प्रवासी हिन्दी लेखिकाओं की कहानियाँ

हसन पठान
समाज और संस्कृति का द्वंद्व
- हसन पठान

समकालीन हिन्दी साहित्यिक परिदृश्य में प्रवासी साहित्य ने अपनी अलग पहचान प्राप्त कर ली है। जिसे ‘प्रवासी हिन्दी साहित्य’ कहा जाने लगा है। अब बकायदा इस साहित्य को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा हैं। जब हम प्रवासी साहित्य कहते है तो हमारे ज़हन में कुछ सवाल उत्पन्न होते है पहले तो यह कि प्रवासी शब्द क्या है और दूसरा यह कि प्रवासी साहित्य किसे कहा जाता है। पहले प्रश्न का उत्तर मिलते ही दूसरा सवाल भी कुछ सीमा तक हल हो जाता है। हिंदी शब्दकोशों में ‘प्रवासी’ शब्द का अर्थ ‘परदेश में रहने वाला व्यक्ति, मूलस्थान छोड़कर अन्य स्थान में बसा व्यक्ति, प्रवास करने वाला।’ दिया गया है। कुछ विद्वानों के मतानुसार हिंदी में इसका बहुत संकुचित अर्थ लिया जाता है। व्यापक अर्थ में यही कहा जा सकता है कि अपने वतन से दूर रहकर जो लेखन किया जाता है उसे प्रवासी साहित्य कहा जा सकता है। प्रवासी साहित्य के विकास पर डॉ.कमल किशोर गोयनका कहते है- “अतः हिंदी के प्रवासी साहित्य की गति और विकास को अब कोई भी विरोधी शक्ति नहीं रोक सकती। वह हिंदी साहित्य की एक सशक्त धारा बन चुकी है और उसे हमें हिंदी साहित्य की प्रमुख धारा में सम्मानपूर्ण स्थान देना होगा। ” राजेन्द्र यादव का प्रवासी साहित्य को लेकर अलग ही दृष्टिकोण है वे कहते है कि विदेशों में जो लोग साहित्य की रचना कर रहे हैं, वे हमेशा दोहरी पहचान में बंधे रहते है। जिस कारण वह न तो यहाँ की और न ही वहाँ की जिंदगी में हस्तक्षेप कर पाते है।

भारतीय प्रवासी साहित्यकारों की सूची लंबी है जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, पोलैंड, अरब, कैनेडा, डेनमार्क, फ्रान्स, नार्वे, मॉरिशस, सूरिनाम आदि देशों में बसे भारतीय प्रवासी रचनाकारों की संवेदनाओं, भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। प्रवासी साहित्यकार जब साहित्य रचना करता है तो उसके साहित्य में चित्रित होने वाला समाज अपनी विसंगतियों, विषमताओं, विशिष्टताओं, सामाजिक परिवेश की गरिमा, देशकाल वातावरण के साथ आता है। भले ही कुछ आलोचक इनके साहित्य को मुख्यधारा के साहित्य से नहीं जोड़ना चाहते हो, लेकिन इंटरनेट ने आज प्रवासी साहित्य को बड़ा पाठक वर्ग दिया है। विदेशों में रहकर साहित्य रचना करने वाला लेखक आज इंटरनेट के माध्यम से उस भाषिक साहित्य प्रेमियों से सहज गति से जुड़ गया है। आज प्रवासी साहित्य को लेकर अनेक विश्वविद्यालयों में शोध कार्य चल रहे हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रवासी साहित्य ने अपनी साहित्यिक दुनिया बना ली है।

