उत्तर-आधुनिकतावाद: कुछ आयाम

शोध पत्र: डॉ रश्मि चतुर्वेदी

(महिला महाविद्यालय, किदवई नगर, कानपुर; चलभाष: +91 800 451 6668)

डॉ. रश्मि चतुर्वेदी
उत्तर आधुनिकतावाद बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ एक सैद्धांतिक आन्दोलन है। यह विशुद्ध साहित्यिक आन्दोलन नहीं है। साहित्य के साथ साथ इसने कला के कई रूपों को भी प्रभावित किया है। इसने पुराने सिद्धांतों पर फिर से विचार करने पर जोर दिया। उत्तर-आधुनिकतावाद एक ही साथ आधुनिकतावाद का विकास भी है और विलोम भी आधुनिकतावाद ने मनुष्य को केंद्र में रख कर अपना विकास किया था। मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधा को केंद्र में रखा। इसके लिए नए नए वैज्ञानिक आविष्कार किये। प्रकृति पर नियन्त्रण पाने की कोशिश की। पूँजी का विकास हुआ। भौतिक विकास को ही मनुष्य का वास्तविक विकास माना जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि प्रकृति के साथ समाज का एक बड़ा हिस्सा भी हाशिए पर चला गया।

उत्तर-आधुनिकतावाद का विकास आधुनिकतावाद की इन्ही प्रवृत्तियों के विरोध में हुआ। उत्तर-आधुनिकतावाद ने हाशिए की आवाज़ को केंद्र में लाने की कोशिश की। विकास की धारणा को प्रश्नांकित किया। परिणामस्वरूप हाशिए की चीज़ें केंद्र में आने लगीं। आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श, स्त्री-विमर्श, पर्यावरण संवेदना आदि कई विमर्श शुरू हुए। समाज में शुरू हुए इन विमर्शों ने साहित्य, कला, राजनीति, फिल्म आदि कई चीज़ों को प्रभावित किया।


उत्तर-आधुनिकतावाद का आरंभ
आधुनिकता की मान्यताओं को प्रश्नांकित करते हुए हाशिए की आवाज़ से उत्तर-आधुनिकतावाद की शुरुआत होती है। आधुनिकता  मनुष्य को केंद्र में रखती आई है। उसने औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। कल-कारखानों को आधुनिकता ने मन्दिर के सदृश्य ठहरा दिया। मनुष्य ने अपनी सुख-सुविधा के लिए प्रकृति और प्रकृति के सबसे अधिक करीब रहने वालों का जम कर दोहन किया। आधुनिक मानव को लगने लगा कि उसने प्रकृति को अपने वश में कर लिया है। पर बात ऐसी नहीं थी।

