बदलते जीवन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में गिलिगडु

वृद्धावस्था के विशेष सन्दर्भ में


निक्की कुमारी

स्नातकोत्तर- हिन्दी, नेट जेराफ एमफिल;
'छिन्नमता' और 'नर नारी' में स्त्री चेतना का तुलनात्मक अध्ययन
पीएच.डी हिन्दी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

“बूढ़ों के साथ लोग कहाँ तक वफ़ा करें
बूढ़ों को भी जो मौत न आए तो क्या करें।”1
                                                         अकबर इलाहाबादी
  
आजादी के बाद के भारतीय समाज के विकास की जब हम बात करते हैं तो एक स्तर पर बाजारवाद और उदारीकरण हमें कहीं मनुष्य के हित की बात लगती है। एक सभ्य समाज में मनुष्य भौतिक सुखों का अधिकारी है, यह बात एक हद तक तो ठीक है लेकिन ये सारा विकास जिस मनुष्य के हित की बात करता है, वही मनुष्य जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर उपेक्षित और असहाय होकर रह जाता है। वैज्ञानिक प्रगति के साथ जहाँ मानव की औसत आयु बढ़ती जा रही है, वहीं बुढ़ापे की समस्याएँ भी बढ़ रही है। आधुनिक जगत में, औद्योगिक प्रगति के युग में वृद्धजन अपने आपको बेहद फालतू और अनुपयोगी समझता हुआ घोर एकाकीपन तथा उपेक्षा का शिकार होते जा रहे हैं। जबकि सही मायने में उम्र बढऩे का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं है, बल्कि समाज और देश के लिए अधिक उपयोगी बनकर सार्थक और जीवंत जीवन जीना है। आज हमारी चिंता का विषय विशाल वृद्ध जन समुदाय के जीवन को सुखमय बनाने से संबंधित है–चाहे वे स्त्री हों या पुरुष।

नारी-अस्मिता और मानवीय विकास से जुड़े मसलों पर अपने रचनात्मक लेखन और सांस्कृतिक सहभागिता निभाने वाले लोगों में हिन्दी की नामचीन लेखिका चित्रा मुद्गल का नाम अग्रगण्य है। इन्होंने अपने उपन्यास ‘आवां’, ‘एक जमीन अपनी’, और ‘गिलिगडु’ के माध्यम से विशेषत: स्त्री विमर्श और उपेक्षित बुजुर्गों की समस्या को उजागर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में वृद्धों की समस्या को केंद्र में रखकर पर्याप्त साहित्य सृजन हो रहा है और इसी कड़ी में चित्रा मुद्गल द्वारा लिखित उपन्यास ‘गिलिगडु’(2000) केंद्र में आया। इसमें बुढ़ापे का दर्द, घर में उपेक्षित व्यवहार तथा दर-दर की ठोकरें खाते घर से बाहर निकाले गए वृद्धों के जीवन की व्यथा को चित्रित किया गया है। यह आकार में छोटा लेकिन संवेदनशीलता का अथाह भंडार है। इसमें तेरह दिन की कहानी के माध्यम से उपन्यास के मुख्य पात्र सेवानिवृत्त सिविल इंजीनियर बाबू जसवंत सिंह व सेवानिवृत्त कर्नल स्वामी (विषनू नारायण स्वामी) के जीवन का पूरा खाका ही नहीं अपितु आज के बदलते जीवन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में घर व परिवार में बुजुर्गों की वास्तविक स्थिति का चित्रण बड़ी बेबाकी से हुआ है। इस उपन्यास में प्रमुख रूप से संयुक्त परिवार का बिखराव, परिवार में बुजुर्गों की भूमिका और वर्तमान पारिवारिक माहौल में उनकी वास्तविक स्थिति को कई प्रसंगों के माध्यम से उजागर किया गया है।

‘गिलिगडु’ का शाब्दिक अर्थ है ‘चिड़ियाँ’ है लेकिन प्रस्तुत उपन्यास में लेखिका ने ‘गिलिगडु’ शब्द का प्रयोग उपन्यास के बुजुर्ग पात्र कर्नल स्वामी की जुड़वाँ पोतियों के लिए किया है। ‘गिलिगडु’ उपन्यास की कहानी ऐसे दो बुजुर्गों की है जो घर-परिवार और आर्थिक रूप से समर्थ होते हुए भी अकेले हैं। हमारे समाज में बुजुर्गों की तीन श्रेणियाँ हैं-एक वे हैं जिनका कोई परिवार नहीं है, इसलिए अकेले रहने को अभिशप्त है, दूसरे वे जो भरा-पूरा परिवार होते हुए भी अकेले रहने को बाध्य है और तीसरे वे हैं जो परिवार में रहकर भी अकेले हैं। इस उपन्यास में तीनों तरह के पात्र मौजूद है। उपन्यास के पात्र मिस्टर और मिसेज श्रीवास्तव जिनका जिक्र उपन्यास के अंत में बहुत ही अल्प समय के लिए उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी के पड़ोसी के रूप में हुआ है, वे दोनों दम्पति इसलिए अकेले रह रहे हैं क्योंकि उनकी अपनी कोई औलाद नहीं है। लेकिन कर्नल स्वामी की स्थिति देखकर उनको इसका कोई मलाल नहीं है कि उनकी अपनी कोई औलाद नहीं है। मिसेज श्रीवास्तव कहती है- “ऐसी कसाई औलादों से तो आदमी निपूता भला। हमें इस बात का कोई गम नहीं कि हमारी कोई अपनी औलाद नहीं...।”2 वही उपन्यास के दूसरे पात्र कर्नल स्वामी जिनका भरा-पूरा परिवार है, आर्थिक रूप से समर्थ है फिर भी पत्नी की मौत के बाद निपट अकेले रहने को अभिशप्त है, हालांकि वो स्वयं इस बात को कभी किसी के सामने जाहिर नहीं होने देते हैं। इस बात का खुलासा उनकी मौत के बाद उनके पड़ोसी बाबू जसवन्त सिंह से करते हैं तभी पाठक इस बात से रूबरू हो पाते हैं। इसी तरह उपन्यास के तीसरे पात्र बाबू जसवंतसिंह है जो कि परिवार में रहते हुए भी अकेले हैं क्योंकि परिवार के लिए अब वो अतिरिक्त हो चुके हैं, उनकी कोई उपादेयता अब नहीं रही।

