निराला की सामाजिक चेतना

- लया एन. 

पांडिचेरी विश्वविद्यालय - layasasidharan93@gmail.com

साहित्य का सम्बन्ध समाज से होता है। इसी को परिलक्षित करते हुए कहा जाता है कि साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होता है। भरतमुनि ने भी नाटक के परिप्रेक्ष्य में कहा है - ‘लोकावृत्तानुकरणम् नाट्यमेतनमया कृतम्’। साहित्य मानव चेतना के एक विशिष्ट उपलब्धि है और सामाजिक सदर्भो से जुड़ा होता है। साहित्य के इस प्रकृति को देखकर ही शायद हमारे प्राचीन विद्वान नाटक के प्रेक्षक को ‘सामाजिक’ कहा गया होगा। “साहित्य में मनुष्य का जीवन का प्रवाह प्रतिलक्षित होता है। साहित्य स्वयं इस प्रवाह और मनुष्य की क्रमशः विस्तारित होती हुई चेतना का परिणाम है। कई अर्थों में वह इस प्रवाह की दिशा और गति को भी प्रभावित करता है। साहित्य में नीहित स्थितियों की व्याख्या और मूल्यांकन केवल सौंदर्य और रसानुभूति के क्षेत्र तक सीमित नहीं होते, उनका सामाजिक अर्थ और प्रभाव बड़ा व्यापक होता है। साहित्य मनुष्य की स्वयं चेतना और जीवन-चेतना में जन्म लेता है।”
 फ्रंचेस्का आर्सिनी ने निराला के विषय में लिखा है, “ ‘छायावाद’ के सबसे अधिक प्रयोगात्मक और विस्तृत कवि, और मौलिक रेखाचित्रों, कहानियों, तथा लघु उपन्यासों के लेखक ‘निराला’ को अब इस शताब्दी के सबसे अग्रणी हिंदी साहित्यकारों में गिना जाता है।” आधुनिक काल में साहित्य के सर्वाधिक विस्तृत चेतना संपन्न साहित्यकार निराला जी हैं। निराला साहित्य सामाजिक प्रश्नों से हमेशा दो-चार करता रहा है। इसी कारण आधुनिक साहित्य के सर्वाधिक विवादित, संघर्ष के प्रतीक और वर्तमान के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक कविताकार और गद्यकार निराला जी ही हैं। भारतेंदु के साहित्य में जिस जनवाद का बीज दिखाई पड़ता है वह निराला में विशाल वृक्ष बन जाता है। निराला का जीवन संघर्ष दोहरे स्तर पर रहा है- सामाजिक और व्यक्तिगत दोनों रूपों से। ‘दुःख ही जीवन की कथा रही’ पंक्ति निराला के सम्पूर्ण जीवन-संघर्ष का निचोड़ है। निराला जी के साहित्यिक-चिंतन का दायरा  अतिविस्तृत था। छायावादी काल के अंतर्गत जहाँ छायावादी-भावबोध से युक्त कविताये लिखे वही ‘बादल-राग’ जैसा यथार्थवादी काव्य भी लिखे। प्रगतिवादी भले ही चिल्लाये कि वे प्रगतिशील विचारधारा के हैं परन्तु निराला जैसी खरी प्रगतिशीलता उनमें नहीं है। निराला की प्रगतिशीलता मार्क्स के पढ़कर नहीं विकसित हुई है वह सौ आने हिंदी समाज से उनके जुड़ाव और व्यक्तिगत संघर्ष से अनुप्राणित है न कि पन्त जैसे सैद्धांतिक अनुवाद मात्र। इसीलिए उनके साहित्य में स्वाभाविक व्यंग्य का तीखापन है। “प्रगतिशील चेतना से व्याप्त उनका कथा साहित्य एक ओर जहाँ उन्हें सामाजिक भूमिकाओं की सतहों को भेदने वाली दृष्टि देता है । वहीं अन्य काव्यरूपों में उनके प्रखर पांडित्य, कलामर्मज्ञता तथा गहरी सूझ-बूझ का पता चलता है । निराला की बौद्धिकता अतिशयता थी । प्रखर कल्पना शक्ति को उन्होंने बौद्धिकता का सबल आधार दिया था।”