लोग पूंजीवाद के विकसित रूप और तकनीक को समाज के हर क्षेत्र में महसूस कर रहे थे। आधुनिकता के साथ ही साम्राज्यवाद का भी उदय हुआ। मार्क्स ने कहा है कि साम्राज्यवाद भारत में सामाजिक बदलाव ला रहा था। लेकिन इस प्रक्रिया में साम्राज्यवादियों के इरादे नेक नहीं थे क्योंकि इसमें उनके अपने हित सर्वोपरि थे। अतः उन्होंने आधुनिकता का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए ही किया। आधुनिकता में मौजूद भौतिक पक्ष को उन्होंने अत्यधिक महत्त्व दिया। इस कृत्य और स्वार्थ के बावजूद उन्होंने जो कुछ भारत के लिए किया वह अनजाने में ही भारत का इतिहास बदलने का कारण बना। ये विरोधी बातें उत्तर-आधुनिकतावाद के कार्य-कारण को समझने में मदद करती हैं। साम्राज्यवादियों ने बड़ी ही चालाकी से भारतवासियों का एक वर्ग तैयार किया, जिसे मध्य वर्ग कहते हैं। यह वर्ग अपने मालिकों का अनुसरण करता था तथा उनकी संस्कृति को प्रशंसा की नज़र से देखता था। लिहाज़ा बहुत हद तक वह अपनी संस्कृति से दूर हो गया। इस मध्य वर्ग ने ही भारत में अंग्रेजों को सत्ता जमाने में मदद की। इनका कार्य और व्यापर इनके एजेंट करते थे और ये झूठ फैलाते रहते थे। इसके साथ ही इन्होने सुनियोजित तरीके से अपनी भाषा और संस्कृति को सबसे श्रेष्ठ बताने की कोशिश की और भारतीय संस्कृति को कमर तक आँका ; इस कार्य में वे काफी हद तक सफल भी हुए। वे जिन मूल्यों और मानवीयता की बात आधुनिकता के  सन्दर्भ में करते थे, उसे उन्होंने कभी नहीं निभाया। इस प्रकार उनका दोमुंहापन भारतीयों के सामने आने लगा। एक ओर तो वे भारत के समृद्ध साहित्य का अध्ययन कर रहे थे ; दूसरी ओर यहाँ की संस्कृति को नकार भी रहे थे। जार्ज ओरवेल इसे कपटपूर्ण आचरण कहते हैं। उन्नीसवीं सदी में मार्क ट्वेन ने अमेरिका द्वारा फिलिस्तीन को अपने कब्ज़े में लेने के बाद लिखा कि यह एक विरोधाभास है कि अमेरिका में तो लोकतंत्र रहे और अन्य देशों में साम्राज्यवाद। इसके आलावा नस्लभेद की नीति भी उनके अवचेतन में विद्यमान थी। अमेरिका में दास प्रथा सैद्धांतिक रूप से समाप्त होने के बाद भी व्यवहार में समाप्त नहीं हुई थी। नस्लभेदी नीति का व्यापक प्रभाव दूसरे महायुद्ध में दिखाई दिया जब हजारों यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह विश्व के इतिहास की सबसे दुखद घटना थी। यूरोप इस घटना से विलोड़ित हो गया था एवं पश्चिम के विकास और इतिहास की प्रक्रिया पर एक सवालिया निशान लग गया। इसके परिणामस्वरूप आधुनिकता की दो मान्यताओं को चुनौती मिली। पहली मानव उत्कृष्टता की ओर बढ़ रहा है तथा शीघ्र ही एक आदर्श मानव बन जाएगा; दूसरी, समाज भी एक आदर्श समाज को ओर जा रहा है, जहाँ मनुष्य अपने तरीके से जीवन जी सकेंगे तथा अपना धर्म पालन करने में स्वतन्त्र होंगे।

