विमर्श: लोकप्रिय लोकतंत्र का भविष्य एवं संभावनाएँ

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी


डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


भारत एक लोकतांत्रिक देश है और आज हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं। यह एक संविधान के माध्यम से संचालित संघीय राज्य है। हम जानते हैं कि संविधान में असमानता में समानता के सूत्र को खोजने का प्रयत्न है- लोकतंत्र। यदि सम्पूर्ण संविधान की मूल संकल्पना को आत्मसात हम करें तो यह पाएंगे कि लोकतंत्र का एक सिद्धांत है-मौलिक अधिकारों की समानता। भारत का संविधान ही-‘हम भारत के लोग’ से अपनी प्रतिबद्धता दर्ज़ कर देता है। वैसे, 17वीं शताब्दी में लॉक के समय से ही ‘विचार’ और ‘अभिव्यक्ति’ की स्वतंत्रता को किसी भी राजनीतिक समाज की आवश्यक शर्त माना जाता रहा है। अमरीकी संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जगह दी गई, जिसका समर्थन नैतिकतावादी जॉन स्टुअर्ट मिल ने किया था। इस स्वतंत्रता को मनुष्यता की आवश्यक शर्त के रूप में देखा जाता है। प्रो. नन्द किशोर आचार्य ने अहिंसा विश्वकोश में लोकतंत्र पर चर्चा करते हुए लिखा है, ‘लॉक का मत था कि यदि शासक उस प्रयोजन को पूरा नहीं करता जिसके लिए समझौता किया गया है या उसके खिलाफ कार्य करता है तो जनता को उसे हटा देने का अधिकार है। इस प्रकार लॉक ने ‘सामाजिक समझौते के सिद्धांत’ की व्याख्या ‘लोकतंत्र’ के पक्ष में की जबकि हॉब्स उसका इस्तेमाल शासक की निरंकुशता कों समर्थन देने के लिए कर रहे थे।’ लोकतंत्र राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और अन्य मजबूत संस्थाओं के बगैर संभव नहीं है, यह बात सच है लेकिन लोकतंत्र की पश्चिम में जो समझ विकसित हुई उसमें भी निरंतर लोकतंत्र की मजबूत प्रणाली विकसित हुई है। अब हम अमेरिका का ही उदाहरण लें और लोकतंत्र की अमेरिकी अवधारणा को यदि बुनियादी पड़ताल करें तो उनकी लोकतंत्र की बुनियादी धारणाओं में सम्मिलित है-
1. प्रत्त्येक व्यक्ति की गरिमा और मौलिक मूल्यों की पहचान,
2. सभी व्यक्तियों की समानता का सम्मान
3. बहुमत में विश्वास और अल्पसंख्यक लोगों के अधिकारों के प्रति आग्रह,
4. जरूरी चीजों पर आम सहमति एवं स्वीकृति, तथा
5. वैयक्तिक स्वतंत्रता की पुरजोर वकालत।

आधुनिक लोकतंत्र के योग्य होने के लिए, एक देश को कुछ मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने की जरूरत है- और उन्हें इसके संविधान में न केवल लिखे जाने की जरूरत है, बल्कि राजनीतिज्ञों और अधिकारियों द्वारा हर रोज जीवन में रखा जाना चाहिए।

क्या है लोकप्रिय लोकतंत्र का भविष्य?
लोकप्रिय लोकतंत्र की संकल्पना अभी भी दुनिया में विकसित नहीं हुई है। लोकतंत्र की लोकप्रियता इसकी व्याख्या नहीं है। अमेरिकी लोकतांत्रिक प्रणाली भी स्वयं को लोकप्रिय लोकतंत्र घोषित नहीं कर सकती क्योंकि यथार्थ यदि देखा जाए तो अमेरिका में भी जिस लोकतंत्र को विकसित होने और उसके आत्मसातीकरण के प्रति लोगों की प्रतिबद्धता की संकल्पना थी वह अपने मूल आत्मा को नहीं प्राप्त कर सकी। दुनिया के तमाम देश अभी भी लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते उनके यहाँ लोकशक्ति को अपने नियंत्रण में रखने के अपने हथकण्डे हैं। ऐसे में, लोकप्रिय लोकतंत्र की संकल्पना के लिए अभी काफी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। क्या यह सच नहीं है कि लोकतंत्र को पश्चिम में दुनिया की बेहतरी का सर्वोत्तम विकल्प के रूप में बताया जाता रहा है? लोकतंत्र की राजनीतिक और व्यक्तिगत आजादी की ताकत को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, यह एक सचाई है। इसे अब कैसे लोकप्रिय लोकतंत्र कहेंगे?

