व्यंग्य: सप्तपदी से सहस्रपदी तक

समीर लाल ‘समीर’
- समीर लाल ‘समीर’

विवाह में अब तक सप्तपदी और सात वचन ही सुने थे। मगर अब, वेदों पुराणों वाले सात वचन मुँहजुबानी और आठवाँ सरकारी शपथपत्र भर कर सुनने में आ रहा है। बिहार में अगर शादी करनी है तो आपको पहले शपथ पत्र देना होगा कि यह विवाह बालविवाह नहीं है और इसमें दहेज का कोई लेन देन नहीं है। यह प्रावधान बिहार सरकार लेकर आई है।  जित्ती सरकारें उत्ती लाठियाँ, जो जैसा हाँक ले जाए।

अब तो लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब विवाह करने हेतु पैन कार्ड, बैंक खाता एवं आधार कार्ड अनिवार्य हो जायेंगे और पैन नंबर शपथ पत्र का हिस्सा हो जायेंगे। पंडित जी की दक्षिणा भीम एप से देना अनिवार्य कर दी जायेगी अन्यथा विवाह अमान्य घोषित किया जाएगा। ऐसा नियम बना दिया जायेगा।

समय बदल रहा है। आज के आठ वचन एक रेट वाले जीएसटी के बदले हजार रेट वाले जीएसटी की तर्ज पर कई वचनों में बदलते जायेंगे। नित बदलाव हमारी आदत का हिस्सा बन गया है। हमने गीता पढ़ी है। हमें ज्ञात है की परिवर्तन ही जीवन का नियम है। बदलाव को झेलना भी और झिलाना भी। हमें आता है। आगे से इसके चलते विवाह में वचन कुछ यूँ हो सकते है:

हम दोनों शपथपत्र भर कर यह घोषणा करते हैं कि:
- हम दोनों के पास आधार कार्ड है जो एक दूसरे से लिंक है,
- हम दोनों के बैंक खाते आपस में लिंक हैं,
- हम दोनों एक ही राजनीतिक दल को वोट दे सकते हैं जिसका निर्णय मेरी पत्नी करेगी और जिस दल का नाम भाजपा होगा।
- अगर मेरी पत्नी अगर कमल के बदले किसी और निशान पर वोट डालेगी तो मेरा कमल पर डाला गया बाई डिफाल्ट वोट ही वैध होगा और पत्नी का वोट बदल कर कमल कर दिया जाएगा। इस हेतु इवीएम में जरुरी फेरबदल करने के लिए सरकार स्वतंत्र है। बजट में इसका प्रावधान किया जा रहा है।
- अगर हम दोनों किसी कार्यवश वोट देने न आ पायें तो हमारा वोट बाई डिफाल्ट कमल पर लगा दिया जाए
- हमारे होने वाले बच्चे को भारतीय नागरिकता के साथ साथ संघ की सदस्यता दे दी जाए।
- हम एतद द्वारा वादा करते हैं कि बच्चे को अम्मा बाबू बोलने से पहले वन्दे मातरम बुलवायेंगे
- हम स्वच्छता अभियान के तहत रोज मोहल्ले में झाड़ू लगायेंगे। यूँ भी कुछ और करने को है भी नहीं। इसी बहाने व्यस्त नजर आयेंगे।

यूँ भी शपथ दर शपथ वादे करता हर भारतीय यह समझता है कि यहाँ सब वादे और शपथें एक तरह के जुमले भर तो हैं। कौन भला सप्तपदी के वचन निभाता है और कौन पूरी करता हैं शपथें जो भला अब हम करेंगे? न हम शपथकर्ता से किसी तरह की उम्मीद पालते हैं ओर न ही हम इस मुगालते में जीतें हैं कि कोई हमारे कहे पर भरोसा करेगा। बोला ही तो है बस!! कोई दे तो न दिये हर खाते में 15 लाख।

हमारे मुँह के बदले हमारी कलम ने बोल दिया तो आप क्या सीरियस हो जाओगे? मने कि, हमारी जुबान से बड़ी आपके लिए हमारी निर्जीव कलम हो गई? हद करते हो जी आप! जुमलों की दुनिया में वादों की भरपाई। महज एक मजाक ही कहलाएगी, है कि नहीं?

आने वाले समय में अगर विवाह जैसे संस्कार बचे रह गए जिसकी की उम्मीद अब न के बराबर है, तब बदला जमाना शायद सप्तपदी की जगह सहस्त्रपदी पढ़ता नजर आये, इत्तेफाकन। आज एक से सात तक के वचन चूकते हैं। कल सहस्त्र तक चूक जायेंगे। और क्या? क्या फरक पड़ता है। हमें तो आदत है वादों को जुमलों में बदलते देखने की।

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