उत्तर आधुनिकतावाद का विस्तार
विकास, तार्किकता, समीक्षात्मक खोज, धर्म निरपेक्षता सब बेमानी हो गए | इस त्रासदी का प्रभाव हर संवेदनशील नागरिक पर पड़ा, विशेष रूप से विद्वानों और लेखकों पर जो समाज की हर हलचल को रेखांकित करते रहे हैं। लेखक इस त्रासदी से जूझने के तरीके तलाश करने लगे क्योंकि यह अनुभव आधुनिकता के संदर्भ में अप्रत्याशित था। अतः इसे रूप देना और काल्पनिक चेतना के अधीन लाना मुश्किल हो गया | परिणामस्वरूप वास्तविकता से मोह भंग हो गया। नाज़ी एक ओर जहाँ जर्मनी से मानवता की बात कर रहे थे, बच्चों को दूध भेज रहे थे, वहीँ दूसरी ओर गैस चैम्बर में यहूदियों को मारा जा रहा था। उनकी मनुष्यता को किस श्रेणी में रखा जाए। डेविड वार्थाल्मे अपने उपन्यास ‘स्नो व्हाईट’ में मनुष्य की बदली हुई परिभाषा इस प्रकार बताते हैं , “ ऐसा आदमी बनने की कोशिश करे जिसे जो वह कर रहा था उसे कुछ भी मालुम नहीं था। अभी भी उसे उसके बारे में मालुम नहीं है। उसने हमें जो निर्देश दिया वह रोचक नहीं था। एक पेड़ ज्यादा रोचक है। एक बंद डिब्बा ज्यादा रोचक है। ” संबंधों को परिभाषित करना सरल नहीं है। इस उपन्यास में लेखक वार्थाल्मे की समस्त पूर्व अवधारणाओं, चरित्र, मनोविज्ञान, एवं लेखक के अधिकार को चुनौती देते हैं। उसी उपन्यास में उनका कहना है कि एक ही अनुभव की अनेक व्याख्याएँ हो सकती हैं।
सैमुअल बैकेट जो उत्तर आधुनिकतावादी काल के प्रमुख नाटककार और उपन्यासकारों में शामिल हैं। वे इस नए अनुभव को इस प्रकार व्यक्त करते हैं:
“वर्णन करने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे इसका वर्णन किया जा सके। इसे व्यक्त करने की शक्ति नहीं है। पर साथ ही वे यह भी कहते हैं कि इसे व्यक्त करने का दायित्व लेखक पर ही है। यही सबसे बड़ी चुनौती भी है। इस भ्रांति और अव्यवस्था को व्यक्त करने का तरीका उसे ही निकलना है। कहीं अर्थहीन वाक्यों और कहीं अर्थहीन वार्तालाप के द्वारा इसे व्यक्त किया गया है। वे अनुभव और भाषा में विच्छेद की बात करते हैं। मौन का उपयोग करते हैं क्योंकि मौन शब्दों से अधिक बोलता है। अपने नाटकों में वे मौन का निर्देश देते हैं। कहीं मौन कम तो कहीं मौन अधिक। वे चलने-फिरने का निर्देश देते हैं लेकिन चलना-फिरना नहीं है।"

उत्तर-आधुनिकतावाद की विशेषताएँ

1. उत्तर-आधुनिकतावाद आधुनिकतावाद का विकास भी है और विलोम भी।
2. उत्तर-आधुनिकतावाद कृति की जगह पाठ पर जोर देता है। इसलिए एक ही रचना के कई पाठ हो सकते हैं। यानी उत्तर-आधुनिकतावाद में लेखक की जगह पाठक प्रमुख होता है।
3. उत्तर-आधुनिकतावाद व्यक्ति और सामाजिक इकाईयों की स्वतंत्रता का समर्थन करता है।
4. उत्तर-आधुनिकतावाद पूर्णतावादी दृष्टि का विरोध करता है। इस प्रकार वह समग्रता का विखंडन करता है।
5. उत्तर-आधुनिकतावाद हाशिए की आवाज़ को प्रमुखता देता है।
6. उत्तर-आधुनिकतावाद में ज्ञान की जगह सूचना का महत्त्व अधिक होता है|

उत्तर-आधुनिकतावाद के परिवर्तनकारी बिंदु

1. महाशून्यता का अनुभव
उत्तर-आधुनिकतावाद का कारण दो और परिवर्तनकारी शक्तियाँ रहीं। प्रथम, पूंजीवाद का विकसित रूप जिसमें मनुष्य का संबंध मानवीय भावनाओं से टूट गया। यहाँ संबंध अमूर्त हो जाते हैं। मार्क्स इसको रेईफिकेशन कहते हैं। यहाँ संबंधों में स्थायित्व ढूंढना अर्थहीन है। भीतर की शक्ति समाप्त हो गई है और और मनुष्य एक बृहत् नीरसता का हिस्सा बन गया है। बाहर से सबकुछ ठीक दिखता है पर भीतर एक महाशून्य है, एक खालीपन है। इससे वह एक सतही तौर पर जीता है। वह अपने जीवन के असंतोष और शक्तिहीनता का कारण नहीं जानता। अपने खालीपन को वह समझता है कि अपव्ययता से दूर किया जा सकता है। लेकिन फिर भी असंतोष बना रहता है। वह एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाता है, लेकिन फिर भी उसे आत्म-संतोष नहीं मिलता। वह एक नकली जिंदगी जीता है जिससे निकलने का कोई उसे नहीं मिलता। स्वयं के साथ उसका संवाद नहीं हो पाता ऊपर से समाज के साथ उसका संवाद टूट जाता है।

