नारी: वर्जना से मुक्ति तक

आरती स्मित

- आरती स्मित

नारी तुम संजीवनी हो
और सुधारस जीवन की
सौम्या हो तुम भावमयी
कवि की कोमल कल्पना

‘संजीवनी’ संबोधन नारी के सशक्त और गरिमामय स्वरूप को उद्घाटित करता है; सुधारस संबोधन उसके प्रेम-प्रगल्भ स्वरूप को चित्रित करता है तो भावमयी संबोधन उसके वात्सल्य, पुरुष के प्रति एकनिष्ठ समर्पण और अनुगमन की प्रवृति को चिह्नित करता है। स्त्री संबोधन-मात्र से लावण्यमयी, कांतिमयी, भावमयी, ममतामयी, प्रेमपूर्ण स्मिता का बिंब उभरता है, जिसके सान्निध्य-मात्र से समस्त पीड़ाओं का उन्मूलन संभव हो। नारी अनादिकाल से सृष्टिकारिणी, जगतपालिका, वैभवी, वाक्शक्ति, अन्नपूर्णा मानी जाती रही है। किंतु इन आदर्शपरक संबोधनों से विलग, वर्तमान में प्रदत्त पारिवारिक संबोधनों पर दृष्टि डालें तो माँ, बहन के अतिरिक्त शेष सम्बोधन पत्नी, प्रेमिका, दादी, नानी, चाची, मामी, फूफी पुरुषवाची संबोधनों के आश्रय में साँस लेते प्रतीत होते हैं। यही है मध्यकाल से स्त्री की पहचान - पुरुष पर निर्भर सप्राण देह, किंतु जड़ मस्तिष्क! इसे अपने अस्तित्व का लेशमात्र आभास नहीं, जो भूल चुकी है कि प्रकृति ने पहले उसे - उसके अस्तित्व को चुना, पुरुष तो करोड़ों वर्ष बाद सृष्टि द्वारा अस्तित्व में लाया गया। यह भी कि वह पहले प्रकृति से एकाकार हुई, उसे आत्मसात किया और उसका ही जीवन जीने लगी। वह प्रकृति बन गई... धरा-सी उर्वरा... सृष्टि रचती हुई, सौंदर्य और आकर्षण सहित प्रेम और वात्सल्य की अविरल धारा प्रवाहित करती, अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक सजीव और निर्जीव को प्राणवंत … जीवन्मयी बनाती, कभी गंगोत्री तो कभी कलकल–छलछल निर्मल निश्छल भागीरथी, कभी स्वयं में ॐकार समाहित की हुई क्षिप्रा तो कभी कमला। करोड़ों वर्षों तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने वाली प्रकृति-सहचरी स्त्री अचानक पुरुष के द्वारा अबला घोषित कर दी जाती है, उसकी दैहिक कोमलता को बाहरी पुरुष नामक पशु से खतरा है, इसलिए वह चौखट लाँघने की भूल न करे, दैहिक शुचिता सर्वोपरि है और उसका रक्षक उसके लिए चौखट बनानेवाला पुरुष है, उसके परिवार का मुखिया। मन और मस्तिष्क पर विचार करना स्त्रियों के लिए व्यर्थ है। वह कोमलांगी मस्तिष्क (विचारों) का बोझ उतार, देह में सिमटी प्रागैतिहास की ओर नज़र डाले तो लगता है, कितनी हास्यास्पद अवस्था को स्वीकारे बैठी है स्त्री। यदि यही सच है तो हमारे वेद स्त्रियों की श्रेष्ठता क्यों स्वीकार करते हैं? वैदिक युग में स्त्री धन-संपत्ति, ज्ञान एवं ऊर्जा का स्रोत मानी जाती रही, स्त्री के प्रति इसी सम्मान भाव ने लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती एवं वनदेवी की अवधारणा को जन्म दिया होगा। वेदों में अनेक जगह लोपामुद्रा, विलोमी, विश्वंभरा आदि नारियाँ अपनी विद्वता के कारण ब्राह्मणी व ऋषिका कही गईं।

