मेरी नजर से: पतनशील पत्नियों के नोट्स (नीलिमा चौहान)

समीर लाल 'समीर'

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’

नीलिमा और उसके लेखन से परिचय ब्लॉग के माध्य्म से एक दशक से अधिक का है। व्यक्तिगत मुलाकातें, फोन और चैट के माध्यम से भी बातें होती रहीं। लेखन की बेबाकी तो शुरु से ज्ञात थी मगर जब वाणी प्रकाशन से उसकी किताब ’पतनशील पत्नियों के नोट्स’ आई तब बड़ा मन हुआ कि तुरंत पढ़ा जाये मगर जब तक सोचते तब तक तो अखबारों और अन्य माध्यमों से इसकी समीक्षायें आने लगीं। नीलिमा को पतनशीन पत्नियों की सरगना घोषित कर दिया गया।

कोई समीक्षा कहती कि यह किताब साहित्य के नाम पर साफ्ट पोर्न है तो कोई कहता गिरने की भी कोई सीमा होती है। कभी फेसबुक पर पढ़ने में आता कि इस लड़की ने शर्म बेच खाई है।

नीलिमा से पारिवारिक संबंधों के चलते जब उसके लिखे और उसके बारे में ऐसी ऐसी टिप्पणियाँ पढ़ते तो एकाएक खून खौल जाता।मगर नीलिमा उन्हीं टिप्पणियों को पढ़कर मुस्करा रही होती या ठहाका लगा रही होती तो हम भी फिर धीरे से मुस्करा देते। किताब तो पढ़ी नहीं थी कि अपनी कोई राय रख पाते मगर लगता तो था कि जरुर कुछ ऐसा लिख दिया है जिसे किसी स्त्री की कलम से लिखे जाना लोगों को नागवार गुजर रहा है।

ऐसा नहीं था कि लोग तारीफ नहीं कर रहे थे। कोई उसे बहादुर कह रहा था तो कोई कहता कि आधी आबादी की घुटन को उसने खुला आसमान दिया है। कोई कहता कि लगता तो था पत्नियाँ ऐसा सोचती होंगी, जाना आज कि वाकई में ऐसा सोचती हैं। मगर ध्यान ज्यादा निगेटिव कमेंट खींच रहे थे। मानव स्वभाव है क्या करें।

साहित्यिक अभिरुचि रखने वालों ने जहाँ एक तरफ नीलिमा को हाथों हाथ लिया। तमाम लिटरेचर फेस्टिवल की स्टार बन गई नीलिमा इस किताब के चलते। जितना नाम ऊँचाईयाँ छूता गया उतना ही इस किताब से लेकर नीलिमा के लिए न जाने कितनी अभद्र टिप्पणियाँ और समीक्षायें छपती चली गई। कई लोगों ने तो टिप्प्णी ही नहीं की- न अच्छाई में, न बुराई में, कौन पड़े लड़ाई में।

खैर, और जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि किताब प्लास्टिक में पैक है। बिना खरीदे स्टाल पर खड़े होकर पलटा सलटा कर देख भी नहीं सकते तब और डाऊट हुआ। हमारे जमाने में ऐसे प्लास्टिक में बंद या तो डेबोनायर पत्रिका आती थी या उससे भी एक पायदान उपर वाली सिर्फ तस्वीरों वाली किताबें जिससे शायद यह मुहावरा बना होगा कि  ‘A picture is worth a thousand words’।  इनके सिवाय कभी कोई और किताब ऐसे प्लास्टिक बंद में सुनी तो वो है ’पतनशील पत्नियों के नोटस’।

कुछ मित्रों के परिवार के लोग या हमारे परिवार से कुछ लोग इस बीच कनाडा आते रहे मगर किससे कहते कि जरा वो वाली किताब खरीद कर लेते आना। सब कहते कि ल्यो, अब यही पढ़ने की उम्र बची है।

फिर किसी तरह नीलिमा ने यह किताब हमारे मित्र को लोकल पोस्ट की जो यहाँ से गये हुए थे। वो भी अपने सामान में पैक करने के पहले कोरियर का लिफाफा खोल कर तसल्ली कर लेना जरुरी समझते थे कि कौन जाने किताब के नाम हशीश वगैरह न चिपका दे कोई और वे कस्टम में धरा जायें। लिफाफे के भीतर प्लास्टिक में पैक किताब और शीर्षक ऐसा। उन्होंने जल्दी से प्लास्टिक काट कर तसल्ली कर ली कि बस किताब ही है और उन्हें कपड़ों के छिपा कर पैक कर लिया कि कहीं उनकी पत्नी न देख लें कि ये क्या लिये जा रहे हैं? कनाडा आने के बाद कई दिनों तक उन्होंने संपर्क ही नहीं किया मगर जब मिले तो कहने लगे, अरे, इसमें तो कुछ है ही नहीं? मैने पूछा कि क्या खोज रहे थे भई जो नहीं मिला तो झेंप गये मगर कुछ बोले नहीं।

