आँसू

मनोज कुमार सिंह

मनोज कुमार सिंह


मैं जिस आँसू की बात कर रहा हूँ वह कोई व्यक्ति नहीं। यह तो वह आँसू है जिसे प्रत्येक मानव धारण करता है। विडम्बना यह है कि हम इसे तभी देख पाते हैं जब यह बाहर आता है। यूँ कहें तो यह आँसू उस सच्चे मित्र कि भाँति होता है, जो दुःख-सुख दोनों ही स्थितियों में आप के साथ होता है। वैसे देखा जाये तो, यह वह मित्र है जो बोल नहीं सकता, पर आप को अच्छी तरह समझ सकता है। जब आप बहुत दुःखी या बहुत खुशी में होते हैं तो यह सहज ही आप की आँखों से निकल आते हैं। इस आँसू को हल्के में मत तोलिए, यह तो अनमोल है। जैसा कि आप बहुत बार, बहुत जगह, सहज ही सुन लेते हैं “ये आँसू बहुत अनमोल हैं इन्हें सहेज कर रखो"। अब बात हम इन आँसुओं की गहराई में जाते हैं। यह आँसू वास्तव में कीमती होते हैं। जब व्यक्ति बहुत दुःखी हो, वह अपने हालात से लड़ते-लड़ते थक कर निराश हो जाता है, उसे कोई रास्ता नजर नहीं आता तो, यही आँसू सच्चे मित्र की भाँति उम्मीद की किरण दिखाते हैं और आप की आँखों से बाहर आते हैं। वैसे आपके जीवन में बहुत से ऐसे वक्त आये होंगे जब आँख से आँसू आये होंगे। ये आँसू हमारी दृष्टि में फरिश्ते से कम नहीं। चूँकि जब ये आते एक उम्मीद बांध के चले जाते हैं। इन आँसुओं के जाने के पश्चात् हमें एक अजीब सी शान्ति मिलती है और हमारे दुःख या गम हल्का होते प्रतीत होते हैं। इनके जाते-जाते एक उम्मीद की किरण नज़र आती है। हम उस किरण की ओर अग्रसर होते हैं। यदि दूसरे पक्ष खुशी की बात करें तो, अधिक कहने की बात नहीं यह तो आप सभी जानते ही है कि, बहुत खुशी होती है तो भी ये मित्र रूपी आँसू सहज ही आ जाते हैं।

अब थोड़ी सी बात हम अपने अन्दर वाले मित्र आँसू के बारे में मनोवैज्ञानिक रूप से करना चाहेंगे। वैसे तो हमारे पास कोई वैज्ञानिक पैमाना नहीं कि, इसे मैं सिद्ध कर सकूँ। इतना जरूर कह सकता हूँ कि, ये आँसू बहुत  कीमती हैं, जिनका कोई मोल नहीं। ये तभी आते हैं, जब मानव का हृदय भाव से युक्त हो। ऐसे कई अवसर आते है जब ये आँसू हमें अपराध करने से बचाते हैं। यह अपराध स्वयं का अपने पर हो या दूसरों पर। देखा जाये तो जब अपराध करने जाते हैं, तो दूसरे के आँखों में आँसू देख कर यह मानव रूपी हृदय द्रवित हो जाता है और हम उसकी गलतियों को क्षमा कर देते हैं। यह तभी होता है जब मानव के अन्दर मानवता एवं सहृदयता हो। और तो और ये आँसू उस व्यक्ति को भी सुधरने का अवसर देते हैं, जो गलती करता है। मजे की बात तो यह है कि, ये हमें भी ऐसे कई मौके पर बचाते हैं जब हम अपने आप को मारना चाहते हैं।