हमारे समाज की कितनी बड़ी त्रासदी है कि वह व्यक्ति जो जीवन भर काम करते हुए परिवार का भरण पोषण एवं नेतृत्व करता था, वृद्ध हो जाने पर तथा काम छूट जाने पर उसी के परिवार के वही लोग जो एक समय उस पर आश्रित रहते थे, अब उस पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करने से नहीं चूकते हैं। बाबू जसवंत सिंह के बेटे नरेन्द्र और बहू सुनयना का उनके प्रति व्यवहार इतना कठोर है कि वे दोनों उनका अपमान व तिरस्कार करने का कोई भी अवसर नहीं चुकते और यही कारण था कि बाबू जसवंत सिंह को कभी यह आभास नहीं होता है कि वह उनका अपना घर है। इस उपन्यास में बाबू जसवन्त सिंह के माध्यम से वृद्धावस्था में प्रवास की समस्या चित्रित हुई है, व्यक्ति समाज में रहते-रहते उससे जुड़ जाता है और जब समाज से अलग होने के बारे में सोचता भी है तो उसी क्षण उसकी सामाजिक मृत्यु हो जाती है। ऐसे में बुजुर्गों को भय रहता है कि नई जगह पर वे मानसिक और संवेदी स्तर पर किसी से कितना जुड़ पाएंगे। यही समस्या बाबू जसवंत सिंह के साथ भी थी। वे पत्नी की मृत्यु के बाद कानपुर छोड़कर दिल्ली नहीं जाना चाहते थे, लेकिन परिस्थितिवश मजबूर होकर उन्हें जाना पड़ता है। इस सन्दर्भ में लेखिका लिखती है- “दिल्ली बाबू जसवंत सिंह ने न कभी आना चाहा न आने के बाद कोई दिन गुजरा कि वे चिहुंक-चिहुंककर दिल्ली से उचाट न हुए हों।”3

आज के समय में आखिर यह कैसी विडम्बना है कि एक बाप को अपने ही घर में अपने बेटे-बहू से भय लग रहा है और वह भी इतना कि वे अपने दोस्त कर्नल स्वामी को एक कप कॉफी पर भी नहीं बुला पाते। बाबू जसवन्त सिंह को भय रहता है कि कहीं बहू सुनयना चाय-कॉफी तो दूर उनका तिरस्कार ना कर दे। “गेट के निकट पहुंचकर बाबू जसवन्त सिंह की इच्छा हुई कि अजनबी को घर चलकर एक कप कॉफी पीने का न्यौता दें। लेकिन न्यौता देने का साहस नहीं जुटा। ...कानपुर से दिल्ली आए उन्हें अरसा हो गया। घर की चौखट में दाखिल होते ही वे स्वयं को अपरिचितों की भांति प्रवेश करता हुआ अनुभव करते हैं। कैसे कहें !”4 नींबू चाय पीने वाले ससुर के सामने बिना नींबू के कत्थई चाय का गिलास रखते हुए उनसे पूछा जाता है- “दलिए का डिब्बा खाली पड़ा हुआ है। सांझ से पहले नहीं आ सकता। नाश्ते में क्या बाबूजी चीला खाना पसंद करेंगे ?”5 इस तरह बात-बात पर उपेक्षित होने पर बाबू जसवन्त सिंह को कभी भी ये नहीं लगता है कि ये उनका स्वयं का घर है। वे स्वयं की तुलना घर के कुत्ते से करते हुए कहते हैं- “इस घर में एक नहीं दो कुत्ते हैं-एक टॉमी, दूसरा अवकाश-प्राप्त सिविल इंजीनियर जसवन्त सिंह ! टॉमी की स्थिति निस्संदेह उनकी बनिस्बत मजबूत है। उसकी इच्छा-अनिच्छा की परवाह में बिछा रहता है पूरा घर। उनके लिए किसी को बिछे रहना जरूरी नहीं लगता। टॉमी अच्छी नस्ल का कुत्ता है। सोसाइटी में उनके घर का रुतबा बढ़ाता है। उनके चलते उनका रुतबा कलंकित हुआ है। कलंकित होकर अक्षत-चन्दन क्यों चढ़ाएं ?”6 बाबू जसवन्त सिंह की स्थिति देखकर लगता है कि निदा फ़ाज़ली ने ठीक ही कहा है-
‘पहले हर चीज थी अपनी,
मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी
दूसरे के घर के हम हैं।’

बुढ़ापे में व्यक्ति अकेला, निर्बल और असहाय हो जाता है। उनकी कार्य करने की क्षमता कमजोर होने के कारण अपने दैनिक कार्य व भरण पोषण के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह निर्भरता उनकी समस्या का कारण बन जाती है। बाबू जसवंत सिंह को बीमारी के चलते पायजामे में खून लग जाने पर बहू सुनयना उलाहना देते हुए कहती है- “उनके पायजामे और चड्ढी में लगे खून के धब्बे वाशिंग मशीन में नहीं छूटते। उनके बाथरूम में रिन की बट्टी रख दी गई है। कपड़े धोने डालने से पहले वे स्वयं धब्बों को तनिक रगड़ दिया करें।”7
कहते हैं कि जीवन में भरोसा बहुत बड़ी चीज होती है। अगर व्यक्ति पर अपनों का भरोसा नहीं रहता है तो वह पूरी तरह टूट जाता है और अगर अपनों का साथ हो तो व्यक्ति हर बाधा से पार पा जाता है। उपन्यास के पात्र बाबू जसवन्त सिंह को बवासीर की पुरानी शिकायत थी और पायजामा खोलकर मस्सों में हडिंसा ट्यूब लगा रहे थे तो गलती से खिड़की खुली रह जाती है, जिसके चलते पड़ौस में रहने वाली औरत को गलतफहमी होती है कि बाबू जसवन्त सिंह उनकी बेटी को देखकर पायजामा खोलते हैं, इस पर वह उनकी शिकायत उनकी बहू सुनयना से करती है। बहू सुनयना उन पर आग के गोले की तरह बरस पड़ती है– “आखिर बाबूजी इस संभ्रांत सोसायटी में उनकी इज्जत खाक में मिलाने पर क्यों उतारू हैं ? अपनी उम्र का लिहाज किया होता। अभी भी जवानी का जोश बाकी हो तो दिक्कत कैसी ? चले जाया करें रेडलाइट एरिया। कौन पेंशन कम मिलती है उन्हें मौजमस्ती में हाथ बंधे हों ? कम से कम अड़ोस-पड़ोस की किशोरियों पर तो नजर न डालें। मुंह दिखाने लायक रखें उन्हें सोसायटी में।”8 बहू सुनयना का कहा सुना तो बाबू जसवन्त सिंह कैसे-जैसे सहन कर लेते हैं लेकिन अपने बेटे नरेंद्र द्वारा रोकना-टोकना उनको बहुत चुभता है। अपने माले की लिफ्ट खुली छोड़कर भूल जाने पर जब नरेंद्र उन्हें टोकता है तो खिन्न होकर वे कहते हैं– “इस घर में बच्चों की शिकायतें नहीं आतीं। बुड्ढों की आती हैं। इस सोसाइटी के लोग शायद कभी बूढ़े नहीं होंगे। न उनकी शक्ति क्षीण होगी न स्मृति। ऐसे अजर-अमर जन्मे हैं, न कभी कोई कष्ट व्यापेगा न हारी-बीमारी।”9

