रंगपाठ्यक्रम के तत्व

कौशलेंद्र

- कौशलेन्द्र

प्रेक्षागृह में बैठे दर्शक सामने मंच पर जो भी कुछ होता हुआ देखते हैं वह रंगमंच के सामूहिक प्रयासों का एक कलात्मक अनुवाद होता है। समूह का अपना एक धर्म होता है, अपनी कार्यशैली होती है और अपनी शर्तें होती हैं जिनके प्रति हर कलाकार को निष्ठावान होना होता है। किंतु किसी कलाकार को रंगकर्म और अभिनय के लिये सतत अभ्यास के अतिरिक्त क्या किसी पाठ्यक्रम और निर्धारित न्यूनतम प्रशिक्षण की भी आवश्यकता होती है?

कुछ लोगों का तर्क हो सकता है कि अभिनय तो जन्मजात और मौलिक प्रतिभा है इसे पाठ्यक्रम की निर्धारित सीमाओं में कैसे बाँधा जा सकता है! किंतु हमारा उत्तर “हाँ” में है। वास्तव में लोककलाओं के इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के हस्तक्षेप ने हमें रंगकर्म के तकनीकीपक्ष और अभिनयपक्ष की दक्षता अभिवर्द्धन के लिये कुछ अतिरिक्त ज्ञान और प्रशिक्षण के अर्जन हेतु बाध्य किया है।     

कला के क्षेत्र में गुरु-शिष्य परम्परा से ज्ञान-दान की परम्परा आज भी भारत, नेपाल, श्रीलंका, बांगलादेश और पाकिस्तान में सम्मानित है। कला-घरानों के अपने निश्चित नियम और अलिखित पाठ्यक्रम हुआ करते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक कलाओं की यात्रा इसी तरह होती रही है।

लिपि के आविष्कार और फिर उसके व्यापक प्रयोग से पूर्व पूरे विश्व में पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान और शिक्षा की परम्पराओं में आद्य और प्रभावी परम्परा रही है श्रुति और गुरु-शिष्य परम्परा। विश्व में दीर्घकाल तक यही सरलतम उपलब्ध पद्धति हुआ करती थी। लिपियों के विकास के बाद शिक्षा की पद्धतियों में भी नवीनता आयी। विद्याओं के इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन के साथ ही विभिन्न उपाधियों के लिये पाठ्यक्रमों की आवश्यकता का अनुभव किया गया और समय-समय पर संशोधनों-परिवर्द्धनों के साथ नये-नये पाठ्यक्रम अस्तित्व में आते गये। इस क्रम में नृत्य और नाटक के क्षेत्र में अभी तक गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वहन होता आ रहा है।

इस विषय पर आगे की चर्चा से पूर्व मैं एक प्रसंग का उल्लेख करना चाहूँगा। वर्ष 2015 के फरवरी माह का यह नौंवा दिन था यानी राष्ट्रीय नाट्यविद्यालय, नयी दिल्ली में लगभग अर्ध चन्द्रमास तक चलने वाले सुप्रसिद्ध भारत-रंग-महोत्सव का नौंवा दिन। इसी बीच विद्यालय के निर्देशक वामन केन्द्रे ने “मार्जिनल, थिएटर और मार्केट” विषय पर एक सेमिनार का भी आयोजन रखा था। उस दिन नाट्य विधा पर ‘बहुमुख’ में व्याख्यान के लिये प्रख्यात अभिनेता अनुपम खेर पधारे हुये थे। एन.एस.डी. के रंगकर्मियों के लिये अनुपम खेर का यह एक तरह से शैक्षणिक व्याख्यान सा था। अपने व्याख्यान के बीच में उन्होंने बताया कि एक समय वह भी था जब नाटक का कोई पाठ्यक्रम तक नहीं हुआ करता था जबकि वर्षों पूर्व भरत मुनि नाट्यकला को सुव्यवस्थित कर उसे शास्त्र की प्रतिष्ठा दिला सकने में सफल हो चुके थे। कदाचित रंगकर्म का यह प्रारम्भिक किंतु आवश्यक पाठ्यक्रम था।