2 मानवतावाद का पतन
तकनीक या प्रौद्योगिकी पूंजीवादी व्यवस्था की परिवर्तनकारी शक्ति है। इसमें मनुष्य एक यंत्र बन जाता है और और एक पुर्जे की तरह काम करता है। व्यक्ति वस्तुतः एक व्यक्ति न होकर एक नम्बर बन जाता है जिसे आप गिन सकते हैं। तकनीकि की दुनिया में मनुष्य अपने आपको समायोजित करता है, बदलता नहीं। धीरे-धीरे वह तकनीकि की गिरफ्त में आ जाता है, उसीसे उसकी दिनचर्या निर्धारित होने लगती है। मानवता जैसे गुम हो गई है। मानव मात्र की इच्छाएँ या आदतें एक जैसी हो जाती हैं। यदि उसकी आदतें भिन्न होंगी तो सामाजिक मशीनरी में घर्षण पैदा होगा। मशीन एक कविता में लुईस लिखते हैं :

मरने से पूर्व प्रार्थना
मैं अभी पैदा नहीं हुआ हूँ।
भगवान मुझे शांति दे
जिससे मैं उनके खिलाफ खड़ा हो सकूं।
जो मेरी मानवता को जमा देना चाहते हैं।
जो मुझे प्राणघातक स्वचालित मशीनों में धकेल रहे हैं
मुझे मशीन का पुर्जा बनाना चाहते हैं
एक चीज़ बनाना चाहते हैं
आधे चेहरे के साथ, एक चीज़

“I am not yet born; O fill me
With strength against those who would freeze my
Humanity, would dragoon me into a lethal automaton,
Would make me a cog in a machine, a thing with
One face, a thing, and against all those
Who would dissipate my entirety, would
Blow me like thistledown hither and
Thither or hither and thither
Like water held in the
Hands will spill me.”
(Prayer before death, Louis Macneice, https://genius.com/Louis-macneice-prayer-before-birth-annotated )

इसी तरह का एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है -

(What nudity as beautiful as this
Obedient monster purring at its toil;
These naked iron muscles dripping oil
And the sure-fingered rods that never miss.
This long and shining flank of metal is
Magic that greasy labour cannot spoil;
While this vast engine that could rend the soil
Conceals its fury with a gentle hiss.
It does not vent its loathing, it does not turn
Upon its makers with destroying hate.
It bears a deeper malice; lives to earn
It’s masters bread and laughs to see this great
Lord of the earth, who rules but cannot learn,
Become the slave of what his slaves create.

(Portrait Of A Machine - Poem by Louis Untermeyerhttps://www.poemhunter.com/poem/portrait-of-a-machine/)

ऐसे प्रौद्योगिकी के युग में मानवता के लिए जगह ही कहाँ है? बेकेट (beckett) के ‘वेटिंग फॉर गोदो’ (waiting for Godot) में चरित्र किसका इंतजार कर रहे हैं – मालूम नहीं, शायद भगवान का ! वेटिंग फॉर गोडोट ( शमूएल बेकेट द्वारा रचित एक नाटक है, जिसमें दो मुख्य पात्र व्लादिमीर और एस्ट्रागन एक अन्य काल्पनिक पात्र गोडोट के आने की अंतहीन व निष्फल प्रतीक्षा करते हैं। इस नाटक के प्रीमियर से अब तक गोडोट की अनुपस्थिति व अन्य पहलुओं को लेकर अनेक व्याख्यायें की जा चुकी हैं। इसे "बीसवीं सदी का सबसे प्रभावशाली अंग्रेजी भाषा का नाटक" भी बुलाया जा चुका है।[1] (बर्लिन, एन. 1999) ऐसे ही रोबे ग्रिलेट का एक उपन्यास है ‘द इररेर्स’ यह हत्यारों के समूह की कहानी है, उन्हें एक आदमी को मारने का जिम्मा सौंपा जाता है। गलती से वह किसी अन्य आदमी को मार देते हैं। जब तक वे सही आदमी को नहीं मार देते तब तक वे असहज रहते हैं। उस आदमी को मार कर ही वे सामान्य हो पाते हैं। ग्रिलेट बताना चाहते हैं कि जैसा समाज होता है वैसा ही उपन्यास भी होता है। दोनों ही स्वचालित यंत्र की तरह काम कर रहे हैं, लेकिन उससे बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता। लगता है मनुष्य एक जाल में जकड़ गया है। जिससे बाहर न निकल सकना उसकी नियति है। यह ठीक उसी तरह होता है जैसे किसी बड़े पत्थर को पहाड़ी पर चढाने का प्रयास किया जाए और वह बार-बार नीचे गिर जाए।