वर्तमान में बुजुर्गों की स्थिति के सन्दर्भ में लेखिका क्षमा शर्मा लिखती है- “अपनों द्वारा ठुकराए जाने का जो मलाल होता है, उसका क्या कोई इलाज है ? उस अकेलेपन और अपमान के अहसास का क्या जो उनके करीबी जन उन्हें कराते हैं? वे बार-बार यह अहसास दिलाते हैं कि उनकी जरूरत अब घर में तो क्या इस धरती पर ही नहीं रही। उन्होंने जिनके लिए अपनी उम्र और अपने सारे संसाधन लगा दिए, वे ही दो जून की रोटी के लिए दुत्कारते हैं।”10

माता-पिता स्वयं के सपनों को तिलांजलि देकर अपने बच्चों का भविष्य संवारने में लगे रहते हैं यह सोचकर कि एक दिन उनके बच्चें कामयाब होकर उनके सपनों और इच्छाओं को पूरा करेंगे। इसी भाव को लेकर उपन्यास के पात्र बाबू जसवंत सिंह ने बेटे नरेंद्र द्वारा किए हुए वादे को कि अम्मा और बाबूजी को बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्रा करवायेगा को दिल में संजोकर रख रखा था– “नरेंद्र ने बहुत पहले कहा था। बाबूजी और अम्मा की बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने की इच्छा वह अवश्य पूरी करेगा। उनके बिना वह स्वयं कभी केदारनाथ दर्शन को नहीं जाएगा।”11 इसी इन्तजार में नरेंद्र की माँ का तो देहांत हो गया था और जब वह दिन आया तो नरेंद्र का फरमान सुनकर बाबू जसवंत सिंह को खुद के कानों पर विश्वास नहीं हुआ, उन्हें सुनने को मिला- “मित्रों के साथ उसका अचानक केदारनाथ जाने का कार्यक्रम बन गया है। अपनी गाड़ी से सभी मित्र सपरिवार जाएंगे। बच्चों की छुट्टी करानी होगी। उन्हें संग ले जाने का निर्णय करके भी मित्रों की सलाह उसे माननी पड़ रही। इस उम्र में उन्हें केदारनाथ ले जाना निरापद नहीं।”12

बूढों की अपनी ही दुनिया होती है जहाँ उन्हें अपनेपन का अहसास होता है, क्योंकि परिवार वालों के पास न उनके लिए समय है न ही उनकी दुनिया में उनके लिए कोई स्थान। इस उपन्यास के पात्र मिस्टर भट्ट बाबू जसवन्त सिंह को बताते हैं कि– “काफी पहले आस-पास की सोसाइटियों के बूढ़ों ने मिलकर (कला विहार, मानस, निर्माण, वर्धमान, समाचार, कीर्ति आदि) एक ‘लॉफिंग क्लब’ बनाया था। सेहत को दुरुस्त रखने के उद्देश्य से।...पार्क में सुबह की सैर करने वाले जवानों को लटक रही खालों और नकली बत्तीसी वाले बूढ़ों की राक्षसी हा, हा, हा, बरदाश्त नहीं हुई।...पार्क सार्वजनिक स्थल है। कल यहां समवेत स्वर में वे रोना आरंभ कर देंगे कि रोना सेहत के लिए फायदेमंद है, कैसे सहा जा सकता है ? बूढ़े डर गए। अगली सुबह वे मिले जरूर लेकिन हँसे नहीं।”13 हम देखते हैं कि अपनी दुनिया में यह बुजुर्ग एक-दूसरे के ऊपर पर्याप्त नजर भी रखते हैं। शायद सामाजिक होना इसे ही कहते हैं कि हम अकेले होकर भी एक-दूसरे को अनदेखा करके नहीं जी सकते। उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी को जब बाबू जसवन्त सिंह मिलते हैं तो वे उनका अकेलापन भांप लेते हैं और हर तरह से उनकी सहायता करने की कोशिश करते हैं। बाबू जसवन्त सिंह शहर में नये थे और सभी जगहों से अनजान भी, उनके पास सैर पर जाने के जूते नहीं थे। कर्नल स्वामी ने उनको जूते खरीदने की हिदायत दी लेकिन उनको पता था कि वे नहीं खरीद पायेंगे इस पर कर्नल स्वामी कहते हैं- “मालूम था, जूते की दुकान खोजने नहीं जा सकेंगे। मैं ले आया, दैट्स ऑल। और यह भी मालूम था दोस्त ! अर्निका भी नहीं मंगा पाए होंगे। पेंट की जेब से कर्नल स्वामी ने एक पतली-सी शीशी निकाली और उनके कुरते की जेब में सरका दी।”14 जब कर्नल स्वामी ने उन्हें सुझाया कि सैर के लिए कुरता-पायजामा की जगह ‘लक्स कॉट्सवूल’ खरीद लेने चाहिए तो बाबू जसवन्त सिंह को मन ही मन बहुत अच्छा लगा कि- “कोई तो है जो उन्हें सर्दी से ही नहीं बचाना चाह रहा, उन्हें चुस्त-दुरुस्त भी देखना चाह रहा है।”15

कर्नल स्वामी हमेशा मनगढंत कहानियाँ बनाकर बाबू जसवन्त सिंह को सुनाते रहते हैं कि उनके भरा-पूरा परिवार हैं, वे अपनी पोतियों गिलिगडु के साथ खूब मस्ती करते हैं, उनके बहू-बेटे उनका बहुत ख्याल रखते हैं जबकि वास्तव में उनका जीवन इसके बिल्कुल विपरीत था। बहू सुनयना द्वारा अपमानित होकर जब इसकी शिकायत वे कर्नल स्वामी से करते हैं तो कर्नल स्वामी उन्हें समझाते हुए कहते हैं-“जीवन मुठभेड़ों से ही जिया जाता है मिस्टर सिंह !”16 हम देखते हैं कि वृद्धों कि एक निश्चित दिनचर्या और सोच बन जाती है और वो एक-दूसरे को देखकर अपनी तुलना भी कई बार करते हैं। कर्नल स्वामी का उक्त वक्तव्य सुनकर उनसे खुद की तुलना करते हुए बाबू जसवन्त सिंह सोचते हैं- “कितनी मुठभेड़ें कोई झेल सकता है ? कर्नल स्वामी ही ऐसा महसूस कर सकते हैं और कह सकते हैं। दरअसल उपेक्षा और लांछनों के चीरते दंशों से वे कोसों दूर हैं। बेटों, बहूओं, पोतों, पोतियों ने उन्हें हाथों हाथ रखा हुआ है। घर की दीवारें चहचहाहट से गुलजार हैं। एक वे हैं – सपनों में सपना बुनते ही रह गए कि कानपुर वाले घर में उनके पोते-पोतियां हुङदंगे मचाएं। दीवारों पर ककहरा लिखें। सींकों से हाथ-पांव वाले आदमी उकेरें। पेड़-पौधे रचें, जिनमें भरा गया रंग बाहर फैल पूरे घर को छींट दे। खाली हाथ घर में घुसते ही रिसाए बच्चों के फूले गाल उन्हें आपस बाजार दौड़ा दें...”17