निराला साहित्य सामाजिक चेतना से संपन्न है। उनके साहित्य में सामाजिक विसंगितियों से हमेशा संघर्ष किया है। सही मायने में निराला साहित्य नवजागरण का प्रतीक है। कबीर के बाद अगर किसी साहित्य में प्रतिरोध का स्वर विद्यमान दिखाई पड़ता है तो निराला के ही साहित्य में। निराला की सबसे बड़ी विशेषता लेखन और जीवन के प्रति अद्वैत स्थापित करना है। निराला ने केवल लिखा ही नहीं है बल्कि उसको जिया भी है। इसी से डॉ शिवगोपाल मिश्र बताते हैं, “कान्यकुब्ज कुल में मांसाहार तथा शराब पीना वैध है । निराला खुलकर मांस तथा मद्य का प्रयोग करते । जो लोग चिढ़ते उन्हें चिढ़ाने के लिए मांस-मद्य का प्रयोग अवश्य करते ।”
 निराला ने सामाजिक विसंगितियों पर जमकर प्रहार किया है। सामाजिक शोषण का पर्दाफास करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। ‘तोड़ती पत्थर’ नामक कविता में सत्ताधारी वर्ग और सामान्य श्रमशील जनता का  प्रतीक महिला का खीचा गया चित्र अत्यंत ही प्रभावशाली है और समाज के यथार्थ स्थिति को सामने रख देती है –
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार,
श्याम तन, भरा बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत-मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार :-
सामने तरु मलिका अट्टालिका, प्राकार।”
निराला इसी तरह अपनी प्रसिद्ध लम्बी कविता ‘कुकुरमुत्ता’ में पूंजीवादी शोषक और सर्वहारा सामान्य जन के शोषित चरित्र का उद्घाटन करते हैं –
“अबे, सुन, बे, गुलाब,
भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतराता है केपिटलिस्ट!
कितनों को तूने बनाया है गुलाम,”
निराला ने सामाजिक शासकों के चरित्र का पर्दाफाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। वे लिखते हैं- , “समाज जब तक गतिशील है सृष्टि के नियमों में बंधा हुआ है, तब तक वह निष्कलुष नहीं, कारण वही सृष्टि सदोष है । परंतु चुँकि समाज निर्मलत्व की ओर गतिशील है, इसीलिए उसके अंगो से हर तरह की कलुष निकालने की चेष्टाएँ की गई । इसीलिए समाज शासकों ने अनेकानेक विधानों द्वारा उसे बचाने का प्रयत्न किया।”
“साहित्य समाज के दर्पण मात्र नहीं होता। उसमें समाज की परंपरा, जीवन दृष्टि और दर्शन, तथा समसामयिक यथार्थ और विसंगतियों के चित्रण के साथ भविष्य का पूर्वाभास और दिशा संकेत भी होता है।”  निराला ने परंपरा का अनुकरण किया पर अंधानुकरण नहीं। अन्धानुकरण इसलिए नहीं कि उन्होंने विसंगतियों का पहचाना है और उसको दूर करने का मार्ग भी चेताया है। चेतनाशील रचनाकार की गतिमयता इसी में है कि वह समाज को गतिशील करे, न कि उसी चौराहे पर छोड़ दे जहाँ उसको रास्ता न मिले। निराला ने ‘तुलसीदास’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ के माध्यम से मिथकीय चेतना का नवसंदर्भ और नवदृष्टि देकर आधुनिक दर्शन की पीठिका तैयार की और समाज की चेतना को गतिशील किया।
निराला समाज के रुढ़िवादी मानसिकता के जर्जर मनोवृत्ति से परिचित थे। भारतीय जनमानस के वर्णवादी कमजोरी की ओर इशारा करते हैं, “ब्राह्मणों को तो गालियाँ सभी देते हैं, पर ब्राह्मण बनने का इरादा कोई भी नवीन संगठित जाति नहीं छोड़ती । इस तरह ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा बढ़ती ही जाती है । लोगों में जैसे ब्राह्मणत्व का लालच बढ़ गया हो ।”  ग्रामीण जीवन की रूढ़ियों एवं परंपरा की संकुचित नज़रिए को ये बिल्लेसुर बकरिहा में चुनौती देते हैं । और इस मनोवृत्ति की तोड़ते भी हैं । जो काम कान्यकुब्जों ब्राह्मणों के लिए निषिद्ध और घृणित था । उसे बिल्लेसुर से करवाके वे गाँव के लोगों की संकुचित जीवन-प्रणाली को मिटाना चाहते हैं जो कि मानवीयता पूर्ण निराला की मूल्य दृष्टि को बताती है । जाति-पाँति संबंधी व्यवस्था को वे अपने उपन्यास कुल्ली में कुल्लीभाट के द्वारा व्यक्त करते हैं । जिसमें कुल्ली निम्न वर्ग के लड़कों को शिक्षा देने का कार्य शुरु करता है । उस दृश्य का वर्णन करते हुए निराला कहते हैं , “गड़हे किनारे ऊँची जगह पर मकान के सामने एक चौकोर जगह है, कुछ पेड़ हैं... । उस पर अछूत लड़के श्रद्धा की मूर्ति बने बैठे हैं... ये पुश्त दर पुश्त से सम्मान देकर नतमस्तक ही संसार से चले गए हैं । संसार की सभ्यता में इनका स्थान नहीं है । ये नहीं कह सकते, हमारे पूर्व कश्यप, भारद्वाज, कपिल, कणाद थे, रामायण महाभारत इनकी कृत्तियाँ हैं; अर्थशास्त्र, कामसूत्र इन्होंने लिखे हैं; अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज इनके वंश हैं । फिर भी ये थे और हैं... समाज का सारा विरोध सहकर कुल्ली ने जो किया है वही निराला की दृष्टि में उन्हें एक तेजस्वी नायक का गौरव देता है।” 

