दलित स्त्रीवाद की आत्मभिव्यक्तियाँ

भावना मासीवाल

- भावना मासीवाल


‘दलित नारीवाद’ भारतीय नारीवाद (जिसे साहित्य में स्त्री विमर्श के रूप में जाना जाता है) के भीतर से स्वयं के लिए खड़ा होने वाला वह वर्ग है जो अपने, सामाजिक राजनैतिक, आर्थिक परिवेश के कारण कहीं पीछे छुट जाता है। यह वर्ग एक ओर नारीवाद से खुद को अलग करता है वहीं दलित चिंतन से भी ‘दलित स्त्री चिंतन’ को अलगाता है क्योंकि इनका मानना था कि नारीवाद के भीतर वह अपनी तथाकथित जाति के कारण दोयम दर्जे के रूप में व्याख्यित होती रही है और उनकी समस्याएं यहाँ गौण भूमिका में सामने आती है। दलित नारीवाद के मुखर होने का दूसरा कारण दलित पितृसत्ता से मुक्ति रहा। दलित चिंतन या कहा जाए की दलित विमर्श के अगुआ पुरुष रहे जिन्होंने इस विचारधारा को केंद्रीय रूप दिया। हाशिए के समाज में भले ही महिलाओं को कुछ स्तर तक निर्णय का अधिकार था, वह विरोध प्रकट कर सकती थी बावजूद इन सबके वह अपने ही घर में प्रताड़ित भी हो रही थी क्योंकि पितृसत्तात्मक व्यवस्था ब्राह्मण समाज में ही मौजूद नहीं थी बल्कि दलितों में भी थी। कांचा इलैया अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं ‘हिस्टोरिकल रेवोल्यूशन के बाद निचले तबके की जाति विशेष रूप से दलित जाति ने ब्राह्मणवाद को अपना लिया...जिसे वह ‘दलित डेमोक्रेटिक पैट्रियार्की’  कहते हैं। दलित समाज में जिस पितृसत्ता की बात कांचा इलैया करते हैं उसमें दलित महिलाओं को घरेलू हिंसा, श्रम के तिहरे शोषण से शोषित होने के साथ ही समाज में दलित होने की अपनी यथावत स्थिति से भी जूझते देखा जाता है।

दलित स्त्रीवादी लेखन को शर्मिला रेगे ‘भिन्नता’ और ‘अलग आवाज’ (Different Voice) के रूप में व्याख्यित करती है और लिखती हैं “स्त्रियों की अलग आवाज़ उनकी भिन्नता को नाम देने मात्र का मुद्दा नहीं है। भिन्नता का नामकरण तो अस्मिता की संकीर्ण राजनीति को जन्म देता –‘इसकी बजाय ‘भिन्नता’ पर यह जोर जाति व जेंडर को चर्चा के केंद्र में लाने की तरह पढ़ा जाए और दलित स्त्रीवाद के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश की तरह देखा जाए”। दलित महिला जहाँ जातीय आधार पर उच्च जातीय व्यवस्था में पुरुष और स्त्री दोनों से शोषित होती हैं वहीं अपने ही समाज में पुरुष वर्ग से भी शोषित देखी जाती है। शोषण का यह क्रम जाति तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि वर्ग के भीतर भी वह श्रम के तिहरे शोषण से शोषित होती है। श्रम का यह तिहरा शोषण घरेलू श्रम, घर से बाहर काम करने का श्रम और पुनर्त्पादन के श्रम से जुड़ता है। महिला यदि शिक्षित है स्थिति तब भी यथावत बनी रहती है। जाति और वर्ग आधारित शोषण की प्रक्रियां समाज में महिलाओं की स्थिति को अधिक गंभीर बनाती हैं। दलित महिलाओं की यथा स्थिति को पहचानते हुए शर्मिला रेगे दलित स्त्री दृष्टिकोण की बात करती हैं ‘दलित स्त्री दृष्टिकोण समाज द्वारा निर्मित समुदायों के भीतर निजी अनुभवों पर जोर देता है तथा जाति, वर्ग क्षेत्रीय राजनीति के उन अनेक श्रेणी बद्ध व सतत परिवर्तनशील सत्ता समीकरणों पर ध्यान केन्द्रित करता है। जिन्होंने इन समुदायों का निर्माण किया है...मानना होगा कि दलित स्त्रीवादी दृष्टिकोण स्वयं को मुक्त करनेवाली जाँच-परख और संशोधनों के लिए खुला है ’। दलित स्त्रीवादी इसी दृष्टिकोण को दलित स्त्री आत्मकथाओं के भीतर भी देखा गया है।