मनगढंत कहानियाँ बनाकर अपने आप को रोमांचित करने वाले कर्नल स्वामी चाहे कितना भी खुश दिखने की कोशिश करते हैं पर अकेलेपन की मार तो उन्होंने भी कम नहीं झेली। भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद पत्नी की मृत्यु के बाद वे आठ वर्षो से निपट अकेले हो गए थे क्योंकि पत्नी के न रहने पर उनके साथ रहने वाला कोई नहीं था। जीवनसाथी की मृत्यु बुढ़ापे को और कष्टदायक बना देती है क्योंकि जीवन का लम्बा अरसा साथ में गुजारने के बाद जीवन के अंतिम समय में अतीत की यादें और सुख-दुःख साझा करने वाले करीबी साथी का अभाव किसी यंत्रणा से कम नहीं होता है। कर्नल स्वामी को अपनी जुड़वाँ पोतियों कुमुदनी और कात्यायिनी से बहुत अधिक लगाव होता है लेकिन उनको उनसे मिलने की छूट नहीं होती है तो वे छुप-छुपकर उनसे होस्टल में मिलने जाते थे।

इसी तरह जब कर्नल स्वामी लगातार तीन-चार दिन गुजर जाने पर भी सैर पर नहीं आते हैं तो बाबू जसवन्त सिंह का दिल बैचेन होने लगता है और परेशान होकर वे खुद बीमारी की अवस्था में भी कर्नल स्वामी को देखने उनके बताये पते पर उनके घर पहुँच जाते हैं। इस बुढ़ापे में उन्हें लगता है कि अगर उनका कोई सच्चा साथी है तो वो कर्नल स्वामी ही है। अनुपयोगी होने की भावना से और अकेलेपन की नीरसता से बचने के लिए उन्हें कर्नल स्वामी का साथ मिलता है लेकिन वह भी ज्यादा दिन नहीं रह पाता। कर्नल स्वामी के घर पहुंचने पर जब पड़ोसी मिसेज श्रीवास्तव से उन्हें पता चलता है कि कर्नल स्वामी इस दुनिया में नहीं रहे तो बाबू जसवन्त सिंह का दिल्ली में रहने का मकसद ही खत्म हो जाता है और उसी क्षण वे दिल्ली छोड़कर कानपुर जाने का निर्णय कर लेते हैं। अब हम यह सोचने पर मजबूर होते हैं कि आखिर कर्नल स्वामी से बाबू जसवन्त सिंह का क्या रिश्ता था ? सिर्फ चंद दिनों के अपनेपन से उन्हें अपना समझ बैठें। बाबू जसवंत सिंह और कर्नल स्वामी का रिश्ता दर्शाता है कि बुजुर्गों को युवा पीढ़ी से और कुछ नहीं चाहिए सिर्फ थोड़ा अपनापन चाहिए। यह अपनापन अगर उनको घर में मिलेगा तो उसकी खोज में उन्हें दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा।

वर्तमान में बुजुर्गों की सुरक्षा व सहायता के लिए अनेक कानून बने हैं लेकिन हमारे सामने प्रश्न यह है कि कितने बुजुर्ग अपने ही अक्षम बच्चों के खिलाफ कानून की शरण में जाएँगे और कितने अपने सक्षम बच्चों के खिलाफ कानूनी लड़ाई में जीत पाएँगे ? उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी ने जब नोयडा वाला घर बेचने से मना कर दिया तो उनके बेटे श्रीनारायण ने क्रोध में आकर उन पर हाथ तक उठा लिया। लहूलुहान कर्नल स्वामी को पुलिस की मदद से अस्पताल ले जाया जाता है लेकिन जब उनको होश आया तो उन्होंने बेटे के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कराने से मना कर दिया। यह सिर्फ उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी की कहानी नहीं है बल्कि वास्तविक जीवन में अनेक वृद्ध माता-पिता अपनी औलाद की मार खाने और उनके साथ हो रहे उपेक्षित व्यवहार को चुपचाप सहन करने को बाध्य है।

उपभोक्तावादी दुनिया में मुनाफा सबसे प्रमुख है। आज न केवल बाजार में बल्कि पारिवारिक रिश्तों की दुनिया में भी उपयोगितावादी सिद्धांत हावी हो रहा है। जब कोई वस्तु उपयोगी नहीं रहती है तो उसको फेंक दिया जाता है, यही स्थिति आज समाज में वृद्धों की भी हैं। इसी सन्दर्भ में उपन्यास के पात्र बाबू जसवंत सिंह सोचते हैं कि- “तुमने अगर नरेंद्र की अम्मा की भांति पकवान बनाने में दक्षता हासिल कर ली होती तो निश्चय ही बहू सुनयना के लिए तुम्हारी कोई उपयोगिता होती। बूढ़ा ठेलुआ उसके किस काम का जो खाने-हगने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता !”18

समकालीन दौर में बच्चे भी उपयोगितावादी प्रवृति से नहीं बच पाये हैं। बाजारवाद एवं उपभोक्तावाद ने बच्चों का एक अलग ही संसार बना दिया है। आजकल बच्चें अपना बचपन कम्प्यूटर, टी.वी., मोबाईल और इंटरनेट पर ढूंढ रहे हैं। बच्चों में भावनात्मक रिश्ते नाम की चीज ही नहीं रह गई है। बच्चों को शुरू से ही इस तरह सीमित रहना सिखाया जाता है कि वे खुद में या दोस्तों में ही सिमट कर रह जाते हैं। बाबू जसवन्त सिंह पोते को जन्मदिन की पार्टी देना चाहते हैं तथा भावनात्मक तौर पर उससे जुड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन मलय का यह करारा जवाब उनके दिल को गहरी ठेस पहुँचाता है- “उसका यह कार्यक्रम उसके दोस्तों के साथ है। घरवाले इसमें शामिल नहीं होंगे। ...अपनी गाड़ी के लिए पापा उस रोज दफ्तर से ड्राइवर बुलवा लेंगे। न, न दादू ! अपने साथ हम किसी भी बड़े को नहीं ले जाएंगे – पार्टी बोरिंग हो जायेगी।”19 लेखिका चित्रा मुद्गल इस सन्दर्भ में लिखती है- “बुद्धिविकास की आड़ में बड़ी खूबसूरती से बच्चों को संवेदना-च्युत किया जा रहा-इतना कि बच्चे कभी परिवार में न लौट सकें, न कभी अपना कोई परिवार गढ़ सकें।”20