अमेरिका इंजिनियरों, डॉक्टरों तथा अन्य प्रशिक्षित व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला देश है। साथ ही में अन्य कई कारणों से विश्व में सबसे शक्तिशाली देश के रूप में भी उभरा हुआ है। वहाँ जाने की तमन्ना लोगों को होती है। अमेरिका सब को अपनी ओर आकर्षित करता है। अमेरिका में प्रवासी भारतीयों द्वारा लेखन का इतिहास लगभग पाँच दशक पुराना है। जब वे भारत से इन देशों में बसने के लिए आते हैं, तो अपने शहर, देश की यादें साथ ले कर आते हैं। इनकी शुरूआती कहानियों में नॉस्टेलजिया स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। प्रवासी साहित्यकारों के लिए कविता के बाद अपनी बात कहने के लिए कहानी सशक्त माध्यम रही है। इन के कहानियों में समाज के विविध रुप दिखते है। अपनत्व की कमी, वतन से दूर की वेदना, संस्कारों की जकड़ से छुटकारा पाने की छटपटाहट, अलग वातावरण में ढलने की कोशिश की पीड़ा, परिवार के बिखरने की व्यथा आदि का चित्रण बड़ी ही बेबाकी से इन लेखिकाओं ने किया है। अमेरिका में हिन्दी में कहानियाँ लिखने वाली लेखिकाओं में इला प्रसाद, अनिल प्रभा कुमार, डॉ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी, सुधा ओम ढींगरा, सुषम बेदी, प्रतिभा सक्सेना, पुष्पा सक्सेना, डॉ. ममता तिवारी, नीलम जैन, रचना श्रीवास्तव, सौमित्रा सक्सेना आदि का नाम सहज लिया जा सकता है।

सुषम बेदी हिन्दी की प्रख्यात प्रवासी लेखिका हैं, जिन्होंने मुख्यधारा के कथाकारों के बीच अपनी विशिष्ट जगह बना ली है। इनकी कहानियों में जहाँ एक ओर पाश्चात्य संस्कृति की झलक मिलती हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय परिवेश तथा संस्करों का असर भी दिखाई देता है। सुषम बेदी की कहानियों के पात्रों में एक ओर भारतीय और दूसरी अमेरिकन जीवन शैली के बीच एक द्वंद दिखायी देता है। ‘चिड़िया और चील’, ‘सड़क की लय और अन्य कहानियाँ’, ‘तीसरी आँख’, ‘यादगारी कहानियाँ’ नामक कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। ‘चिड़िया और चील’ कहानी संग्रह में सुषम बेदी की 1978 से लेकर 1994 तक में भिन्न-भिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित सभी कहानियों को स्थान दिया गया हैं। सुषम बेदी का कहानियों में दो पीढ़ीयों की टकराहट और मानवीय सरोकार का साक्षात्कार होता हैं। पहली पीढ़ी है जो भारतीय मूल्यों के साथ जीना चाहती है, वहीं दूसरी पीढ़ी जो वहीं जन्मी और पली-बड़ी है। दूसरी पीढ़ी कि समस्या यह है कि वे भारतीय परिवेश से अनभिज्ञ हैं। इसी कारण दूसरी पीढ़ी समझ ही नहीं पाती की मूल्यों को कितना ग्रहण करें और कितना छोड़े यही कश्मकश उनकी कहानियों में परिलक्षित होता है।