स्त्री जब आत्मकथा लिखती है तो उसे धमाके के रूप में देखा जाता है। यदि वह स्त्री दलित हो तो उसकी यातना की दास्तान और बढ़ जाती है, जो हर दलित के साथ घटित होती है। दलित स्त्री आत्मकथा लेखन की शुरुआत बाबा साहब अंबेडकर की भूमि महाराष्ट्र से होती है जिनमें बेबी कांबले की ‘जीवन हमारा (जीणं आमुच) मराठी , शांता कृष्ण कांबले की ‘माज्या जल्माची चित्तरकथा’(मराठी) , 1981 में कुमुद पावड़े की ‘अंतः स्फोट’(मराठी), जनाबाई गिरहे की ‘मरणकला (मरणपीड़ा) मराठी, 2003 में उर्मिला पवार की ‘आयदान’ (मराठी ), 1999 में कौशल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’, 2011 में सुशीला टाकभौरे की ‘शिकंजे का दर्द’ आदि प्रमुख आत्मकथाएँ हैं। आत्मकथाओं के अतिरिक्त महिलाओं द्वारा आत्मवृत भी लिखे गए जिनमें ‘जातीय दुर्भावना की शिकार’ रमा पांचाल, ‘मेरा सृजनात्मक संघर्ष जारी है’ पी.शिवकामी, ‘मेरा बचपन: जीवन के कुछ प्रसंग’ अनिता भारती, ‘अध्यापकगिरी’ हेमलता महिश्वर, ‘तुम्हारी जात क्या है !’ राज रानी, ‘जातिवादी मानसिकता की पड़ताल’ स्मिता पाटिल, ‘जो कही नहीं’ डॉ रजनी अनुरागी, ‘असमानता के विरुद्ध संघर्ष’ उपासना गौतम, ‘वर्ग, जाति और जेंडर’ रजनी तिलक, ‘ज़ारी है हर कदम पर जंग’ पुष्पा विवेक आदि प्रमुख हैं। दलित स्त्री आत्मकथाओं को यदि विस्तार से देखें तो यह समाज न केवल जाति से बल्कि वर्ग और जेंडर से भी प्रभावित रहा। समाज का विभाजन जाति आधारित रहा है और जाति ही वर्ग का निर्धारण भी करती है और यही जाति समाज में स्त्री होने की पीड़ा को दोयम दर्जे तक पहुंचाती है।

स्त्री आत्मकथा लेखन अंबेडकर के विचारों से न केवल प्रभावित देखा गया बल्कि समाज में उनके विचारों को स्थापित भी करता है क्योंकि यह समाज एक ओर दलित होने की पीड़ा से पीड़ित था तो दूसरी ओर स्त्री होने की अपनी जैविक क्रिया से। 'जाति' का सामाजिक विभाजन व्यक्ति के जीवन को कितना अधिक प्रभावित करता है। इसका प्रमाण ‘शिकंजे का दर्द’ है जहाँ समाज उच्चवर्ण के भिखारी को भी सम्मान देता है परंतु शिक्षित दलित को अछूत मानते हुए उसकी छाया से भी परहेज करता है। सुशीला टाकभौरे इस सत्य को उद्घघाटित करती हैं। पड़ोसन भिखारी को उनकी जाति से परिचित कराती है, और कहती है- “महाराज जी इस घर की भिक्षा नहीं लेना। यहाँ जमादारन रहती  है।..... अच्छा हुआ माता जी आपने बता दिया। भला उनके घर का आटा कैसे ले सकता हूँ।”  शिक्षित दलित व्यक्ति का स्तर समाज में भिखारी से भी अधिक निम्न है। सुशीला टाकभौरे के समान ही शांता कृष्ण काम्बले अपनी आत्मकथा ‘नाजा’ में शिक्षित वर्ग पर लिखती हैं जो शिक्षित होने के बावजूद भी अपने बच्चों को जाति का पाठ सिखाते हैं और बचपन से ही उनके मन पर जाति का लेबल लगा देते हैं। शांता कृष्ण काम्बले लिखती हैं- मेरी लड़की ने अपनी सहेली के घर प्यास लगने पर मटके का पानी पी लिया तो उसकी सहेली रोने लगी, पूछने पर बोली ‘मंगला तू महार की लड़की है। हमारे यहाँ भगवान की पूजा होती है। माँ कहती है कि मंगला ने किसी चीज को हाथ लगाया तो भगवान अपवित्र हो जाएगा’।  शांता कृष्ण काम्बले की तरह ही कौशल्या बैसंत्री भी महार जाति से थी। समाज में अस्पृश्यता को देखती हैं और महसूस भी करती हैं जहाँ ‘सफाई कर्मचारियों से भी छुत-छात बरती जाती थी’  अंबेडकर ने ठीक ही कहा है कि भारत में जाति का संबंध धर्म से जुड़ा है। धर्म को जब तक पुनः परिभाषित नहीं किया जाएगा तब तक ‘जाति’ की संरचना को खत्म नहीं किया जा सकता। शिक्षा भी समाज में समानता लाने में चुकती है जिसका एक अन्य उदाहरण पी. शिवकामी का आत्मवृत ‘मेरा सृजनात्मक संघर्ष ज़ारी है’ में देखा जा सकता है जहाँ एक प्रतियोगिता के दौरान रिजल्ट की घोषणा से पूर्व रिजल्ट न बताने पर ‘प्रतिभागी बाहर आकर बोली-श्डयूल कास्ट बिच’।  यहाँ जातिगत टिपण्णी की जाती है। दलित महिला यहाँ दलित पुरुष की भांति समाज में जातिगत भेदभाव को सहती है वहीं दूसरी ओर स्वर्ण महिला के द्वारा भी उपेक्षित होती हंल। रमा रसाल अपने आत्मवृत ‘जातीय दुर्भावना की शिकार’ में शिक्षा व्यवस्था पर आच्छादित जातीय मानसिकता पर प्रहार करती हैं ‘जहाँ उन्हें 12 वर्षों के अध्यापन व वरिष्ठ शिक्षिका होने पर भी पदोन्नति नहीं मिलती’ साथ ही संस्कृत क्लासिकल में एम.ए करने के उनके निर्णय पर शिक्षकों द्वारा बुलाकर बताया जाता है कि ‘आप अनुसूचित जाति की हो दूसरा महिला हो। इन दोनों विपरीत स्थितियों के होते हुए ते संस्कृत का पीछा क्यों पकड़े हुए हो’। जाति का संबंध केवल समाज की सामाजिक संरचना तक सीमित नहीं हैं बल्कि यह आज मानसिकता बन गई है जाति की यही मानसिकता आत्मकथा और आत्मवृतों में देखी जा सकती है।

