फिल्मों में शहर/गाँव और संस्कृति: फिल्म गमन के विशेष संदर्भ में


किसी भी फिल्म को पर्दे पर देखते हुए दर्शक के अन्तर्मन में फ़िल्मकार यह स्पष्ट कर देता है कि फिल्म की कहानी किस समाज, व्यक्तित्व और शहर को प्रतिबिम्बित करती है। किसी फ़िल्मकार का यह नैतिक कर्तव्य भी है। दर्शक भी उस फिल्म को देखते हुए वास्तविक समाज की कल्पना कर पाने में सक्षम हो पाता है। हाल फिलहाल में ही रिलीज हुई फिल्म कहानी 2 को उदाहरण स्वरूप देखें तो यह समझ में आता है कि कहानी-2 कोलकाता की कहानी है। पूरी फिल्म में कोलकाता नायक के रूप में बना रहता है। फिल्म की नायिका विद्या बालन उस शहर की गलियों में दौड़ती भागती हुई दिखती है, उसी भाग दौड़ के सहारे उस शहर की सामाजिक स्थिति से भी दर्शकों का सामना होता है। बोलचाल, पहनावा, रहन-सहन आदि से उन तथ्यों की पहचान आसानी से की जा सकती है। फिल्म में कोलकाता से 35 किलोमीटर दूर एक छोटे से कस्बे चंदननगर में  विद्या सिन्हा (विद्या बालन) अपनी 14-वर्षीय बेटी मिनी (नायशा खन्ना) के साथ रहती है। बेटी मिनी चल-फिर नहीं सकती, उसी के उसके इलाज के लिए विद्या पैसा इकट्ठा कर अमेरिका जाना चाहती है। एक दिन उसका अपहरण हो जाता है और पूरी फिल्म उसी को खोजने और बंगाल की गलियों से गुजरती हुई आगे बढ़ती है।
ऐसी ही कई अन्य हिन्दी फिल्में उदाहरण स्वरूप हमें देखने को मिल जाएगी, जिनमें नायक के रूप में शहर या गाँव है। डेल्ही वेली, चेन्नई एक्सप्रेस, बदलापुर, डेल्ही6, मिशन कश्मीर, मुंबई मेरी जान, मुंबई मिरर, शूट आउट एट लोखंडवाला, चलो दिल्ली, सलाम बॉम्बे, वेलकम टू सज्जनपुर, पंजाब मेल, बॉम्बे टू गोवा, बॉम्बे टू  बैंकॉक, मद्रास कैफे, मुंबई से आया मेरा दोस्त, दिल्ली सफारी, जिला गाजियाबाद, क्या दिल्ली क्या लाहौर, बॉम्बे वेल्वेट, रमन राघव 2। 0 आदि फिल्में इसका प्रमुख उदाहरण मानी जा सकती है।

 संस्कृति प्रधान फिल्मों के लिए मशहूर फ़िल्मकार मुजफ्फर अली की ही तीनों  फिल्मों  गमन, उमराव जान और अंजुमन  में एक शहर के नायक के रूप के होने का जीता जागता नमूना माना जा सकता है। हिन्दी फिल्म जगत में मुजफ्फर अली एक लब्ध-प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं। एक संवेदनशील और सरोकारी फिल्म निर्देशक के रूप में उन्होंने तीन दशक से ज्यादा का वक्त भारतीय सिनेमा को दिया है। साथ ही अपनी विशिष्ट पहचान भी अर्जित की है। सन 1944 में लखनऊ के एक राजसी परिवार में जन्में मुजफ्फर अली की तालीम और तरबियत लखनऊ में ही हुई। इसी वजह से लखनऊ के प्राचीन वैभव एवं समकालीन मूल्यों को उन्होंने बेहद करीब से जाना समझा है। इसी समझ ने उनकी फिल्मों को एक चमत्कारी मौलिकता से नवाज़ा भी है। उनकी बनाई अधिकांश फिल्मों में लखनऊ हमें किसी पात्र की तरह नज़र आता है। जब कभी लखनऊ की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों की बात होती है मन में पहली छवि मुजफ्फर अली की ही उभरती है। उनकी सबसे पहली फिल्म गमन, उनकी हस्ताक्षर फिल्म उमराव जान और उनकी एक अप्रदर्शित फिल्म अंजुमन इन सभी फिल्मों में लखनऊ अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज़ करवाता है। इस शोध पत्र में मुजफ्फर अली की ही पहली फिल्म गमन को संदर्भ विशेष के रूप में रखा गया है। तथा फिल्म के दृश्यों,संवादों और कलात्मक पक्ष को अंतर्वस्तु विश्लेषण के जरिये देखने का प्रयास किया गया है ।
लखनऊ के युवा शायर हिमांशु बाजपेयी हिंदुस्तान अखबार के कॉलम लखनौवा में लिखते है कि  किसी शहर का चरित्र खोजना है तो उसके जन में बसे किस्से-कहानियों में खोजा जाए। इसमें तस्लीम करने में शायद किसी को कोई एतराज न होगा की हिंदुस्तान में मशरिकी (पूर्वी) सभ्यता व संस्कृति का जो आखिरी नमूना नजर आया वह अवध का पुराना दरबार था । पुराने चन्द्र वंशी परिवार विशेषकर राजा रामचन्द्र जी के इतने कारनामे साक्ष्य के रूप में हैं की इतिहास उन्हें अपने अंदर सामने में असमर्थ हैं और यही कारण हैं कि हिंदुस्तान का शायद ही कोई ही ऐसा अभागा गाँव व शहर होगा जहाँ उनकी याद में हर साल रामलीला के नाटक ना होते हो ।

