आत्मकथा के दर्पण में कृष्णा अग्निहोत्री के जीवनानुभवों का प्रतिबिम्ब - किरण ग्रोवर

किरण ग्रोवर
सारांश
आत्मकथा लेखक की स्थिति विशिष्ट अंतर्द्वंद्व से सम्पूरित होती है। साहित्यकारों ने अपने जीवन के रहस्यमय व प्रच्छन्न अनुभव अपनी आत्मकथा में लिखकर पाठकों के सम्मुख विश्लेषणार्थ प्रस्तुत किए हैं। साहित्यिक आत्मकथाकार अपने अन्तर्मुखी मन को विशिष्ट स्व के प्रतिच्छायित करते हैं, जिनके कारण साहित्यिक आत्मकथाओं में निजता का निर्वाह अधिक होता है। कृष्णा अग्निहोत्री जी ने ‘लगता नहीं है दिल मेरा’आत्मकथा के अन्तर्गत विवाह के अनुष्ठान,विवाह में प्रदत दहेज, मनोवैज्ञानिक भाव भूमि का विश्लेषण करते हुए परिवार की रचनात्मक संघटना का भी विवेचन, पुत्री जन्म की घटना का सहज विश्लेषण, ममत्व की भावना के वशीभूत होकर अपनी पुत्री की संवेदना का संश्लेषण किया है। कृष्णा जी ने दूसरे विवाह के सन्दर्भ में पारिवारिक वातावरण, श्रीकान्त के बच्चों के प्रति भावनात्मकता, अपनी पुत्री नीहार के प्रति कर्तव्य-निष्ठा, पहले पति अग्निहोत्री जी से तलाक, श्रीकांत के हर्ष को प्रतिबिम्बित किया है। दाम्पत्येतर सम्बन्धों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए आलोक से मिलने वाले सुख व आनन्द की पुष्टि संचारी भावों के माध्यम से प्रस्तुत की है। इन्होंने सत्य व तथ्य की रक्षा करते हुए अपने नियमित व अनियमित प्रेम-प्रसंगों का पर्दाफ़ाश किया है। मातृत्व की पूर्ति निमित्त दौहित्री के आगमन से अपने आँचल को अलौकिक मानकर उल्लास की भावाभिव्यक्ति अनुमोदित की है। कृष्णा अग्निहोत्री उन लेखकों में परिगणित की जाती है जिन्होंने भोगे हुए क्षणों को समाज के समक्ष बेबाकी से प्रस्तुत कर ज़मीनी सच्चाइयों का विश्लेषण किया है जिससे उनके व्यक्तिगत जीवन के पहलू स्वतः खुलते चले जाते है। आत्मकथा के क्षेत्र में कृष्णा अग्निहोत्री जी का योगदान साहसपूर्ण व चुनौती मय कदम है जो आत्मकथा लेखन की कसौटी है।

बीज शब्द
आत्मकथा, प्रच्छन्न अनुभव, तथ्याश्रिता, आनन्द की पुष्टि, कृष्णा अग्निहोत्री,जीवनानुभव।