उत्तर वैदिक काल नारी के अधिकारों पर पुरुषों द्वारा सेंध लगाने का काल था। संपत्ति पर से उसका अधिकार समाप्त कर दिया गया। ज्ञान का क्षेत्र अभी सुरक्षित रहा। विदग्धा, मैत्रेयी, गार्गी जैसी विदूषियों  की विद्वता तात्कालिक समाज में सम्मानित थी, किंतु संपत्ति के अधिकार पर पुरुष अहंकारी हो गया। उल्लिखित है कि राजा की सभा में गार्गी द्वारा महर्षि याज्ञवल्क्य को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती देने पर याज्ञवल्क्य ऋषि ने उपहास करते हुए कहा था,’’शास्त्रार्थ जीत भी लोगी, तो भी जीता हुआ धन तुम्हारा नहीं, तुम्हारे पिता या पति का होगा।”  व्यावहारिक जीवन को सबल बनाने हेतु धन पर पुरुष की आधिपत्य-प्रवृति उसके अहंकार को पुष्ट तो करती है, किंतु वह भूल जाता है कि स्त्री के बिना शिव भी शव-मात्र है। स्त्री ही अग्नि है... आंतरिक ऊर्जा। स्वयं पलने-बढ़ने, फलने-फूलने और दूसरों को पोषित करने वाली वनदेवी... जीवन का महत्वपूर्ण आधार।

रामायण व महाभारत काल में स्त्री की विद्वता की जगह उसके शील, सहयोग और समर्पण को प्रश्रय मिलने लगा। मर्यादाएँ तय की जाने लगीं। इस काल में एक ओर राजा दशरथ की सहयोगिनी बनी   कैकेयी की दूरदृष्टि, साहस का परिचय युद्धभूमि में मिलता है तो दूसरी ओर कोमलांगी सीता लक्ष्मणरेखा पार करने की भूल के कारण, लंबे समय तक रावण की लंका में नज़रबंद रहती है। उससे भी बड़ी पीड़ा तो वह तब भोगती है, जब उसकी अग्नि परीक्षा ली जाती है। ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहलानेवाले राम को पुरुष समाज से  इस संबोधन के साथ ही ‘उच्च चरित्र’ का प्रमाण पत्र मिला होता है, पीड़ा का अतिरेक भी तब होता है, जब एक अनपढ़ धोबी के कहने पर राम उसे गर्भवती की अवस्था में वन भिजवा देते हैं। कोई उन्हें दोष नहीं देता, न ही उस अबला केलिए न्याय की याचना की जाती है। यह प्रश्न प्रासंगिक ही है कि राम के वनवास-गमन के लिए रानी कैकेयी को दोषी ठहराया गया,फिर गर्भवती पत्नी को बिना उसका अपराध बताए, छल से अकेले वन में ऋषि के भरोसे छोड़ देने पर, क्या खुद को संरक्षक कहलानेवाले पति राम पर सवाल नहीं उठने चाहिएँ? कैकेयी को ‘कुमाता’ कहा गया,किंतु राम को ‘कुपति’ नहीं! वन में लक्ष्मण-मूर्छा के समय राम प्रलाप करते हुए कहते हैं, राज, परिवार और पत्नी तो फिर मिल जाएँगे, भाई नहीं मिलेगा! विडंबना यह है कि आज  भी हमारा समाज किसी दंपति को राम-सीता के समान जोड़ी बनाए रखने का आशीष देता है। लक्ष्मण नव-विवाहिता पत्नी उर्मिला से बिना उसकी इच्छा जाने, राम के साथ वन जाते हैं। ये व अन्य कई तथ्य पुरुष-सत्ता के उदय की कहानी कहते हैं, जिसने नारी को व्यक्ति से वस्तु के रूप में आरोपित करने में मदद की।