वास्तव में एन. एस. डी. के प्रारम्भिक दिनों में कई रंगशिक्षकों को भी पता नहीं था कि उन्हें अपने विद्यार्थियों के साथ करना क्या है। अनिश्चितता की यह धुन्ध रंगशिक्षकों के उत्साह और सतत प्रयास से धीरे-धीरे छंटती चली गयी और अंततः नाटक का एक पाठ्यक्रम सुनिश्चित किया गया। फिर भी, वर्तमान पाठ्यक्रम में अभी बहुत कुछ जोड़ा जाना शेष है।

मैं पुनः अपनी बात पर आता हूँ। यह सच है कि लोककलायें अपने मानक स्वयं तय करती रही हैं, अपना पथ स्वयं निर्धारित करती रही हैं और अपने टूल्स भी आवश्यकतानुसार स्वयं विकसित करती रही हैं। लोककला जब गाँव से निकलकर नगर की ओर उन्मुख होती है तो उसमें किंचित परिवर्तनों की आवश्यकता होती है। परिवर्तन की यह माँग ही लोककला के इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन का पथ प्रशस्त करती है। नगरीय प्रेक्षागृहों के दर्शकों का बौद्धिकस्तर कला के सुसंस्कृत स्वरूप के साथ-साथ आधुनिक तकनीकी प्रभावों के रोमांच की वांछना करता है। कला रूपांतरित और व्यापक होती जाती है और तब मंच की एक आवश्यकता और भी होती है ... और यह है रंगपाठ्यक्रम।

रंगपाठ्यक्रम पर विचार करने से पूर्व रंगकर्म के उन तत्वों पर विचार करना आवश्यक है जो रंगकर्म को उद्देश्यपरक, प्रभावी, संप्रेषणीय, व्यापक और रुचिकर बनाते हैं। मैं यहाँ तकनीकी उपकरणों, संसाधनों  और तद्जन्य प्रभावों की चर्चा नहीं करूँगा, वह एक पृथक विषय है।
रंजकता रंगकर्म की प्रथम शर्त है, दूसरी शर्त है संप्रेषणीयता, तीसरी शर्त है उद्देश्यपरकता, चौथी शर्त है प्रभावोत्पादकता और पाँचवी शर्त है उसकी व्यापकता। इन पाँच शर्तों को पूर्ण करने पर ही कोई रंगकर्म सार्थक हो पाता है।

जहाँ तक मैं समझ सका हूँ, रंजकता रंगकर्मी के भीतर से प्रवाहित होने वाला वह स्वाभाविक तत्व है जिसकी मौलिकता और विविधता आदि आयामों के लिये रंगकर्मी ही सर्वाधिक उत्तरदायी होता है। एक तरह से यह उसकी निजी प्रतिभा और कलादक्षता है जो उसे अन्यों से पृथक करती है।

