व्यंग्य: कथरी से आगे नहीं

- कौशलेन्द्र

कौशलेंद्र
पीढ़ियों से वह कथरी ओढ़ता रहा है। कथरी से वह सुपरिचित है और उसके उपयोग का अभ्यस्त भी। मलिन और जीर्ण-शीर्ण हो चुकी किंतु ठंड से रक्षा करने वाली अपनी प्रिय कथरी छोड़ने की कल्पना भी उसके लिए दुष्कर है। कथरी के अभ्यास को तोषक से बदलने की कल्पना क्रांति की कल्पना है जो सत्ता को उलट-पुलट सकती है अतः किसी भी स्थिति में ब्रह्माण्ड की सीमा कथरी से आगे नहीं होनी चाहिए। कथरी से उसकी ठंड का किंचित निवारण तो हो ही जाता है इसलिए हम अपने भंडार में रखे सुवासित तोशक उसे नहीं दे सकते। हमारे पास सुन्दर-सुवासित तोशकों का विपुल भण्डार है जिनका निर्माण ही लोगों की ठंड दूर करने के लिए किया गया है किंतु प्रजा के कथरीप्रेम के कारण हम उस भण्डार में से एक तोशक भी किसी को नहीं देते। व्यवस्थापकों का आदेश है कि इन वंचितों को वही कथरी दी जानी चाहिये जो उन्हें अति प्रिय है। ठंड दूर करने में सक्षम तोशक उनके लिए अनुपयोगी हैं क्योंकि उन्हें तो अपनी फटी और मलिन कथरी से बेहद प्रेम है। उन्हें उनकी प्रिय वस्तु से वंचित करना अनुचित और अव्यावहारिक है। अभ्यास का संरक्षण सर्वोपरि है, उसके आगे ज्ञान की तुच्छता का उद् घोष ही आधुनिक तत्वदर्शन है।

ग्रामीण बच्चे स्तरीय हिन्दी से अनभिज्ञ हैं इसलिए उन्हें जीवन भर स्तरीय हिन्दी सीखने की आवश्यकता नहीं है, वे अपनी ग्रामीण क्षेत्रीय बोली से सुपरिचित और अभ्यस्त हैं इसलिए उन्हें अन्य किसी भाषा को सीखने की आवश्यकता नहीं है। हिन्दी के लिए हिन्दी पखवाड़ा पर्याप्त है अतः ग्रामीण बच्चों को विद्यालयीन शिक्षा उनके गाँव की बोली में ही दी जानी चाहिए या फिर सात समन्दर पार की चमत्कारी अंग्रेज़ी भाषा में। धरती पर जो जैसा है उसे उसी रूप में उपयोग करने से सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण होता है। परिमार्जन नवीनता का परिचायक है जो अप्रिय और कष्टदायक होने से त्याज्य है। अशिक्षित समाज अन्धविश्वासों में जीने का अभ्यस्त है। सदियों के अभ्यास को छोड़ना कष्टदायक होता है, किंतु कोई राजा अपनी प्रजा को कष्ट नहीं देना चाहता इसलिए समाज से अन्धविश्वास दूर करने का प्रयास तो दूर उसके विषय में सोचना भी पाप है।

सत्ता और समाज की सम्पूर्ण व्यवस्थायें निरीह और अशिक्षित प्रजा की मानसिकता के स्तर से कदमताल मिलाती हुयी ही होनी चाहिए। इससे जहाँ प्रजा निरंतर कूपमण्डूक बनी रहती है वहीं धूर्तों को सत्ता उपभोग की अनुकूलता भी उपलब्ध होती रहती है।

