कविताएँ: मार्टिन जॉन

- मार्टिन जॉन

ट्रेन की खिडकियाँ उदास रहतीं हैं 

उदास रहतीं हैं ट्रेन की खिडकियाँ
अगवा कर लिया गया है शायद उनकी सदाबहार हँसी
नहीं दिखती अब उन्हें उसके क़रीब आने की जद्दो-जहद
बच्चों की गुत्थम-गुत्थी
नहीं बैठना चाहते उसकी गोद में बच्चे।

दिखाना चाहती हैं बच्चों को आज भी अपनी आँखों से
अज़ीबो-ग़रीब नाम वाले स्टेशनों के चेहरे
मार्टिन जॉन 
दौड़ते, मुस्कराते पहाड़
झुमते, हाथ हिलाते पेड़-पौधे
रफ़्तार से होड़ लेते रंग-बिरंगे परिंदे
दमकता, चमकता सूरज
लुका-छुपी खेलते बादल
हरियाली की चादर लहराते खेत
कल-कल निनाद करती नदियाँ
अँधेरे में जुगनुओं से चमकते शहर-दर-शहर
दुलारते, पुचकारते हँसी ठिठोली के साथ दुहराना चाहती है
अशोक कुमार को, '... रेल गाड़ी छुक छुक ...'
दिखाना चाहती है अपनी आँखों से सजीव संसार
वज़ूद के नकारे जाने से ग़मज़दा खिडकियों को कौन बताए
बच्चों का बचपन अपनी मुट्ठियों में कैद कर लिया है आभासी संसार।


एम्बुलेंस दादा

हवाओं को चीरते
दुपहिये एम्बुलेंस पर सवार
कच्ची-पक्की दुर्गम सड़कों को सुगम बनाते
जब दौड़ते हो
एक ‘रेस’ का हिस्सा बन जाते हो तुम भी।
ये ‘रेस’ किसी मल्टीनेशनल कम्पनी द्वारा प्रायोजित नहीं होता
और न कोई राष्ट्रीय स्पर्धा में शरीक होते हो
इस रेस में मौत को पछाड़ना होता है
ज़िन्दगी को जीताने के लिए।

आँधियों के खिलाफ़
जब घूमते हैं तुम्हारे पहिये
वहाँ तुम नहीं होते
होता है तुम्हारा जज़्बा
तुम्हारा जुनून
पीछे छूट जाती है बहुत पीछे
तुम्हारी अपनी ज़िन्दगी
ज़िन्दगी की कही-अनकही कहानियाँ
और तुम्हारे सूखे दिन, सुलगती रातें।

मसीहा कहलाना
मंजूर नहीं तुम्हें
टूटती-बिखरती साँसों की डोर थामे
बने रहना चाहते हो करीमुल हक़* ही।

*अपनी बाइक से मरीजों को निस्वार्थ भाव के तहत अस्पताल ले जाने का काम करने वाले पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के निवासी पद्मश्री सम्मान से सम्मानित करीमुल हक़ एम्बुलेंस दादा के नाम से जाने जाते हैं।

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