महाभारत काल में, अम्बा-अंबालिका केवल संतानोत्पत्ति के लिए मुनि व्यास के साथ नियोग क्रिया करने हेतु विवश होती है; कुमारी कुंती पिता के भय से कर्ण का त्याग तो करती है, किंतु यौन संबंध बनाने में अक्षम पति पांडु की आज्ञा से पर पुरुषों के साथ नियोग क्रिया कर शिशु जन्म देती है। इन स्त्रियों को वंश-परंपरा बढ़ाने के लिए वस्तु की भाँति उपयोग में लाया जाता है, वह भी पुरुष समाज की इच्छा से। नियोग क्रिया यदि स्त्री-स्वतंत्रता की बोधक है तो इन स्त्रियों को संतानोत्पत्ति के बाद नियोग क्रिया के लिए स्वतंत्र क्यों नहीं छोड़ा जाता! बुद्धि, सौंदर्य और स्वाभिमान से भरी द्रौपदी को संपत्ति की तरह युधिष्ठिर द्वारा दाँव पर लगाया जाता है और अर्जुन चुप रह जाता है, उसे हार जाने पर दु:शासन भरी सभा में उसकी नारियोचित गरिमा को तार-तार करना चाहता है, मगर पति कहलाए जानेवाले वे पाँचों भाई सिर झुकाए तमाशाई बने रहते हैं, और तो और भीष्म पितामह भी अनाचार के गवाह बने बैठे रहते हैं। कहाँ जाती है घर की मर्यादा? मगर जवाब दे तो कौन; जवाब मांगे तो किससे? पुरुष की नारी के प्रति मानसिक बर्बरता, उसकी भावनाओं की उपेक्षा नारी के मन में प्रेम और सुरक्षा नहीं, साथ रहने की विवशता प्रतिध्वनित करती है। जब-जब अनाचार, अत्याचार प्रकर्ष लाँघने लगता है, द्रौपदी के बाल खुलते हैं, शपथ ली जाती है, सारी कुव्यवस्था तहस-नहस कर देने का संकल्प और जुनून महाभारत रचता है और तब अन्न उपजाने वाली धरा रक्त पीती है। इसी प्रकार, गंगोत्री गंगा से जब हुगली बनाई जाती है तो अपनी मलिनता से क्षुब्ध यही गंगा जहरीली होकर प्राणहारिणी बन जाती है; अपने किनारे को सींचती पवित्र जलधारा अपनी प्रचंडता में किनारे को समूल नष्ट कर देती है। दावाग्नि जंगल नेस्तनाबूद कर देती है। स्त्री हो या प्रकृति - उसका प्रेम सृजन करता है और आक्रोश मृत्यु का तांडव रचता है।