सुधा ओम ढींगरा की कहनियाँ अपनेपन के तलाश की गाथा बयान करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र समाज को अजनबी नहीं बनना चाहते हैं वरन वे सामूहिकता, सहभाव में जीना चाहते है। इसका अच्छा उदाहरण ‘और बाड़ बन गई’ कहानी है। जिसमें लेखिका ने मनु, पारुल, ज़ीवा, रुबिन के माध्यम से वसुदैव कुटुम्बकम् की भावना को प्रबल करने की कोशिश की है। अपने पड़ोस में रहने आ रहा परिवार कहाँ से है। इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में पुरी कहानी का ताना-बाना बुना गया है। हो सकता है कि इन पात्रों की मानसिकता में भारतीयता कुछ ज्यादा रही हो। जिस समाज को हम अपने आप में जीने वाला कहते है उसे इस कहानी के माध्यम से गलत बताया है क्योंकि उस समाज में भी यह उत्सुकता रहती है कि अपने पड़ोस में रहने वाला व्यक्ति कहाँ से आ रहा है। जब तक यह पता नहीं चलता कि अपना पड़ोसी कौन है तब तक मनु, जीवा, पारुल, रुबिन उसके बारे में जानने की कोशिश करते रहते है। इस प्रक्रिया में वे कभी सोचते है कि जो पड़ोस में आ रहा है वो शायद माफिया का मुखिया है। इस कल्पना से ही वे सहम जाते है। पारुल एक जगह पर कहती है, “ऐसे पड़ोसी से क्या सुख मिलेगा ? जिसके आने से पहले ही बेचैनी हो गई।” यह कहानी अंत में भारतीयों बढ़ती अलगाव की खोज करती है। जो लोग भारत से विदेश में जा रहे है वे मनु के शब्दों में “पारुल कई भारतीय अमेरिकी लोगों को समझे बिना उनकी तरह बनने की कोशिश करते हैं, वे अमेरिकी बन नहीं पाते और भारतीय वे रहते नहीं। संभ्रमित हो कर रह जाते हैं। जो वे हैं नहीं वही बनने की कोशिश में सीमाओं का उल्लंघन कर जाते हैं। हमारा नया पड़ोसी भी उनमें से एक है।" डॉ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी की कहानी अखबारवाला भी इसी प्रकार की कहानी है। जिसमें पड़ोस वालों से बात करने की, एक दूसरें के हाल-चाल जानने की ललक कुछ ज्यादा ही है। लेकिन जिस समाज की यह कहानी है वह समाज अलगाववादी है इस ओर पाठक का ध्यान बरबस ही खिंचा जाता है। कहानी की मुख्य पात्र जया के माध्यम से लेखिका अपनी खीज को अभिव्यक्त कर ही देती है, “अपने आप पर केन्द्रित यह समाज कितना बेलाग और बेगाना है।”

'ऐसी भी होली' नामक कहानी में सुधा ओम ढींगरा ने जीवन के रंगों को बखूबी चित्रित किया है। प्रवासी भारतीय लोंग किस प्रकार से मिलजुल कर त्योहारों को मनाते है, इस पर भी यह कहानी प्रकाश ड़ालती है। त्योहारों को एक साथ मनाने के पीछे उनका एक ही उद्देश होता है कि भारत से आया हुआ कोई भी व्यक्ति इस दिन खुद को अकेला न समझे। इस कहानी की वेनसा अभिनव को कहती है, “असहज होने की कोई बात नहीं होली पर भारत से आए नए लोगों का हमेशा ही स्वागत होता है, चाहे उन्हें कोई आमंत्रित मेहमान अपने साथ ले आए। बस यही चाहते हैं कि दिन त्योहार वाले दिन कोई अकेला ना रहे। तुम बिन बुलाए नहीं हो... सहज हो कर मस्ती करो...” और इसी दिन अभिनव को वेनसा से प्यार भी हो जाता है। वेनसा एक अमेरिकन यहूदी परिवार की लड़की है और अभिनव दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कट्टर आर्य समाजी परिवार का बेटा है। दादा हाई कोर्ट के रिटायर जज हैं और पिता आई. ए. एस आफिसर। उसका परिवार हमेशा से सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध लड़ता रहा है। लेकिन जब अभिनव घर पर बता देता है कि उसे वेनसा से प्यार हुआ है और वह उससे शादी करना चाहता है तब उसके समझ में आता है कि खुद को आर्य समाजी कहने वाला उसका परिवार किस प्रकार से उसे वेनसा से शादी नहीं करने के लिए दबाव ड़ाल रहा हैं। कहानी में एक जगह पर दादा जी कहते है, “आर्य समाजी होने का मतलब यह तो नहीं कि कुछ देखा ही ना जाए। शादी के बाद तुम्हारा ही नहीं हमारा भी पूरा जीवन उससे जुड़ने वाला है। मेरा मतलब है कि गुजराती, बंगाली, मद्रासी... कौन है वह? घर परिवार तो देखा ही होगा तुमने।” इस विसंगति के बाद कहानी के अंत में होली के दिन दोनों परिवार मिल जाते है। माँ अभिनव को समझाते हुए कहती है, “वह रंगों वाले दिन तुम्हें उपहार देना चाहती थी... इंसानी रंगों के सरप्राईज़ का उपहार। ” लेखिका ने बहुत ही सूझ-बूझ के साथ कहानी का ताना-बाना बुना है और कहानी में अभिनव की इन पंक्तियों को सिध्द कर दिया है कि “रंगों का मतवाला कभी सोच भी नहीं सकता कि ऐसी भी होली हो सकती है।” यह कहानी भारत के सूत्र वाक्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा को मज़बूती से स्थापित करने का सार्थक प्रयास करती है।