3. मानवीय मूल्यों का अंत
यह बहुत हद तक सही है कि उत्तर-आधुनिकतावादी साहित्य में निश्चित मानवीय मूल्य कोई विशेष महत्त्व नहीं रखते। बहुत से आलोचक निराशावादी, नकारात्मक और और अतार्किक तत्त्वों को ही महत्त्व देते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि इसमें आधुनिकतावादी सभी अवधारणाओं को नकार दिया गया है। उत्तर आधुनिकतावादी भी नए अबुभावों को बांधने पर जोर देते हैं। और अनुभव के बंधन के लिए नए रास्ते तलाश कर रहे हैं क्योंकि नैतिक और बुद्धिमत्तापूर्ण विचार अप्रासंगिक हो गए हैं या मृतप्राय हैं। लेस्ली फेडरर, सुसेन सोंटेग, जॉर्ज साइलेंस, रिचर्ड पायोनियर, और ईहाव हसन इसको एक महत्वपूर्ण खोज मानते हैं।

4 नई आलोचना
उत्तर आधुनिकता को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है। फ्रैंक करमोडे और गेराल्ड ग्राफ इसको आधुनिकतावाद का विस्तार मानते हैं। माल्कन ब्राडबरी और उहाब हसन इसे आधुनिकतावाद का विस्तार भी मानते हैं एवं इससे अलग भी। इरविंग होम इसे ह्रास और पतन मानते हैं। फ्रेडरि जेमिसन इन दोनों को अलग-अलग घटना मानते हैं क्योंकि दोनों अपने मायने और सामाजिक कार्य में अलग-अलग हैं। वे इसे मार्क्सवादी विचारधारा से जोड़कर देखते हैं। वे उत्तर-आधुनिकतावाद को लेट-कैपेटेटिव या मल्टीनेशनल केपेतटेटिव से जोड़कर देखते हैं, जिसने सांस्कृतिक क्षेत्र को बिलकुल बदल दिया है।

रेमंड विलिअम कहते हैं कि उत्तर-आधुनिक लेखकों और आलोचकों ने कुछ क्षेत्रों को दर्शाया है और कुछ क्षेत्रों की उपेक्षा की है। अतः इसे विचारधारा के सन्दर्भ में देखा जा सकता है। उनके अनुसार आधुनिकता का आधार दो क्षेत्र हैं :
1.  सामाजिक वास्तविकता की नवीन प्रक्रिया, जिसने समाज को एक नवीन नैतिक विवेचना दी ;
2. उन बाह्य पहलुओं का नवीनीकरण, जिसने भाषा को नए तरीके से लिखने की प्रेरणा दी।