रंगकर्मी की किसी विषय और अपने एम्बियेंस के प्रति उत्सुकता, निरीक्षण क्षमता, निरीक्षण से प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण, विश्लेषण का नाट्यानुवाद, सतत अभ्यास और प्रयोगवादिता – ये वे तत्व हैं जो किसी भी रंगकर्मी की मौलिकता और रंजन क्षमता को सुनिश्चित करते हैं। हमारे चारो ओर प्रतिक्षण कुछ न कुछ घटित होता रहता है। एक सजग रंगकर्मी की सहज उत्सुकता उसे उन घटनाओं के तटस्थ निरीक्षण के लिये प्रेरित करती है। यहाँ रंगधर्म की यह माँग है कि एक अच्छे रंगकर्मी को बहुत धैर्यवान निरीक्षक होना ही चाहिये। और केवल निरीक्षक़ होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसमें निरीक्षण से प्राप्त तथ्यों के विश्लेषण की भी क्षमता होनी चाहिये। मुझे कई बार लगता है कि किसी रंगकर्मी का रंगधर्म धरती के अन्य सभी धर्मों की अपेक्षा कहीं अधिक मौलिक है जिसका अनुशीलन हर किसी के वश की बात नहीं होती, विशेषक्षमतावान व्यक्ति ही उसका अनुशीलन कर पाते हैं। रंगधर्म के सभी नियमों का पालन सरल नहीं है। उदाहरण के लिये यह दृश्य देखें –दिल्ली की सड़क पर हुयी दुर्घटना से एक व्यक्ति घायल होकर एक ओर पड़ा है और तत्काल सहयोग की अपेक्षित प्रतीक्षा कर रहा है। यह एक ऐसी घटना है जिसकी ओर लगभग हर आने-जाने वाला व्यक्ति उत्सुकतापूर्वक देखेगा। लोग जानना चाहते हैं कि दुर्घटना कैसे हुयी, चोट कितनी लगी,आदि। कुछ लोग अपने मोबाइल से फ़ोटो भर खीचकर आगे बढ़ जायेंगे, कुछ व्यवस्था को गाली देते हुये निकल जायेंगे, कुछ ड्रायवर को कोसेंगे तो कुछ निर्विकार भाव से निकल जायेंगे जैसे कुछ हुआ ही न हो। बहुत कम लोग होंगे जो घायल के सहयोग के लिये आगे आयेंगे। सामान्यतः होता ऐसा ही है किंतु एक रंगकर्मी इन सबसे पृथक अपनी उत्सुकता और संवेदनशीलता के साथ उस घटना का स्वयं भी एक भाग बन जाया करता है। घायल व्यक्ति को आवश्यक सहायता देने के साथ-साथ वह घटना का सूक्ष्म निरीक्षण भी करता है, निरीक्षण से प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण करता है और फिर उसकी अनुभूति का आत्मानुवाद करता है। अपनी अनुभूतियों में कभी वह पीड़ा भोगता घायल व्यक्ति बन जाता है, कभी संवेदनहीन तमाशबीन बन जाता है, कभी मददगार बन जाता है, तो कभी लापरवाह ड्रायवर और पुलिसवाला बन जाता है। रंगकर्मी का यही धर्म है। वह घटना के अन्दर प्रवेश करने की क्षमता रखता है गोया परकाया प्रवेश की दैवीयशक्ति से युक्त हो। उसे परकायाप्रवेश और अनुभूतियों के आत्मानुवाद का सतत अभ्यास भी करना होता है और नये-नये प्रयोग भी। रंग-प्रयोगवादिता रंगकर्म की विविधता का आधार है जिससे रंगकर्मी की क्षमताओं और प्रतिभा में निखार एवं नवीनता आती है। रंगकर्मी की रुचि के अनुसार इन प्रयोगों के क्षेत्र भिन्न-भिन्न हो सकते हैं।

नृत्य हो या नाटक उसे प्रेक्षागृह के अंतिम आम दर्शक तक अपनी सम्पूर्णता के साथ पहुँचना चाहिये। यही बात मैं कविता के लिये भी कहता हूँ, कविता की संप्रेषणीयता यदि एक वर्ग विशेष तक ही सीमित रह जाय तो वह व्यापक नहीं हो पाती, वह स्वांतः सुखाय तो हो सकती है किंतु परांतः सुखाय नहीं। रंगकर्म इतना सहज, सुबोध और संप्रेषणीय होना चाहिये कि वह समाज की जड़ता को गत्यात्मकता की ओर मोड़ सके। एक सजग और संवेदनशील रचनाकार ही सहज संप्रेषण के बीज अपनी नृत्यमुद्राओं, गीतों और संवादों में बो सकने में समर्थ हो पाता है। वास्तव में रंगकर्मी एक सहज सर्जक होने के कारण एक समानांतर विश्व की रचना करने की सामर्थ्य रखता है। यहाँ यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि नाटक या फ़िल्म के अधिकांश दर्शक आम आदमी के बीच से आते हैं, उनकी सोच और बोधगम्यता सामान्य होती है इसलिये भावों, मुद्राओं और संवादों की सुगमनीयता उन तक बनानी होती है अन्यथा कोई नाटक बहुत अच्छा होते हुये भी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पायेगा। गीतों और संवादों की संप्रेषणीयता के प्रकरण में भाषा की सुबोधता के लिये जहाँ रचनाकार उत्तरदायी होता है वहीं उच्चारण की शुद्धता, ध्वनि के आरोह-अवरोह और स्पष्टता के लिये रंगकर्मी उत्तरदायी होता है। दुर्भाग्य से यह एक उपेक्षित सा पक्ष होता जा रहा है जिस पर विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। जब मैं किसी कलाकार के मुँह से ‘साँथ’, ‘हाँथ’, ‘तरहँ’ और ‘हौंसला’ जैसे शब्द सुनता हूँ तो वहाँ से उठकर चले जाने का मन होता है। लगता है जैसे बादशाहभोग भात खाते-खाते अचानक कोई कंकड़ दाँतों के नीचे आ गया हो। हिंदी में अनुस्वार और उर्दू में नुक्तों को लेकर हम सब बेहद असावधान होते जा रहे हैं।