लोगों का, लोगों के द्वारा और लोगों के लिए’ एक श्लोगन बहुत प्रचलित हुआ। भारत में लोकतंत्र की स्थापना के साथ अंगीकृत श्लोगन-हम भारत के लोग। ऐसी ‘टैग लाईन्स’ प्रायः दुनिया के लोग अपने चार्टर या संविधान के जरिए इसलिए अभिव्यक्त करते रहे हैं ताकि उनकी लोकप्रिय कल्याणकारी छवि निर्मित हो। लेकिन यह सच में लोकतंत्र की स्थापना के लिए नाकाफी है। एक कल्याणकारी राज्य ही सच्चे लोकतंत्र का वाहक बन सकता है। जिसमें प्रतिभागिता कम और श्लोगन को गढ़ने की प्रवृत्ति ज्यादा होगी, वह राज्य कल्याणकारी राज्य नहीं हो सकता। वह राज्य मानवाधिकारवादी नहीं हो सकता। इन सबसे विरक्त रहने वाला राज्य लोकप्रिय एवं लोकतांत्रिक भी नहीं हो सकता। ऐसे राज्य के बारे में यह मान्यता है कि उसे लोकप्रिय लोकतंत्र की श्रेणी में नहीं स्मरण किया जा सकता। 4 जुलाई, 1776 को अमरीकी ड्रॉफ्ट तैयार किया गया। उसमें यह कहा गया था कि हम इन तथ्यों को स्पष्ट सिद्ध मानते हैं कि सभी मनुष्य समान निर्मित हुए हैं, कि वे अपने सृजनकर्ता के द्वारा विशिष्ट अहस्तांतरणीय अधिकारों से संपन्न किए गए हैं, कि इनमें जीवन, स्वतंत्रता एवं आनंद की खोज है। लोकतंत्र की इन्हीं संवेदनाओं को बाद में जब मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा हुई तो उसको विस्तारित किया गया जिसे 30 सूत्रीय प्रतिज्ञापत्र के रूप में हम पाते हैं लेकिन वे अब तक एक लोकप्रिय लोकतंत्र की सुदृढ़ बुनियाद विकसित नहीं कर सके।

लोकप्रिय लोकतंत्र को ऐसी व्यवस्था में विकसित किया भी नहीं जा सकता। सस्ता लोकतंत्र और कामचलाऊ लोकतंत्र से संचालित हो रही दुनिया की सभ्यता अब उस मोकाम पर पहुँच चुकी है जहाँ भयानक प्राकृतिक मार, गरीबी, भूख, दंश एवं युद्ध आदि की संभावनाएं ज्यादा दिखाई दे रही हैं। लोकप्रिय लोकतंत्र में अपने वोट की कीमत रखने वाला एक अदद मनुष्य अपने मन का मतदान अगर नहीं दे सकता तो वहाँ ऐसी संकल्पना को जमीन दे पाना कितना मुश्किल है, इसे समझा जा सकता है। ऐसे में, यदि लोकतंत्र की बुनियादी ईंट को बालू से निर्मित कर हम लोकप्रिय लोकतंत्र को समझने का प्रयास कर रहे हैं तो यह एक मिथ्या प्रलाप है और दुनिया की मनुष्य बिरादरी के साथ षडयंत्र है। यदि उत्पाद ही सही नहीं होगा तो विपणन से उपभोक्ता को संतुष्टि नहीं मिल सकती। यदि उत्पाद आजतक इस षडयंत्र के सहारे चलता रहा तो अबतक के इतिहास का लोकतंत्र कैसी समाजिक संरचना की आधारभूमि में अपने नागरिकों को लाभ पहुँचाता रहा इसकी भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह तो एक षडयंत्रकारी लोकतंत्र ही तब दुनिया को अपने शक्ति से संचालित करता रहा है, ऐसा कहा जा सकता है। षडयंत्रकारी लोकतंत्र दरअसल अपनी मूलचेतना में ही क्रूर होता है। उसकी सीधी सी बात यह होती है कि वह निरंकुश होगा। उसे दंडित करने का अधिकार होगा। वह सजा देने के लिए पूरी व्यवस्था रखता है। अपने मुताबिक अपने नागरिकों को चलने के लिए विवश करता है। राज्य की संकल्पना यदि प्रूधो इस भाव से देखा था तो वह हमें गलत नहीं लगती। क्योंकि वही राज्य तो अपने होने का, अपने वजूद का ढिढोरा पीटते हुए खुद को लोकतांत्रिक भी तो कह रहे हैं।

