सविता मिश्रा की लघुकथाएँ

सविता मिश्रा 'अक्षजा'

सविता मिश्रा 'अक्षजा'
रीढ़ की हड्डी

दिनभर बेहोश रही बीनू। अस्पताल से घर आने पर देखा कि बच्चे सब्जी-रोटी खा रहे हैं। खाना खत्म कर बच्चे माँ के पास बैठ गये।

"पिंकी, खाना किसने बनाया? पड़ोस वाली आंटी ने क्या?"

"नहीं, पापा ने बनाया ..।"

"पापा ने?"

"हाँ, पापा ने! सुबह उन्होंने नाश्ता भी बनाया था ! फिर बर्तन धोये। झाड़ू-पोछा भी किया आपकी तरह। और दोपहर में दाल-चावल भी बनाये थे।"

"तुम दोनों ने मदद नहीं की पापा की।"

"नहीं, पापा ने कहा आज मैं करता हूँ। तुम दोनों हस्पताल में रहो मम्मी के साथ अपने।"

"कहाँ है तेरे पापा !"

"डाक्टर ने आपकी दवा लेने के लिए भेजा, वही लेने गये हैं।"

"बीनू उठो, लो दवा खा लो। टिंकू एक गिलास पानी दे दे बेटा।"

"आप! परन्तु आप कैसे आ गये? छुट्टी मिल गयी क्या?" पति के आते ही सवाल की बौछार लगा दी।

"हाँ, मिल गयी। पूरे पन्द्रह दिन, मैं साथ ही रहूँगा तुम्हारे।"

"इत्ते दिन !!!"

"हाँ!"

"मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे होगा। कोई भरोसेमंद आदमी गृहकार्य के लिए खोजना तो मुश्किल ही लग रहा। कोई ऐसा रिश्तेदार भी तो नहीं अपना जो महीने-पन्द्रह दिन आ जाये।"

"चिंता न करो बीनू, सब हो जायेगा। मैं हूँ न!"

"इतनी बार परेशानी आई। हास्पिटल के चक्कर अकेले लगाती रही थी। परन्तु इस बार कैसे आपके अफ़सर की मेहरबानी हो गई?

"पुलिस अधिकारी भी जानते है कि बच्चों पर कोई समस्या आएगी तो बीवी झेल लेगी, परन्तु बीवी ही बीमार हो जाएगी तो फिर कौन सम्भालेगा। इसलिए फटाफट सेंशन कर दी छुट्टी।"

"यानि रीढ़ की हड्डी हूँ मैं आपकी।"

"हाँ, वो तो हो ही बीनू। अकेले बिना किसी शिकायत के हर कुछ सम्भालती रही हो।"

"पर पन्द्रह दिन तो आप हो, हमारी रीढ़ की हड्डी।" कहते हुए मुस्करा दी बीनू।

"हाँ भई, अभी तक सरकारी नौकर था, पन्द्रह दिन नौकर बीवी का हूँ।" दोनों ही खिलखिला पड़े।

परिपाटी

अपने बहन की शादी में खींची गयी उस अनजान लड़की की तस्वीर को नीलेश जब भी निहारता, तो सारा दृश्य आँखों के सामने यूँ आ खड़ा होता, जैसे दो साल पहले की नहीं, कुछ पल पहले की ही बात हो। वह भयभीत सी इधर-उधर देखती फिर सबकी नजर बचाकर चूड़ियों पर उँगलियाँ फेरकर खनका देती। चूड़ियों की खनकार सुनकर बच्चियों सी मुस्कराती, फ़िर फौरन सहम कर गम्भीरता ओढ़ लेती। सोचते-सोचते नीलेश मुस्कुरा दिया।

वहीं से गुज़रती भाभी ने उसे यूँ एकान्त में मुस्कुराते देखा तो पीछे पड़ गयीं। "किसकी तस्वीर है? कौन है यह?" उनके लाख कुरेदने पर नीलेश शर्माते हुए इतना ही बोल पाया।"भाभी हो सके तो इसे खोज लाओ बस, एहसान होगा आपका!"

फिर क्या था! भाभी ने लड़की की तस्वीर ले ली और उसे ढूँढना अपना सबसे अहम टारगेट बना लिया।

आज़ जैसे ही नीलेश घर वापस आया, भाभी ने उस लड़की की तस्वीर उसे वापस थमा दी, और उससे आँखे चुराती हुई बुदबुदाईं "इस खिलखिलाते चेहरे के पीछे सदा उदासी बिखरी रहती है, नीलेश!"

"क्या हुआ भाभी, ऐसा क्यों कह रहीं हैं आप!" मुकेश घबरा कर ऊँची आवाज़ में पूछ बैठा। आवाज़ सुनकर घर के सारे लोग वहीं जमा हो गए।

भाभी कहने लगीं "यह लड़की मेरे बुआ के गाँव की है। उसकी शादी हो चुकी है, पर अफ़सोस उसका पति सियाचिन बार्डर पर शहीद हो चुका है।" यह सुनकर नीलेश के पैरों तले से जमीन खिसक गयी।

नीलेश भाभी के आगे हाथ जोड़कर, गिड़गिड़ाने लगा "भाभी इस लड़की के साथ मैं अपनी मुस्कुराहट साझा करना चाहता हूँ। प्लीज़ कुछ करिये आप!"

नीलेश की यह बात सुनते ही परिवारीजन सकते में आ गए।

 "मेरी सात पुश्तों में किसी ने विधवा से शादी करने का सोचा तक नहीं, फ़िर भले वह विधुर ही क्यों न रहा हो! तू तो अभी कंवारा ही है! अबे! तू विधवा को घर लायेगा...? कुल की परिपाटी तोड़ेगा.. नालायक?" पिता जी फौरन कड़कते हुए नीलेश को मारने दौड़े। बीच-बचाव में माँ, पिता को शांत कराने के चक्कर में गश खा गईं। अपना सिर पकड़कर वे फर्श पर ही बैठ गईं।

पिता जी अभी शांत भी न हुए थे कि अब बड़ा भाई शुरू हो गया "अरे छोटे! तेरे लिए छोकरियों की लाइन लगा दूँगा। इसे तू भूल ही जा।"

विरोध के चौतरफ़ा बवंडर के बावजूद नीलेश अडिग रहा। नीलेश ने रंगबिरंगी चूड़ियों में समाई उस लड़की की मुस्कान वापस लौटाने की जो ठान ली थी। इस हो-हल्ले में माँ ने जब अपने दुलारे नीलेश को अकेला पड़ता पाया तो उन्होंने नीलेश की कलाई पकड़ी और अपने कमरे की तरफ़ उसे साथ में लेकर बढ़ चलीं। एकायक तमतमा कर वे पलटीं और कमरे में मौजूद सबको सुनाकर ऊँची आवाज़ में बोलीं "रंगबिरंगी नहीं मूरख! लाल-लाल चूड़ियाँ लेना! हमारे यहाँ सुहागनें लाल चूड़ियाँ ही पहनती हैं। कुल की परिपाटी तोड़ेगा क्या नालायक!"

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