समय रामायण व महाभारत की घटनाओं का हो या आज की परिस्थिति में रंगा ... स्वरूप बदला है और कुछ नहीं। पुरुषों की मानसिकता तथा स्त्री की वर्जना-मुक्ति हेतु छटपटाहट आज भी वही है, जो बदला है उसका प्रतिशत बहुत कम है। आज भी घर, सड़क और महल में आज की द्रौपदी चीख रही है और समाज भीष्म पितामह बना हुआ है, सबसे पीड़ित तो आज की सीता है जो अपने जनक की दी हुई सीख के अनुकूल आजीवन चलते रहने की कोशिश में हर पल मरती है, नहीं मरना चाहती तो दुश्चरित्र कहकर निकाल दी जाती है, उसकी इस अवस्था का जितना दोषी पति होता है, उतना ही पिता। महानगरों की व ठेठ गाँव की बात कम करें तो साधारण गाँवों, कस्बों, छोटे शहरों और महानगर में भी आ-आकर बसे परिवारों में किशोरावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक स्त्रियाँ अपनी इच्छा से खुली हवा में साँस लेने को अकुलाती हैं, छटपटाती हैं अपने जीवन का निर्णय खुद लेने के लिए; चाहती हैं कि परिवार में उनके विचारों और भावनाओं को स्थान मिले। अन्न से पेट भरता है, मानसिक तृप्ति नहीं मिलती। स्त्री तो प्राणवायु- सी अमूर्त, परिवार और समाज को जीवंतता प्रदान करती रहती है, बदले में कुछ माँगती है तो अपने होने का एहसास, जो सुनियोजित तरीके से हजारों वर्षों पहले उससे छीन लिया गया है। सहनशक्ति जब उबाल लाती है तो प्राणदायिनी हवा अपने अस्तित्व में भरे गए ज़हर को उगलना शुरू कर देती है। कभी अम्ल वर्षा तो कभी ऑक्सीजन की अतीव न्यूनता। पेड़ कट रहे हैं, धरती वीरान हो रही है, वह अपनी उजड़ती कोख का शोक मनाती है, आर्त्तनाद करती है, बिलखती है और सीप में मोती जन्म देने वाली बूँदें खारी अम्ल वर्षा में बदल जाती है। ऑक्सीजन समाप्त होने लगता है और जीवन मृतप्राय। स्त्री धरा, नदी, वायु और अग्नि-सी जनजीवन में ऊर्जा स्फुरित करती रहती है, किंतु बार-बार छली जाती हुई - शोषण और अवमानना का ज़हर तन-मन पर झेलती हुई जब संवेदनशून्यता के कगार पर खड़ी कर अचेतन वस्तु या उपभोग-सामग्री घोषित कर दी जाती है तो फूट पड़ती है भीषण बाढ़ बनकर, ढहा देती है शिलाएँ धधक उठती हैं, लपटें नेस्तनाबूद कर देती हैं पुरातन सामंती व्यवस्था। यह बेचैनी है मध्यमवर्गीय स्त्रियों की। हमारा समाज आज भी मनु के बनाए नियम को लेकर लकीर का फकीर बना हुआ है। मनुस्मृति के अनुसार, स्त्री बचपन में माता-पिता के, युवावस्था में पति के और वृद्धावस्था में पुत्र के आश्रय में रहकर सुरक्षित जीवन बिताए। इन नियमों को बचपन से ही स्त्रियों के मस्तिष्क में कूट-कूटकर इस तरह भरा गया कि उन्होंने इसे जीवन का शाश्वत सत्य मान लिया... मान लिया कि परिवार के पुरुष उनके जीवनोद्धारक हैं, जो सर्वगुण सम्पन्न, सर्वशक्तिमान हैं, जिनसे कभी कोई गलती हो ही नहीं सकती, यदि वे चौखट के भीतर सुरक्षा की बात कह रहे हैं तो यही सच है... स्त्री के जीवन का एकमात्र सच! क्योंकि पूर्व मध्यकालीन परिस्थितियों ने धीरे-धीरे स्त्रियों को शिक्षा से बेदखल कर दिया। स्त्रियाँ पुरुषों के समक्ष स्वयं को मंदबुद्धि व निर्बल स्वीकारने लगीं। मोक्ष का भय दिखाकर ब्राह्मणों ने स्त्री के अवचेतन मन में यह बात बिठा दी कि पति धर्म स्त्री-मात्र के लिए सर्वोच्च धर्म और मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र मार्ग है। मुगल आक्रमण ने हिंदू धर्म की रूढ़िवादिता को बढ़ा दिया। पर्दा प्रथा, बाल विवाह का चलन बढ़ा, रामायण व महाभारत काल में जो वर्जनाएँ स्वत:स्फूर्त थीं, अब अनिवार्य हो गईं। मोक्ष की लालसा ने सती प्रथा जैसे अमानवीय  धार्मिक कुरीतियों को जन्म दिया। गौरतलब है कि विदेशी आक्रमण उत्तर में अधिक हुए, तो कुरीतियाँ इस भूभाग में अधिक फैलीं। दक्षिण में साहित्य और शासन से उस काल में स्त्रियाँ जुड़ी रहीं। सामान्य नारी के परिप्रेक्ष्य में पुरुष ही निर्णय लेने का अधिकारी रहा। ब्रिटिश हुकूमत में सबसे अधिक नारी ही शोषित हुई। ब्राह्मण काल से मुगल, फिर ब्रिटिश काल तक आते-आते नारी मस्तिष्क से उतरकर देहमात्र हो गई, जिसकी सुरक्षा के लिए मुगलकाल से ही तमाम बेड़ियाँ बाँधी जा रही थीं। लोपामुद्रा, अनसूया, गार्गी सदृश विदुषियों की चर्चा तो निषिद्ध थी ही, उसकी जगह सावित्री सत्यवान और लीलावती-कलावती की कथाओं ने ले ली। विडंबना यह है कि जिस वेद की ऋचाएँ इन ऋषिकाओं ने लिखीं, उस वेद को स्पर्श करने पर भी प्रतिबंध लग गया। आधुनिक सामंती दृष्टिकोण दर्शाती ये पंक्तियाँ:
                    कमरे में अलमारी
                    फ्रिज, टीवी, कम्प्यूटर
                    सोफ़ा और तुम!
                    ... मेरे उपभोग की सामग्री!
                    मेरे अधिशासी क्षेत्र की वस्तु!
                    मगर
                    तुम!
                    तुम ऐसा सोचने
                    या समझने की भूल ना करना
                    अपनी चेतना को
                    ताजमहल का
                    हिस्सा बना रहने दो
                    और खुश रहो
                   ‘अर्धांगिनी’ शब्द के साथ।
           