मार्क्स ने जब सर्वहारा ही बात की उस समय वह भारत की जातीय व्यवस्था को अच्छे से परख न सके। अगर जानते तो वर्ग समानता के जिस सिद्धांत को वह क्रांति का हथियार मानते थे भारत में ‘फेल’ न होता। भारत में वर्ग से अधिक जाति का महत्व रहा व्यक्ति वर्ग से ऊपर उठ सकता है पर जाति उसका पीछा नहीं छोड़ती। सुशीला टाकभौरे लिखती हैं- “मेरा दर्द उस शिक्षित, सम्मानित दलित महिला का दर्द है जो पी.एच.डी. प्राप्त कॉलेज की प्राध्यापिका होने के बाद भी जाति के रोजगार के नाम से जानी जाती है। मेरी आत्मकथा मेरी वेदना का दस्तावेज है”।   इसी अपमान से पीड़ित होकर लिखती है- पीएच. डी प्राप्त / कालेज की प्राध्यपिका / जाति के नाम पर कहलाती है / सिर्फ झाडूवाली   ‘दोहरा अभिशाप’ की लेखिका कौशल्या बैसंत्री लिखती हैं कि उनके पति देवेन्द्र कुमार जहाँ भी तबादला हुआ उनसे पहले उनकी जाति वहां पहुँच जाती थी। दफ्तर के चपरासी पर प्रभाव यह था कि ‘छोटी जाति वाला साहब है इसलिए न वह हमारे घर का काम करेगा न हमारा छुआ खाना खाएगा, पर डटा रहेगा हमारे घर’। हमारे समाज में श्रम का विभाजन कर्म नहीं बल्कि जन्म है। आदिम युग में जब कबीलाई समाज का गठन होता है वहीं से परिवार नामक संस्था की उत्पत्ति भी होती है। जिसमें श्रम के विभाजन के लिए समुदाय का निर्माण किया जाता है जिसका आधार था कर्म। समय के साथ कर्म, जन्म में परिवर्तित हो गया। जिसमें एक बार जन्म लेने पर जीवनपर्यंत व मृत्यु के पश्चात भी जाति व्यक्ति के साथ जुड़ी रहती है।  स्वयं भीमराव अंबेडकर भी ‘जाति प्रथा का विनाश’ अपने लेख में जाति के यथार्थ को बताते हुए कहते हैं कि, “वर्ण व्यवस्था और जातिभेद वस्तुत: श्रम का नहीं, श्रमिकों का विभाजन है। यही कारण है कि यहाँ नीचे गिराई गई जाति का मुख्य मनुष्य ऊपर वाली जाति का पेशा नहीं कर सकता”।