संसदीय लोकतंत्र की चुनौती
दुनिया में संसद की भूमिका लोकतंत्र की रक्षा और संवर्धन में अहम होती है। संसद में प्रतिभागिता कर रहे जन-प्रतिनिधियों की अब यह जिम्मेदारी होती है कि सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष में रह कर किसी राज्य की कैसी अवसंरचना विनिर्मित करता है। संसदीय लोकतंत्र में संप्रभुता वास्तविक अर्थों में संसद और कार्यपालिका में केंद्रित है, यह दुनिया के तमाम संसद को देख कर लगता है और सभी स्थानीय संस्थाएं उनके समक्ष बौनी प्रतीत होती हैं। पूरे हिटलर और ऐसी सत्ताओं को यदि याद करें। उस समय के औपचारिक संसदीय लोकतंत्र भी फासीवादी प्रतीत होने लगे थे। गांधी ने बहुत पहले हिन्द स्वराज में संसदीय लोकतंत्र को बांझ और वेश्या जैसे शब्दों से संबोधित किया। हालांकि, इस बात से लोकतंत्र में विश्वास करने वाले लोग सहमत नहीं हो सकते। लोकतंत्र की सत्तासीन आदतों को लेकर यह गांधी का विचार था। इससे सहमत होना जरूरी है भी और नहीं भी क्योंकि गांधी स्वयं कोई अंतिम व्याख्याकार नहीं हो सकते और न ही यही कहा जा सकता है कि गांधी गलत ही हैं। यदि किसी भी व्यवस्था का चरित्र ही अपने को परिभाषित करने लगे तो लोकतंत्र के सौन्दर्यबोध के जानकार भी इस तथ्य को झुठला नहीं सकते कि संसद अपने मूल चरित्र से बहकी नहीं है। भारत और दुनिया की तमाम संसद जो कानून और बिल लाती हैं वह कितने लोगों के लिए हितकारी होते हैं? ये संसदें क्या अपने हित साधने के लिए कार्पोरेट के साथ समझौते करती हैं कि नहीं? संसदें भ्रष्टाचार में लिप्त हैं कि नहीं? संसदें नवधनाढ्यों के लिए उदारता दिखाती हैं कि नहीं? ... ऐसे अनगिनत सवाल हैं जो दुनिया की संसदें कर रही हैं। वह समझौते करती हैं। वह सौदे करती हैं। वह अपनी वाहवाही के लिए षडयंत्र करती हैं। वह गरीबों के हितों के साथ खिलवाड़ भी करती हैं। आत्महत्या के लिए मजबूर करती हैं। बाज़ार के अनुसार कानून लाती हैं। कल्याणकारी कदम की जगह अन्तरराष्ट्रीय महत्त्व की एजेन्सीज के दबाव या दुनिया की उन संसदों के दबाव में कार्य करती हैं जिनसे उन्हें व्यापार और सुरक्षा के प्रलोभन मिलते हैं। यह संसदीय व्यवस्था का सही चरित्र नहीं है। दुनिया के तमाम देशों की संसदें अपने चरित्र से भटकी हुई हैं। प्रभावशाली होने का नाटक करने वाली इन संसदीय व्यवस्था से लोगों का मोह भंग हुआ है। यह मोह उन लोगों का भंग हुआ है जो लोकतंत्र को थोड़ा-थोड़ा जान गए हैं या तो संसद को समझ गए हैं। तीसरी दुनिया के बहुत से देशों में अभी भी अशिक्षा है, गरीबी है, अराजक स्थिति है। वहाँ की भोलीभाली जनता अभी इससे वाकिफ नहीं है। वहाँ की जनता को कागजों पर पढ़ा-लिखा बताकर अपनी वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत कर दिया जाता है। यह एक बड़ा षडयंत्र है। लोकतंत्र में इससे बड़ा षडयंत्र कुछ हो ही नहीं सकता जहाँ झूठी रिपोर्ट बनाकर प्रस्तुत कर दिया जाता हो। सरकारों का यह षडयंत्र हमारे संसद में अनुमोदित करके दुनिया के समझ रखा जाता है। अब आज यह एक बड़ा प्रश्न है कि ऐसा संसदें क्यों करती हैं? संसदों की मजबूरी क्या है? संसद इसको चुनौती के रूप में क्यों नहीं लेकर इसके खिलाफ अपना स्वर उठातीं? दरअसल, यही समझने की आज जरूरत है। इसमें यदि सुधार हो जाए तो लोकप्रिय लोकतंत्र स्थापित करने में संसदें सफल हो जाएंगी किन्तु दुर्भाग्य है कि इस प्रकार की चुनौती को दूर करने के लिए हमारी संसदों ने कोई