सुधा ओम ढींगरा की कहनियों में भारतीय एवं पाश्चात्य मूल्यों का द्वंद्व कुछ ज्यादा ही उजागर होता दिखाई देता है। जिसे हम उपर्युक्त उनकी दोनों कहानियों में देख सकते है। सूरज क्यों निकलता है कहानी हमें प्रेमचंद की 'कफन' की याद दिलाती है। इन दोनों कहानियों में अंतर सिर्फ देश काल परिवेश का है लेकिन विषय और कथ्य में एक समानता है। कफन में घीसू-माधव बाप-बेटे हैं तो इस कहानी में जेम्ज-पीटर है भाई-भाई। इस कहानी के पात्र यू.एस.ए. के है। उसके हिसाब से कहानी में परिवर्तन भी काफी है। घीसू और माधव से भी जेम्ज और पीटर बहुत आलसी है। यह दोनों कुछ भी काम करना अपने स्वाभिमान के खिलाफ़ समझते है। इन्हें अपनी कुछ भी फिक्र नहीं है क्योंकि सरकार इन्हें मुफ्त में खाना देती है और वे रात मे शैल्टर होम में सोने का इंतजाम कर लेते है। जेम्ज और पीटर को यह जन्म जात अधिकार में मिला हुआ गुण है। सरकार से प्राप्त कूपन को भी दोनों किसी प्रकार से बचा कर कुछ पैसों में बेच देते है। और उस पैसों से शराब पीकर रात भर पड़े रहते है। यह कहानी हमें अमेरिका के उस सच को भी पाठक के सामने प्रस्तुत करती है जिसके संदर्भ में सामान्य भारतीय सोचते रहते है कि अमेरिका बहुत प्रगत है, वहा सभी लोग अमीर है, वहा कोई गरीब नहीं है, वहा सभी काम करने वाले रहते है। इस कहानी को पढ़ने के बाद हमारा उस कल्पित चकाचौंध से मोहभंग हो जाता है। यह कहानी समाज के एक यथार्थ को पाठक सम्मुख प्रस्तुत करती है।

