कविता: वर्ष दो हजार सत्रह, जाते-जाते...

अनिता ललित
- अनिता ललित

वर्ष दो हज़ार सत्रह
जाते-जाते –छुड़ा ले गया
एक ऐसा हाथ –जिससे झरती थीं,
दुआएँ ही दुआएँ, प्यार ही प्यार!
आँधी हो या तूफ़ान, कड़ी धूप या बरसात,
हर मुसीबत से था बचाया –
वह हाथ! था हमारे सिर पर साया!
बनकर पत्थर, जीवन भर, ख़ुद को रहा घिसता
कर्म की चट्टानों पर -
कि भर दे उजाला हमारी दुनिया में!
कि कर दे रौशन हमारे अस्तित्व के हर कोने को!
वह हाथ! जिसने अपने नहीं,
‘सिर्फ़ अपनों’ के लिए सदा कमाया!
वह हाथ! जो कभी किसी के आगे न फैला –
सिवाय ईश्वर के!
जिसने कभी कुछ न माँगा –
सिवाय ‘अपनों’ की ख़ुशियों के!
इस जाते हुए वर्ष ने –
सभी बन्धनों से उसे छुड़ाया!
और दे गया दिल को एक ख़ालीपन,
छोड़ के वहाँ - एक टीस भरी याद का साया!

वर्ष दो हज़ार सत्रह
जाते-जाते - हटा गया नक़ाब,
कुछ अपनों के चेहरों से! -
जो निकले, बेगानों से भी बेगाने!
तोड़ दिए जिन्होंने हर बाँध –
जो जुड़े थे, एक नाज़ुक धागे से!
बींध दी आत्मा,
छील डाला पर्त-दर-पर्त उसे,
शब्दों के बाणों से!
किया आहत, ज़ख़्मी किया,
कराया विष-पान उन्हें –
जिन्होंने की क़ुर्बान
अपनी खुशियाँ, अपनी जान,
देने को जीवन-दान उन्हें!

वर्ष दो हज़ार सत्रह
जाते-जाते - करा गया पहचान,
ख़ून के रंगों से! -
कि कैसे होता है, धीरे-धीरे वक़्त के साथ –
ख़ून – लाल से भूरा, फिर पीला,
फिर सफ़ेद, और अंत में पानी! –
झलक जाता है जो –
संवेदनहीन आँखों में
मरते, दम तोड़ते हुए!
न दौड़ता है जोश में, न ही मारता है उफ़ान!
ये बना देता है - ज़िंदा आदमी को – एक हैवान!
होता नहीं जिसे – सही-ग़लत का
कुछ भी भान!

वर्ष दो हज़ार सत्रह
जाते-जाते –उगा गया काँटे
उन सभी राहों पर –जो जाती थीं –
मेरे दिल, मेरी जाँ, मेरी पहचान तक!
बिछा गया शोले, मख़मली फूलों के आँगन में!
कर गया बेबस मुझे -
कि चाहकर भी, बढ़ा नहीं पाती क़दम,
थाम नहीं पाती, उन कमज़ोर बाहों को –
दिया जिन्होंने सहारा सदा
हर लड़खड़ाते तिनके को!
वह हौसला, वह चाहत
जो नींव थे, हर ख्व़ाब की,
कर दिया सूना, उस आशियाने को!
चाहकर भी जिन्हें, देख नहीं पाती,
मैं जी नहीं पाती -
कि छीन लिया मुझसे, मेरे होने का हक़ -
बनाकर मेरी साँसों को क़र्ज़ का भागी!

वर्ष दो हज़ार सत्रह
जाते-जाते मगर – डाल गया मेरी झोली में –
कुछ बेशक़ीमती पल!
वे पल –दिया जिन्होंने मौका मुझे,
कि चुका सकूँ कुछ अंश –
उस दैवीय ऋण का,
नामुमकिन है होना जिससे, कभी भी उऋण!
मैं थाम सकी, उन काँपते हाथों को –
जो हो चले थे अशक्त, सहारा देते-देते,
दे सकी चमक, उन आँखों को –
जिसमें झोंकी थी धूल, वक़्त की साज़िश ने,
ला सकी हँसी, उन होठों पर –
जो भूल चुके थे मुस्काना भी!
बाँट सकी थी दर्द, उन दिलों का –
जो थे बेहद तन्हा,
अपनों के रहते भी!
और मैं ये कर सकी -क्योंकि
मैं उनकी, वे थे मेरी जान,
दिल की धड़कन, वे मेरे भगवान!
वे पल, दिया जिन्होंने –
मेरे जीवन को एक अर्थ, एक आश्वासन,
और मेरे दिल को -सुक़ून का वरदान!
अमिट, अथाह, स्नेहसिन्चित यादों की
पूँजी अनमोल -
वे पल हैं अब, मेरे जीवन की आन!
सहेजूँगी मैं जिसे –मरते दम तक,
अपनी आख़िरी साँस तक!!!
-0-

4 comments :

  1. यादों की पूँजी अनमोल .... भावमय करती अभिव्यक्ति .....

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  2. दिल से लिखी,पीड़ा से भरी तथा जीवन के कड़वे सच को दर्शाती एक खूबसूरत रचना अनीता जी !

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  3. हृदयस्पर्शी सृजन ..हार्दिक बधाई अनिता जी।

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  4. अच्छा किया ..जो दिल का बोझ लिख कर कागज़ पर डाल दिया ..वरना बहुत भारी था ये ..
    ये कोई रचना नही ..लगे है यूँ ये आपबीती है
    अपनी कलम से ये आप ही के ज़ख्म सीती है ....
    सुकून के लिए शुभकामनायें |

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