उपाय ही नहीं अभी तक सोचा। इस पर न ही शोध और अनुसंधान की कोशिश चल रही है और न ही संसद में बैठे लोग इस पर विचार-विमर्श करते। तमाम वादों में फंसे हमारे जन-प्रतिनिधियों की संलिप्तता और उनमें इच्छाशक्ति का अभाव इसका सबसे बड़ा कारण है। नैतिक मूल्यों से विरक्त रहने वाले हमारे अधिकांश जन-प्रतिनिधि यह सोचते हैं कि उनका दायित्व अब चयन के बाद सुख प्राप्त करने के लिए हुआ है या कहीं वे खुद इस आग में न जल जाएं। जब भ्रष्टाचार में फंसा जन-प्रतिनिधि संसद का सदस्य होगा तो वह क्या सही पहल करेगा? क्या कोई झंझट मोल लेगा? यदि संसद में बैठकर अश्लील वीडियो देखी जाएगी, सौदेबाजी की जाएगी, रूपयों की लेनदेन होगी तो उस संसद और उस संसद में रह रही बिरादरी का लोकतंत्र कभी साफ-सुथरा तो नहीं होगा। वह सामान्य आरटीआई से डरेगा ही। संसद द्वारा सत्ता का विकेन्द्रीकरण तो हुआ भारत में लेकिन लोकतंत्र की दुहाई देकर आमजनता यह पूछती है कि उसके हक उसकी पहुँच से अभी तक इतने दूर क्यों हैं? सही व्यक्ति तक सही चीजों की पहुँच भारतीय संसद नहीं बना पायी। यह बात अलग है कि पाकिस्तान और दूसरे देशों में लोकतंत्र के स्थायित्व को सत्ता की तख्तापलट से देखा जाता है लेकिन सच में यह लोकतंत्र तो नहीं है। एक उदाहरण अरब का लेते हैं। सबसे ज्यादा आबादी वाला अरब देश इस समय लोकतांत्रिक नहीं है, यह बात सामान्य तौर से उठने लगी थी। सवाल यही था कि क्या वह कभी स्थिर लोकतांत्रिक सिद्धांतों वाला था। लेकिन यह सच है कि 2012 में लोकतांत्रिक चुनाव हुए और जनता ने एक संसद चुना। लेकिन उसके बाद हुए आंदोलनों और अल सिसी के नेतृत्व में सैनिक तख्तापलट ने जो कुछ भी लोकतंत्र था उसे नष्ट कर दिया। संसद की यह कमजोरी दुनिया के बहुत से देशों में मिली है। अमेरिकी थिंक टैंक पीयू रिसर्च ने दुनिया भर में लोकतांत्रिक व्यवस्था के समर्थन से जुड़ा एक सर्वे जारी किया है। यह सर्वे 38 देशों के तकरीबन 42 हजारों लोगों के बीच किया गया है। ऐसे भी मत हैं कि जहाँ लोकतंत्र ने श्रीलंका को कई मोर्चों पर फायदा पहुँचाया है, वहीं इससे कुछ नुकसान भी अधिक हुए हैं। शोध और सामाजिक कार्य से जुड़ी एक संस्था नेशनल पीस काउंसिल ने एक अध्ययन में पाया गया कि राजनीतिक तंत्र ने विभाजनों को बढ़ाया है। उसके मुताबिक, जातीय रूप से विभाजित देश में बहुमत का शासन एक तरह से तानाशाही व्यवस्था में तब्दील हो सकता है जिसमें स्थायी बहुसंख्यक लोग स्थायी रूप से अल्पसंख्यक लोगों पर शासन करते हैं। तानाशाही यह संसद की जड़ों में जब घर कर जाती है तो लोकतंत्र सही मायने में विकास नहीं कर पाता। रेडियो जर्मनी से बात करते हुए एक पत्रकार आखिर क्यों यह कहता है कि उसका लोकतंत्र से विश्वास हट गया है। वरिष्ठ तमिल पत्रकार वीरागथी थानाबालासिंघम ने एक रेडियो साक्षात्कार में कहा था-हमारे संसदीय लोकतंत्र को लेकर गर्व करने जैसी कोई बात नहीं है। यह विफल रहा है। उसका कहना है, ‘1948 से ही सरकार ने ऐसे कानून बनाने शुरू कर दिये थे जिनसे अल्पसंख्यकों का शोषण होता है। इसी का नतीजा है कि युद्ध शुरू हुआ। इतनी तबाही के बाद भी सिंहली राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा कोई बदलाव नहीं दिखता जिससे भविष्य में इस तरह के संकटों को रोका जा सके।’ इस वक्तव्य से भारतीय एवं श्रीलंका की संसद एवं उसके कानून की यह विफलता संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए प्रश्नचिन्ह ही है।