यद्यपि रंगकर्म का आयोजन होता ही मनोरंजन के लिये है किंतु उसका उद्देश्यपरक होना भी आवश्यक है। अभिनय या तो पीड़ा और परिवाद की अभिव्यक्ति है या फिर निर्मल हृदय का उल्लसित प्रवाह। अभिनय कला न होती तो दुनिया में विक्षिप्तों की भरमार होती और समाज निष्पन्द हो गया होता। हम अभिनय को कला के साथ-साथ मनोचिकित्सा और पॉज़िटिव हेल्थ की एक सशक्त विधा भी मानते हैं, वहीं अभिनय के माध्यम से समाज को दिया गया संदेश समाज की चेतना को जड़ होने से बचाता है। उदाहरण के लिये, शिक्षा के गिरते हुये स्तर के विषय को लेकर रचे गये हास्य नाटक में सकारात्मक सुझाव या विकल्प का अंश उसे उद्देश्यपरक बना सकता है। इसी तरह उपवन में खिले फूलों के बीच आत्ममुग्ध होकर नृत्य करती युवती नृत्य की समाप्ति पर एक मनमोहक पुष्प को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाते-बढ़ाते ठहर कर प्रकृति के प्रति अपने सम्मान को व्यक्त करने का अभिनय करते हुये इस क्षणिक दृश्य को उद्देश्यपरक बना सकती है। 

लोकमंच लोककला की वह अनुसंधानशाला है जहाँ लोकवाणी और लोकरंग के माध्यम से पीड़ा या उल्लास को अनूदित किया जाता है, नयी रचनाओं के बीज अंकुरित होते हैं और कला के इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन का भोज्य तैयार किया जाता है। इसीलिये लोककलाओं का संरक्षण और नवप्रवाह न केवल आवश्यक है अपितु कला को जीवित रखने की अनिवार्य शर्त भी है। कलाकार को तय यह करना है कि देश-काल-वातावरण के अनुरूप कौन सा संदेश संप्रेषित किया जाना अधिक उपयुक्त और उपादेय है।