फिल्मों में भी किसी शहर को पहचानने के लिए कुछ प्रमुख तत्वों को आधार बनाया जा सकता है। उदाहरण के रूप में उस शहर की बोली-भाषा, पहनावा, रहन सहन, खानपान, और उस शहर की वास्तविक लोकेशन की  जानकारी आदि । इस आधार पर सिनेमा में शहर को आसानी से खोजा जा सकता है। और इसी के सहारे किसी खास शहर की कहानी को फ़िल्मकार और भी ज्यादा तथ्य-परक और वास्तविक  रूप दे सकते है।

    इंट्रीगेटेड फ़िल्म्स के तत्वावधान में 1978 में बनी फिल्म मुजफ्फर अली की निर्देशन की पहली फिल्म  गमन अपने शहरीय चरित्र के लिए जानी पहचानी जाती है । यह फिल्म अवध के समाज और संस्कृति को दर्शाती है । अवध का समाज नवाबी और शानो-शौकत से परिपूर्ण माना जाता रहा हैं। फिल्में समाज को आईना दिखाने में सबसे अहम किरदार निभाती है’, इसी तर्ज पर मुजफ्फर अली ने इस फिल्म का निर्माण किया है। फिल्म में अवध की राजधानी लखनऊ के पास के एक शिया बाहुल्य गाँव कोटवारा की कहानी हैं। जहाँ तत्कालीन समय में हिन्दू मुस्लिम दोनों की आबादी लगभग समान रूप से रहती थी । फिल्म के अहम किरदार में फारूख शेख़ (गुलाम हसन), स्मिता पाटिल (खैरुन), जलाल आगा (लल्लू लाल तिवारी), नाना पाटेकर (बासू), सुलभा देश पांडे (बासू की माँ), गीता सिद्धार्थ (यशोधरा) तथा सतीश शाह हैं। फिल्म में  कोटवारा गाँव तथा बॉम्बे के टैक्सी ड्राइवरों की भी अहम भूमिका देखने को मिलती है।

    135 मिनट की इस फिल्म की कहानी खुद मुजफ्फर अली ने लिखी थी। निर्देशन भी उन्हीं का ही था। कहानी विस्तार में असग़र वजाहत, और मुजफ्फर अली की पहली बीबी सुभाषिनी अली ने मदद की थी। फिल्म में संगीत जयदेव ने दिया था। गीत स्व. मख्दूम मोहिउद्दीन और शहरयार के हैं, वहीं प्लेबैक सिंगर में सुरेश वडकर, हरिहरन, हीरा देवी मिश्रा और छाया गांगुली का नाम हैं । गौरतलब है कि जयदेव को इस फिल्म के संगीत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया था। वही मखदूम मोहिउद्दीनके लिखे एक गीत को स्वर छाया गांगुलीने दिया जिसके लिए उन्हें सन 1979 में सर्वश्रेष्ठ गायिका का राष्ट्रीय पुरस्कार भी  मिला । छाया गांगुली जयदेव की शिष्या भी रह चुकी थी। मखदूम की लिखी एक गजल रात भर आपकी याद आती रही को बहुत कम बहुत कम वाद्य यंत्रों के ज़रिये जयदेव के संगीत और छाया की आवाज ने इसे काबिले तारीफ बनाया हैं।
गजल की कुछ लाइनें इस प्रकार हैं ।
आपकी याद आती रही रात भर
चश्मे-नम मुस्कुराती रही रात भर
आपकी याद आती रही
रात भर दर्द की शाम जलती रही
रात भर दर्द की शाम जलती रही
गम की लौ थरथराती रही रात भर
                गम की लौ थरथराती रही रात भर…………

                फिल्म की सिनेमेटोग्राफी नदीम खान तथा सम्पादन जेठु मण्डल ने किया। वहीं फिल्म के संवाद हृदया लानी ने लिखे जो फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभाव डालते हैं। फिल्म के लगभग संवाद अवधी में हैं। मुजफ्फरअली निर्देशित इस फिल्म की सबसे खास बात यह रही कि फिल्म में बासु का किरदार निभा रहे नाना पाटेकर की यह पदार्पण फिल्म थी।

    फिल्म लखनऊ के पास के एक शिया गाँव की कहानी हैं। इस गाँव में हिन्दू मुस्लिम दोनों ही रहते हैं। गाँव मूलतः कृषि पर आधारित है। गाँव के पास में ही एक फैक्ट्री भी हैं जहाँ का अंदरूनी माहौल तानाशाही  से भरपूर हैं । इस तानाशाही के चलते गाँव में रोजगार की भी ख़ासी दिक्कत देखने को मिलती हैं । फिल्म में शिया मुसलमानों की संस्कृति को दर्शाने के लिए मदरसे में पढ़ रहे बच्चे, मस्जिद और पूरे गाँव का नज़ारा फिल्म की शुरुआत में ही दिखाया दिया गया हैं । फिल्म की कहानी खैरुन के चूल्हे में चाय बनाते हुए से शुरू होती हैं, वह अपने शौहर गुलाम हसन जो आठवीं कक्षा तक पढ़ा होने के बावजूद बेरोजगार हैं को जगाती हैं और चाय देती हैं। तभी गुलाम खैरुन को बीड़ी सुलगाने (गुलाम के पास में माचिस न होने के कारण) के लिए कहता हैं तनी सुलगाए लाओ।”