भारत के लिए तो यह एक खास सवाल है क्योंकि भारत का संविधान जिस लोकतंत्र में विश्वास करता है वह समानता, धर्मनिर्पेक्षता और सहिष्णुता पर आधारित है। भारत के प्रत्त्येक नागरिक की आस्था एक ऐसे गणतंत्र पर आधारित है जो न्याय, समानता एवं भाईचारे की विरासत को आगे बढ़ाती है। देश का संविधान यह सुनिश्चित करता है कि हर नागरिक इस लोकतांत्रिक ढाँचे में तमाम विविधताओं और बहुलताओं के साथ रहे। वही इस लोकतंत्र की मजबूती और खूबसूरती है। जब हम यह समझ लेते हैं कि वैयक्तिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा लोकतंत्र से संभव है, तो हम इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को अनदेखा करते हैं। ‘लोकतंत्र’, ‘वैयक्तिक स्वतंत्रता’ और ‘मानवाधिकार’ तीनों अलग-अलग बातें हैं। तीन अलग-अलग टर्म हैं, वे एक नहीं हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में तीनों की मौजूदगी एक साथ संभव है। तीनों को एक करके समझा जाता है।

रूस का उदाहरण लें तो वहाँ मानवाधिकारों की रक्षा के बगैर लोकतंत्र लागू किया गया था। उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन में लोकतंत्र जैसी किसी चीज के आने के पहले मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई थी। आज दुनिया में बहुत सी पार्टियों को चुनाव में खड़े होते देखते हैं, जो चुनाव में मिली जीत को असहमति खत्म करने और खास जीवन शैली, एजेण्डे को थोपने के मौके की तरह देखती है। जो वहाँ के अधिकाँश नागरिकों के लिए सामान्य रूप से स्वीकार्य नहीं है। यह भारत के भी संदर्भ में उदाहरण लिया जा सकता है। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र मानवाधिकरों की सुरक्षा के बजाय उसके लिए ख़तरा बन जाता है।