ये आँसू उस वक्त भी कारगर होते हैं जब हमसे हमारी सबसे प्रिय वस्तु खो जाती है। और तो और यह दो प्रेमियों के बिछड़ने पर जीने का साहस देता है। जब हमें याद आती है ये हमारी आँखों से सहसा निकल आते हैं और कुछ पल हमारे साथ उस प्रिय वस्तु, या प्रियजन की यादों को ताजा करके हमें शान्ति प्रदान करके धीरे-धीरे सूर्य की तरह ढ़ल जाते हैं। ये आँसू बड़े चमत्कारिक साबित होते हैं। जैसे नींद की गोली होती है, वैसे काम करते हैं। वेदनाओं के साथ हमारे समक्ष आते हैं और हमें न जाने कब नींद के आगोश में धीरे-धीरे अपने बूँद की थपकियाँ देकर, सुला के चले जाते हैं। इनका एहसास तब होता है, जब कोई सुबह हमारे गालों पर इनके जाने का निशान देख कर बताता है या जब हम आईने के सामने आते हैं। वैसे तो एहसास होता ही है पर किसी से हम अपने इस छुपे हुई दर्द को बयां नहीं कर पाते तो ये अप्रत्यक्ष रूप से बता जाते हैं कि, कोई बात है।

अब यदि हम बात उसकी करते हैं जहाँ पर, जिस समाज में मानव जीवन निर्वाह कर रहा है। वैसे तो कहने को हम बहुत तरक्की कर रहे हैं और कर भी चुके हैं। दूसरी तरफ हम अपने सच्चे मित्र को भी भूलते जा रहे हैं। असल में भूलने का कारण भी है, जैसा कि धर्म में भी बताया गया है कि, “बिना कारण के कार्य नहीं होता । जब हम तरक्की करते हैं, तो हम अपने दिमाग का भरपूर उपयोग करते हैं। जब हम दिमाग का उपयोग करते हैं तो, जो मानव की मानवता का एहसास कराता है, वह हृदय, गौण हो जाता है। जिससे मानव का हृदय भी गौण हो जाता है और हमारा मित्र आँसू भी हमसे दूर हो जाता है। यही आज कल देखने में आता है कि, हर व्यक्ति आज आगे बढ़ने की लालसा में अपने मानवता को भूलता जा रहा है। जैसे हो, जिस रूप में हो, हमारा भला हो, दूसरे का भले कितना ही नुकसान हो जाए वह जिये या मरे उसको उसकी परवाह नहीं। मानव की एक सबसे बड़ी पहचान उसकी मानवता है। वह मानव तब तक मानव है जब तक उसके अन्दर मानवता हैं। दूसरों के दुःख-दर्द को देख कर वह द्रवित, और खुशी देख कर वह खुश हो जाता है, वह मानव है। आज वह मानव कहीं विलुप्त सा होता जा रहा है। जहाँ देखिये वह दिन दुगना चार चौगुना बढ़ने की लालसा में अपने आप से दूर हो गया है। अपने हृदय की आवाज को निष्ठुर कर लिया है। अब उसका हृदय वह हृदय नहीं जो मानव का हृदय होता था। तब दूसरे की खुशी के लिए अपने को समर्पित कर देता था। यह समर्पित भाव जब हृदय की गहराइयों को छूता था तो खुशी के आँसू बाहर आते थे और मानव को मानवता का एहसास कराता था। यदि ऐसा ही समाज विकास करता रहा और अपने आँसू रूपी मित्र को तरजीह नहीं दी तो मानव, मानव नहीं रह जायेगा वह एक मशीन हो जायेगा। यह मानव रूपी मशीन को ईंधन की जरूरत होगी, जो डीजल या पेट्रोल से नहीं चल पायेगा। मानव बनने के लिए अपने आँसू रूपी मित्र के बिना वह मानव नहीं बन पायेगा। इस प्रकार से देखा जाये तो वह आँसू रूपी मित्र की हमारे जीवन में बहुत ही उपयोगिता है। परन्तु हर छोटी-छोटी बात पर मित्र रूपी आँसू को बुलाना अपनी कमजोरी होगी। जब तक हममें साहस है, तब तक संघर्ष करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।

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