किताब पढ़ने का सिलसिला शुरु हुआ दफ्तर आते जाते ट्रेन में। कवर पलट कर लगा दिया था बस सफेद झक प्लेन दिखता था। बहुत हिन्दुस्तानी हैं यहाँ भी। ट्रेन में पढ़ता देख सोचते कि क्या पढ़ रहा है बंदा दफ्तर आते जाते? उम्र और बालों की सफेदी और हाथ में ये किताब! पढ़ते रहे:
मुझे किसी पुरुष को जिगरी दोस्त बनाना है
सरेआम पीठ पर धौल जमाकर मिलना है और घंटों बातों करनी हैं।
पेट पकड़कर बीच गली ठहाके लगाने हैं,
कंधे पर सर रखकर बॉस की, घरवालों की ज्यादती का रोना रोना हैं,
जब कभी गप करने पर आएं तो घड़ी का मुंह दीवाल की ओर कर देना है और जमकर देश, समाज, राजनीति से लेकर शरीर और बिस्तर की, जज़्बे और जुनून की सपनों की, धोखों की बातें करते हुए जी भर सिगरेट फूंकना है,
-इसमें क्या है। यह तो ख्वाहिश हर किसी की हो सकती है। इसमें पतनशीलता कैसी?

फिर कहती है कि
’पति का प्यार’? जी वो मेरे खर्चने की ताकत से ज़्यादा कमाने का हौसला रखेगा तब तक तो मेरे दिल से उतर नहीं सकेगा,  और वो मुझे अपने दिल से उतार दे ऎसी नौबत न आने देने के लिए मेरे पास एक अदद ज़बान, हुस्न और दुनियादारी के खौफ की चाबी है ही न।

नीलिमा चौहान
पढ़ते रहे एक चैप्टर से दूसरे चैप्टर... हर चैप्टर का शीर्षक भी इतना रोचक कि फिर पूरा पढ़ जाने को तुरंत मन लालायित हो जाये। भाषा में हिन्दी, उर्दू का ऐसा मजेदार मिश्रण मानों कोई लज़ीज व्यंजन पकाया हो। कुछ रोचक शीर्षक देखें:
बीबी हूँ जी, हॉर्नी हसीना नहीं,
तीस घटा पाँच
बवाल ए जान ब्रा
सयानी सासों के स्यापे
बीवियों के माशूक़ नहीं होते
तश्तरी का मादा लेखन

सोचता हूँ अगर मुझे सिर्फ ये शीर्षक दे दिये जायें कि हर शीर्षक पर 500 शब्दों का आलेख लिखो तब तो वाकई ख्याली पुलाव पकाते हुये लिखी किताब प्लास्टिक पैक के उपर लोहे का ताला लगा कर बेचना पड़ेगी मगर ये किताब... एकदम बिना रोक टोक के वो बातें कह जा रही है जो शायद हर पत्नी ने कहीं न कहीं अहसासा हो मगर बस! अनेको अनेक अन्य बातो की तरह इन्हें भी जबान पर न आने दिया हो।
बानगी देखें:
हर रात तेल और मसालों की बू से लबालब इस हरारत भरे बदन को बिस्तर तक पहुँचाते हुए अपने दिलो-दिमाग पर जमी औरताना किचकिच को साफ करती चलती हूँ। माफी चाहती हूँ कि आज भी तुम अपने बिस्तर पर हॉर्नी हसीना की जगह बहस के लिए पिल पड़ती बेस्वाद बीवी ही पाने वाले हो।

बीवी जो जिस्म नहीं रह गई, जुनून नहीं रह गई। बस एक थुलथुले, लिजलिजे गोश्त में तब्दील हो चुकी है। बीवी जिसके बदन में नजाकत और शरारत भरी कामुक शिरकतों को महसूस करने की कवायद में मनहूसियत ही हाथ लगा करती है।

एक और चैप्टर का अंश देखें:
‘फ़ेमिनिज्म के समर्थक पतियों की जान को हज़ार ग़म होते हैं और उन ग़मों का समझदार साझीदार कोई नहीं होता। रिश्तेदारी में जोरू का ग़ुलाम कहलाना पड़ता है। नौकर-चाकर, अर्दली जैसे ग़मख़्वार लोग नामर्द मानकर बेचारा और बेचारगी का मारा कहा करते हैं...  ऐसी औरतों के हमचश्म बनने वाले पतियों की जान को घर-गृहस्थी के बहुत से काम ही नहीं बढ़ जाते, बल्कि उनको ख़ुशी-खु़शी किया जा रहा है कि नौटंकी को भी अंजाम देना होता है...

देखते देखते पूरी किताब पढ़ गये और फिर जुबान से मित्र की वही बात, अरे, इसमें तो कुछ था ही नहीं... ।लेकिन फिर खुद से जागे कि इतना कुछ था जो आजतक लिखा ही नहीं गया। उस तल की गहराई को शब्द देना जो आज तक एक स्व-अहसास मात्र थे पत्नियों के लिए, ये अद्भुत है। और दिल के भीतर से कहीं बेसाख़्ता उठा कि वाह! नीलिमा, कमाल कर दिया।

अगर आपने अब तक न पढ़ी हो यह किताब, तो जरुर पढ़ें, वादा है आप भी कह उठेंगे कि वाह नीलिमा! कमाल कर दिया!
किताब: पतनशील पत्नियों के नोट्स
लेखिका: नीलिमा चौहान
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली
कीमत: ₹ 395.00 (हार्ड कवर)/ ₹ 199.00 (पेपर बैक)

1 comment :

  1. साल भर से सुन रही हूँ इस किताब के बारे में पहली बार आप की समीक्षा से कुछ नोट्स पढ़ने का मौका मिला है। धन्यवाद।

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