सन्दर्भ को नकारना, इतिहास को नकारना और केवल टेक्स्ट पर ही केन्द्रित होना एक भ्रमित विचारधारा का हिस्सा है। जैसे उत्तर-आधुनिकतावादी मानते हैं कि जीवन में अगर बिखराव है तो उसको समझने का तरीका केवल टेक्स्ट पर ही केंद्रित करना एक भुलावा है। इसी विचारधारा का हिस्सा है न्यू क्रिटिसिज्म टेक्स्ट दुनिया से हट कर शब्द पर केन्द्रित हो गई है। इसके लिए तरह-तरह के नकार इस्तेमाल किए जाने लगे। विलिअम्स के अनुसार सन्दर्भ से हट कर कोई साहित्यिक कृति अपना पूरा संसार नहीं बना सकती। वे कहते हैं यदि उत्तर-आधुनिकता की जकड़न से बाहर निकलना है तो उस परम्परा को पुनः जागृत करना होगा जिसे उत्तर-आधुनिकता की रफ़्तार ने पीछे छोड़ दिया है। और उन कृतियों पर ध्यान देना होगा जिनमे समुदाय को दुबारा स्थापित किया जा सके। स्पष्ट है कि विलियम्स उस बदलाव के ख़िलाफ़ लिख रहे हैं जो अनुभव करने और उस अनुभव को व्यक्त करने की प्रक्रिया में आ गया है। यदि इतिहास को खंगाला जाए तो उन सब मुद्दों को केंद्र में लाना होगा जो नई विचारधारा में हाशिए पर डाल दिए गए हैं। यहाँ यह याद रखना चाहिए कि अक्सर किसी कृति की तलाश में उसके मूल सन्दर्भ को भूल जाना ठीक नहीं है।

रेमंड विलियम्स जिस समय लिख रहे थे उस समय विश्व में बदलाव का युग था। एक के बाद एक देश साम्राज्यवादी चंगुल से मुक्त हो रहे थे। वहां के लोग अपने अधिकार क्षेत्र के मूल्यों और अधिकारों की बात कर रहे थे। उनके एजेंडे में काले अमरीकी, राष्ट्रवादी तत्त्व, दलित या उनसे समानता रखने वाले थे। यदि उन्हें ऐतिहासिक सन्दर्भ में नहीं देखा जाएगा तो उनके मुद्दे बेमानी हो जाएँगे। ये विश्व भर में उत्तर-आधुनिकतावाद के विरोध में खड़े थे। इस लिए उत्तर-अधुनिक्तावाद के साथ इन तत्त्वों को भी ध्यान में रखना चाहिए। हालाँकि इसका खतरा बना रहता है कि यह उस बृहद विचारधारा में दब न जाए। भारत में उत्तर-आधुनिकतावाद की बात करते समय उनकी वेदना और अनुभव को नकारना नहीं चाहिए। भारत में लेखक अभी उस हद तक नहीं पहुंचा है जहाँ एक उत्तर-आधुनिक विचार गया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि भारतीय साहित्य उत्तर-आधुनिकतावादी प्रभाव में नहीं आया। यहाँ उत्तर-अधुनिक्तावादी चेतना को उसी तरह स्वीकार कर लिया जिस तरह आधुनिक को स्वीकार किया था। अंतर केवल इतना है कि उत्तर-आधुनिकता पूरी तरह से आयातित है जबकि आधुनिक चेतना कुछ हद तक देशज थी। उत्तर आधुनिक लेखक उन तत्त्वों को स्वीकार करते हैं जो या तो मौजूद नहीं हैं या विकसित नहीं हैं। जैसे विमुखीकरण की प्रकिया जो समय बड़े शहरों तक थी और केवल कुछ लोगों तक सीमित थी, लेकिन पूरे भारत में यह कल्पना आरोपित लगती है। हिंदी में उत्तर-आधुनिकता की चर्चा सबसे पहले निर्मल वर्मा ने की। निर्मल वर्मा भारत के उन चंद लेखकों में थे जो देश-परदेश में हो रहे साहित्यिक-सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन को एक साथ देख रहे थे। वे शायद पहले हिंदी लेखक हैं जिन्होंने आधुनिकता के विकास मॉडल पर गम्भीर सवाल उठाए।