बेरोज़गार आदमी की घर में वास्तविक हालत क्या होती है फिल्म के सहारे समझा जा सकता है । बीड़ी पीते पीते ही गुलाम की माँ का संवाद उठौ सोवई करिहौ, सब अपनै काम धंधा परि गै है, और तुम्हरि खटिया नाई  छूटी, पानी-वानी लईहौ की बिछौना बीड़िहि फुकिहौ, यहू नहीं की कुछ हिल्लै लगीको सुनकर फिल्म की भाषा अवधी  होने का अंदाजा लगाया जा सकता है। तथा गुलाम की बेरोज़गारी का परिदृश्य नज़र आने लगता है।

          कहानी के अगले चरण में गाँव में किसी घर के पास बैठे पाँच- छह लोग फैक्ट्री में रोजाना अठन्नी कटने की बात करते हैं और उसका समाधान निकालने की जुगत में लगते हैं । उसी जगह गुलाम और लल्लू लाल भी वहाँ आ जाते है। लल्लू एक व्यक्ति से अपने उधार दिये हुए पाँच रुपये मांगता हैं और ठिठौली करते हुए कहता है पैसा न कौड़ी मदारन तौड़ीऔर फिर सबसे कहता है की तुम सब भी चलो बंबई और फिर फिल्म में एक संवाद बंबई के प्रति सोच को दर्शाया जाता है बंबई मा हुवा सुबेरे से शाम तक कान का मैलो निकालो तो खड़े कर लेव, दस पंद्रह रुपियाऔर फिर वे सभी लोग कहते हैं, लल्लू बाबू हमका सबका हियइह रहैंका तुम जाओ।फिर लल्लू उनको यह कहता हुआ गुलाम के साथ निकाल जाता हैं हा रहओ हियही और चाटो अमर सिंह के तलवे।” पूरा दृश्य गाँव के पास की फैक्ट्री के तानाशाही माहौल और दूसरे प्रदेश जाकर नौकरी करने से इस समस्या के समाधान की ओर इशारा करता है।

            इधर गुलाम भी बेरोज़गार है तो उसके घर वाले भी चिंतित है। गुलाम की माँ और खैरुन घर की परिस्थिति की आपस में चर्चा करती हैं। हालांकि खैरुन समझदारी भरी बातों से माँ को समझाती हैं और कहती हैं गुलाम को काम मिल जाते ही सब ठीक हो जाएगा। गुलाम की माँ की एक चिंता और भी है, जो इस संवाद के पेश की गयी है  अठवी तक पढे हैं ढलियौ तो नाई ढोई पइहै। तब तक गुलाम आ जाता हैं और माँ की दवाई भी लेकर आता हैं। पान तंबाकू न खाने की सख़्त हिदायत भी देता हैं ।

फिल्म में संगीत और अवधी संस्कृति को दिखाने के लिए फिल्म की शुरुआत से ही हीरा देवी मिश्रा की गायी ठुमरी आजा सवरिया तोहे गरबा लगा लूँऔर अनीस के मरसिए का प्रयोग किया गया है। फैजाबाद में जन्मे मीर अली अनीस गजल, सलाम, रुबाइयाँ भी लिखते थे, पर उन्हें ख्याति अपनी मरसिया से ही मिली थी। मरसिया वस्तुतः किसी भी परिजन की स्मृति में लिखे शोकगीत को कहते हैं। किन्तु उर्दू में लिखे गए अधिकांश मरसियों के केंद्र में कर्बला की त्रासदी और इमाम हुसैन की शहादत ही हैं। अनीस के मरसियों में रात का सफर खत्म होने, हजरत मुहम्मद के कर्बला जाने, सेना को पानी न मिलने, जैनब के दोनों पुत्रों के वीर गति प्राप्त करने की घटनाओं का करुण और हृदय-ग्राही वर्णन किया गया हैं। अन्य मरसियों में विभिन्न आयु के चरित्रों और उनमें पारस्परिक संबंधों का भी मार्मिक निरूपण देखने को मिलता हैं, इनकी मरसियों की भाषा बेहद सरल और मुहावरों का सटीक प्रयोग भी देखा जा सकता हैं। कमला नसीमा के अनुसार करुणा इन मरसियों का प्राण है, संवेदना, आधार, और मर्यादा अद्भुत वर्णात्मकता ही इनकी उत्कृष्टता का रहस्य हैं” 

                  जिस प्रकार हिन्दू समाज में तुलसी दास की चौपाई अपना प्रभुत्व रखती हैं उसी प्रकार अनीस के मरसिए मुस्लिम जगत की संस्कृति में अपनी छाप छोड़ती हैं। इस फिल्म में मरसिए और ठुमरी ने अवध की संस्कृति को दर्शाने में अहम भूमिका निभाई हैं। फिल्म की शुरुआत में ठुमरी और मरसियों का प्रयोग मानवीय संवेदनाओ को व्यक्त करने के लिए किया गया हैं फिर वो चाहे ठाकुर के यहाँ जाते हुए मुहर्रम के जुलूस के दौरान पढे गए मरसिए हो या बंबई जाने के दौरान पार्श्व के बजने वाली धुन हो।

आजा सवरियाँ तोहे गरबा लगा लूँ के संगीत में ठुमरी सिनेमा देखने वाले दर्शक को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए काफी हैं। ठुमरी भारतीय संगीत की एक गायन शैली है, जिसमें रस, रंग और भाव की प्रधानता होती है। प्रायः ठुमरी गायक या गायिका को एक ही शब्द अथवा शब्द समूह को अलग-अलग भाव में प्रस्तुत करना होता है। महाकवि कालिदास ने 'मालविकाग्निमित्र' नामक नाटक में मालविका द्वारा छलिका का बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है। ठुमरी इसका ही परिवर्तित रूप मानी जाती है। ठुमरी गाने के लिए कल्पनाशील होना आवश्यक है। इसके साथ ही भावपूर्ण हृदय, मधुर और लोचक आवाज़ भी आवश्यक है। यह गुण स्त्रियों में अधिक पाए जाते हैं। इसलिए इसे 'स्त्री प्रधान गायन शैली' भी कहा जाता है।

