कवितायें - प्रोमिला क़ाज़ी

प्रोमिला क़ाज़ी

समझौते

स्त्री दुःख के अंतहीन ढेरों से
दब  जाती है जब
तो खाली करती है
अपने शरीर की ऐसी जगह
जहाँ उसने दर्द  छुपाये थे
जाने कौन सी नदियों से
करती है गुप्त समझौते
और बड़े दर्द को जगह देने के लिए
छोटे-छोटे कई दर्द
बहा देती है उसमे
स्त्री के दुःख शोर नहीं करते
न कभी मरते है
बस चुपचाप जगह बदलते है छुपने के लिए
अपनी ही देह में!
.................

हेड और टेल!

अकेली स्त्री
बेचारी स्त्री
जब आंसू बहाती है
तो पुरुष उसे सबसे अधिक प्रेम करता है
उसे अकेले में बहादुर होना सिखाता है
उसे बताता है कि रोया ना करो
सामना किया करो किसी भी अपमान का
एकांत में पुरुष स्त्री से प्रेम करता है
किसी प्रार्थना की तरह
लेकिन
वह नहीं भूलता स्वयं देवता होना
उसे याद होते है पुरुष होने के नियम
उसे मालूम होती है स्त्रियों की सीमा
और उसके आचरण के कायदे कानून
एकांत में पुरुष स्त्री को सबसे अधिक खुश रखता है

प्रेम के बाद की दूसरी पारी में
पुरुष उस प्रेम की खबर बनाता है
और दोस्तों के साथ बैठ कर
प्लेट में पड़े नमकीन की तरह
स्वाद ले ले कर बताता है

वैसे ही जैसे कोई राजा
अपने शिकार के किस्से बार बार
बड़े रौब से सुनाता है
और अपने कमरो में रखे
उन जानवरो के सर
बड़े गर्व से दिखाता है
अपने दोस्तों के ठहाकों में
पुरुष कैसा राजा सा हो जाता है !
और धज़्ज़ियाँ उड़ते देखता है
किसी अख़बार सी
पुराने प्रेम की !
...................

आवारगी!

एक छोटा सा बैग
बस कुछ जोड़ी कपडे
चुन्नियों वाले सूट हरगिज़ नहीं
कुछ कुर्ते, एक जीन्स, कुछ टॉप और लेग्गिंग्स बस।
एक बॉडी लोशन, कुछ पैन किलर्स, अपनी रेगुलर दवाई
एक पैड, कुछ पेन, एक टोर्च,
सबसे आरामदायक चप्पले दो जोड़ी (एक टूट गयी तो?)
सब चिंताएं, फ़िक्र, तकाज़े, शिकायते
 रिश्ते और प्रेम के लिए एक छोटा सा डिब्बा,

जिसे साथ नहीं ले जाना, शायद बेड के नीचे छोड़ जाऊँ!
अब एक जगह जहाँ न कोई जानता हो, ना पहचानता हो और बस मैं और समय!
ऐसी यात्रा कभी भी शुरू हो सकती है , चाहिए तो केवल हौसला!
हवा, नदी, कोरा विक्षिप्त मन, दिन-रात, ढेर सारी साँसे
(जाने कितना रुकना पड़ जाये, साँसे सफर में कम नहीं पड़नी चाहिए!)
अंतिम सांस के लिए घर बेहद ज़रूरी है

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