ब्रिटिश शासन काल में अधिकांश स्त्रियाँ अनपढ़ थीं, आज भी हैं, किंतु उनकी मानसिक शक्ति का परिचय तब-तब प्राप्त होता है, जब-जब देश व समाज उसका आह्वान करता है, चाहे वह 1783 के पूर्व आंदोलन का आगाज़ हो, 1857 का गदर या गाँधी के आह्वान पर हजारों पर्दानशीनों का सड़क पर उतर आना, लाठियाँ खाना, धूप में घंटों धरना–प्रदर्शन; जेल-यात्रा, ए, बी और सी क्लास की तकलीफ़ों को हँसकर झेलना, गर्भवती स्त्रियों का भी जेल जाना और तमाम असुविधाओं के बीच शिशु को जन्म देना और आशापूर्ण नामकरण! इसी प्रकार किशोरियों व युवतियों का अंग्रेजों के विरुद्ध खूनी क्रांति का आगाज़  करना, आजीवन कारावास या हँसते-हँसते फाँसी पर झूल जाना - देश की स्वाधीनता से लेकर देश के बहुमुखी विकास में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नारी का सशक्त रूप उभरकर सामने आता है। नारियों ने संविधान और कानून-निर्माण में भी योगदान दिया। साहित्य, कला, लोक संगीत एवं नृत्य,शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य की गौरवशाली विधाओं को सँवारती, निखारती नारी आज विकास के प्रत्येक क्षेत्र में कदम बढ़ा चुकी है, हर वह वर्जित क्षेत्र जिसे पुरुषों ने अपने क़ब्ज़े में रखा था, आज वह कदम दर कदम बढ़ती जा रही है। राजनीति, शिक्षा, कला, विज्ञान, खेल, सुरक्षा, अस्पताल, न्यायालय, रेल, बस, मेट्रो, हवाई जहाज़, अन्तरिक्ष यात्रा... अपने सपनों को पंख लगाकर पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर, लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए बढ़ी जा रही है वह।

प्रत्येक युग में परिवर्तन के साथ उसके जीवन-मूल्य बदलते रहते हैं, किंतु शाश्वत आदर्श कभी परिवर्तित नहीं होता। अब भारत में भी यह धारणा बलवती हो रही है कि नारी और नर प्रकृति में दो समान और स्वतंत्र महत्वपूर्ण सत्ताएँ हैं - एक–दूसरे के पूरक नहीं। पुरुष समाज के कठोर पौरुष का प्रतीक है तो नारी संजीवनी शक्ति का। भारतीय संस्कृति में स्त्री पुरुष की प्रेरणा, शक्ति एवं पूर्णता मानी गई है। वह पुरुष के अन्तर्मन की शक्ति है। यह है भारतीय नारी की सच्ची तस्वीर जिसे इस समाज से, अपने ऊपर विश्वास चाहिए, फिर से वैदिक सभ्यता के स्त्रियोचित सम्मान को वापस लाने के लिए।स्वामी विवेकानंद ने कहा है: “स्त्रियों की अवस्था में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई मार्ग नहीं। किसी भी पक्षी का एक पंख के सहारे उड़ना नितांत असंभव है।” 
                                                                                  