वर्तमान समय में वृद्धों के दयनीय और बेसहारा होने का एक मुख्य कारण कमजोर माँ-बाप की मजबूत संतान भी है। बाबू जसवंत सिंह व कर्नल स्वामी अपने बच्चों को यथाशक्ति सुविधाएँ देकर, उनका सामान्य पालन-पोषण करते हुए उनकी शिक्षा में विशेष रूप से ध्यान देकर उन्हें उच्च शिक्षित श्रेणी में रखने के लिए खूब धन भी खर्च करते हैं। खर्च करते समय हर माँ-बाप अपने बच्चों से यह अपेक्षा रखते हैं कि हम यदि अपने लिए कुछ भी नहीं बचा रहे हैं तो कोई बात नहीं, बच्चा तो बड़ा आदमी बनकर हमारी देखरेख करेगा लेकिन होता उसका बिलकुल विपरीत है। लेखिका ने नरेंद्र के बचपन की सारी कहानी दोहराई है मात्र यह बताने के लिए कि उसके माँ-बाप ने कितने प्यार से उसका लालन-पालन किया जबकि बेटे के पास न पिता के लिए समय है और न पैसा। इसी तरह कर्नल स्वामी अपनी औलाद को काबिल बनाते हैं लेकिन अकेले रहने को अभिशप्त है। यह बात अलग है कि अकेले रहकर भी उन्होंने खुश होकर जीना सीख लिया।

इस उपन्यास के माध्यम से एक बात यह जानने को मिलती है कि आदमी बूढ़ा तन से होता है मन से नहीं। उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी उम्र के इस पड़ाव में भी बेहद चुस्ती व तीव्रता लिए नजर आते हैं। कर्नल स्वामी को देखकर लगता है कि उम्र कठोर नहीं है, न ही बुढ़ापा। हमारी सोच भी उम्र को बदलती है। उम्रदराज होते हुए भी वह एहसास न किया जाए तो उसमें कोई बुराई नहीं, बल्कि यह जीवन के जीने का तरीका है। शायद स्वयं को विश्वास में लेकर बुढ़ापा बोझिल नहीं लग सकता। कर्नल स्वामी की जिन्दादिली उस समय देखते ही बनती है जब वे कहते हैं- “मौत जब आएगी, आ जाएगी। किसी भी शक्ल में आ जाए। रगड़ेगी हफ्ता, महीना, साल या अचानक झपाटे से उठा लेगी। उठा ले। मगर उन कुछेक कष्टकर दिनों की कल्पना में रात-दिन अधमरे होकर जीना जिन्दगी का मजाक उड़ाना नहीं!”21 सीमा दीक्षित लिखती है- “कई बार यह देखा गया है कि बहुत कम उम्र के लोग भी अपने को बुजुर्ग कहलाना पसंद करते हैं, जबकि बहुत से लोग जो बुजुर्ग होकर भी उम्र की चुनौतियों को हर क्षण खारिज करने में लगे रहते हैं। समस्या उनकी नहीं हैं, जिन्होंने उम्र से भिड़ना सीखा है, बल्कि समस्या उनकी है, जो एक संख्या को उम्र और एक उम्र को बुजुर्गियत मानकर चलते हैं।”22

कर्नल स्वामी अपनी एक काल्पनिक दुनिया जीते हैं, अगर परिस्थितियाँ उनके अनुकूल रहती तो वे वास्तव में वैसा जीवन जी सकते थे जैसा वे बाबू जसवंतसिंह को बताते हैं। उनके जीवन में अपनों के अपनेपन के अलावा सब कुछ था। एक वृद्ध व्यक्ति परिवार व समाज से क्या चाहता है ये बात कर्नल स्वामी के माध्यम से पता चलती है, लेकिन वास्तव में परिवार व समाज वृद्ध व्यक्ति को क्या देता है, यह भी इस उपन्यास में देखने को मिलता है। कर्नल स्वामी की तरह व्यक्ति को स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना सीख लेना चाहिए तभी वह खुशमय जीवन जी सकता है वरना तो जिन्दगी एक बोझ बनकर रह जाती है। ह्यूम का कथन है- “वह व्यक्ति सुखी होता है, जिसकी परिस्थितियाँ उसके स्वभाव या मनोदशा के अनुकूल होती हैं; किन्तु वह अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, जो अपने स्वभाव को परिस्थितियों के अनुकूल ढाल लेता है।”23 कर्नल स्वामी का व्यक्तित्व वास्तव में काबिले तारीफ था जो इतने कष्ट और यातनाएँ, अपनों का तिरस्कार सब कुछ सहने के बावजूद कभी भी अपने दुःख को जुबान पर नहीं आने देते उलटें बाबू जसवन्त सिंह को खुश होकर जीवन जीने के लिए प्रेरित करते हैं। ओशो की कहीं गयी ये पंक्तियाँ कर्नल स्वामी के व्यक्तित्व पर सटीक बैठती है-
‘दरिया की जिन्दगी पर सदके हजार जानें,
मुझको नहीं गवारा साहिल की मौत मरना।’