             फिल्म के सिद्धांतों पर भी खरी उतरने वाली यह फिल्म आधे घंटे के दौरान फिल्म के लगभग सभी मुख्य पात्रों का परिचय करा देती है। यह फिल्म लखनऊ के पास के शिया गाँव की संस्कृति का दर्पण हैं जो तत्कालीन समय की संस्कृति से पूरी तरह मेल खाती नज़र आती है। फिल्म में हिन्दू-पात्र लल्लू लाल तिवारी, पुत्तू और मुस्लिम समुदाय के गुलाम के परिवार के तौर पर हिन्दू मुस्लिम एकता और गंगा-जमुनी तहजीब को भी बखूबी पेश किया गया है । गाँव में रोजगार न होने के कारण अपना देश छोड़कर जाने का दर्द और दुख कैसा होता है और इससे कौन-कौन प्रभावित होते हैं यह आसानी से देखा समझा जा सकता है। फिल्म में अवध की संस्कृति का संगीत और अवधी भाषा के इस्तेमाल से इसे  निखारने का पूरा प्रयास और सफलता भी पायी गयी हैं।

 गाँव में रोजगार की समस्या से परेशान गुलाम अब बंबई जा चुका हैं । अपने गाँव और शहर लखनऊ से दूर वह पहली बार निकला है । ऐसे में गुलाम के साथ-साथ दर्शक भी किसी एक शहर से दूसरे शहर की ओर प्रस्थान करते हुए मालूम देते है।
गुलाम बंबई में लल्लूलाल का पता पूछते हुए रुखसत कर चुका हैं । निर्देशक अब अवध के साथ मुंबई की संस्कृति को भी प्रदर्शित कर रहे है । बस कंडक्टर का संवाद तथा बोलने का ढंग (खड़ा नहीं रहने का भाऊ) ही बता देता हैं कि गुलाम अब बंबई पहुँच चुका हैं। अपने दोस्त को बंबई की अंजान गलियों में ढूंढते हुए गुलाम हिचकिचाता नहीं है और उन गलियों से गुजरता है जहाँ देश के अन्य प्रदेशों से आयें हुए लोग वहाँ काम धंधे के लिए बसे हुए है। फिलहाल  लल्लू से मिलते ही लल्लू गुलाम को यह कहते हुए (अरे गुलाम, चिट्ठी नाय, पत्री नाय, मान गए कलेजा तोहार गुरु) सुनना अच्छा लगता है।

     आप देश के किसी भी कोने में जाइए आम तौर पर उस शहर से आपका परिचय आपके परिजन रिश्तेदार  जरूर करवाते है। उसी तरह दूसरे दिन सुबह होते ही लल्लू गुलाम को जार्ज पंचम द्वारा बनवाए फाटक, सेंट्रल लाइब्रेरी, मुंबई का वीटी स्टेशन, वलार्ड स्टेट, जैसी जगहों में घुमाता है।

गुलाम अपने गाँव से पैसे कमाने के लिए आया होता हैं तो जाहीर है उसे मुंबई में सबसे ज्यादा जरूरत काम की थी। ऐसे में  इसीलिए लल्लू उसे कोटवारा से ही आए हुए रामप्रसाद जो की 35 सालो से बंबई में ही रहते हैं, उनसे मिलवाता हैं। रामप्रसाद और गुलाम की बात होने पर पता चलता हैं कि गुलाम के पिता और रामप्रसाद बहुत ही अच्छे दोस्त थे। रामप्रसाद काम के लिए गुलाम को अपने किसी दोस्त के पास भेज देता हैं। अब गुलाम को गाड़ियों को धोने पोंछने का काम मिल जाता हैं।

          अब लल्लू और गुलाम के अलावा कोटवारा के रामप्रसाद और उसका दोस्त भी मिल चुके थे ऐसे में  सभी लोग अपनी भाषा को ही तबज्जो दे रहे थे। तीनों का मिलन गंगा-जमुनी तहजीब को बढ़ावा दे रहा है। काम मिलते ही फिल्म अब दूसरी तरफ यानि गुलाम के परिवार की दिनचर्या की तरफ मुड़ती है। उधर लल्लू द्वारा गुलाम के घर भेजा गया मनीऑर्डर पहुँच चुका हैं। मनीऑर्डर जैसे शब्दों से अनभिज्ञ गुलाम की माँ डाकिये से पूछती है ई मनी आडर को आय?” डाकिया बताता है कि गुलाम भैया ने परदेश से पैसा और चिट्ठी भेजा हैं। वैसे मनीऑर्डर भेजना और उसे दूसरी तरफ प्राप्त कर लेने की पुष्टि सरकारी कामकाज हैं तो उसी कारण डाकिया गुलाम की माँ से अंगूठा लगाने के लिए कहता हैं। तब गुलाम की माँ कहती हैं कि अंगूठा लगाव तुम और पईसा देव हमका तो डाकिया फिर समझाता है कि ये सरकारी कानून हैं माता जी और फिर गुलाम की माँ फिर से अरे तोर सरकार की और उहके कानून की कहते हुए अंगूठा लगा देती हैं। फिल्म के बोले गए संवादों से स्पष्ट हैं कि फिल्म अवध की पृष्ठभूमि पर ही आधारित हैं। हर जगह घूम फिर कर अवध और उसके समाज को ही दर्शाया गया हैं। हम इस फिल्म को भाषा के तौर पर हिन्दी-अवधी मिश्रित मान सकते हैं।