मूल प्रतिपादन
आत्मकथा एक जीवन बिंदु पर पहुँचे कथानायक के लिए अपने विगत जीवन का पुनरावलोकन है। जिसका कथानायक प्रामाणिक जीवित व्यक्ति होता है, जिसकी वर्जनाएँ, कुण्ठाएँ और विवशताएँ निजतः भोगी हुई होती हैं। कवि की कविता, कथाकार की कथा, आलोचक की आलोचना, संगीतज्ञ का संगीत, मूर्तिकार की मूर्ति, चित्रकार के चित्र, अभिनेता के अभिनय से सर्वथा भिन्न आत्मकथाएँ हैं। आत्मकथा में आत्मसंश्लेषण के माघ्यम से समकालीन सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक चेतना का भी सहज सम्प्रेषण होता है। आत्मकथा लेखक का उद्देश्य जीवन का सहज निरूपण, घटनाओं का व्यापक चित्रण और भुक्त क्षणों का प्रतिपादन, जीवन मूल्यों का संरक्षण, जीवन दर्शन का रेखांकन करना होता है। मानव में कुछ ऐसा अवश्य है कि वह अपने परिदृष्ट अनुभवों, अर्जित स्मृतियों एवं सम्यक् अनुभूतियों को मानवीय भाषा में अन्य असमर्थ संकेतों के द्वारा यथाशक्य सम्प्रेषित करने को आतुर रहता है। जब विगत जीवन के अनुभव और अनुभूतियाँ साहित्य स्रष्टा को इतना उद्वेलित व विवश कर देती हैं कि उन्हें अपने अन्तर्मन के बाहर उड़ेल देने के अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता, प्रायः तभी  श्रेष्ठ आत्मकथाएँ अथवा गीतों की पंक्तियाँ जन्म लेती हैं।1तब पाठक या प्रमाता आत्मकथा में वर्णित अनुभवों और अनुभूतियों का अपने जीवन के किसी अंश से साम्य पाता है, तो रोमांचित एवं उद्वेलित होता है। सुप्रसिद्ध अंग्रेज़ी विवेचक विलियम हेनरी हडसन ने अपनी पुस्तक ‘एन इन्ट्रोडक्शन टू द स्टडी आॅफ लिट्रेचर’ में लिखा है, ‘‘साहित्य के सूत्र हमें जीवन में मिलते हैं और वैयक्तिक जीवन में लौकिक रूचि के गूढ़ तत्व निहित हैं।’’2 आत्मकथा जीवन की कलात्मक अनुकृति है। जिस प्रकार जन्म और मृत्यु की परिधि में बंधे जीवन का प्रारम्भ और अन्त रहता है, उसी तरह आत्मकथा भी आरम्भ और परिसमाप्ति के बीच निबद्ध रहती है। वास्तव में आत्मकथा लेखक के जीवन की दुर्बलताओं, सबलताओं आदि का वह सन्तुलित और व्यवस्थित चित्रण है, जो उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के निष्पक्ष उद्घाटन में समर्थ होता है।

आत्मकथा लेखक की स्थिति विशिष्ट अन्तद्र्वन्द्व से सम्पूरित होती है। साहित्यकारों के जीवन रहस्य को जानने का मानव-मन में सहज कौतूहल होता है। आत्मकथा साहित्य यह अपेक्षा रखता है कि लेखक अपने समस्त गुणों और अवगुणों का सम्यक् निरूपण करें लेकिन यह कार्य दुधारी तलवार पर चलने के समान कठिन व्यवसाय है। साहित्यकारों ने अपने जीवन के रहस्यमय व प्रच्छन्न अनुभव अपनी आत्मकथा में लिखकर पाठकों के सम्मुख विश्लेषणार्थ प्रस्तुत किए हैं। साहित्यकार स्त्री या पुरुष मानवीय सम्बन्धों की पृष्ठभूमि में अपना जीवन यापित करते हैं। सामान्य से विशिष्ट तक ही यात्रा ही काम से प्रेम की यात्रा कही जा सकती है। विश्वसनीयता व यथार्थ-बोध साहित्यकारों की आत्मकथा की विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं।3

       वर्तमान बोध और अतीत बोध परस्पर जब अनुकूल बन जाते हैं और लेखक अतीत बोध के मध्य वर्तमान बोध को उभारने में संलग्न हो जाता है, वहाँ पहुँचने पर लेखक का जीवनदर्शन स्थिर और निश्चित बनता है। इस दृष्टि से वर्तमान बोध का परिपक्व हो जाना ही एक नवीन अन्तर्दृष्टि का परिचायक है। मानसिक प्रौढ़ावस्था के मोड़ पर लेखक के परिपक्व संस्कार स्मृति, सत्य व साहस से अतीत व वर्तमान के मिलन-बिन्दु पर बाहरी प्रेरणा और अभ्यर्थना का सम्बल लेकर आत्माभिव्यक्ति के लिए व्यग्र हो उठते है तब कलात्मक आत्मकथा का जन्म होता है4  