दलित समाज पर सवर्णों का शोषण तो रहा ही साथ ही उनकी स्त्रियों पर भी उनकी शोषणकारी दृष्टि रही। जहाँ समाज में दलित स्त्री होने के कारण वह वर्गभेद, जातिभेद, शोषण, हिंसा का शिकार होती है। वह लिखती हैं "दलित महिला उत्पीसड़न चाहे घर में अपनो के द्वारा हो या बाहर सवर्ण गैर पुरुषों द्वारा, महिला उत्पीड़न की बातों को पुरुष भी छिपाते हैं, महिलाएँ भी छिपाती हैं, परिवार समाज में सभी छिपाते हैं"।  सुशीला टाकभौरे भी शोषण की इस पुरुष मानसिकता से पीड़ित होती हैं। महाविद्यालय परिसर में एक अध्यापक का अक्सर उनसे कहना "सुशीला तुम पढ़ाई में होशियार हो, मार्गदर्शन के लिए मेरे घर आया करो। मैं तुम्हें कलेक्टर बनवा दूंगा"।  कौसल्या बैसंत्री भी समाज में छेड़-छाड़ और यौन हिंसा की घटनाओं को सामने लाती हैं।  नर्सिग कोर्स के बहाने अस्पताल का दरबान उन्हें अकेले सुनसान जगह पर बुलाता है और वहाँ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति प्यार करने की बात जाहिर करता है जो बाद में उनकी कच्ची उम्र को देखकर उन्हें छोड़ देता हैं ‘उसने छेड़-छाड़ नहीं की। वह सिर्फ विचित्र ढंग से मेरी और देख रहा था’। समाज महिलाओं का निम्न जाति का होना, सवर्णों और दलित पुरुषों को उनके शोषण का अधिकार स्वतः दे देता है। अनिता भारती ‘मेरा बचपन: जीवन के कुछ प्रसंग’ आत्मवृत में लिखती हैं उनके पिता जी के दोस्त दीवान अंकल अंबेडकरवादी और बौद्ध विचारों से संपन्न व्यक्ति थे।  अनिता भारती की माता जी उनके विचारों से प्रभावित थी।  वह अनिता भारती अध्ययन के लिए उनके पास भेजती हैं।  यहीं से पुरुषवादी यौन शोषण की संकीर्ण मानसिकता सामने आती है।  अनिता भारती लिखती हैं -जब दीवान अंकल ने सपरिवार खाने की मेज पर ‘’मुझे अपनी गोद में बैठाया हुआ। सबके सामने वे चुपचाप अपने एक हाथ से मेरा हाथ अपनी पेंट के बीच में ले गए। उनका दूसरा हाथ मेरे कंधे पर था। इसी हाथ से वे बार-बार मुझसे आग्रह करते खाओ बेटा रूक क्यों गई, पर मुझसे खाना खाते नहीं बन रहा था’। बाल यौन शोषण से जुड़ी बहुत सी घटनाएँ हैं जो सामने नहीं आती हैं।  यह कुछ आत्मकथाएँ और आत्मवृत है जो सामने आए हैं परंतु अभी भी बहुत कुछ छिपा हुआ हैं। महिलाओं के संदर्भ में तो प्रायः ही समझा जाता है कि उसकी कोई जाति नहीं होती। फिर शोषण की कैसे अपनी जाति हो सकती है।