जीवन की सांध्यबेला में जब वृद्धों को परिवार की सबसे अधिक आवश्यकता होती है तब उन्हें वृद्धाश्रम में धकेल दिया जाता है। व्यक्ति के एकांकी व घुटन भरे जीवन व्यतीत करने से कहीं बेहतर है कि वह वृद्धाश्रम में जाकर अपना जीवन बिताएँ लेकिन हमारे समाज का परिवेश और वातावरण ऐसा है कि घर छूट जाने की मजबूरी और कड़वाहट किसी भी वृद्ध को किसी भी दूसरे स्थान को घर मानने के लिए तैयार नहीं होने देता। बेसहारा वृद्धों के लिए वृद्धाश्रम का होना उचित है लेकिन बुजुर्गों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को टालने के लिए वृद्धाश्रमों का इस्तेमाल हमारी संस्कृति के खिलाफ है। समकालीन दौर स्पर्धा और प्रतिस्पर्धा का दौर है। युवाओं को कैरियर बनाने के लिए घर से बाहर विदेश में भी जाना पड़ता है। माँ-बाप अपने पुश्तैनी घर को छोड़कर बच्चों के साथ या तो जाने के लिए तैयार नहीं है और अगर तैयार हो भी जाते हैं तो जगह की कमी के होते बच्चे उनको साथ न रखने के लिए मजबूर है। उपन्यास का पात्र नरेंद्र भी अमेरिका जाने की सोचता है तो अपने पिता जसवंत सिंह को वृद्धाश्रम में छोड़ना चाहता है। बाबू जसवन्त सिंह ने जब बेटी से उनके साथ हो रहे उपेक्षित व्यवहार की शिकायत की तो वह भी उल्टा उन्हें ही डाटने लगी- “वह यह भी मानते हैं कि उनके स्वभाव में आए परिवर्तन का कारण है अम्मा का अचानक चले जाना। अकेलापन उन्हें खाए जा रहा। मगर भैया के अकेले प्रयत्नों से तो अशान्ति कम नहीं हो सकती। बाबूजी को भी अपनी खोह से बाहर निकलने की जरूरत है।...भैया तो यहाँ तक सोच रहे हैं कि जहां बाबूजी का मन लगे, वे प्रसन्नचित्त रहें, उन्हें वहीं रखा जाए। उन्होंने पता लगाया है कि नोएडा के सेक्टर पचपन में कोई आनन्द निकेतन वृद्धाश्रम है, क्यों न उनके रहने की व्यवस्था वहीं कर दी जाए।...उन्हें वहां रखने के निर्णय से भैया पर खर्च का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। भैया उसे सहर्ष उठाने के लिए तैयार है।”24 बेटी शालू के इस वक्तव्य ने बाबू जसवन्त सिंह के जीने की चाह ही खत्म कर दी और उनको बहुत तेज बुखार ने आ घेरा। लेखिका लिखती है- “करवट भरते हुए बाबू जसवन्त सिंह को अपनी छहफुटी देह थर्ड डिग्री की पाशविकता झेलकर निकली हुई अनुभव हो रही। जोड़ो की ऐसी बगावत सालों से नहीं झेली उन्होंने ! खुद उनकी समझ से बाहर है कि बिना किसी पूर्व छिक्क-मुक्क के उन पर बुखार का आक्रमण एकदम से कैसे हो गया।”25 उन्होंने कैसे-जैसे बीमारी से निकलकर कानपुर जाने का निर्णय ले लिया जहाँ उनकी जरूरत भी थी और उनका मान-सम्मान भी। डॉ. नीलम सराफ़ लिखती है- “पुत्र द्वारा उपेक्षा और पुत्री की विवशता दोनों ही वृद्धों की ओर ध्यान दिए जाने में बाधक बनते हैं।”26

आज उपभोक्तावादी दुनिया में वृद्धाश्रमों की स्थिति यह है कि 200 बिस्तरों वाले वृद्धाश्रम के लिए तीन-चार हजार तक आवेदन आ जाते हैं। हम मानते हैं कि इस भागमभाग भरी जिन्दगी में व्यक्ति के पास स्वयं के लिए भी समय नहीं है ऐसे में वह दूसरों के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। लेकिन इसका समाधान ये तो नहीं है कि घर के बूढें माँ-बाप को अकेलापन, अजनबीपन, ऊब और विवशता भरी जिन्दगी जीने के लिए विवश कर दिया जाए। बुजुर्ग हमारे समाज के अमूल्य धरोहर है, हमारे समाज की एक जरूरत है। अगर वे नहीं होते तो हम होते ही नहीं, यह बात हमें हमारे जेहन में बैठानी होगी, तभी हमारे समाज का समुचित विकास सम्भव है। वे उम्र में हमसे जितने साल बड़े हैं, उतने ही अधिक जीवन के अनुभव उनके पास है। बुजुर्ग बेशक बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक रूप से कमजोर होते हैं, उनकी श्रम के जरिए उत्पादकता घट या समाप्त हो जाती है लेकिन सच यह है कि उनके पास मौजूद अनुभव समाज और युवा पीढ़ी को दिशा देने की बड़ी पूँजी साबित हो सकते हैं। वे अपने इन अनुभवों को लेकर किसी हद तक रूढ़िवादी हो सकते हैं, शायद किसी सीमा तक हठी भी लेकिन अनुपयोगी कभी भी नहीं हो सकते। उन्हें बोझ मानकर चलना तो विकृत मानसिकता का ही लक्षण है, जो हमारे लिए भी उतनी ही बोझिल और अनिष्टकारी साबित हो सकती है, जितनी उनके लिए।

आज के समय में हम देखते हैं कि माता-पिता दोनों कामकाजी होने की स्थिति में अपने छोटे बच्चों की देखभाल के लिए उनको बाल सुरक्षा गृह में छोड़कर निश्चित हो जाते हैं। बच्चों को दादा-दादी के पास छोड़ने की बजाय उन्हें गैर हाथों में सौंप कर ज्यादा स्वतंत्र महसूस करते हैं। यही वजह है कि बच्चे न तो सुरक्षित हैं और न ही वे अपने बुजुर्गों से अच्छे संस्कार ही सीख पा रहे हैं। उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी अपनी जुड़वाँ पोतियों गिलिगडु (कात्यायिनी और कुमुदनी) से बहुत ज्यादा स्नेह रखते थे। उनकी पोतियाँ अपनी माँ अनुश्री के नृत्य गुरु के साथ जाकर रहने लगने और पिता की व्यस्तता के चलते होस्टल में रहने को बाध्य थी। कर्नल स्वामी के हर मनगढंत किस्से में अपनी गिलिगडु का जिक्र होता था, उनका लालन-पालन कर्नल स्वामी कर सकते थे और उनकी खाली जिन्दगी में भी कुछ रौनक़ आ जाती लेकिन वे इतने मजबूर थे कि उन्हें पास रखना तो दूर, चाह कर उनसे मिल भी नहीं पाते थे, इसके लिए उन्हें छुपकर जाना पड़ता था।