भुक्त यथार्थ की अभिव्यंजना में आत्मकथा लेखक की रचना जब सार्वजनिक हो जाती है तो जनसाधारण यह जानना चाहता है कि उसके क्या कारण हैं। आत्मकथा लेखक स्वयं अपने कार्यों का कार्य-कारण सहित ब्यौरा प्रदत्त करता है। साहित्यिक आत्मकथाकार अपने अन्तर्मुखी मन को विशिष्ट स्व के प्रतिच्छायित करते हैं, जिनके कारण साहित्यिक आत्मकथाओं में निजता का निर्वाह अधिक होता है। विश्वसनीयता व आधुनिकता के समावेश ने साहित्यकारों की आत्मकथाओं में जीवनमूल्यों को किस हद तक प्रभावित किया है। दाम्पत्येतर सम्बन्धों से जुड़ने की प्यास बहुआयामी होती हैः दाम्पत्य सम्बन्धों में असन्तुष्टि को साहित्यकारों ने आत्मकथाओं में कितना बेबाकी से स्वीकार किया है।5 आत्मकथाकारों ने पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक वातावरण में किस प्रकार जीवन-निर्वाह किया है। साहित्यकारों की आत्मकथाएँ तथ्याश्रिता के आधार पर अपना पृथक् रूपभेद निर्मित करती हुई प्रमाता के अन्तःकरण पर विशेष छाप छोड़ती हैं। साहित्यकारों की आत्मकथाओं में सौन्दर्य, आशा-निराशा, पीड़ा-चाह, भय ग्रन्थि, सुख-दुःख के विविध छाया तथ्यों की ही बाह्य सौन्दर्यमयी कलात्मक अभिव्यक्ति की गई है। साहित्यकारों ने आत्मकथाओं में ‘स्व’ को उद्घाटित करने की आन्तरिक विवशता से आत्मकथा लेखन सम्पन्न किया है तथा अपनी विवशता, आत्मिक छटपटाहट से जुडी़ भावना को संदर्भित भी किया है। आत्मकथाओं में साहित्यकारों के व्यक्तिगत जीवन के पहलू स्वतः खुलते चले जाते है। दाम्पत्य सम्बन्धों में असन्तुष्टि को साहित्यकारों ने आत्मकथाओं में कितना बेबाकी से स्वीकार किया है।6 साहित्यकारों की आत्मकथाएँ तथ्याश्रिता के आधार पर अपना पृथक् रूपभेद निर्मित करती हुई प्रमाता के अन्तःकरण पर विशेष छाप छोड़ती हैं।
हिन्दी महिला कथाकारों की सशक्त पीढ़ी है जिन्होंने अपने रचना संसार को विविध रूप रंग से सुसज्जित किया है। कृष्णा अग्निहोत्री उन लेखकों में परिगणित की जाती है जिन्होंने भोगे हुए क्षणों को समाज के समक्ष बेबाकी से प्रस्तुत करते हुए अपने साहित्य के माध्यम से जीवन का तूफ़ान, तूफ़ान का सैलाब, भावनाओं की सघनता, तनावों के कसाव को वाणी देने का सातत्य प्रयास किया है। हिन्दी औपन्यासिक साहित्य के इतिहास में कृष्णा अग्निहोत्री का चुनौती मय कदम है जिसमें बाह्यजगत व अन्तर्जगत की कथा अन्तर्गुत्थित प्रतिबिम्बित होती है। निश्चय ही हिन्दी साहित्य के इतिहास में आत्मकथा के क्षेत्र में कृष्णा अग्निहोत्री ने लोकप्रियता अर्जित की है।