दलित समाज की महिला जहाँ एक ओर अपने उच्च समाज के पुरुषों से शोषित होती है वहीं अपने समाज में भी अपने परिवार के भीतर और बाहर शोषित होती है। सुशीला टाकभौरे का जीवन इसी गुलामी व शोषण का यथार्थ रूप था। जहाँ पति अपनी पत्नी का शरीरिक व मानसिक दोनों रूपों में शोषण करता है। वह लिखती हैं’ खाना परोसने में देरी होने पर या किसी बात से नाराज होने पर वे स्पष्ट शब्दों में कहते थे ‘मेरे पैरों पर सर रखकर माफी माँग तब मैं तेरी बात मांनूगा’। इसी तरह घर में मारपीट गाली गलौज उनके साथ सामान्य था। यहाँ तक की बहस के दौरान उन्होंने अपनी चप्पल उन पर उठा दी “अपनी बक बक करते हुए मैं इनके लिए चाय लेकर, सामने रखे टी टेबल के पास आई। तभी उन्होंने पैरों के पास रखी बाटा की एक चप्पल उठाकर टी टेबल पर रखी और गुस्से के साथ कहाँ “अब बोल क्या कहना है ?”  स्त्रियों के प्रति अव्यवहार व उत्पीड़न की शिकार केवल सुशीला जी ही नहीं बल्कि उनकी भाईयों की पत्नी भी थी। वह लिखती है भाई भाभी को ड़ाँटते हुए कहते थे” एक औरत देश की प्रधानमंत्री बन गई, इसका मतलब यह नहीं है कि घर की औरत-औरत जैसी नहीं रहेगी?”  कौसल्या बैसंत्री के पति का व्यवहार भी उनके प्रति क्रूर था उनके पति रसोई का सारा सामान ताले में बंद रखते। रोज दूध और सब्जी का पैसा गिनकर देते...भूल जाने पर और याद दिलाने पर मारने दौड़ते। वह लिखती हैं ‘देवेन्द्र कुमार को पत्नी सिर्फ खाना बनाने और उसकी शरीरिक भूख मिटाने के लिए चाहिए थी’। पुष्पा विवेक अपने आत्मवृत ‘जारी है हर कदम पर जंग’ में इसी पुरुष मानसिकता को उद्घाटित करती है जहाँ पुरुष स्त्री को अपना संरक्षक घोषित करता हैं और खुद ही उसका भक्षक भी बनता है ‘कमरे में ही रहना खिड़की से पर्दा नहीं हटाना, किसी से बात नहीं करना जैसी छोटी –छोटी बातों की हिदायतों के साथ पिटाई होती रहती ..कहीं बाहर घुमने लेकर जाते तो फलां आदमी तेरे तरफ क्यों देख रहा था? तू क्या सबसे ज्यादा सुंदर है? तुझसे भी ज्यादा सुंदर-सुंदर पड़ी हैं। तू वेश्या की तरह दिखती है और यह सब मैं बिना सफाई में कुछ कहें सुनती रहती। पिटती रहती....’  दलित समाज में महिलाओं के साथ यौन हिंसा का स्वरूप ब्राह्मण पितृसत्ता का ही रूप है जो आज इस समाज में बहुत गहरे से बैठ चूका है। जहाँ पुरुषों का सोचना है कि ‘गुलाब के संग कांटे होते है जो उसकी रक्षा करते है। अगर फूल के संग काटे नहीं होगे तो फुल (स्त्री) कैसे सुरक्षित रह सकता है। उसे तो कोई भी तोड़कर मसल सकता देगा’ । दलित स्त्रीवाद इसी पितृसत्ता के ख़िलाफ आवाज़ बुलंद करता है। आयदान आत्मकथा में उर्मिला पवार लिखती हैं ‘मर्दों की जब तरक्की होती है, वे ‘साहब’ बन जाते है लेकिन स्त्रियाँ ‘बहनजी’ बाई ही रहती हैं’। समाज का यह भाषाई वर्ग विभाजन भी महिलाओं को पुरुषों से कमतर बनाता है।

यह समाज अपनी संरचना में आज पितृसतात्मक है जो इसकी जड़ों में अर्थात परिवार में देखा जा सकता हैं। जेंडर के रूप में समाज का पहले भाषाई विभाजन सामने आया तो बाद में यह विभाजन स्त्री-पुरुष संबंधों व उनकी विशेषताओं के आधार पर। जहाँ बचपन से देखे गये सामाजिक व्यवहार संस्कार के रूप में हमारे समक्ष उभर कर आते हैं। यही संस्कार समाज में पितृसत्ता की श्रेष्ठता को बनाये रखने का साधन बनते हैं। जहाँ परिवार के पुरुष सदस्य को बुलाने के लिए पत्नी के नाम से जोड़ कर संबोधित किया जाता है। सुशीला टाकभौरे लिखती हैं- “पिताजी माँ को बुलाने के लिए नाम न लेकर उन्हें कमल की माँ और कल्लू की माँ कहकर बुलाते थे। .... मैं अक्सर सोचती थी वे शीला की माँ और शीला के पप्पा क्यों नहीं  कहते।”  सामाजिक संरचना ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का गठन करती है  जब समाज व उसकी नीतियाँ ही भेदभाव पूर्ण हो तो स्त्री समानता कहाँ तक संभव है। रजनी अनुरागी अपने आत्मवृत ‘जो कह सकी’ में लिखती हैं ‘घरेलू स्तर पर पापा के द्वारा लिया गया निर्णय ही सर्वपरी था उन्होंने कभी मम्मी को या हम बच्चों से यह यह जानने की कोशिश नहीं कि हम क्या सोचते है ? क्या चाहते है ?’  रजनी तिलक भी परिवार में पिता द्वारा उपेक्षित होती हैं और लिखती हैं ‘बाबा मनोहर को तो पैसा देते और मुझे धमकाकर भगाते। डाटकर कहते अरी ‘मंगल की’ नहीं जाएगी यहाँ से’। परिवार में बेटी होने की, ससुराल में पत्नी, समाज में स्त्री और दलित होने की असमानताओं से महिलाओं को ही जूझना पड़ता है। दलित स्त्रीवाद इसी असमानता के विरोध में समानता की बात करता है और अपने लिए आवाज़ उठाता है।