निराला ने शोषित और अधिकार वंचित आधी आबादी के समाज के संघर्ष को भी अपने उपन्यासों में वाणी दी है। उनकी उपन्यासों के विषय में रामखेलावन चौधरी ने लिखा है , “निराला के तीनों उपन्यासों की कथाएँ नारी जीवन के संघर्ष से संबंध रखती हैं । अप्सरा में वेश्या पुत्री कनक को अपने जन्म से संबंधित परिस्थितियों के विरूद्ध संघर्ष करना पड़ता है... अलका में निराश्रिता शोभा गाँव में जमींदार के कुचक्र का शिकार हो जाती है... निरुपमा में एक कोमलांगी सुशिक्षिका और सच्चरित्रा बंगाली बाला की कथा है, जो घर के भीतर ही अपने मामा और भाई के कुचक्र एवं षड्यंत्र का शिकार हो जाती है... उपर्युक्त घटनाओं पर दृष्टिपात करने से निराला पर दो प्रभाव स्पष्ट दिखलाई पड़ते हैं – एक है बंगला के यशस्वी लेखक शरतचंद्र जी का और दूसरा है हिंदी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी का ।”

‘ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ की स्थिति में रहने वाले निराला जी को सामाजिक बन्धन स्वीकार नहीं था। इसी कारण उनको ब्राह्मण समाज के दंश को झेलना पड़ा। इसी को देखते हुए उनके विषय में लिखा गया है, “वे अपने को आउटड्रॉप समझते थे– मैं बाहर कर दिया गया हूँ, भीतर भर दिया हूँ, वे चाहते तो बड़े मजे से पुरोहित वर्ग का अंग बनकर या शासक वर्ग की सेवा करते हुए सुख के साथ जी सकते थे। लेकिन उन्होंने जो रास्ता चुना, वह उन्हें इसी दशा तक पहुँचा सकता था– ‘ब्राह्मण समाज ज्यों अछूत’।”