5 संस्कृति का प्रश्न
पिछले दो-तीन दशकों में बहुत तेज़ी से उदारीकरण हुआ है, इससे भौतिकता प्रबल रूप से समाज में व्याप्त हो गई है। शुरू में इसका विरोध हुआ लेकिन बाद में वह खत्म हो गया। ऐसी प्रक्रिया विचारों को प्रभावित करती है। यह विचार फिर साहित्य को प्रभावित करते हैं। प्रश्न यह है कि लेखक उस अनुभव को कहाँ से देखते हैं? उदारीकरण के भीतर से या उस स्थान से जहाँ उसे समझने और मायने देने के प्रयास शुरू होते हैं ! लेकिन यह प्रयास पूंजीवादी जटिल प्रक्रिया में दब जाता है और यह पता ही नहीं चलता कि कब उसकी गिरफ्त में आ गया। आधुनिकतावाद की एक विलोम अवस्था की प्राचीनता से तुलना होती थी और उत्तर-आधुनिकतावाद की आधुनिकतावाद से। सारी संस्कृतियाँ उत्तर-अधुनिक्तावाद से प्रभावित हैं, यह कहना ठीक नहीं। रेमंड विलियम कहते हैं कि आधुनिकतावाद अप्रासंगिक नहीं होता; इस लिए अनुभव को फिर से स्थापित करने के लिए परम्परा से जोड़ना होगा। वे संस्कृतिक कृतियों की बात करते समय बची हुई और उबरते रूप की बात करते हैं। काले अमेरीकी जिस तरह का साहित्य लिख रहे हैं वह काफी हद तक प्रभुत्वपूर्ण विचारधारा से अलग है। इसी तरह तीसरी दुनिया के लेखकों के सामने सवाल है कि यदि वे उत्तर-आधुनिकतावाद को पूरी तरह से स्वीकार करते हैं तो वे सदियाँ लांघ जाते हैं। वे समझने लगते हैं कि पश्चिम के देशों की त्रासदी उनकी भी है, जिसमे वैश्विक असमानता है। लेकिन अपने चरों ओर की दुर्दशा और पीड़ा उन्हें चिंतित करती है। लेकिन यदि वह उत्तर-आधुनिकतावाद के रूप को स्वीकार करते हैं तो क्या उनके कंटेंट को ना कह सकते हैं ! इस दुविधा से निकलने के लिए काले अमेरिकी लेखकों, अफ़्रीकी लेखकों और तीसरी दुनिया के लेखकों ने अपनी चेतना को टटोला और उसकी अभिव्यक्ति उनकी आत्म-कथाओं में हुई। रेमंड विलियम्स की बात सही है कि तीसरी दुनिया को जो परोसा जाता है, वे उसे वैसे ही स्वीकार करते हैं। इसे वे सेलेक्टिव एसोसिएशन कहते हैं। चुने हुए तथ्यों को स्वीकार करके वे विवेचना को फिर से स्थापित करते हैं, जिसमे ऐतिहासिक चेतना और वास्तविक चेतना अलग नहीं होती।
6 चयन का अधिकार
तीसरी दुनिया के लेखकों के पास अभी भी चुनने का अधिकार है। उसमें वह समकालीन सभ्यता को एक विवेचनात्मक भौतिकता से देख सकते हैं। यथार्थवादी स्थिति का वर्णन करने वाली शब्दावली को वे उच्च कला के नाम पर नकारते हैं। इन देशों के लेखक अब भी अतीत से अपना सम्बन्ध कायम रखते हैं। यहाँ तक कि व्यक्ति और समुदाय का संबंध भी टूटा नहीं है। इन देशों में स्मृति के माध्यम से साहित्य और कलाओं में परंपरा का नवीनीकरण हो रहा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि तीसरी दुनिया के लोग अतीत में रहने लगे हैं। पर अतीत की एक नई व्याख्या शुरू हो गई है। यह व्याख्या आधुनिकता की व्याख्या से अलग है। अब मध्यकालीन कह कर या प्राचीन कह कर यूूँ किसी कृति या मूल्य को नकारा नहीं जा सकता। उन पर पुनर्विचार हो रहे हैं।