दलित स्त्री आत्मकथाओं और आत्मवृतों की यदि गहनता से पड़ताल की जाए तो स्त्री के प्रति यहाँ पुरुष का दृष्टिकोण डेमोक्रिटिक पैट्रियार्की के रूप में सामने आता है जिसकी बात कांचा इलैया करते हैं –‘दलित स्त्री काम करने के लिए खेतों में जाती है और घर से बाहर जाकर भी काम करती है, वह अपने पति से लड़ाई भी कर सकती है। शादी के बाद तलाक लेना और तलाक के बाद दुबारा शादी करने का अधिकार भी उसको है इसलिए इसको दलित डेमोक्रेटिक पैट्रियार्की कहते हैं’। बावजूद इन सबके दलित महिला भी पितृसत्ता से शोषित होती हैं भले स्वरूप बदला हो। स्वरूप बदलने पर भी शोषित का चरित्र नहीं बदलता और उच्च वर्ग में भी स्त्री है और निम्न वर्ग में भी वह स्त्री ही है।

महिला का शोषण जहाँ जाति, जाति के भीतर छिपे वर्ग के आधार पर होता है वहीं शोषण की एक और प्रक्रिया पुनर्त्पादन के श्रम के रूप में सामने आती है। स्त्री की जैविक संरचना ने उसे प्रजनन का अधिकार दिया। प्रश्न उठता है क्या वह कभी स्वयं इस अधिकार का प्रयोग कर सकी ? उसके इसी अधिकार को उसके शोषण का हथियार बनाया गया। स्त्री की पुनर्त्पादन की क्षमता प्रकृति प्रदत्त है उसे प्रजनन की मशीन समझ लेना क्या सही है ? दलित स्त्रीवाद समाज में स्त्री पुनर्त्पादन के प्रश्न को भी उठाता है क्योंकि यह केवल महिला के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के स्वास्थ्य के लिए भी आज आवश्यक है। अम्बेडकर स्त्री पुनर्त्पादन के श्रम से परिचित थे इसी कारण 28 जुलाई 1928 को बंबई विधान परिषद में कामकाजी महिलाओं के लिए उन्होंने प्रसूति अवकाश बिल पर अपने विचार हुए अंबेडकर ने कहा था-‘महिलाओं को प्रसूति अवकाश प्रदान करना राष्ट्रीय हित में एक महत्वपूर्ण कदम हैं राष्ट्र की निर्मात्री को प्रसूतावस्था में विश्राम देते और उसे सुनिश्चित करने का दायित्व सरकार का है’। परंतु यह विचार नौकरी पेशा महिलाओं के संदर्भ में रहा परिवार के भीतर महिलाओं की क्या स्थिति है इस पर भी विचार आवश्यक है।