हिंसा से लोकतंत्र मुमकिन नहीं
लोकतंत्र के स्वरूप भी अब हिंसक होते दिख रहे हैं। कहने को लोकतंत्र यदि हिंसा के औजारों से उनके टूल्स से दोस्ती करेगा तो उसको क्या कहेंगे। जापानी लोग 1945 से ही परमाणु हथियारों को दुनिया से पूरी तरह खत्म करने के लिए अभियान चलाते रहे हैं लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। अब लोकतंत्र और शांति के संरक्षकों से सवाल यह है कि परमाणु प्रसार से कैसे सुरक्षित नागरिक जीवन संभव है? सच तो यह है कि विचार व्यक्त करने की आजादी यानी ‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ की हद क्या है, यह सवाल उठने चाहिए। ये आजादी किस बिन्दु से नफ़रत भरे विचारों में बदल जाती है जिससे दूसरों का सम्मान आहत होता है, यह इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में हो रहे दंगों का इतिहास पढ़कर समझा जाए। यदि यह पाठ भी हो सका तो लोकतंत्र सुरक्षित किया जा सकता है। दूसरी बात, हमें ये भी देखना होगा कि वो कौन सा बिन्दु या विषय होता है जब हमारे किसी एक अधिकार का प्रयोग करने से किसी अन्य व्यक्ति के किसी अन्य अधिकार का उल्लंघन ना होता हो। अगर ऐसा है तो हमारे उस अधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता जिसे वर्षों से हम करते आ रहे हैं। हमें ये भी तत्काल सुनिश्चित करना होगा कि सभी नागरिकों के सभी अधिकारों का न सिर्फ़ सम्मान किया जाए बल्कि उन्हें पूरी हिफाजत भी मिले। हम समझते हैं कि सच्चे लोकतंत्र में टकराव और हिंसा छोड़कर रचनात्मक बातचीत के लिए जगह बनानी होगी जिसमें सभी पक्ष भाग ले सकें और राजनीतिक मतभेदों को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर सुलह का माहौल बनाया जा सके। इसके अलावा और कोई रास्ता कारगर साबित नहीं हो सकता। दुनिया के तमाम राज्य जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीमा विवाद में घिरकर अपने लोकतंत्र के लिए खतरा महसूस कर रहे हैं उससे तो निजात मिलेगी। किसी भी राजनीतिक दल को अलग-थलग करने या देश में किसी भी विचारधारा वाली आवाज़ के लिए सभी दरवाज़े बन्द करने से कोई हल नहीं निकलने वाला है। समाज के किसी वर्ग को नज़रअन्दाज़ करने से समाज में लोगों को मिलजुलकर रहने और एक दूसरे के विचारों का सम्मान करने का माहौल बनाना असम्भव होगा। जरूरी है कि समाज के सभी वर्गों के विचारों का सम्मान किया जाए ताकि लोगों की लोकतान्त्रिक आकांक्षाओं और उम्मीदों को पूरा करने के लिए उपयुक्त माहौल बनाया जा सके। इस बात को नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि पिछले कई वर्षों से लोग लोकतन्त्र के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उनके संघर्ष के महत्व को कम नहीं किया जा सकता। हिंसा किसी भी लोकतंत्र के लिए और मनुष्यता के लिए खतरनाक है। लोकतंत्र का सही स्वरूप आपसी भाईचारगी ओर प्रेम के माध्यम से ही संभव है।