पिछले दो दशकों से उत्तर-आधुनिकता के व्यापक मूल्यों के खिलाफ एक मुहीम चली है। यह उत्तर-उपनिवेशवादी विचारधारा के तहत है जो उपनिवेशवादी मूल्यों को नकारते हैं। इससे राजनीतिक वास्तविकता के बारे में चेतना विकसित हुई है। अब दलित और नारीवादी लेखक भी अपनी बात स्वतन्त्र ढंग से कह रहे हैं। उत्तर-आधुनिक साहित्य चिन्तन को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए हिंदी की दो रचनाओं का उदहारण दिया जा सकता है। पहली है अज्ञेय का ‘अपने-अपने अजनबी’, जो पिछली शताब्दी के आठवें दशक में प्रकाशित हुआ, और दूसरी है उदय प्रकाश की चर्चित कहानी – ‘ और अंत में प्रार्थना ’ जो 1992 में हंस में प्रकाशित हुई थी। दोनों रचनाओं का सन्दर्भ और चिन्तन अलग है। अज्ञेय का उपन्यास विदेश की पृष्ठभूमि में लिखा गया था और पूर्ण रूप से उत्तर-आधुनिक पश्चिम साहित्य चिन्तन से प्रभावित है। उदय प्रकाश की पृष्ठभूमि भारतीय है और वह उन उलझी हुई सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से जूझती है जिनका निराकरण दिखाई नहीं देता। इस प्रकार उदय प्रकाश की कहानी इस चिन्तन को पूर्ण रूप से भारतीय दृष्टि से देखती है। वह आधुनिकता और आधुनिकता की आड़ में छिपे मध्यकालीन बोध दोनों को ही पाठक के सामने नंगा करती है। 

निष्कर्ष


हिंदी भाषा भाषियों को खास और पूरे भारत के लिए आमतौर पर उत्तर-आधुनिकतावाद की अवधारणा अभी समझ से परे है। कृषि प्रधान ग्रामीण जनसंख्या बहुलता वाले इस देश में जहाँ किसान और खेतीहर मजदूर हर रोज़ आत्म हत्या करने पर विवश हैं , जहाँ भीड़ तंत्र की हिंसा, साम्प्रदायिक दंगे, नक्सलवाद, आतंकवाद और उनके रक्षाकवच पत्थरबाज, भूख, बेकारी, और बीमारी अभी भी विद्यमान है वहाँ क्या आप उत्तर-आधुनिकतावाद को कैसे समझ पाएँगे? या फिर इसे ही उत्तर-आधुनिकता कहेंगे? उधर रेमंड विलियम कहते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि उत्तर-आधुनिकतावादी अनुभव को आधुनिकतावाद की कसौटी पर देखा जाए और आधुनिकतावाद के साथ भी यही व्यवहार किया जाए। मनुष्य जीवन के दो पहलू हैं – वास्तविक और संभावित। उत्तर-आधुनिकतावाद पश्चिम के केवल वास्तविक पहलु पर ही जोर देता है क्योंकि वहां मनुष्य अपने माहौल में कैद है। वह स्थिति धीरे-धीरे तीसरी दुनिया के देशों में प्रवेश करने लगी है। इसलिए यह लेखक का दायित्व है कि वह उस स्थिति से निकलने का रास्ता भी दिखाए। रास्ता न दिखा सके तो कम से कम पाठक को इस स्थिति का बोध तो कराए। बीमारी का ईलाज करना ही बड़ी बात नहीं होती। कई बार बीमारी को सही ढंग से पहचान कर बीमार को इसका ज्ञान कराना भी एक बड़ा काम होता है। उत्तर-आधुनिकता आज वही काम कर रही है।

सन्दर्भ
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पचौरी, सुधीश, उत्तर-आधुनिक साहित्यिक विमर्श
Ahmad, aziz (1992), in theory: classes, nations, literature, verso: London
Jencks, chares (1986), what is Post Modernism? Academy Edition: London
Jemison, Fredric (1991), post modernism or cultural logic of late capitalism, Duke University Press
Jean-François, Lyotard,(1984), the postmodern condition: A report on knowledge. Manchester university press: Manchester

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1 comment :

  1. very interesting and clear approach with solid content

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