मातृत्व जिस पर महिला के अधिकार को समाज द्वारा सुनिश्चित किया गया उसके बावजूद भी समाज में महिला का अपने मातृत्व पर अधिकार नहीं है महिला एक श्रमिक के रूप में बच्चा पैदा करने की मशीनरी के रूप में इस्तेमाल में लाई जाती हैं। उर्मिला पवार लिखती हैं- मैं चाहती थी कि दूसरा भी बेटा ही हो ताकि मैं बच्चे बंद करवाने का ऑपरेशन करवा सकूँ। उन दिनों दो बेटों के बाद स्त्रियाँ ऐसा ही करती थी और ऊपर से ‘ऑपरेशन का तुर्रा..लेकिन मुझे हुई बेटी। हरिश्चन्द्र ने कहा कि–“मुझे तो एक और बेटा चाहिए भई ” इसलिए एक और चान्स लिया, इस बार भी बेटी ही हुई। उन दिनों यह इतना आसान लगता जैसे –मुझे तो एक और कप वाली फरमाइश हो’। कौसल्या बैसंत्री भी लिखती हैं ‘माँ हमेशा बाल धोते वक्त बड़बड़ाती रहती थी-देवा, मैंने ऐसा कौन सा पाप किया था कि मेरे नसीब में लडकियाँ ही लिखी थी ? माँ ने लगातार पांच बेटियों को जन्म दिया’..उसके बाद दो बेटियां हुई, वे भी दस-ग्यारह महीने की होते ही मर गई। उसके बाद माँ को लगातार चार बेटियां हुई। अब हम पांच बहने रह गई। बाद में दो बेटे और एक लड़की को जन्म दिया। उनमें से एक लड़का और एक लड़की की मृत्यु हो गई...’। एक महिला के पुनर्त्पादन के श्रम का यह शोषण कहा जाएगा जहाँ उसे लगातार अपनी इच्छा  के विरुद्ध पुनर्त्पादन की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जिसका वह विरोध नहीं कर सकती हैं क्योंकि समाज ने इसे स्त्री की स्वभाविक प्रक्रिया माना। ‘नाजा’ आत्मकथा  में शांता कृष्ण काम्बले श्रम के इस तिहरे शोषण पर लिखती हैं जब परिवार में पता चलता है कि बेटी हुई है वहां प्रजनन एक श्रम में तब्दील हो जाता है जिसकी पीड़ा शांता कृष्ण काम्बले के पिता  के शब्दों में मिलती है ‘चौथी बार जब माँ की जचकी हुई..अप्पा ने दादी से पूछा ..क्या हुआ? लड़की हो गई तेरी दादी ने कहा ..तब मेरे बापू बोले ‘सब लडकियाँ ही लडकियाँ हो गई  माँ..’। सुशीला जी के तीन बच्चे के होने के बाद भी और बेटों की लालसा “टाकभौरे जी का बड़ा अरमान था उनके और बेटे हो ”।... मैं एक हूँ मेरा बेटा भी एक ही रह गया” । इसके कारण सुशीला टाकभौरे फैमिली प्लानिंग की बात नहीं सोचती। समाज में स्त्री होना और फिर बेटी के रूप में स्त्री होकर पैदा होना कितना बड़ा अपराध है इसे मातृत्व के लगातार बढ़ते श्रम के कारणों से जाना जा सकता है जिसे आत्मकथाएँ स्पष्ट करती हैं। यह समस्यां मात्र दलित महिला की नहीं है बल्कि समाज की हर महिला की है।
पुनरुत्पादन घरेलू श्रम व बच्चों का लालन-पालन व सार्वजनिक श्रम की तीनों स्थितियों के बीच नौकरी करते हुए जीवन जीना है। मातृत्व स्त्री के जीवन का परम दायित्व व कर्म नहीं होता है। वह जैविक प्रक्रिया है परंतु इसका यह अर्थ नहीं  कि “सामाजिक मातृत्व का दायित्व भी औरत के कंधों पर ही डाल दिया जाए (अर्थात बच्चों के पालन-पोषण और देख भाल का दायित्व)। मातृत्व अपने आप में ही कोई रचनात्मक कर्म नहीं  है, वर्तमान सामाजिक परिस्थिति में मातृत्व की परिणति प्राय: स्त्रियों के दासत्व में होती है”। स्त्री और पुरुष के मध्य इस अन्याय पूर्ण श्रम विभाजन का आधार स्त्रियोचित मातृत्वपूर्ण प्रकृति का विचार था, जो पुरुषों द्वारा खोजा और स्त्रियों पर आरोपित किया गया। इन विचारों को पुरुष द्वारा विशेष प्रकार की शिक्षा-दीक्षा, मानसिक अनुकूलन और समाजीकरण के द्वारा आरोपित किया गया है। आज दलित समाज भी इसी ब्राह्मणीय पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रसित है। जिसमें हाशिए से भी हाशिए में इन्हें उच्च वर्ग और इनके खुद के समाज द्वारा तब्दील किया जा रहा है। दलित स्त्रीवाद दलित महिलाओं और हाशिए की महिलाओं द्वारा उठाया गया वह कदम है जो ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ के उसी अधिकार की मांग करता हैं जिसे फ्रांस की क्रांति के दौरान उठाया गया था। अंबेडकर ने जिसे शिक्षित बनो, संघर्ष करो और संगठित हो कर उठाया था। आज दलित स्त्रीवादियों द्वारा अपने समाज के दृष्टिकोण के विरुद्ध  पुनः उसे उठाया जा रहा है।
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मो.-9623650112 bhawnamasiiwal@gmail.com 
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 