कृष्णा अग्निहोत्री जी ने ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ आत्मकथा के अन्तर्गत माँ की स्वभावगत विशिष्टता का उल्लेख करते स्वयं को निष्प्रभ अनुभव कर माँ की व्यावहारिकता का विश्लेषण किया है, ‘‘माँ मुझे प्यार नहीं करती थी पर मैं अम्मा को हृदय से प्यार करती थी... यदि पल भर को भी मुझे प्यार देती थी तो मैं गद्गद् हो जाती थी।’’7भाई व बहिन का सम्बन्ध पारिवारिक संरचना का आधार स्तम्भ होता है। भाई व बहिन का आदर्शात्मक सम्बन्ध समाज को दिशा निर्देशित करता है। औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप भाई व बहिन सम्बन्धों के मध्य प्रगाढ़ता विलीन होती जा रही है। भाई-बहिन के आदर्श व यथार्थ को लेकर अनेक अवधारणाएँ साहित्यिक आत्मकथाओं में विस्तृत फलक पर अभिव्यंजित हैं। कृष्णा अग्निहोत्री जी ने विवेच्य आत्मकथा के अन्तर्गत औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरुप भाई बहिन के सम्बन्धों की विच्छिन्नता का सहज निदर्शन किया है, ‘‘मै भी देखती हू कि तुम मुझे घर से कैसे निकालते हो। मै कलक्टर से शिकायत कर दूँगी? मै क्रोध व अपमान से काँप रही थी।’’8

पारिवारिक संगठन हेतु ननद भाभी के सम्बन्धों की मधुरता व तिक्तता का कृष्णा अग्निहोत्री जी ने प्रभावशाली प्रत्यंकन किया है, ‘‘मैंने मन से, हदय से बेटे अतुल को पाला... चार माह तक वह मुझे ही माॅ समझता रहा... भाभी का लीवर खराब था;उनके लिए लीवर सूप बनाना व परोसने का काम भी मैं ही करती... होना तो यह था कि वे सबको प्यार देती लेकिन वे हमसे प्रत्येक क्षण मायका छुड़वा रही थी।’’9

गृहस्थाश्रम सभी  आश्रमों का द्वार है। विधि द्वारा विवाह के उपरान्त ही स्त्री और पुरुष को पति-पत्नी का दर्जा दिया जाता है और पति-पत्नी को दम्पती माना गया हैं। दाम्पत्य जीवन में विवाह एक आधारशिला है। विवाह के माध्यम से पति-पत्नी गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होते हैं; अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति, सन्तानोत्पत्ति एवं बच्चों का पालन पोषण करते हैं। पति-पत्नी  के पारस्परिक आकर्षण को मर्यादित करने का उपक्रम पारिवारिक ढांचे की आधारशिला के रूप में दाम्पत्य सम्बन्धांे में विद्यमान रहता है।10 कृष्णा अग्निहोत्री ने ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ आत्मकथा के अन्तर्गत विवाह के अनुष्ठान का शब्दबद्ध अभिव्यंजन किया है, ‘‘शादी के समय पानी गिर रहा था और मैं अनिद्रा में फेरे ले रही थी । एकदम निरुत्साहित, घबराई। जो आता, कान में फुसफुसा देता,वर बढ़िया है।’’11विवाह में प्रदत दहेज पर भी कृष्णा अग्निहोत्री जी ने विहंगम दृष्टि डाली है। अपने पति सत्यदेव अग्निहोत्री जी की प्रशंसा व ससुराल वालों की अनुहार का भी विस्तार से विवेचन किया है, ‘‘पिता जी ने पलंग, सोफासैट, पंखा, रेडियो भी दिए... मेरी सास ने कहा-‘तिवाड़ी जी हमें लड़के की दादी को पैर छुवाई में सोने की गिन्नी चाहिए।’12 पति पत्नी के साहचर्य की भावना से दाम्पत्य सम्बन्ध का सूत्रपात होता है। गार्हस्थ्य धर्म भावना में आत्मसंयम में नारी की उपयोगिता असंदिग्ध है। इसी अवस्था की अनुकृति कृष्णा अग्निहोत्री जी ने प्रतिपादित की है, ‘‘गर्भ से पूर्व अग्निहोत्री जी ने स्वयं मेरे शरीर से भरपूर सुख लूटा था... यह अवश्य कहते... प्रत्येक बार तुम प्रथम दिवस की सी कमसिन कुँवारी ही हो जाती हो।’’13 परिवार के प्रति कर्तव्य पूर्ति के निमित्त मनोवैज्ञानिक भाव भूमि का विश्लेषण करते हुए परिवार की रचनात्मक संघटना का भी सविस्तार विवेचन किया है, ‘‘आॅफीसरी, उनका रहन सहन मेरे लिए नया नहीं था... लेकिन पद का घमंड मेरे पति को अत्यधिक था... मैं अपने से अधिक उनकी चिन्ता करती।’14

