काव्य: आभा आयंगर

आभा आयंगर एक प्रकाशित कवयित्री और लेखिका हैं। अंग्रेजी में उनकी पाँच किताबें प्रकाशित हुई हैं। कभी कभी वे हिंदी में कवितायें लिखने का प्रयास करती हैं।

तुम मुझे बाँध नहीं सकते

तुम मुझे बाँध नहीं सकते
किसी एक मज़हब के साथ, किसी एक रिश्ते में,
किसी एक खूँटे के साथ, मेरे गले में फंदा मत डालो
कभी हवाओं को बांधने की कोशिश की है?
तो जानते होगे कितने लाचार हुए थे तुम
मैं तो हवा ही हूँ, पत्तों को झिंझोड़ती हूँ,
बालों को सँवारती हूँ, रेत को खिसकाती हूँ,
इधर से उधर। मेरा कोई ठिकाना नहीं, और यह भी
मालूम नहीं मैं कब गायब हो जाऊं
तुम्हारी ज़िन्दगी से। मेरे स्पर्श ओ महसूस करो,
मुझे स्वीकार करो, जिस तरह मैं हूँ। मैं बकरी नहीं,
खूंटे से बाँध नहीं पाओगे, मेरा गला
काट नहीं पाओगे, मेरी बलि नहीं कर पाओगे तुम।
नहीं, औरत हूँ मैं, मुझे इसी रूप में स्वीकार करो,
एक हवा का झोंका जो तुम्हारी ज़िन्दगी को निखारने आया है
कुछ समय के लिए, बस यही सच है, और कुछ नहीं ।


2. ज़िन्दगी क्या चाहती है

आखिर बात यहीं आकर कुछ ऐसे ही रुक जाती है
ज़िन्दगी क्या चाहती है ना जाने क्यों तरसाती है

तृप्ति पायी किसी ने नहीं जो भी धरती पे आया है
झूंझता हमेशा इस उलझन से, क्या अपना क्या पराया है
सांस को अपनी जान लो, इतना ही काफी है लेकिन
सांस को उसने कभी नहीं किसी मूल्य का पाया है
जी रहा है आदमी हर रोज कुश्ती करते हुए
किस के सर पर चढ़ दूर जा सकता है सोचते हुए
गाडी, बँगला, जेवरात सब जीवन में भरता है लेकिन
सांस जब देह से निकलती है तब ही वह समझता है
यही सांस थी जिसका लेना वह अब तक व्यर्थ समझता था
जब मौत से लड़ता है, तब वह साँसों का मूल्य समझता है

3. समय

व्यस्त हैं फिर भी समय धीमा सा है
न जाने किस खबर का इंतज़ार सा है
आस्मां भी बादलों से झुक रहा है
शायद कुछ बूंदों का इंतज़ार सा है
हाथों में छुरी सब्ज़ी काटने को है
 किस  सीने का इंतज़ार सा है
आँखों की नमी कुछ कहने को तैयार नहीं है
साँसों की दौड़ में लेकिन इंतज़ार सा है
लगती हो तुम व्यस्त लेकिन कुछ अलग है 'अनकही';
इन मामूली घड़ियों में तुम्हें इंतज़ार सा है
सेतु, दिसम्बर 2017

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