प्रेम पाने की भावना एक मनोवैज्ञानिक जरूरत है, जो प्रत्येक मानव के हृदय में सदैव लहराती रहती है। यह हर किसी के जीवन का मधुर रहस्य है। एक ऐसी प्यास है जो कभी बुझती नहीं। बुढ़ापे का जीवन प्रेम की महकती हवा में खिल उठेगा। कर्नल स्वामी को जब अपनों से कोई उम्मीद नहीं रह जाती है तो बुढ़ापे में अणिमा दास के रूप में अपना जीवनसाथी खोज लेते हैं और बाबू जसवन्त सिंह से उनका जिक्र करते हुए वे एक अलग ही दुनिया में खो जाते हैं। कर्नल स्वामी कहते हैं- “मैं आजकल अपने जीवन के आखिरी प्रेम में डूबा हुआ हूँ। खामोशी से। किसी को भनक नहीं लगने दे रहा।”27 आगे लेखिका चित्रा मुद्गल लिखती है– “कर्नल स्वामी अणिमा दास को समझने में लगे हुए हैं और अणिमा दास उन्हें समझ लेना चाहती हैं। उनके बीच पसरा हुआ सैकड़ों मील का फासला उनके बित्तों में सिमट रहा।”28 उपन्यास के अंत तक भी यह नहीं पता चल पाता है कि कर्नल स्वामी की और मनगढंत कहानियों की तरह अणिमा दास की कहानी भी मनगढंत थी या वास्तविक और ऐसा उस चिट्ठी में क्या लिखा था जो कि अणिमा दास की चिट्ठी बताकर उन्होंने बाबू जसवन्त सिंह को दी थी ? शायद उन्होंने अपनी वसीयत दोबारा लिखवाकर मलिन बस्ती के बच्चों की शिक्षा के नाम करवा दी थी और उसी का परिणाम था कि उस चिट्ठी को पढ़कर बाबू जसवन्त सिंह में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आता और वे सदियों से चली आ रही संपति पर पुत्राधिकार की परम्परा को क्षत-विक्षत कर देना चाहते हैं और अपने जीते जी नई वसीयत अपने कानपुर वाले घर में काम करने वाली सुनगुनियां के नाम लिखवाना चाहते हैं, इतना ही नहीं वे सुनगुनियां और खुद के रिश्ते को एक नया नाम देना चाहते हैं- “बाबू जसवन्त सिंह सुनगुनियां से कहना चाहते हैं-अपने और उसके रिश्ते को वह जो भी नाम देना चाहे, उन्हें स्वीकार होगा।...वे अब तक, सच कहें तो, उसे अनाम रूप से ही अपने भीतर जीते रहे हैं। आगे भी उसे शायद इसी रूप में जीते रहते अगर उनकी मुलाकात अकस्मात अणिमा दास की लम्बी कविता से न हो जाती।”29

हमारे भारतीय समाज में लम्बे समय से पूँजी व दाह संस्कार पर पुत्राधिकार की परम्परा चली आई है, लेकिन लेखिका चित्रा मुद्गल ने अपने इस उपन्यास में उस परम्परा की धज्जियाँ उड़ा के रख दी है। उपन्यास के प्रारम्भ से लेकर अंत तक केंद्र में रही पात्र सुनगुनियां को बाबू जसवन्त सिंह ना केवल अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हैं बल्कि बाकी की जिन्दगी भी इज्जत व सम्मान के साथ सुनगुनियां के साथ जीना चाहते हैं और यहाँ तक कि अपने दाहसंस्कार का अधिकार भी अपने बेटे नरेंद्र को ना देकर सुनगुनियां के बेटे रामरतन (अभिषेक आसरे- बाबू जसवन्त सिंह का दिया हुआ नाम) को देते हैं जो कि अपने आप में एक बहुत बड़ी सामाजिक क्रान्ति है। लेखिका लिखती है- “बाबू जसवन्त सिंह सुनगुनियां से यह भी कहना चाहते हैं कि कानपुर पहुंचते ही वे अपने परिचित एडवोकेट मुन्ना सिंह कुशवाहा से अविलम्ब मुलाकात करेंगे। उनसे अपनी नई वसीयत बनवाएंगे और उसे रजिस्टर्ड करवाएंगे कि कानपुर वाला घर उनकी पैतृक संपति नहीं है। उनकी अर्जित संपति है। उनके न रहने पर उस घर की एकमात्र अधिकारिणी सुनगुनियां होगी।”30आगे लेखिका लिखती है– “सुनगुनियां से वे कहकर जाएंगे और उसे अपनी वसीयत में स्पष्ट लिखवा भी देंगे कि सुनगुनियां का पुत्र रामरतन, न अभिषेक आसरे ही उनकी कपालक्रिया करे। उसे ही वह अपने दाह-संस्कार का अधिकार दे रहे हैं।”31

उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी पत्नी की मृत्यु के बाद 8 साल से अकेले रह रहे थे और वही दूसरी और बाबू जसवन्त सिंह को हर बात में अपनी पत्नी की कमी खलती है। लेखिका क्षमा शर्मा लिखती है- “बुजुर्गों में भी पति-पत्नी में से किसी एक के जीवित रह जाने पर स्थिति और खराब होती है। न कोई सुनने वाला न कोई कहने वाला और अपनी सुध लेने वाला बचता है।”32 वृद्धावस्था जीवन का एक ऐसा पड़ाव होता है जहाँ व्यक्ति अपने अतीत के साथ ज्यादा जीता है, क्योंकि इस पड़ाव तक पहुँचने में वह जीवन का एक लम्बा सफर तय करता है। माज़ या अतीत के बहुत सारे पल अच्छे बुरे तजुर्बों की धूप-छाँव की तरह याद आते हैं। प्रसिद्ध पाश्चात्य विचारक अरस्तु ने वृद्धों के सन्दर्भ में लिखा है- ‘वे उम्मीद से अधिक यादों के सहारे जीते हैं।’ इस उम्र में व्यक्ति भविष्य के सपने देखना लगभग बंद कर देता है, क्योंकि उनका शरीर उनको हकीकत में बदलने में सक्षम नहीं रहता है। जीवन के अंतिम पड़ाव तक व्यक्ति अपने अनेकों करीबी लोगों को खो देता है–मसलन जीवनसाथी, माता-पिता, भाई-बहन आदि और ऐसे में वह भावनात्मक खालीपन महसूस करता है और जीवन जीने की लालसा लगभग खत्म हो जाती है और मौत की प्रतीक्षा में जीवन व्यतीत करने लग जाता है। महापुरुष एडिसन ने लिखा है–“जीवन के इस थोड़े से समय में उतार-चढ़ाव, ज्वार-भाटा, आनन्द व विषाद के दिन एक-एक करके आते और चले जाते हैं।”33 जीवनसाथी की मृत्यु बुढ़ापे को और कष्टदायक बना देती है, क्योंकि जीवन का लम्बा अरसा साथ में गुजारने के बाद जीवन के अंतिम समय में अतीत की यादें और सुख-दुःख साझा करने वाले करीबी साथी का अभाव किसी यंत्रणा से कम नहीं होता है।

हम देखते हैं कि पुरुष की तुलना में महिलाएं कम अहमन्य होती हैं और वे अपने प्रति जागरूक भी नहीं होती। बाबू जसवंत सिंह की पत्नी को अपने बहू-बेटे के लिए इस उम्र में भी काम करके खुशी मिलती थी। जबकि बाबू जसवन्त सिंह स्वयं पूरे समय कुछ-न-कुछ कमियाँ खोजते रहते थे। वे वही इज्जत और सम्मान चाहते थे जो उनको प्रौढ़ावस्था में मिलता था और ऐसा नहीं होने पर वे छोटी से छोटी बात की शिकायत कर्नल स्वामी से करते थे जो स्वयं भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद अकेले रह रहे थे। अहम फैसलों में अपनी नजरअंदाजी वे सहन नहीं कर पाते। परिवार में वृद्धों को चौबीसों घंटे जितना अपने मान-सम्मान का ध्यान रहता है, उतना अन्य किसी भी चीज का नहीं रहता है। अपने बहू-बेटे की शिकायत करने पर कर्नल स्वामी उल्टा उन्हें डाटते हुए कहते हैं – “सच तो यह है दोस्त, आपको दुःख ओढ़ने बिछाने की आदत पड़ गई है। साधारण बात प्रहार हो उठती है। दरअसल यह और कुछ नहीं है मिस्टर सिंह-बूढ़ों की शासन न कर पाने की कुंठा है।”34 अमेरिका के दार्शनिक जॉन डेवी ने लिखा है- “मनुष्य में महत्त्वपूर्ण बने रहने की बलवती भावना होती है।”35

