सम्पादकीय - पतझड़ के दिन

हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार कुँवर नारायण के इस माह हुए देहांत के साथ आधुनिक हिंदी कविता के एक युग का अंत हो गया है। हमारी विनम्र श्रद्धांजलि! यह समय एक अन्य कवि को स्मरण करने का भी है। आठ दशक पहले, 15 नवम्बर, 1937 को महाकवि जयशंकर प्रसाद का देहावसान हुआ था। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर सेतु परिवार उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।

पतझड़ में पत्ते गिरैं, मन आकुल हो जाय।
गिरा हुआ पत्ता कभी, फिर वापस ना आय।।

फिर वापस ना आय, पवन चलै चाहे जितनी ।
बात बहुत है बड़ी, लगै चाहे छोटी कितनी ।।

अंधड़ चलै, तूफ़ान मचायै कितनी भगदड़।
आवेगा वसन्त पुनः, जावैगा पतझड़।।

उत्तरी गोलार्ध में पतझड़ का समय है। वृक्षों के पत्ते गिर रहे हैं, यानि उनके वस-अंत का समय है। पिट्सबर्ग में ठंडी हवाएँ चल रही हैं। पतझड़ का यह समय पत्तों के बदलते विभिन्न रंगों के योग से गज़ब की सुंदरता उत्पन्न करता है और बदलती ऋतुओं के जीवन चक्र के बहाने हमारे मन में आशा का संचार भी करता है।
  
सेतु के प्रकाशन के आरम्भ में ही सेतु के सम्पादनमण्डल ने प्रतिवर्ष हिंदी और अंग्रेज़ी भाषाओं के कुल चार प्रतिनिधियों को उनके योगदान के लिये सम्मानित करने का निर्णय लिया था। सन 2017 के लिये सेतु पाठकों के परिचित लेखकों सर्वश्री स्कॉट टॉमस ऑउटलार, रॉब हार्ले, तथा अत्रेय शर्मा उप्पलूरी के साथ-साथ हिंदी के ख्यातिनाम लेखक से. रा. यात्री जी को सेतु सम्मान प्रदान करने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के लिये स्वीकृति देने हेतु मैं इन चारों गुणीजनों का सेतु सम्पादन मण्डल की ओर से आभारी हूँ।

शुभकामनाओं सहित,
अनुराग शर्मा

1 comment :

  1. आप का सम्पादकीय मेँ वसन्त कख नया अर्थ मिला
    आर्थात बस अन्त । अँगरेजी और हिन्दी के साहित्यकारोँ को पुरस्कृत करने की योजना प्रशँसनीय है । से रा यात्री मेरे मित्र हैँ ।

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