यौन सम्बन्धों के साथ साथ पति पत्नी में सन्तानोत्पत्ति की भावना की प्रबलतम होती है। पति पत्नी के सम्बन्धों में प्रगाढ़ता लाने के लिए सन्तान की महती भूमिका होती है। परिवार एक शिशु गृह है जहाँ प्रजातन्त्र विनिर्मित होता है। परिवारों में वंशवर्द्धन व जातीय जीवन के सातत्य को बनाए रखने रखने की अनिवार्यता पर बल दिया जाता है। परिवारिक भावनात्मकता का सूत्र जब अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होता है, तब सामाजिक नियन्त्रण के बल पर परिवार की आस्था सुदृढ़ हो जाती है। पारिवारिक सार्वभौमिकता का स्वरूप विश्लेषित करते हुए कृष्णा अग्निहोत्री जी ने पुत्री जन्म की घटना को प्रस्तुत किया है, ‘‘सातवें माह में मै  बिस्तर पर रखी गई, तब नीहार का जन्म हुआ... लड़की का स्वागत है, उसकी देख रेख अच्छे से करें।’’15  माँ के प्रति ममता स्वाभाविक होती है। कृष्णा अग्निहोत्री जी के जीवन अनुभवों को जान लेने की पाठकों को उत्सुकता रही, जिस की प्रत्यक्ष अनुभूति में व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों, को लेखनीबद्ध किया है। ममत्व की भावना के वशीभूत होकर अपनी पुत्री की संवेदना को मनोवैज्ञानिक धरातल पर संश्लेषित किया है, ‘‘प्यारी दुलारी बिटिया की बांहें गले का हार थी। प्रेरणा थी,जीने का बहाना थी,मैं रोती रही, वह आँसू पोंछती रही।’’16 सुहाने सफ़र में पति पत्नी के विचारों में असमानता जीवन को नीरस बना देती है। आत्मकथा की रचना प्रक्रिया में सम और विषम दोनों स्थितियों की स्वरुपात्मक अभिव्यक्ति की है, ‘‘रात पति पी कर आए तो उन्हें औरत की आवश्यकता थी पर में तो नाराज़ थी... उठाया पुलसिया डंडा, बहुत मारा।’’17 कृष्णा जी ने आलोक से बातचीत करने पर अपने पति के व्यवहार में परिवर्तनशीलता का सहज निदर्शन किया है‘अग्निहोत्री जी ने दरवाज़ा बन्द किया और जूते सहित एक जोर की लात मेरे पेट में मारी... अपने यार से इश्क लड़ाने यहाँ आई है।’’18

पति-पत्नी अप्राप्य महत्त्वाकंाक्षाओं को लेकर उद्विग्न हो जाते है। बदलते सन्दर्भ में  दाम्पत्य जीवन सम्बन्धी परम्परागत नैतिक मान्यताएँँ शिथिल होती जा रही है। पति-पत्नी के परस्पर सम्बन्धों के मूल्य भी बदल रहे हैं। मानव सम्बन्धों की विशृंखलता के कारण मानवीय सवेदनाओं के आहत होने पर पति-पत्नी के सम्बन्धों में भी विषमता का प्रसार होने लगा। भारतीय संस्कृति में परिवार को व्यापक फलक पर चित्रित किया गया है जिनमें गार्हस्थ्य भावना की पारिवारिक व्यापकता प्रकट होती है। कृष्णा अग्निहोत्री ने आत्मविश्लेषण में जीवन के असन्तोष को प्रकट करते हुए जमीनी सच्चाइयों से जीवन में गहराई का भी चिन्तन मनन करते हुए अवस्थी जी के आश्वासन की सीढ़ियों पर चढ़ते चढ़ते आवेश के क्षणों में भावनात्मक प्रतिक्रिया का विश्लेषण किया है, ‘‘मैंने अवस्थी जी से कह दिया था, ‘‘ मैं रखैल बनकर कभी नहीं जी सकती और आवेश के क्षणों में सुख के लिए मेरी भावना से कोई खिलवाड़ करे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा।’’19            