सार्क देशों का हम उदाहरण लें। सार्क का गठन इस आधार पर हुआ था कि परस्परता के जरिए हम बहुमुखी विकास हेतु आगे बढ़ेंगे। लेकिन सार्क से जुड़े सभी राज्यों को आज देख लीजिए। कोई आपसी विश्वास नहीं बचा है। एक देश दूसरे देश का विश्वास नहीं कर पा रहा है। तनाव भी कम नहीं है। हिंसा के बादल इस प्रकार छाए हुए हैं कि इन देशों में रह रहे नागरिकों को अपने-अपने लोकतंत्र पर खतरा नज़र आ रहा है। यह हिंसा की अजीब सी भय किसी भी दशा में लोकतंत्र को मजबूती नहीं दे सकती। ऐसा ही साऊथ कोरिया और नार्थ कोरिया में, इजरायल और फिलीस्तीन में और दुनिया के तमाम देशों के बीच नफ़रत और हिंसा का जो माहौल बन पड़ा है वह लोकतंत्र के लिए खतरा बन गया है। इसलिए लोकतंत्र को बचाने के लिए यह आवश्यक है कि नफरत और हिंसा का माहौल ठीक किया जए ताकि राज्यों की संसदें सही माहौल में शांति पूर्वक अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर सकें ओर अपने नागरिकों को सुरक्षाबोध देकर उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ सकें। संयुक्त राष्ट्र द्वारा किया गया प्रयास लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान करने में नाकाफी सिद्ध हुआ है। ईराक में अमरीकी सरकार द्वारा की गई पूर्व में मनमानी इसको समझने लिए एक बड़ा उदाहरण है। अब भी इसीलिए संयुक्त राष्ट्र पर बार-बार सवाल खड़ा किया जा रहा है क्योंकि 70 साल से अधिक समय हुआ यूएन के गठन के, लेकिन उसकी बेबाक छबि नहीं बन सकी। यूएन किसी न किसी दशा में किसी राज्य का पक्ष लेते हुए कटघड़े में खड़ा कर दिया जाता है। हिंसा रोकने के लिए प्रतिबद्ध जब संयुक्त राष्ट्र ही प्रश्नांकित होने लगा है तो हिंसा से रहित लोकतंत्र वाला विश्व हम कैसे देख सकेंगे? ऐसे में, दुनिया के तमाम समस्याओं को शांतिमय तरीके से हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र में सुधार करना आवश्यक है ताकि हम जिस न्यायप्रिय लोकतंत्र की अपेक्षा कर रहे हैं और जो लोकतंत्र विनिर्मित करने का स्वप्न देख रहे हैं, उसका सही रूप सृजित हो।

दुनिया में लोकतंत्र को लेकर हैरानियाँ
 उदारवादी लोकतंत्र और पश्चिम की राजनीति एवं मानक लोकतंत्र को नई बहस में ला दिए। जैसे-एक लचीला लोकतंत्र ही हिंसा और आतंक के खतरे को पराजित कर पाएगा। हिंसा की राजनीति जिन राष्ट्र राज्य की संस्कृति बन चुका है, उनकी अपनी-अपनी व्याख्याएं भी विकसित हो रही हैं। आज यह सवाल है कि क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत, लोकतंत्र के मानकों पर पूरी तरह खरा उतर रहा है? क्या अमरीकी लोकतंत्र दुनिया के लिए आज मिसाल बन सकता है? जबकि अमेरिका और यूरोप में मजबूत होती दिख रही पॉपुलिस्ट राजनीति और उसके नेता आधुनिक मानवाधिकार आंदोलनों और यहां तक कि पश्चिमी लोकतंत्र के लिए भी खतरा साबित हुए हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की 704 पेजों वाली वर्ल्ड राइट्स-2017 रिपोर्ट में मानव अधिकारों से जुड़े प्रमुख वैश्विक रुझान और कुल 90 देशों में स्थानीय हालात की समीक्षा शामिल की गई है। इसमें यह कहा गया है कि लोकतंत्र के लिए खतरा है ट्रंप जैसा पॉपुलिज्म। इसमें यह उल्लेख है कि बढ़ते पैमाने पर पॉपुलिज्म और उग्रपंथ के विकृत चेहरे का उदय हुआ है जो बढ़ते नस्लवाद, विदेशी विरोध, मुस्लिम विरोधी उन्माद और असहिष्णुता के दूसरे रूपों में एक दूसरे का पोषण कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल है कि शक्ति का विभाजन और लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार क्या है? हंगरी में लोकतंत्र है लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी पर काफी पाबंदियां हैं। मिस्र में लोकतंत्र की स्थिति देखें। चुनावी सुधार एक गंभीर समस्या है। सीरिया में तो आपदा की स्थिति है। अमेरिका ऐसा लोकतंत्र है जहां कई आवाजें हैं और सभी का अलग स्वर भी है। विशेषज्ञों ने पुतिन साम्राज्य को देखते हुए यहाँ तक कहा कि रूसी लोकतंत्र के लिए अब बहुत देर हो चुकी है। पुतिन ने पूरे देश को अपने कब्जे में ले रखा है। ग्रीस लोकतंत्र का पर्यायवाची था, ऐसा मानते हैं लेकिन अब क्या स्थिति है ग्रीस की। भारत में खुद धार्मिक कट्टरपन की वजह से लोकतंत्र पर नई बहस और नई परिभाषाएं गढ़ने की पुरजोर कोशिश हो रही है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की बात करें तो चुनाव आयोग के समक्ष पंजीकृत 1,900 से ज्यादा राजनीतिक दलों में से 400 ने आज तक कभी कोई चुनाव ही नहीं लड़ा। अब आयोग हर साल ऐसे दलों की छंटनी पर विचार कर रहा है। विभिन्न संवैधानिक संस्थाएं लोकतंत्र को मजबूती देने वाले चार स्तम्भ की तरह है। हर स्तम्भ का अपना महत्त्व है, लेकिन कोई भी दूसरे को कमजोर कर अकेले सब कुछ नहीं कर सकता। इसलिए एक दूसरे को मजबूत करना कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों की ही जिम्मेदारी है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। उसकी अब तक संवैधानिक भूमिका भले स्पष्ट न हो, किन्तु उसे जिम्मेदार और मजबूत बनाना और ज्यादा जरूरी है। आज लोकतंत्र की रक्षा मीडिया से सुनिश्चित होगी, ऐसा माना जा रहा है। किन्तु मीडिया हाऊस पार्टियों की तरफदारी में जब जुट जाते हैं तो ऐसे में मीडिया से भी लोगों का विश्वास डगमगाने लगा है। अन्ना ने यह चिंता जाहिर की थी कि इस देश के लोगों ने 1857 से 1947 तक 90 सालों तक अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी, इस देश में लोकतंत्र लाने के लिए। मगर राजनीतिक दल और नेता लोकतंत्र को आने ही नहीं दे रहे हैं। सच्चा लोकतंत्र तो तब आएगा, जब आम व्यक्ति चुनाव जीतकर लोकसभा और राज्यसभा में पहुँचेगा।  उनका मानना है कि अपने-अपने दलों को मजबूत करना राजनीतिक दलों की प्राथमिकता हो गई है, उनके लिए सत्ता और उससे पैसा तथा पैसे से सत्ता हथियाना ही लक्ष्य है। उनके लिए देश और समाज का कोई स्थान नहीं है। भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, जातिवाद का जहर यही लोग तो फैला रहे हैं, इनके खि़लाफ़ जब कोई बोलता है, तो उस पर सब मिलकर टूट पड़ते हैं।