स्वास्थ्य और चिकित्सा के विषय में प्रजा की अज्ञानता और रूढ़ियों को दूर करने से प्रजा के रुष्ट होने का भय है अतः उच्च शिक्षित चिकित्सकों को चाहिए कि वे प्रजा की भावनाओं का सम्मान करते हुए उनकी संतुष्टि के लिए अशिक्षित, अनाड़ी और नीम-हक़ीम बनकर ही चिकित्सा कार्य करें। रोग का निदान वही किया जाना चाहिए जो प्रजा माँग करे, चिकित्सा वही दी जानी चाहिए जिसमें प्रजा के अन्धविश्वास की रक्षा हो सके। डी.डी.टी. के अवचूर्णन से अब मच्छरों की हत्या नहीं हो पाती और लाभ के स्थान पर हानि की ही सम्भावनाएं अधिक हैं तथापि करोड़ों रुपए खर्च कर इसका अवचूर्णन किए जाने की महती आवश्यकता इसलिए है कि प्रजा को उनके प्रति सत्ता की चिंता से आप्लावित किया जाता रहे। यद्यपि दोषपूर्ण जीवनशैली लगभग 80% व्याधियों के लिए उत्तरदायी है तथापि दोषपूर्ण जीवनशैली का चमत्कारिक आकर्षण अद्भुत है। शरीर नश्वर है, मृत्यु अनिवार्य है, मृत्यु के भय से आनन्द का परित्याग पाप है। हशीश, कोकीन, शराब, भांग, गाँजा आदि के सेवन से मिलने वाला आनन्द भला गोदुग्ध में कहाँ ! तम्बाखू का त्याग करना कष्टदायक है जबकि सेवन करना सुखद है, अतः जब तक मुंह में कैंसर न हो जाय तब तक तम्बाखू का सुखपूर्वक सेवन करने के आनन्द से प्रजा को वंचित करने से क्या लाभ ? प्रजा के सेवन हेतु शराब और तम्बाखू की पर्याप्त उपलब्धता की व्यवस्था करना सत्ताओं का राजसिक दायित्व है, इनके सेवन से होने वाले हानिकारक प्रभावों से अपनी प्रजा को, सहजता से न दिख सकने योग्य छोटे-छोटे अक्षरों के विज्ञापन से सचेत करना राजाओं का छद्म नैतिक कर्तव्य है और राजा द्वारा उपलब्ध करावाये गये विषों का निरंतर सेवन करना प्रजा का स्वच्छन्द तामसिक धर्म है।

इस सहज ज्ञान का सार यह है कि दुनिया में दो प्रकार के कार्य होते हैं, एक श्रेयस और दूसरे प्रेयस। श्रेयस कार्यों का मार्ग अति कठिन और संघर्षपूर्ण है जबकि प्रेयस कार्यों का मार्ग अति सरल और आकर्षक है। सत्पथ अनुगमन की आवश्यकता ही क्या जब अ-सत्पथ अनुगमन से सुरा-सुन्दरी भी सहज ही उपलब्ध हैं। मनुष्य जीवन की सार्थकता नित नवीन सुरा-सुन्दरी के उपभोग में है। उच्च शिक्षा हो या उच्च पद, सुरा- सुन्दरी के लक्ष्य में इनका अवरोधकत्व गुण समाप्त हो गया है। शिक्षित-अशिक्षित, सभ्य-असभ्य और सुसंस्कृत-अपसंस्कृत के मध्य की विभेदक दीवाल ढह चुकी है, वर्गभेद समाप्त हो चुका है और समाज में अद्भुत समानता व्याप्त हो चुकी है। सब धान बाइस सेर का आदर्श सुस्थापित हो चुका है जिसमें राजा के विशेषज्ञ प्रतिनिधियों के रूप में प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों का योगदान महत्वपूर्ण है। सत्ता जब अदक्ष और दूषित होती है तो वह शोषणमूलक होती है। अयोग्य लोगों को सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जो समाज में उनकी अयोग्यता का विरोध न कर सकें। वे ऐसे घटकों का निरंतर निर्माण करते रहते हैं जो समाज में यथास्थिति को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा सकें। प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अश्व-गर्दभ के परस्पर प्रजातीय रूपांतरण में दक्ष हो जाते हैं। निरंतर प्रतिकूल स्थितियों में भी लोग किसी भी तरह जीवित रहने की कला सीख ही लेते हैं, विज्ञान के युग में आधुनिक भारत की यह अद्भुत कलात्मक उपलब्धि है जिसकी हम सबको सराहना करनी चाहिये।

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