डॉ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी की कहानी अवैध नगरी में पुरू नामक पात्र के माध्यम से लेखिकाने मानवीय रिश्तों के तथा विज्ञान के द्वंद्व को दर्शाया है। यह कहानी विज्ञान के उस वरदान पर दृष्टिक्षेप करती है जिसकी वजह से कुछ महिलाएँ मातृत्व सुख को पाप्त कर पाई है। यह कहानी उस पीड़ा का भी चित्रण करती है जिससे होकर स्त्री को गुजरना होता है। यह कहानी उस पक्ष पर भी पाठक को सोचने पर मजबूर करती है जिससे होकर पुरुष गुजर रहा है। हालाकि अंत में सब दोष स्त्री के ही मथ्य मढ़ती नजर आती यह कहानी पुरानपंथी सोच की पुराणवृत्ती नजर आती है। पुरू इस कहानी का पात्र है जिसको लगता है कि उसके माँ ने उसे टेस्ट ट्यूब बेबी के माध्यम से जन्म देकर कोई बड़ा गुनाह कर दिया है। पुरू को आज तीस बरस हो गये है उसका जन्म टेस्ट ट्यूब बेबी के माध्यम से हुआ था। इस सच का पता उसे आज चला है। जब से उसे यह पता चला है तब से उसके मन में एक द्वंद्व उठ खड़ा हुआ है। पुरू व्यवसाय से वैज्ञानिक है लेकिन फिर भी उसकी मानसिकता परम्परावादी है। वह प्रगत विज्ञान के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहता है, “कोई भी बाँझ माँ बन सकती है। कोई भी बेऔलाद औलाद वाला। क्या करिश्मा है साइंस का। प्रकृति के पेट में गंडासे घुसेड़ो और जो चाहे निकाल लो। न परम्परा, न धर्म। न पुश्तैनी रक्त, न रिश्ते की पावनता कुछ भी तो नहीं चाहिए। कहाँ गई वह जायज-नाजायज की परिपाटी, पवित्र अपिवत्रता के समझोते या वैध-अवैध संतान की मान्यताएँ। स्कूल में पिता के नाम के बिना दाखिला नहीं। नाजायज गर्भवती का समाज में स्थान नहीं और आज वही किसी का भी स्पर्म खरीद कर वैध माँ बन सकती है। अब उसे किसी वंचना की अपेक्षा नहीं। ” जब उसका भी जन्म इसी से हुआ है यह जानने के बाद उसकी बेचैनी और बढ़ जाती है। वह अब अपने माँ को माँ भी कहने से हिचकिचा रहा है। वह पाप-पुण्य के मायावी जाल में फसता जा रहा है। जिससे उसका द्वंद्व तब और गहरा हो जाता है। लेखिका ने पुरू नामक पात्र के माध्यम से समाज में व्याप्त एक मानसिकता को दर्शाया है। यह एक विरोधाभासी दुनिया का सत्य है। विज्ञान ने कितनी भी प्रगती कर ली हो लेकिन आज भी हम अपनी परम्पराओं, मान्यताओं, पाप-पुण्य के चक्र में फसे हुए है। और अतं में वही भारतीय परम्परा वाला रोना रोते हुए पुरू कहता है, “मैं आज विज्ञान के इन कृत्रिम अविष्कारों और परिणामों को लानत भेजता हूँ। आने वाली अवैध पीढ़ी पर थूकता हूँ। मुझे मेरा पिता चाहिए, मुझे मेरी पहचान चाहिए। मैं कैसे जानू! माँ तुम बताओगी या मैं लेबोरटरी में बैठ कर एक एक स्पर्म-क्रम की तह तक जाकर उसे ढूँढू और स्वयं पाऊँ, नहीं तो मैं अपने मनोशास्त्र में अवैध ही रहूँगा। किस पिता को अग्नि-दाह देने का अधिकार मुझे मिल पाएगा!” इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने एक भारतीय मानसिकता का चित्रण हमारे सामने रखा है। भले ही हम कितने भी प्रगत क्यों न हो जाय लेकिन हमारे सोच में कहीं न कहीं परम्परा, रूढ़ि, मान्यताओं, पाप-पुण्य का द्वंद्व हमेशा रहता आया है और यह कहानी उसे बखुबी उजागर करती है।
इला प्रसाद की कहानी कोई बड़ा लक्ष्य लेकर नहीं लिखी गई है। उनमें एक सामान्य घटना को लेकर अपने रचना कौशल्य के साथ प्रस्तुत करने का हुनर बस लगती है। आवाजों की दुनिया, ईमेल, मुआवजा, रोड टेस्ट, आदि कहानियों का कथ्य इतना दमदार नहीं है कि पाठक पर कोई प्रभाव छोड़ सके। हाँ लेकिन कहानी पाठक को आपने में कुछ हद तक बांधने में कामियाब होती है। एक अधूरी प्रेमकथा सबसे अच्छी कहानी है जो अपने रचना विधान को सार्थकता प्रदान करती है। इस कहानी में लेखिका ने निमिषा के माध्यम से प्रेम के रिश्तों का चित्रण किया है। निमिषा मात्र अपने प्रेमी को इसलिए खो देती है कि वह कुँवारी माता की संतान है। प्रेम के इस रिश्तें में कितना कुछ दाव पर लग जाता है। प्रेम में मनुष्य कितना एक दूसरे के करीब आता है। एक दूसरे से मिलना, घंटो बातें करना आदि का चित्रण निमिषा के माध्यम से हुआ ही है। लेकिन प्रेम का अंत जो परम्परा से चलता आया है वहीं इस कहानी में भी होता है। भले ही कारणों की भिन्नता है। लेकिन बिछड़ना आज भी है और शायद यही प्रेम का आखरी पड़ाव हो। इसे यह कहानी दर्शाती है। ईमेल कहानी के माध्यम से लेखिका ने यह बताया है कि आपनो से दूर विदेश में या दूसरे शहरों में रहने वाले लोंग ईमेल के माध्यम से सम्पर्क में रहते है। लेकिन इस आधुनिक तंत्रज्ञान ने हमें आपस में जोड़ने भी आसानी कर दी हो लेकिन कभी कभी हम पहचान में गलती कर देते है और दूसरों से अपना समझ कर बातें करते रहते है। अनु इस कहानी की मुख्य पात्र है जो लेखिका है। वह विदेश में रहती है और ईमेल के माध्यम से अपनों से जुड़ी रहती है। कहानी का कथ्य बेजान सा लगता है लेकिन विषय महत्त्वपूर्ण है। मुआवजा कहानी अमेरिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कटाक्ष करती है।