किसी दूसरे से जुड़ने की प्यास मानव में स्वाभाविक होती है। यह प्यास इतनी बहुआयामी होती है कि दाम्पत्य सम्बन्धों से सन्तुष्ट नहीं हो पाती। कृष्णा अग्निहोत्री जी ने अपनी जीवन शैली में दोस्ती की अनिवार्यता पर बल देते हुए अपनी ज़िन्दगी को अन्य के प्रति दस्तावेज़ित किया है व दूसरे विवाह के सन्दर्भ में पारिवारिक वातावरण, श्रीकान्त के बच्चों के प्रति भावनात्मकता, अपनी पुत्री नीहार के प्रति कत्र्तव्य-निष्ठा ,पहले पति अग्निहोत्री जी से तलाक, श्रीकांत के हर्ष को वैवाहिक अनुष्ठान की भावभूमि में प्रतिबिम्बित किया है, ‘‘मैं तैयार नहीं हुई तो उन्होंने विवाह की योजना बना ली... मैं अपने झूठे अहं व स्वाभिमान की डोर से बंघती गई।’20

कृष्णा अग्निहोत्री जी ने अपने जीवन का तूफ़ान, तूफ़ान का सैलाब, भावनाओं की सघनता, तनावों का कसाव आदि को वाणी देने का सातत्य प्रयास किया है एवम् आलोक के साथ अपने सम्बन्धों को निःसंगता के साथ प्रस्तुत किया है। दाम्पत्येतर सम्बन्धों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए आलोक से मिलने वाले सुख व आनन्द की पुष्टि कृष्णा अग्निहोत्री जी ने संचारी भावों के माध्यम से प्रस्तुत की है, ‘‘आलोक हमें कई बढ़िया जगह घुमाने ले गए... अधिकतर तो वो मेरे पास ही बैठते... हाल की सबसे सुंदर स्त्री कौन है।परदे लाल की जगह हरे होने चाहिए थे।’’21

‘           आजकल विवाह को धार्मिक संस्कार न मानकर केवल ‘अनुबन्ध’ मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। पुरुष के प्रति सहज आकर्षण नारी के मन में स्वाभाविक ही होता है। इस आत्मकथा में उन ज़मीनी सच्चाइयों का विश्लेषण कृष्णा अग्निहोत्री जी ने  किया है जिससे जीवन में गहराई संस्पर्शित होती है व व्यक्तिगत जीवन के पहलू स्वतः खुलते चले जाते है। उन्होने पाठकों की जिज्ञासा का शमन करने हेतु अपने सम्बन्धों की निश्छलता को शब्दबद्ध किया है । इन्होंने सत्य व तथ्य की रक्षा करते हुए अपने नियमित व अनियमित प्रेम-प्रसंगों का पर्दाफ़ाश किया है। मंजुल के विश्वसनीय व्यक्तित्व से प्रभावित हो उम्र का बंधन त्याग कर दाम्पत्येतर सम्बन्धों का मनोवैज्ञानिक संश्लेषण कृष्णा अग्निहोत्री जी ने किया है- ‘‘कई बार मेरे मंजुल के सम्बन्ध कटघरे में खड़े हुए... कई रिश्तों की भावनाओं का हम निर्वाह कर रहे थे... जिसकी न परिवार , न समाज को हानि थी।’22