              धीरे-धीरे गुलाम भी अब गाड़ी चलाना सीख रहा होता हैं । जिससे लल्लू की तरह वो भी टैक्सी ड्राइवर बन सके। गाँव में दिन भर पड़ा रहने वाला निठल्ला गुलाम अब रोजी-रोटी के परिश्रम से हुनर सीख रहा हैं। फिल्म में गाड़ी सीखने वाला दृश्य सराहनीय हैं। धीरे-धीरे दिन बीत रहे हैं उधर गुलाम गाड़ी सीख चुका हैं। इधर उसकी माँ और बीबी को उसकी याद भी सताने लगी। हम बताते चले कि जब गुलाम बंबई गया था तब से लेकर  गुलाम के घर वालों को उसकी याद आने तक के बीच के समय को दर्शाने के लिए मुहर्रम की सातवीं शब्द का इस्तेमाल किया गया हैं। इसी दौरान के एक संवाद में गुलाम की माँ कहती हैं कि आज मुहर्रम की सातवीं हैं भइया का गए पूरा एक साल होई गवा। हालांकि इस बीच गुलाम ने कोई खत या पैसा घर पर नहीं भेजा था। उसी समय डाकिया चिट्ठी लेकर गुलाम के घर पहुँच जाता हैं, चिट्ठी में  गुलाम अपनी खैरियत और माँ और बीबी की सलामती की दुआ सलामती लिखता हैं। और जल्दी काम मिलने की बात बताता हैं। गुलाम अपने गाँव के ही रामप्रसाद व अन्य लोगों के बंबई में ही होने और टैक्सी चलाने की बात लिखकर अपनी माँ से शब्बाखैर लिखता हैं। फिल्म में दूसरी तरफ लल्लू अपनी प्रेमिका के साथ जूहु चौपाटी पर अपने प्रेम प्रसंग को आगे बढ़ाता नज़र आता हैं और वही अपने भविष्य के ताने बाने बुनता हैं। लल्लू की प्रेमिका उसे शादी करने के लिए कहती हैं तो लल्लू गरीबी और घर बार ना होने की बात कह कर अपनी किस्मत को दोष देता हैं। लल्लू इधर अपनी प्रेमिका के साथ है वही गुलाम अपने भेजे खत के जवाब (जो उसकी बीबी दोबारा भेजती हैं) को पढ़ता हैं और उसे याद करता हैं। संवादों और लोकेशन से मुंबई शहर और अवध को दर्शक आसानी से पहचान सकते है।

                  गुलाम से उसकी बीबी गाँव में अकेले मन न लगने की बात को लिखकर खुद और माँ को बंबई  बुलाने की बात कहती हैं। इन सब बातों से एक बात तो साफ निकाल कर आती हैं की लल्लू गुलाम या रामप्रसाद सबके सब जिन परिस्थितियों में अपना घर गाँव छोड़ कर बंबई कमाने आए हुए थे और वहाँ  भी उनकी हालत बदतर ही नज़र आई। एक टैक्सी ड्राइवर की हैसियत से वो कितना कमा कर अपना घर बार चला सकते थे, फिल्म टैक्सी ड्राइवर की सच्ची दास्तान और दर्द को भी दर्शाती नज़र आती है। अचानक रामप्रसाद की टैक्सी  के दुर्घटना ग्रस्त होने सा संदेश आता हैं, और वो चल बसते हैं।
इस गीत से पूरा दृश्य समेटने की कोशिश की गयी है ।
 “अजीब ख्वाब मुझ पर गुजर गया यारो
मैं अपने साये से कल रात डर गया यारो

                  फिल्म का यह गीत  रामप्रसाद की मौत और वहाँ के आस पास के टैक्सी ड्राइवरों  के दुख का प्रतीक बना। जिसमें अवध के संगीत का बखूबी प्रयोग किया गया हैं। गीत और उस दृश्य से किन हालातों में लोग अपने शहर को छोड़ कर पलायन करते हैं इसे दर्शाने की पूरी कोशिश की गयी और दृश्य गुलाम और उसके गाँव के लोगों  के प्रति सांत्वना प्रकट करती दिखाई देती है। पलायन के बाद भी लोगों की समस्या और उनके बीच के संचार को अपनी ही बोली भाषा में दिखाना फिल्म को मजबूती प्रदान करती हैं।

               एक बात तो जेहन में जरूर ही आती है कि अपना घर-बार छोड़ कर पैसे कमाने और परिवार चलाने का सपना लिए पलायन करते लोग यहाँ भी पूरी तरह खुश नहीं थे। न तो इनकी आर्थिक स्थिति ठीक थी, न ही वो मानसिक रूप से सही हालात में जीवन बसर कर रहे थे । फिल्म के पात्र  रामप्रसाद 30 सालों तक टैक्सी चलाने के बावजूद वे हमेशा झूठी हँसी हँसते हुए मर गए। उनके जैसे बहुत से टैक्सी ड्राइवर विभिन्न प्रांतों से आकर मुंबई में बसे थे पर एक झूठी खुशी और बड़े शहर की चकाचौंध में फँस कर जीते हुए दिखाई देते हैं।