प्रवासी लेखकों के विषय में यह कहा जाता है कि वे अतीत की यादों के शिकार होते हैं। लेकिन क्या यह बात अपने देश में रहकर लेखन करने वाला रचनाकार अपने अतीत से मुक्त होता है ? यह भी उतना ही बड़ा प्रश्न है। अनेक वर्ष पूर्व महानगरों में आकर जीवन व्यतीत करने वाला एक संवेदनशील लेखक अपने गाँव-गली, कस्बे-मोहल्ले, नगर, लोगों को कैसे भुला सकता। वहां का परिवेश, वातावरण उसकी साँसों में रचा-बसा होता है और किसी न किसी रूप में उसकी सृजनात्मकता का अहम हिस्सा बनता है। अनिल प्रभा कुमार की कुछ कहानियों के संदर्भ में भी यह सच उतना की कारगर है, जितना अन्य रचनाकारों के बारे में। अनिल प्रभा कुमार की कहानियों का विषय प्रभावशाली रूप में चित्रित हुआ है। उनका शिल्प उसे और अधिक प्रभावोत्पादक बनाता है। उनके पात्र पाठक के दिलो-दिमाग में विचलन पैदा करते हैं और उसके अंतर्मन को सिक्त कर एक अमिट छाप छोड़ते हैं। उसका इंतजार, घर, दिवाली की शाम, फिर से, बरसों बाद, बहता पानी, मैं रमा नहीं आदि कुछ ऐसी ही कहानियाँ है। फिर से कहानी पारिवारिक विघटन को व्याख्यायित करती है। यह कहानी केशी और तिया की है। केशी सेना में युद्धभूमि में था तब तिया उसकी अनुपस्थिति में उसकी मान मर्यादाओं की सीमाएँ तोड़ती है और अवैध संबंध बना लेती है। लेकिन जब केशी को यह पता चलता है तब भी वह बच्चों की खातिर उसके साथ रहने को तैयार हो जाता है, लेकिन तिया को उसका उपकार नहीं चाहिए था। इसी वजह से दोनों अलग हो जाते हैं। केशी बच्चों को लेकर अमेरिका जा बसता है। तिया की अपने बच्चों के प्रति प्रेम को लेखिका ने अंत में दर्शाया है। जब तिया बच्चों से मिलने अमेरिका पहुँचती है उस क्षण को बहुत ही मार्मिकता से लेखिका ने कहानी में चित्रित किया है। लेकिन वहाँ केशी और तिया के दिल पुनः मिलकर भी दोनों के अहं टकराते हैं और केशी बेटी संजना के घर से जाने का निर्णय कर लेता है। उस क्षण को कहानी में जिस प्रकार लेखिका ने बिम्बायित किया है वह आकर्षक है, “खाली कमरे के बीचों-बीच खड़े वह बाढ़ में सब-कुछ जल-ग्रस्त हो जाने के बाद खड़े एकाकी पेड़ जैसे लग रहे थे। नितांत अकेला, उदास वृक्ष। प्रकृति जैसे उसे पीटने के बाद, रहम खाकर, जिन्दा रहने के लिए छोड़ गई हो।” इस कहानी का परिवेश अलग है लेकिन वहाँ पर भी रिश्तों की पवित्रता है यह दर्शाना लेखिका का उद्देश्य लगता है। जिस समाज के बारें में हम अवैध-वैध से परे सोचते है, उस समाज का एक अलग चित्रण यह कहानी करती है।