            कृष्णा अग्निहोत्री जी ने अपने भाव जगत की इच्छाओं, आकांक्षाओं, स्वपनों, कल्पनाओं का सुन्दर दिग्दर्शन किया है। मातृत्व की पूर्ति निमित्त दौहित्री के आगमन से अपने आँचल को अलौकिक मानकर आनन्द व उल्लास की भावाभिव्यक्ति कृष्णा अग्निहोत्री जी ने अनुमोदित की है- ‘‘मेरे पास पाँच रुपये के नोटों की गड्डी थी, उस समय उपस्थित सभी नर्सों को मैने नातिन पर से न्यौछावर करके बांट दिया।’’23
उन लेखकों में कृष्णा अग्निहोत्री परिगणित की जाती है जिन्होंने भोगे हुए क्षणों को समाज के समक्ष बेबाकी से प्रस्तुत करने का साहस दिखाया। ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ आत्मकथा कृष्णा अग्निहोत्री जी की अन्तर्जगत की कथा है जहाँ-2 लेखिका के अन्तरंग जीवन के दर्शन होते है; वे पर्याप्त प्रभावशाली है । इस आत्मकथा में उन ज़मीनी सच्चाइयों का विश्लेषण किया गया है जिससे उनके जीवन में गहराई संस्पर्शित होती है व व्यक्तिगत जीवन के पहलू स्वतः खुलते चले जाते है। स्वच्छन्द विचारों की धारणा करना कृष्णा जी के व्यक्तित्व की महती विशेषता है, इसी कारण उन्होंने अपने व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों का सत्यता से आलेखन किया है व जीवन की स्थितियों व समस्याओं को उठाया है जिसके कारण पाठकों से संवदेनात्मक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। कृष्णा जी ने भुक्त यथार्थ की अभिव्यंजना, भावनाओं का सहज उच्छ्लन, मानसिक अन्तद्र्वन्द्व का शमन, आत्मरहस्योद्घाटन आदि प्रयोजनों के निहित्तार्थ को सुस्पष्ट किया है। आत्मकथा के क्षेत्र में कृष्णा अग्निहोत्री जी का योगदान साहसपूर्ण व चुनौती मय कदम है जो आत्मकथा लेखन की कसौटी है।

सन्दर्भ ग्रन्थ
1 विश्व बन्धु ‘व्यथित’: हिन्दी का आत्मकथा साहित्य, राधा प्रकाशन, दिल्ली, 1989, पृ 120
2 नारायण विष्णु शर्माः हिन्दी आत्मकथा, पुस्तक संस्थान, कानपुर, 1978 , पृ  58
3 कमलेश सिंहः हिन्दी आत्मकथाः स्वरूप एवं साहित्य, नेशनल पब्लिशिंग हाऊस, दिल्ली, 1989, पृ 128
4 विश्व बन्धु ‘व्यथित’, हिन्दी का आत्मकथा साहित्य, राधा प्रकाशन, दिल्ली, 1989,पृ 143
5 साधना अग्रवालः वर्तमान हिन्दी महिला कथा लेखन और दाम्पत्य जीवन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995, पृ 13
6 उर्मिला भटनागरः हिन्दी उपन्यास साहित्य में दाम्पत्य चित्रण, अर्चना प्रकाशन, दिल्ली, पृ 130
7 कृष्णा अग्निहोत्रीः लगता नहीं है दिल मेरा,सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 2010, पृ 22
8 वही, पृ0 28
9 वही, पृ0 227
10 साधना अग्रवालः वर्तमान हिन्दी महिला कथा लेखन और दाम्पत्य जीवन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1995, पृ0 117
11 वही, पृ0 92
12 वही, पृ0 93
13 वही, पृ0 112
14 वही, पृ0 105
15 वही, पृ0 121-122
1 वही, पृ0 226
17 वही, पृ0 137
18 वही, पृ0 158
19 .वही, पृ0 187
20 वही, पृ0 260
21 वही, पृ0 158
22 वही, पृ0 287
23 वही, पृ0 294

अंतर्जालीय स्रोत
  1. http://www.hindibook.com/index.php?p=sr&Field=author&String=KRISHNA%20AGNIHOTRI
  2. http://www.shabdankan.com/2016/02/krishna-agnihotri-hindi-writer-interview.html
  3. www.samayikprakashan.com/indetails.asp?id=302
  4. http://www.facenfacts.com/NewsDetails/127/the-chhinaal-controversy.htm

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