                फिल्म में रामप्रसाद की मौत के बाद गुलाम भी काफी चिंतित हुआ। क्योंकि उसने भी टैक्सी चलानी सीख ली थी। कब उसका ऐसे ही देहांत हो जाए इसका डर उसे सताने लगा  । साथ ही घर की याद भी उसे दुगनी सताने लगी। एक ओर गुलाम उम्रदराज होने के बावजूद काम करता है वहीं  यशोधरा का निकम्मा भाई बैठे-बैठे ही घर पर खाता हैं। दो भिन्न समाज के जब एक ही उम्र के लोगों  की कहानी इस तरह की होती हैं कि बेहतर समाज चुनने को लोग मजबूर हो जाते हैं। गुलाम को अच्छा और बासु (नाना पाटेकर) को बुरा भला कहते दर्शक पाये जा सकते है।

             गुलाम का अपनी माँ को लिखे खत में अपनी खैरियत और गाड़ी चलाने से मिले पैसे की  खबर को अवधी भाषा में ही पेश किया गया हैं। फिल्म को यही बात जमीनी स्तर से जोड़े रखती हैं। इस खत में गुलाम अपने लिए सिलाई हुई वर्दी तथा अन्य खर्चो का विवरण देते हुए पैसे की पूरी तरह से पूर्ति न होने की बात लिखता हैं और उदाहरण के तौर पर बताता हैं कि लल्लू के इतने दिनों से गाड़ी चलाने के बावजूद उसके पास अपनी खोली (घर) नहीं हैं और मैं किसी तरह पैसे जोड़ कर घर आता  हूँ। खैर गुलाम की ज़िंदगी में एक भी ऐसा पल नहीं आया जब उसे घर की याद ना आई हो और वह अपने काम और पैसे के बारे में ना सोचता हो। उसके लिखे खत के जवाब में खैरुन लिखती हैं:
             गए जुम्मेरात अम्मा गिर पड़ी कूल्हे कि हड्डी टूट गयी, टुकटुक भइया डाक्टर लई के आए रहें, डाक्टर कहिन हैं कि जल्दी अम्मा का लखनऊ के अस्पताल में दिखावई का पड़ी, अम्मा को बहुत तकलीफ हैं, रोवती रहती हैं, और कहती हैं कि भइया का लिखौ जल्दी वापस आ जाय, बहुत हो गया बंबई, अब नहीं चाहिए बंबई की कमाई, मुझे अकेले बहुत डर लग रहा हैं आप पैसों का जुगाड़ करके फौरन चले आओ । कसम हैं आपको।
 पूरे खत में माँ और बीबी की मार्मिक आवाज और करुणा दर्शाई गयी हैं। माँ का दिल जहाँ बेटे पर रखा रहता हैं वही बीबी अकेले होने की बात कहती हैं। इसके इतर गुलाम की आर्थिक स्थिति उसे वापस घर जाने की इजाजत नहीं देती। माँ की हालत दिन पर दिन खराब होती जा रही थी इधर गुलाम खत को पढ़-पढ़ कर और परेशान होता था। गुलाम पैसे के जुगाड़ के लिए दो चार अपने जानने वालों के पास गया पर वहाँ उसे कोई जवाब नहीं मिला।

              फिल्म के इस दृश्य के बाद रखे गीत की प्रशंसा इसलिए अनिवार्य हैं क्योंकि इस गीत के लफ्ज कहीं न कहीं पूरे दृश्य को भरते दिखाई देते हैं। क्योंकि जहाँ गुलाम पैसे के लिए जाता हैं उसे लोग अपनी स्वयं की परेशानी बता कर उसकी सहायता न कर पाने का दुख जाहिर करते हैं।
गीत के शब्द इस प्रकार हैं  :-
सीने में जलन, आँखों में तूफान सा क्यों हैं
इस शहर में हर शख्स, परेशान सा क्यों हैं

              इस गीत को सुरेश वडकर ने अपनी आवाज दी हैं और संगीत जयदेव तथा बोल शहरयार ने लिखे थे। गीत के बाद लल्लू और यशोधरा के आपस के संवाद को फिल्म में नया मोड़ दिया। यशोधरा के काका और भाई बासु यशोधरा को दुबई भेजने की जिद करते हैं। कोई भी भारतीय संस्कृति सभ्यता से परिचित औरत इसे करने में हमेशा दूर रहेगी। यशोधरा लल्लू से अपनी बात बताती हैं और यशोधरा लल्लू से जल्दी खोली का जुगाड़ कर शादी करने की जिद करती हैं। यशोधरा कहती है मुझे नहीं रहना उस घर में। तभी पैसे का इंतजाम न होने के कारण निराश गुलाम घर आता हैं तब लल्लू पूछता हैं कि क्या हुआ, और सारा मामला जान कर पैसे के जुगाड़ हो जाने की  बात कहता हैं। अगले दिन लल्लू गुलाम को यशोधरा से लेकर पैसे देता है। गुलाम के पास अब 200 रुपये का इंतजाम हो गया था और इसे लेकर वो वापस खोली में जाने लगा तो रास्ते पर गुलाम को महाराष्ट्र की संस्कृति में चल रही शादी का आयोजन दिखाई देता हैं और उसकी टैक्सी जाम में फँस जाती हैं। उसी समय उस दृश्य को देखकर गुलाम को अपनी नयी नवेली दुल्हन की तरह सजी हुई खैरुन का ख्याल आता हैं। रास्ते पर नाच रहे लोगों  को देखकर गुलाम को अपने गाँव में चल रहे मौहर्रम के चालीसवें (चेहल्लुम) का दृश्य याद आता हैं ।