बरसों बाद कहानी दो सहेलियों की मिलन गाथा है, जो तीस वर्षों के बाद मिल रही हैं। अपनी बेटी के प्रसव के लिए अमेरिका पहुँची सहेली, जिसका पति प्रोफेसर था, अपनी पीड़ा जब इन शब्दों में बयान करती है, “नौकरी करती रही न! ऊपर से बीमारियों-तनाव की वजह से। एहसास बस कौरव महारथियों के बीच अभिमन्यु के घिर जाने जैसा। यूँ ही घर-गृहस्थी के रोज-रोज के ताने, व्यंग्य, आरोप। मुझे लगता है कि जैसे मैं दुनिया की सबसे बुरी औरत हूँ। ” वह बात करते हुए काँप रही थी। वह पढ़ी-लिखी नौकरी पेशा है तो क्या हुआ, है तो एक आम भारतीय नारी ही। स्त्री की स्थिति का वास्तविक आख्यान करती यह कहानी कितने ही विचारणीय प्रश्न पाठक के मन में उत्पन्न करती है। दीपावली की शाम एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसके पास अपार संपत्ति है, लेकिन घर का बड़ा लड़का कुबेर चवालीस साल का, छोटा लट्टू छत्तीस का और लड़की मौनिका बयालीस साल की लेकिन तीनों में कोई भी विवाहित नहीं। जिसकी वजह से घर में कोई बच्चा नहीं है जिसकी किलकारियों से खालीपण दूर हो जाए। घर का स्वामी मायादास अपने घर की तुलना ताजमहल से करता नहीं अघाता लेकिन उसी ताजमहल में दीपावली के दिन सन्नाटा उसे परेशान अवश्य करता है। उसे घर में का यह अलगाव का वातावरण जिसमें न कहीं रोशनी है न उत्साह। अपनी परेशानी को गृहस्वामी यह कहकर छुपाता है, “अगली दीपावली हिंदुस्तान में मनाएँगे। सभी जाएँगे। बस, पास रोकड़ा होना चाहिए।” इस कहानी के पात्र के नाम ही बहुत कुछ दर्शाते है।

उपरोक्त सभी कहानियों को देखने के पश्चात यहीं कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानियाँ अपने रचना विधान में एक अलग विषयवस्तु पाठक को परोसती है। लेकिन भाषा का हलकापन कहानियों के कथ्य को उतना असरदार नहीं बनाता, जितना कहानी का विषय मांग करता है। लेकिन इन कहानियों का परिवेश हिन्दी पाठकों के लिए नया है। जिसकी वजह से पाठक के मन पर यह कहानियाँ प्रभाव डालती है।

संदर्भ
[1] वर्धा हिन्दी शब्दकोश-सॉफ्टवेयर संस्करण
[2] डॉ.कमल किशोर गोयनका, ‘भूमिका शब्दयोग, अप्रैल 2008’, पृष्ठ 6-7


2 comments :

  1. अच्छा आलेख है। बधाई ।

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  2. बहुत अच्छा आलेख । बधाई ।

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