कविताएँ - पारुल चतुर्वेदी

पारुल चतुर्वेदी

मानवता

होता जो भूख का मज़हब तो
रोटी भी भेदभाव करती,
जो खून का मज़हब होता तो
शमशीर सोचकर घाव करती
जो होता कोई मज़हब ग़रीब
तो दौलत भी ये हिसाब रखती,
सूरज चाँद मज़हबी होते तो
रात भी चेहरे पे हिज़ाब रखती
जो उम्र का मज़हब होता तो
पका कर सफ़ेद न बाल करती,
या तो केसरिया कर देती
या फिर कुछ हरे लाल करती
शुक्र है आज भी माँ की ममता
मज़हब में बंटा नहीं करती,
वरना शकील की माँ सा प्यार
श्याम की माँ उसे नहीं करती
प्रकृति ने बाँटा नहीं किसी को
मज़हब की लकीरों में,
वरना वो भी फल, फूल, छाँव
बिन भेद लुटाया नहीं करती

वो धर्म भी है, वो मज़हब भी,
वो ईश्वर भी, वो अल्लाह भी,
'मानवता' का पालन जाने क्यूँ
ये दुनिया किया नहीं करती।।

क्या हुआ...

क्या हुआ जो ये ज़िन्दगी
ज़हर का प्याला बन गयी
डर... प्याले को होठों तक लाने का ही तो है।
क्या हुआ जो मुस्कानें छीन
कोई आँसू की कतारें दे गया
चुभन... आँसू छलकाने तक ही तो है।
क्या हुआ कि हर अपने ने
वक़्त पर साथ छोड़ दिया
दर्द... पत्थर दिल बन जाने तक ही तो है।
क्या हुआ जो तम से
घिरा हुआ है हर कोना
अँधेरा... सूरज उग आने तक ही तो है।
क्या हुआ जो सब रास्ते
बँद नज़र आने लगे

कश्मकश... दो कदम पीछे जाने तक ही तो है।

क्या हुआ जो भँवर में
फँस गयी है नैय्या

मुश्किल... तूफ़ाँ के गुज़र जाने तक ही तो है।
क्या हुआ जो बुझने लगी है
लौ ज़िन्दगी की

तकलीफ़... आखिरी साँस आने तक ही तो है।

ग़ज़ल

मकाँ तो कई इस ज़िन्दगी के हिस्से आये हैं,
पर घर हम अपना, कहीं बचपन में छोड़ आये हैं।
इतनी दूर आ गए हैं पानी की खोज में
कि प्यास अपनी मोहल्ले में छोड़ आये हैं।
ता उम्र भागते रहे जिस शै के पीछे,
मात अपनी, उसकी भरी निगाहों में छोड़ आये हैं।
रात ढलने लगी है, तन्हा खतरनाक राहें हैं,
और अपनों की बस्ती, बहुत पीछे छोड़ आये हैं।
तूफानों में फंस गयी है पतंग-ए-हयात,
माँझा, चबोतरा-ए-माज़ी में छोड़ आये हैं।
इन बहते हुए अश्कों को पोंछें भी तो कैसे,
माँ का आँचल तो जूनून-ए-अमीरी में छोड़ आये हैं।
हम वो हैं जिसपर, अब मल्कियत समंदर की,
कि किनारे से टकरा के भी किनारा छोड़ आये हैं।
सेतु, अगस्त 2017

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