              अपने शिया संस्कृति के इस योगदान को वह महाराष्ट्र  के समाज की खुशी के मौके पर याद करता हैं कारण उसकी माँ, बीबी, आर्थिक स्थिति, और उसका छूटा हुआ गाँव हैं। सीधे शब्दो में कहे तो गुलाम भले ही बंबई में एक शादी के आयोजन के पास से गुजर रहा था, किन्तु उसे याद अपना चेहल्लुम (मातम) आता है। उसे इमाम हुसैन की शहादत याद आती है, बीबी याद आती है, माँ याद आती हैं और याद आता है अपना गाँव जिसे छोड़ वह यहाँ कमाने के लिए पड़ा हुआ था और वह इतना भी कमा नहीं पाया जिससे वह दोबारा अपने घर वापस जा सके। घर आकर यशोधरा का बाप फिर से गुलाम से पेट्रोल मांगता हैं पर किसलिए, फिल्म में इस मिथक को अभी तक नहीं तोड़ा गया।   
                  
        यशोधरा का भाई बासु (नाना पाटेकर) और काका उसे लगातार दुबई भेजने की जिद और टार्चर करने में लगे थे, वैसे समाज में फैली ऐसी कुप्रथा को समाज में बासु जैसे निकम्मे लोगों  ने काफी हद तक बढ़ावा दिया था। यशोधरा भाग कर लल्लू के पास आ जाती हैं और रो-रो कर इस पूरी घटना को बताती हैं और भाई की इस नीच और घटिया सोच को दर्शाती हैं। लल्लू यशोधरा को लाकर फिर जुहू-चौपाटी चला जाता हैं और उधर बासु यशोधरा के घर से आने के कारण वह काका के साथ मिलकर लल्लू को मार कर रास्ते का पत्थर हटाने की योजना बना चुका होता हैं। लल्लू और यशोधरा आपस में गुफ्तगू कर रहे होते हैं काफी सूझ बूझ कर अपने फैसले लिए की उन्हें क्या करना चाहिए। उधर गुलाम और खैरुन के दृश्य भी फिल्म में जान डाल रहे होते हैं, गुलाम जहाँ पैसे गिन रहा होता हैं वहीं खैरुन गाँव में अम्मा के पैर दबा रही होती हैं। स्पष्ट हैं कि गुलाम आने की तैयारी में और खैरुन माँ की सेवा में लगी हुई है। इस दृश्य के बाद वाले गीत आपकी याद आती रही रात भर ने फिल्म के दर्शकों को पूरी तरह भाव विभोर कर दिया।

                लल्लू और यशोधरा जुहू से वापस आते हैं। उसी समय ताक लगाए हुए बासु और उसका काका लल्लू को मार देता है। जब गुलाम को इस बात का पता चलता है तो एक तरफ जहाँ पहले से ही दुख से घिरा हुआ गुलाम अब एक और बड़ी मुश्किल में फँस चुका है, उसका सबसे ज्यादा अच्छा दोस्त उसे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुका है। यशोधरा की किस्मत तो स्वाभाविक ही बुरी हो चली थी। गुलाम और लल्लू हिन्दू मुस्लिम होने के बावजूद दोनों ने पूरी फिल्म में मिलाप दिखा। बंबई में इतनी तंगी के बावजूद उसने कभी भेदभाव नहीं किया। हर संभव मदद की। सबसे खास बात हैं यह है कि दोनों के घरों के रिश्ते भी पाक साफ थे, जब भी गुलाम अपनी अम्मा को खत लिखता तो लल्लू आदाब जरूर लिखवाता। और खैरुन हमेशा लल्लू के बारे में पूछती रहती थी। गुलाम अब पूरी तरह से अकेला हो चुका था और वो अपना समान बांध कर गाँव जाने की तैयारी कर चुका था। यशोधरा का बाप पेट्रोल मांगने आता हैं इस बार गुलाम उसे पेट्रोल दे देता हैं। पेट्रोल पाकर यशोधरा का बाप समुद्र में  पेट्रोल डाल कर आग लगा देता हैं, और अपने दिल में वर्षों से जल रही आग को ठंडा करता हैं, इस दृश्य में  काफी मार्मिकता नज़र आई और इसे समाजशास्त्री अपने-अपने ढंग से अपनी राय देते हैं। वैसे गुलाम की तरह यशोधरा का बाप भी पलायन का शिकार और आर्थिक तंगी झेल रहा था ऊपर से उसका लड़का बासु कमाता भी नहीं था उसकी भी टेंशन उसे हमेशा खाये जाती थी।

                       फिल्म अब अपने चरम पर हैं, निष्कर्ष की ओर निर्देशक बढ़ रहे है । दर्शकों को यह जरूर लगता हैं कि अब गुलाम को वापस जाकर अपना घर बार संभाल लेना चाहिए और कुछ काम धाम करके घर में ही खुश रहना चाहिए जिससे  कम से कम घर और अपने समाज में तो रहेगा। लेकिन होता कुछ और हैं ।

          गुलाम स्टेशन पहुँच चुका हैं और ट्रेन भी आ चुकी है। यह भाग काफी दर्द भरा है । फिल्म में दो भिन्न शहरों का समाज और संस्कृति  एक साथ देखने और सुनने को मिल रही हैं। तभी अवध की निशानी आजा सावरियाँ तोहे गरबा लगा लूँ एक ठुमरी बजती हैं जो अवध के समाज को प्रदर्शित करती नज़र आ रही हैं। अब गुलाम के पास माँ का डर, बीबी का अकेलापन तथा लल्लू के मरने का दुख तो था ही इसके बावजूद घर जाकर फिर से बेरोजगारी में जीना और घर में बीमार पड़ी माँ की दवा दारू का खर्च सोच कर वो बंबई छोड़कर जाने से कतराने लगता है। उसे अब सिर्फ माँ का दर्द और गाँव में बेरोजगार रहने के डर ने बंबई में ही  रहने को मजबूर कर दिया। क्योंकि गुलाम के पास सिर्फ 200 रुपये थे, जिनमें से 150 रुपये तो घर जाने में ही खर्च हो जाते ऐसे में  उसके पास क्या बचते और कैसे वो माँ की दवा करा पाता? गुलाम फिर से इस बार भी अपने देश वापस नहीं जा पाता लेकिन उधर खैरुन हमेशा उसका दरवाजे पर इंतजार ही करती दिखाई देती है और गाती है, आजा सावरियाँ तोहे गरबा लगा लूँ।