ऐसी दुनिया के विभिन्न देशों में लोकतंत्र को लेकर हैरानियाँ हैं। कोई भी देश ऐसा आज पूरे विश्व में दावा नहीं कर सकता कि हम एक वेल्फेयर स्टेट हैं और हम लोकतंत्र-डेमोक्रेसी के आयडियल को प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। जैसे तैसे वाला लोकतंत्र पूरी दुनिया को ढो रहा है यह उस पटरी की तरह है जिस पर से चलने वाली रेल का भविष्य भगवान भरोसे है, ऐसा कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। महत्त्वपूर्ण यह है कि लोकतंत्र की व्यवस्था नागरिकों की बुनियादी जरूरत है। इससे अधिकारों का विकेन्द्रीकरण, अधिकारों का एहसास और उसका पुनउर्त्पादन संभव है। एक स्वस्थ नेशन-स्टेट की संकल्पना लोकतंत्र के जरिए की जा सकती है यद्यपि नेशन-स्टेट की भी जरूरत को खारिज किया जाता रहा है लेकिन वर्तमान समय में एक स्वस्थ लोकप्रिय लोकतंत्र कैसे सतत किया जा सकता है, यह विचारणीय है। इसमें कोई दो मत नहीं कि यदि संयुक्त राष्ट्र एवं दुनिया के वे लोग जो लोकतंत्र में विश्वास करते हैं और समस्त नागरिकों को लोकतांत्रिक माहौल देने के हिमायती हैं, अपनी एकजुटता बनाएँ और सही लोकतंत्र का मॉडल प्रस्तुत करें तो इस दुनिया के मनुष्यों का जीवन सबसे खूबसूरत हो जाएगा।

1 comment :

  1. आलेख अन्तर्मुख करता है। सत्य से सामना कराता है। हम भारतीय परिस्थिति को निष्पक्ष तर्क पर परख नहीं पाये तो लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर पायेंगे । यही इस आलेख का सन्देश हमें स्वीकारना चाहिए ।

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