काँच के शामियाने, समाज का दर्पण!

पुस्तक समीक्षा: रश्मि रविजा कृत कांच के शामियाने

पुस्तक: काँच के शामियाने
लेखिका: रश्मि रविजा
प्रकाशक: हिन्द युग्म, नई दिल्ली
मूल्य: रुपये 140 / डॉलर 7.00
पृष्ठ 203, पेपरबैक

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’


रश्मि रविजा से बहुत पुराना परिचय है। ब्लॉग के माध्यम से हुआ था। कमेंट आदि ही माध्यम रहे बातचीत के मगर उसकी कहानियाँ, संस्मरण, आलेख पढ़कर लगता कि कोई अपना अपने आस पास को लिख रहा है वो भी इतना जिन्दा लेखन कि रेल यात्रा की बात करे तो स्टेशन पर बिकते पकोड़ों की महक नथुनों में समाने लगे और कभी एक दर्द को उजागर करे तो आँख स्वतः नम हो आये।

समीक्षक: समीर लाल
कई बार उसको पढ़ते हुए कहा कि किताब निकालो। पुस्तकारुप दो अपने ख्यालों को। हाँ ना करते कई साल गुजर जाने पर पता चला कि उसकी नई किताब आई है ’काँच के शामियाने’। मन ललच कर रह जाता जब उस किताब की तस्वीर देखते और लोगों को उसकी तारीफ करता देखते। जानता तो था ही लेखन की गहराई मगर किनारे बैठ कर गहराई का अनुमान लगाना नदी में उतर कर गहराई नापने का आनन्द कभी नहीं दे सकता। और फिर यहाँ तो समुंदर सी गहराई की बात थी।

एक दिन दफ्तर से घर लौट रहा था तो मित्र का फोन आया कि भारत जा रहा हूँ 10 दिन के लिए, कुछ काम हो तो बताना। अंधा क्या मांगे दो आँखें! तुरंत उसका भारत का पता लेकर रश्मि को भेजा कि इनके माध्यम से पुस्तक भेज दो। उसका बड़प्पन कि तुरंत कुरियर करके मित्र तक पुस्तक पहुँचा दी। वरना मुंबई की दिन ब दिन की व्यस्तता में हम जैसों का फरमान। कौन समय निकालता है इतना? कुछ दिनों में किताब आई और बस! तुरंत पढ़ भी ली गई।

लेखिका रश्मि रविजा
घर में, दफ्तर के रास्ते में, पढ़ते रहे, अहसासते रहे कि जैसे कोई जाना पहचाना परिवार हो। जिसकी बात चल रही है। जया के दर्द को गहराई तक अहसासा। कुछ देर नम आँख लिये सुन्न में ताकते रहे। फिर आगे पढ़ा। जया से जैसे कोई रिश्ता सा स्थापित हो गया। लगा कि काश मैं अपना कंधा दूं कि चलो, कुछ देर यहां रो लो। कुछ सुकून पा लो। जान पाये कि लेखिका कितना रोई हो गई इस किरदार को रचते। बहते चले गये पन्ना दर पन्ना। इतनी बारिकी से पिरोये इन्सानी ज़ज्बात। इतनी खूबसूरती से उकेरे गये शब्द चित्र। लगता ही नहीं कि पढ़ रहे हैं। प्रवाह मय फ्रेम दर फेम चलचित्र देखने का सा एहसास। मानो कह रही हो।

मैं गुलाब लिखूँगी।
तुम महक लेना उसको।
गर वादा करो
कभी किताब में रख कर
भूलोगे नहीं मुझ गुलाब को।
वाकई, किताब का लिखा हर हर्फ खुद बोलता है, खुद के जिन्दा होने का अहसास करता है, जया के दर्द का दर्द महसूस करवा जाता है और आँखे उस दर्द की गवाही देने को आतुर । कुछ ऐसे नम होती है कि एक धुँधलका सा छा जाता है किताब के पन्ने पर और आप अपने हाथ से करीने से आँख नहीं, पन्ना पौंछने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसा किताब पढ़ते पढ़ते बार बार अहसास पायेंगे आप।

किताब पढ़कर रश्मि से टिप्पणी के माध्यम से संवाद स्थापित कर बस यही कह पाया कि न जाने क्यूँ, जबकि इस ’काँच के शामियाने’ में कहीं पत्थर का जिक्र भी नहीं है मगर पत्थर हुई संवेदनहीन मानवता। जिस तरह उभर कर सामने आती है। मुझे लगता है कि हर इंसान जिसके पास दिल है जो सही में धड़कता है हर दर्द ए जहां पर। उसे रश्मि की यह किताब जरुर एक बार खरीद कर पढ़ना चाहिये। मुफ्त में प्राप्त खजाना भी ध्यान आकर्षित नहीं कराता गहराई पर। वह धरातल पर तैराता है। अतः खरीद कर पढ़ने का आह्वान। बस इतनी सी समीक्षा।

3 comments :

  1. रश्मि रविजा की यह कहानी किश्तों में पढ़ी थी जब वे इसे अपने ब्लॉग पर लिखा करती थीं। इसी कहानी की वजह से रश्मिजी से परिचय हुआ
    यह महज कहानी नही एक दस्तावेज है उन ज़िंदगियों का जो न जाने कितनी जयाएँ उम्र भर झेलती हैं, हर्फ ब हर्फ..!
    पाठक एक मूक दर्शक बन जाता है, कसमसाहट से भरा हुआ, की पकड़े जया का हाथ और उठाकर जड़ दे उन सभी के चेहरों पर जिन्होंने उसकी खुशी खरोंच खरोंच कर छील दी है।
    एक अविस्मरणीय उपन्यास...!
    सभी को पढ़ना चाहिए..!!!

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  2. बढि़या लिखा आपने

    काँच के शमियाने तो है ही पठनीय, रश्मि जी को लेकर जो लिखा वो भी सही है।आनलाईन में दिक्कत हो रही थी तो मुझे भी भेज दी थी किताब.. बाद में आर्डर भी हो गया
    अब दो किताब थी मेरे पास, सो एक गिफ्ट किया

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  3. पारंपरिक समीक्षा से बिल्कुल अलग तरीके से लिखी गई आपकी ये समीक्षा अपने मकसद में पूरी तौर से कामयाब हुई है । अच्छा लगा यूँ दिल से लिखी, अपनत्व की चाशनी से भरी इस पोस्ट को पढ़ के...। आप दोनों को बधाई

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