आर्थिक दबावों का सीधा प्रभाव आज जिस तेजी से हमारे समाज पर पड़ रहा है उसे वैविध्यपूर्ण कथ्य और शिल्प के साथ-साथ भाषा के स्तर पर प्रस्तुत करने में चित्रा मुद्गल की सजकता उल्लेखनीय है। अगर उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी और बाबू जसवन्त सिंह आर्थिक रूप से समर्थ नहीं होते तो वे घर की बजाय न चाहते हुए भी वृद्धाश्रम में रह रहे होते। शायद बाबू जसवन्त सिंह को कभी कानपुर से दिल्ली नहीं लाया जाता बल्कि उनको सीधे वृद्धाश्रम की राह दिखा दी जाती और वे चाह कर भी मना नहीं कर पाते और वापिस दिल्ली छोड़कर कानपुर जाने का निर्णय तो कभी नहीं ले पाते। इसी तरह उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी अगर आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होते तो कभी भी अपने बेटों का प्रतिकार नहीं कर पाते और नोएडा का मकान बेचकर वृद्धाश्रम में रह रहे होते। पिता के सन्दर्भ में असलम हसन की एक कविता इस उपन्यास के पात्र बाबू जसवन्त सिंह और कर्नल स्वामी पर सार्थक बैठती है –
“बच्चे बड़े हो गये
और बौना हो गया है पिता
घर का एक बेकाना कोना
बिछौना
हो गया है पिता
अपने पांव पर खड़े हो गये
खेलते बच्चे और खिलौना हो गया है पिता।”36

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि वर्तमान उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में व्यक्ति की व्यस्तता के चलते समझौता दोनों पक्षों को करना होगा। पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी के साथ सामंजस्य बैठाना होगा और नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के साथ। उपन्यास के पात्र कर्नल स्वामी और बाबू जसवन्त सिंह की दर्दभरी कहानी वर्तमान दौर के बुजुर्गों की करुण कथा कहती है। बुजुर्गों को इस तरह उपेक्षित और असहाय छोड़कर हम इस समस्या का समाधान नहीं खोज सकते। चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद लिखते हैं- “बुढ़ापे को एक नई दृष्टि से देखने की आवश्यकता है, एक ऐसी दृष्टि से जिसमें संवेदना हो और बूढ़ों के लिए आदर व सम्मान का जीवन देने की आकांक्षा हो।”37 हमें इस समस्या का समाधान निकालना होगा जिससे समाज में बुजुर्गों की स्वीकार्यता बढ़े, उन्हें बेकार और व्यर्थ न समझा जाये बल्कि समाज में उनकी उपयोगिता स्थापित करनी होंगी। बुजुर्गों के अनुभव और ज्ञान का लाभ नई पीढ़ी को मिल सके, इस पर सरकार, साहित्यकारों, समाजसेवी संगठनों और सर्वोपरि परिवार वालों को सोचना होगा, तभी इस समस्या से कुछ हद तक निजात पाया जा सकता है।

संदर्भ
1. बूढ़ापा शायरी, अकबर इलाहाबादी, रेख्ता वैबसाइट (https://rekhta.org/tags/budhapa-shayari?lang=hi)
2. गिलिगडु, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ संख्या 138
3. वही........पृष्ठ संख्या 36
4. वही........पृष्ठ संख्या 14
5. वही.........पृष्ठ संख्या 39
6. वही.........पृष्ठ संख्या 96
7. वही........पृष्ठ संख्या 71
8. वही........पृष्ठ संख्या 59
9. वही........पृष्ठ संख्या 65
10. सं. संजय गुप्त, दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण), दैनिक हिन्दी समाचार पत्र, रविवारीय अंतराल के अंतर्गत ‘अपनों     की अनदेखी का दर्द’- क्षमा शर्मा, नई दिल्ली, 11 जून 2017
11. गिलिगडु, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ संख्या 68
12. वही.......पृष्ठ संख्या 68
13. वही.......पृष्ठ संख्या 66
14. वही.......पृष्ठ संख्या 18
15. वही.......पृष्ठ संख्या 27
16. वही........पृष्ठ संख्या 61
17. वही.........पृष्ठ संख्या 61-62
18. वही.........पृष्ठ संख्या 37
19. वही.........पृष्ठ संख्या 33-34
20. वही.........पृष्ठ संख्या 34
21. वही.........पृष्ठ संख्या 63
22. वृद्धावस्था की दस्तक, सीमा दीक्षित, सामयिक बुक्स प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ संख्या 13
23. रिटायरमेंट के बाद सुखी जीवन, डॉ. राम सिंह, विद्या विहार प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 59
24. गिलिगडु, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ संख्या 96-97
25. वही.........पृष्ठ संख्या 101
26. हिन्दी उपन्यास सामाजिक समस्याएँ, डॉ. नीलम सराफ़, हिन्दी बुक सेन्टर, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 106
27. गिलिगडु, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ संख्या 73
28. वही.........पृष्ठ संख्या 73
29. वही........पृष्ठ संख्या 143
30. वही........पृष्ठ संख्या 144
31. वही........पृष्ठ संख्या 144
32. सं. संजय गुप्त, दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण), दैनिक हिन्दी समाचार पत्र, रविवारीय अंतराल के अंतर्गत ‘अपनों     की अनदेखी का दर्द’- क्षमा शर्मा, नई दिल्ली, 11 जून 2017
33. वृद्धावस्था की दस्तक, सीमा दीक्षित, सामयिक बुक्स प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ संख्या 10
34. गिलिगडु, चित्रा मुद्गल, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2002, पृष्ठ संख्या 93
35. रिटायरमेंट के बाद सुखी जीवन, डॉ. राम सिंह, विद्या विहार प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2012, पृष्ठ संख्या 53
36. वृद्धावस्था की दस्तक, सीमा दीक्षित, सामयिक बुक्स प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016, पृष्ठ संख्या 127
37. वृद्धावस्था विमर्श, लेखक-चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद, सं. ऋषभदेव शर्मा, परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद, प्रथम संस्करण 2016 

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