालय से कन्याकुमारी तक तथा  सिंध से आसाम तक सारे भारतवर्ष में, एक साधारण भाषा के सहारे एक प्रान्तवासी दूसरे प्रान्त में रहने वाले अपने भाईयों से अपना मनोभाव प्रकट कर सके और भाषा की दृढ़ पर मुलायम डोरी से बंधे हुए एक अखण्ड भारत की सृष्टि करे।” (निराला रचनावली-6: सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006, पृ.सं.-21)

निराला ने शिक्षा के लिए हिंदी भाषा की आवश्यकता को जरूरी समझते हुए सभी प्रकार के शिक्षा में हिंदी माध्यम का ही प्रयोग किया जाय –“इस विश्वविद्यालय के लिए सोची हुई सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ केवल साहित्य की ही नहीं, किन्तु व्यावसायिक, यांत्रिकी तथा कलात्मिका शिक्षा भी दी जाएगी। हिंदी के माध्यम से इंजीनियरिंग तथा डॉक्टरी शिक्षा की व्यवस्था करने पर यह विश्वविद्यालय भारत में अद्वितीय होगा, इसमें संदेह नहीं।” (निराला रचनावली-6 : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, 2006,पृ.सं.-470)

निराला किस तरह का नवजागरण भारतीय समाज में लाना चाहते थे इस पर दृष्टि डालते हुए रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश में कहते हैं –“जातीयता का समर्थन और जातीय संकीर्णता का विरोध, राष्ट्रीयता का समर्थन और उससे ऊपर उठकर विश्व मानवता का समर्थन, ये दोनों बातें रविन्द्र नाथ ठाकुर में हैं और निराला में भी हैं । जिस तरह जातीय जागरण का नेतृत्व ठाकूर ने किया था वह आदर्श निराला के सामने भी था और यह आदर्श उनके साहित्यिक जीवन के प्रारंभिक दौर में सुनिश्चित हो गया था।” (निराला संचयिता- सं. रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण- 2001, पृ.स.- 26)

निराला के गद्य साहित्य का क्षेत्र विस्तार विस्तृत है। निराला ने गद्य-लेखन को विकसित ही नहीं किया अपितु उनके गद्य में समाज और साहित्य के प्रति नयी दिशाओं के बीज का रोपण भी हुआ है। हिंदी समाज में आई नवचेतना का सम्यक विकास है। निराला सही मायने में भारतेंदु, महावीरप्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद के द्वारा फैलाई गई नवजागरण की चेतना को बढ़ाते ही नहीं है अपितु खुद जीवन में उसको उतारकर कथनी-करनी में एकता को भी स्थापित करते हैं। 

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