         बंबई जैसे बड़े शहर में पलायन किया हुआ इंसान जब उस शहर के खूनी पंजे और चकाचौंध में अंधा होता हैं तो उसे इस तरह के फैसले जीवन में लेने ही पड़ते हैं। जहाँ तक फिल्म की बात हैं, कई मायनों में यह मार्मिक रही। जिसमें से एक माँ-बेटे का प्यारगुलाम और खैरुन, लल्लू और उसकी माँ, लल्लू और यशोधरा का प्रेम हो, गुलाम लल्लू का ताना-बाना हो या हिन्दू मुस्लिम एकता की निशानी हो सभी बातें सिर्फ अवध की शान को बरकरार रखने में काफी हद तक सफल हुई हैं। वहीं सबसे उम्दा खासियत फिल्म की बोली भाषा हैं। बंबई जैसे शहर में रहने के बावजूद पलायन करने वाले लोग किस तरह से अपनी बोली भाषा का  प्रयोग करते हैं काबिले-तारीफ हैं। फिल्म के सभी संवाद मेरी नज़र में फिल्म को सच्ची दास्ताँ के काफी करीब ले जाते हुए सुनाई पड़ते है। गुलाम को लखनऊ छोड़ने का दर्द वैसा ही मालूम पड़ता है जैसे लखनऊ से पलायन करते हुए वहाँ के नवाब वाजिद अली शाह ने एक शेर कहते हुए कहा था :-
    “जब छोड़ चले लखनऊ नगरी, कहो हाल-ए-पिया दिल पर क्या गुजरी”   

                फिल्म का संगीत, संवाद, पटकथा उम्दा हैं जिसमें अवध के समाज और वहाँ की संस्कृति को ध्यान में रखकर तैयार किया गया तथा जिसमें अवध की विशेषता देखने को मिलती हैं। फिल्म अवध के समाज और संस्कृति की जमीनी हकीकत बयाँ करती नज़र आती है।

एक शहर जिसका खयाल आते ही ज़हन में तहज़ीब की शमाएँ रोशन हो उठती हैं, जिसका जिक्र छिड़ते ही दिल की गलियां गुलशन हो उठती हैं। लखनऊ वो तिलिस्म है जिसमें कैद हुआ शख्स कभी आज़ाद नहीं होना चाहता, जो दुर्भाग्य के कारण यहां से निकल भी जाते हैं वो अपनी आंखों में लखनऊ के मंज़र लिए भटकते हैं और इसकी यादों को अपने कलेजे से हरदम लगाए रहते हैं। वाजिद अली शाह के हवाले से इतिहास गवाह रहा है कि ऐसे दीवाने जहाँ भी जाते हैं एक नया लखनऊ बसा देते हैं, लखनऊ वाले कहीं भी रहें लखनवी आदाब कभी नहीं भुलाते। इसी धारणा से एकदम मेल खाती 1978 में बनी फिल्म गमन में अली साहब ने एक व्यक्ति गुलामजो रोजी रोटी कमाने के लिए अपना शहर, अपना परिवार छोड़ उसे बड़े शहर की तरफ जाना होता है और फिर आखिर तक वो अपने शहर को दिल का दिल में बसाये ही रह जाता है पर बड़े शहर का खूनी पंजा और रोजी रोटी के जाल में फँसा गुलाम घर आने के लिए तरसता रहता है। गुलाम के साथ-साथ यही समस्या लगभग पूरे ग्रामीण लखनऊ के मध्यम वर्गीय समाज की भी थी जिसे फिल्म में गुलाम व उसके परिवार को केन्द्रित करते हुए दिखाया गया है।

संदर्भ
·       फिल्म गमन 1978 का अंतर्वस्तु विश्लेषण
·       सहर सादिका नवाब, लोकप्रिय शायर, मजरूह सुल्तानपुरी, संस्करण 2002 वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
·       प्रवीन योगेशपीली कोठी, संस्करण 2010, सुलभ प्रकाशन, लखनऊ
·       प्रवीन योगेश, डूबता अवध, तृतीय संस्करण 2010, सुलभ प्रकाशन, लखनऊ
·       प्रवीन योगेश, लखनऊ नामा,चतुर्थ संस्करण 2011, भारत बुक सेंटर, लखनऊ
·       बहुवचन, सिनेमा के सौ साल, संपादक अशोक मिश्र प्रकाशन वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय अंक अक्तूबर-दिसंबर 2013  
·       बहुवचन, सिनेमा के सौ साल, संपादक अशोक मिश्र प्रकाशन वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय अंक जनवरी-मार्च 2014   
·       बहुवचन, सिनेमा के सौ साल, संपादक अशोक मिश्र प्रकाशन वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय अप्रैल-जून 2013
·       लमही, संपादक ऋत्विक राय, अंक जुलाई-सितंबर 2010 प्रकाशन गोमती नगर लखनऊ संपादकीय {स्क्रीनप्ले: आशुतोष पाठक}
·      परिकथा, संपादक डा॰ नामवर सिंह, युवा सिनेमा अंक, नवंबर-दिसंबर 2011
·       भारतीय सिनेमा का सफरनामा, संपादन प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली  

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।