निराला ने समाज में व्याप्त जाती-प्रथा के सन्दर्भ में अपने निबंध ‘वर्णाश्रम धर्म की वर्तमान स्थिति’ शीर्षक में लिखा  है: “ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने घर में ऐंठने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य रह गये। बाहरी प्रतिघातों ने भारतवर्ष के उस समाज-शरीर को, उसके उस व्यक्तित्व को, समूल नष्ट कर दिया; ब्रह्म – दृष्टि से उसका अस्तित्व ही न रह गया। भारतवर्ष की तमाम सामाजिक शक्तियों का यह एकीकरण-काल शूद्रों और अन्त्यजों के उठने का प्रभातकाल है। प्रकृति की यह कैसी विचित्र क्रिया है, जिसने युगों तक शूद्रों से अपर तीन वर्णों की सेवा करायी और एस तरह उनमें एक अदम्य शक्ति का प्रवाह भरा, और अब अनेकानेक विवर्तनों से गुजरती हुई, उठने के लिए उन्हें एक विचित्र ढंग से मौका दिया है, भारतवर्ष का यह युग शूद्र-शक्ति के उत्थान का युग है। और देश का पुनरुद्धार उन्हीं के जागरण की प्रतीक्षा कर रहा है।”

निराला का साहित्य जीवित और जीवंत साहित्य है। निराला का साहित्य प्रेमचंद की इस उक्ति पर बिलकुल खरा उतरता है-“हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन का आत्मा हो, जीवन की सचायियों का प्रकाश हो – जो हममें गति और बेचैनी पैदा करो, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।”

संदर्भ:
i - परंपरा, इतिहास बोध और संस्कृति, श्याम चरण दुबे, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि.,2014,पेज 150
ii - हिंदी का लोकवृत्त , फ्रंचेस्का आर्सिनी, अनु. नीलाभ ,वाणी प्रकाशन,2011, पृ.सं.175
iii - प्रसाद निराला और पंत (छायावदा और उसकी वृहत्रयी),विजय बहादुर सिंह, स्वराज प्रकाशन दिल्ली, संस्करण- 2002, पृ.सं.- 12
iv - ऐसे थे हमारे निराला, डॉ. शिवगोपाल मिश्र, तक्षशिला प्रकाशन दरियागंज नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2002, पृ. सं.-75
v -रागविराग, सं रामविलास शर्मा, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2012, पे. 118
vi - रागविराग, सं रामविलास शर्मा, लोकभारती प्रकाशन, संस्करण 2012, पे. 145
vii - निराला संचयिता, सं., रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2001, पृ.स.-324
viii - परंपरा, इतिहास बोध और संस्कृति, श्याम चरण दुबे, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि.,2014,पेज 155
ix - निराला संचयिता, सं., रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2001, पृ.सं.- 319
x - निराला एक पुनर्मूल्यांकन, सं. ए.अरविंदाक्षन, आधार प्रकाशन पंचकूला हरियाणा, प्रथम संस्करण -2006, पृ.सं.- 17
xi - कथा -शिल्पी : निराला, डॉ. बलदेव प्रसाद मेहरोत्रा, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1984, पृ.सं.- 54
xii -निराला एक पुनर्मूल्यांकन, सं. ए.अरविंदाक्षन, आधार प्रकाशन पंचकूला हरियाणा, प्रथम संस्करण -2006, पृ.सं.-152
xiii -निराला रचनावली-6  : सं. नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन,2006,पृ.सं.-16
xiv - प्रेमचंद, कुछ विचार – प्रेमचंद, लोकभारती संस्करण : 2013, पुनर्मुद्रण : 2015 पे.  24-25

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