अभिनय की सफलता में संप्रेषण की प्रभावोत्पादकता का महत्वपूर्ण स्थान है। जब हम मंच पर जीवन के विविध कालखण्डों में घटित होने वाली घटनाओं को मंचित करते हैं तो उनकी वैज्ञानिकता संदेह से परे होनी चाहिये। कला का वैज्ञानिक पक्ष उसे स्वाभाविक और तार्किक बनाता है। कलाकार एक सर्जक है, वह अपनी कल्पना को मूर्त आकार देता है और स्वयं उस आकार का प्राण बन जाया करता है। हमें यह समझना होगा कि यह एक जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें साइको-फ़िज़ियो-पैथोलॉजिकल क्रियायें-प्रतिक्रियायें सम्पन्न होती हैं। रंगकर्मी के लिये अनिवार्य है कि वह स्क्रिप्ट को जिये। स्क्रिप्ट जीने के लिये आवश्यक है कि रंगकर्मी स्क्रिप्ट के एसेंस को हावों-भावों में अनूदित करे। यह भावानुवाद पुनः क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं में अनूदित किया जाता है जिसे दर्शक देख-सुन पाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मस्तिष्क, इंडोक्राइन ग्लैण्ड्स और मांस-पेशियाँ सक्रियता से भाग लेती हैं। यद्यपि यह सब जानबूझकर नहीं किया जाता बल्कि स्वाभाविक रूप से होता रहता है किंतु रंगकर्मी के लिये अभिनय की मनोदैहिक प्रक्रिया को जानना उसकी अभिनय दक्षता को और भी परिष्कृत करना होगा। भावनात्मक आवेश के क्षणों में देह की भाषा और मन की केमिस्ट्री में होने वाले परिवर्तनों के बीच ताल-मेल आवश्यक है। रुदन का अभिनय करते समय किसी व्यक्तिगत दुःखद प्रसंग को पुनर्जीवित करने की सारी शर्तों को पूरा किये बिना स्वाभाविकता नहीं आ सकती। कई बार रंगकर्मी को ऐसे भी अभिनय को जीना पड़ सकता है जिससे वह निजी तौर पर अपरिचित है, यथा-  पार्किन्संस या अल्ज़ाइमर्स के रोगी की मनोदैहिक अवस्था। यहाँ पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण की आवश्यकता अनिवार्य है। 

हम फ़िल्मों में पात्रों को प्रायः झटके के साथ शरीर को शिथिल करके मरते हुये देखने के अभ्यस्त हैं। रंगकर्मियों को अपने अभिनय में स्वाभाविकता और वैज्ञानिकता लाने के लिये डॉक्टर से यह जानकारी करना उचित होगा कि मृत्यु के अंतिम क्षणों में क्या होता है ...कैसे होता है, पार्किन्संस के रोगी की चाल-ढाल, अंगुलियों की गति और मुखमुद्रा कैसी होती है, एंजाइना पेक्टोरिस के ऑनसेट होते ही कार्डिनल साइन और रोगी की स्थिति कैसी हो जाती है, हार्ट फैल्योर में रोगी का चेहरा कैसा हो जाता है, शिज़ोफ़्रेनिया के दौरे कैसे होते हैं ... आदि-आदि। यदि कहानी की माँग में ऐसी कोई स्थिति आवश्यक है और दिग्दर्शक मंच पर अपने पात्रों से यह सब करवाना चाहते हैं तो पाठ्यक्रम में इसका समावेश किया जाना उचित ही नहीं आवश्यक भी हो जाता है। हमें ध्यान रखना होगा कि मंचन में स्वाभाविकता और वैज्ञानिकता का समावेश उसे तथ्यपरक, तार्किक, सहज, रोचक और पूर्ण बनाता है।

मंचन की व्यापकता रंगकर्म की अंतिम शर्त है। यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि कोई कथा देशज हो सकती है, उसका प्रभावक्षेत्र सीमित हो सकता है किंतु उसके माध्यम से चित्रित किये गये मानवचरित्र में व्यापकता होनी चाहिये। लोककला के इंस्टीट्यूशनलाइज़ेशन के लिये भी इस तत्व का समावेश आवश्यक होता है। मैं एक उदाहरण से इस बात को स्पष्ट करने का प्रयास करूँगा। बस्तर के रावघाट आयरन-ओर-प्रोजेक्ट की औद्योगिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय समस्यायें स्थानीय लोगों के लिये गम्भीर हैं। देश के अन्य भागों में इन समस्याओं के प्रति लोगों का दृष्टिकोण उतना गम्भीर नहीं होगा। किंतु कथ्य, उद्देश्य और अभिनय के माध्यम से निर्मम औद्योगीकरण के पीछे की लोलुप मानसिकता के चरित्र को व्यापक बनाया जा सकता है। कला को सार्वदेशज और सार्वकालिक स्वरूप प्रदान करने के लिये यह सब आवश्यक है। 

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