सन्दर्भ

  1.   दलित स्त्री-पुरुष को सबसे पहले ब्राह्मण के ख़िलाफ लड़ना होगा (साक्षात्कार: प्रो. कांचा इलैया से धनंजय कुमार चौबे की बातचीत), पृ.59
  2.    दलित स्त्रीवादी दृष्टिकोण की ओर (लेख), शर्मिला रेगे  (अनु.) डॉ अनुपमा गुप्ता, पृ.50
  3.   दलित स्त्रीवादी दृष्टिकोण की ओर (लेख), शर्मिला रेगे  (अनु.) डॉ अनुपमा गुप्ता, पृ.57
  4.  .शिकंजे का दर्द (आत्मकथा),सुशीला टाकभौरे पृ.167
  5.   नाजा (आत्मकथा), शान्ता कृष्ण काम्बले, (सं.) रजनी तिलक और ऊषा अंभोरे, पृ.126
  6.   दोहरा अभिशाप (आत्मकथा),  कौशल्या बैसंत्री, पृ.31
  7.   मेरा सृजनात्मक संघर्ष ज़ारी है (आत्मवृत), पी. शिवकामी, (सं.) तेज सिंह,अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष, पृ.126
  8.   जातीय दुर्भावना की शिकार (आत्मवृत), रमा रसाल, (सं.) तेज सिंह, अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष, पृ.87
  9.   शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे, पृ. 16
  10.   शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे, पृ. 15
  11.   दोहरा अभिशाप (आत्मकथा), कौशल्या बैसंत्री, पृ.102
  12.   जाति प्रथा का विनाश (लेख), भीमराव अंबेडकर, संपा. पुस्तक जातिवाद और रंगभेद, पृ. 49
  13.   शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे, पृ.10
  14.   शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे, पृ.118
  15.   दोहरा अभिशाप (आत्मकथा), कौशल्या बैसंत्री, पृ.66
  16.   मेरा बचपन: जीवन के कुछ प्रसंग (आत्मवृत), अनिता भारती, (सं.) तेज सिंह, अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष,  पृ.140
  17.  . शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे, पृ.223
  18.  . शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे, पृ.90
  19.    दोहरा अभिशाप(आत्मकथा), कौशल्या बैसंत्री, पृ.104
  20.   जारी है हर कदम पर जंग(आत्मवृत), पुष्पा विवेक, (सं.) तेज सिंह, अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष, पृ.168
  21.   जारी है हर कदम पर जंग (आत्मवृत), पुष्पा विवेक, (सं.) तेज सिंह, अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष
  22.   आयदान (आत्मकथा), उर्मिला पवार, (अनु. ) सौ.माधवी प्र. देशपांडे, पृ.180
  23.   शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे,  पृ.15
  24.   जो कह सकी (आत्मवृत), रजनी अनुरागी, (सं.) तेज सिंह, अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष, पृ.232
  25.   वर्ग, जाति और जेंडर (आत्मवृत), रजनी तिलक, (सं.) तेज सिंह, अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष
  26.   दलित स्त्री-पुरुष को सबसे पहले ब्राह्मण के ख़िलाफ लड़ना होगा (साक्षात्कार: प्रो. कांचा इलैया से धनंजय कुमार चौबे की बातचीत), पृ.5
  27.   आयदान (आत्मकथा), उर्मिला पवार, (अनु.) सौ.माधवी प्र. देशपांडे, पृ.168
  28.    दोहरा अभिशाप (आत्मकथा),कौशल्या बैसंत्री, पृ.11
  29.   नाजा (आत्मकथा), शान्ता कृष्ण काम्बले, (सं.) रजनी तिलक और ऊषा अंभोरे, पृ.39
  30.   शिकंजे का दर्द (आत्मकथा), सुशीला टाकभौरे पृ.181
  31.   स्त्री के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, सीमोन द वोउवार, पृ.17
  32. संदर्भ ग्रन्थ
  33. बैसंत्री, कौशल्या, दोहरा अभिशाप, किताबघर प्रकाशन, संस्करण-2012, नई दिल्ली
  34. टाकभौरे सुशीला, शिकंजे का दर्द,  राजकमल प्रकाशन, संस्करण-2011, नई दिल्ली
  35. उर्मिला पवार, (अनु.) माधवी प्र.देशपांडे, आयदान, वाणी प्रकाशन, संस्करण-2010, नई दिल्ली 
  36. (सं.)तेज सिंह, अंबेडकरवादी स्त्री चिंतन: सामाजिक शोषण के ख़िलाफ आत्मवृतात्मक संघर्ष, स्वराज प्रकाशन, प्रथम संस्करण-2011, नई दिल्ली
  37. शान्ता कृष्ण काम्बले, (सं.) रजनी तिलक और ऊषा अंभोरे, नाजा (आत्मकथा),
  38. शांताबाई दाणी, (सं.) रजनी तिलक और ऊषा अंभोरे, धूप और छांव, नवयान साहित्य प्रकाशन, संस्करण-2007, दिल्ली
  39. दलित स्त्रीवाद विशेषांक, स्त्रीकाल (पत्रिका), (सं.) संजीव चंदन,  सितंबर 2014,
  40. अभिमूकनायक (सम्मान की आवाज़), (सं.) प्रशांत लीला रामदास, रजनी तिलक, अनिता भारती, वर्ष-6, दिसम्बर 2004, नई दिल्ली 
  41. अपेक्षा, अम्बेडकरवादी साहित्य का मुखपत्र, तेज सिंह, वर्ष-6, अंक-22, जनवरी-मार्च 2008 

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