स्वतंत्रता आंदोलन में शौर्य के लिए लक्ष्मीबाई,चेनम्मा, ज़ीनत महल जैसी हजारों वीरांगनाएँ, शिक्षा के पुनर्स्थापन के लिए रमाबाई, सरलादेवी आदि दृढ़ संकल्पी विदूषियाँ, ब्रिटिश सत्ता से लोहा लेनेवाली अहिंसक या हिंसक क्रांतिकारी सरोजिनी नायडू, विजयालक्ष्मी, कस्तूरबा गाँधी, कमला नेहरू, प्रीति लता, सुनीति चौधरी, दुर्गा भाभी, वीना दास आदि हजारों कुमारियाँ / स्त्रियाँ, जिनके नाम इतिहास में दर्ज़ तक नहीं हो सकें, लेकिन जिनकी चर्चा-मात्र से स्वाभाविक स्फुरण संचरित होता है, से लेकर विकास के किसी भी क्षेत्र में पुरुष के समकक्ष खड़ी होनेवाली हर पहली नारी भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं। कोर्नेलिया सोराब (वकील), राजकुमारी अमृत कौर (केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री), लीला सेठ (चीफ जस्टिस, हाई कोर्ट), सुचेता कृपलानी (मुख्य मंत्री), लक्ष्मी एन. मेनन (विदेश मंत्री), विजयालक्ष्मी पंडित (राजदूत), व.स.रामादेवी (राज्यसभा की सेक्रेटरी जनरल), सरोजिनी नायडू (वायसराय), अन्ना राजम जॉर्ज (आई.ए.एस.), किरण बेदी (आई.पी.एस.), सौदामिनी देशमुख (जेट कमांडर), प्रेम माथुर (पायलॉट,कमर्शियल),एनी बेसेंट (भारतीय राष्ट्रीय कॉँग्रेस की अध्यक्ष), इंदिरा गाँधी (प्रधान मंत्री), अमृता प्रीतम (साहित्य अकादमी सम्मान), बछेंद्रीपाल (माउंट एवरेस्ट पर्वतारोही), आरती साहा (तैराकी में इंगलिश चैनल पार), थिरुश कामिनी (वर्ल्ड कप क्रिकेट में प्रथम शतक) और इसके साथ ही आंध्र प्रदेश की कृषक-पुत्री मालावथ पूर्णा, जिसने 13 वर्ष की किशोर वय में माउंट एवरेस्ट पर खड़े होकर सहज भाव से कहा, “द वर्ल्ड इज वेरी स्मॉल!” सच ही कहा उसने! दृढ़ संकल्प के सामने कोई बाधा टिक नहीं सकती।

इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्त्रियों ने वर्जनाओं को तोड़ने के अथक प्रयास किए, अधिकांश वर्जनाएँ तत्कालीन समाज की देन थीं, जिससे उत्तरी भारत आज भी कमोबेश ग्रसित है और जो संक्रामक रोग की तरह फैल रहा है, किंतु इस सत्य से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों को कम करवाने की पहल भी पुरुषों ने ही की। वे सहयोगी बनकर खड़े हुए, स्त्रियों में विश्वास जगाया कि आज भी उनमें वही बौद्धिक क्षमता है जो गार्गी और मैत्रेयी में थी। आज स्त्री विद्रोह उसके अपने अस्तित्व की पहचान के लिए है। आज ज्ञान व संपत्ति पर पुन: अपना खोया अधिकार पाने के लिए वे संकल्पित हैं। आज वह समाज के द्वंद्व को समझते हुए अपनी मुक्तागामी चेतना से बार-बार टकराती, लहूलुहान होती हुई भी, आगे बढ़ रही है। लेखिका अनामिका मानती हैं कि “आत्मविश्वास की प्यास तेज़ होती है, लगातार किसी के इशारे पर नाचने का मन नहीं करता। कम खाओ,कम ही पियो; कम से कम हँसो और बोलो; यह करो, यह नहीं; अब सोओ, अब उठो इस प्रश्न का जवाब दो, अब चुप्पी साध जाओ।” नारी और उसकी पीड़ा को साहित्य के माध्यम से लेखिकाओं ने समाज के सामने रखा है। राजेन्द्र यादव ने स्त्री की दुखती रग पर मानो उंगली रख दी, पर साथ में उन पुरुषों के षडयंत्रों का भी खुलासा किया जो आज भी स्त्री को मर्यादा के नाम पर मानसिक रूप से उसे गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। राजेन्द्र जी के ही शब्दों में, “कैसी हास्यास्पद विडंबना है कि हजारों सालों में पुरुष ने स्त्री को देह से अधिक कुछ नहीं माना। शस्त्रों और शास्त्रों से भी उसे यही समझाया जाता रहा है कि वह सिर्फ देह है और उसकी इस देह के स्वामित्व पर ही उसने संस्कृति का वितान खड़ा कर लिया – लेकिन आज जब स्त्री ने सिर उठाकर कहना शुरू कर दिया कि वह सबसे पहले देह है और अपनी देह की मालिक वह स्वयं है तो पुरुषों के सारे समीकरण गड़बड़ा गए।”

आज स्त्रियाँ दो मोर्चों पर डटी नज़र आती हैं, एक जो अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए शालीनतापूर्वक अपने कर्म और ज्ञान को अस्त्र-शस्त्र बनाकर मुक्ति चाहती हैं, दूसरी, जिसने पुरुष से प्रतिशोध लेने की होड़ में खुद को बाज़ार का हिस्सा बना दिया और नासमझी में वही कर रही है, जो पुरुष-प्रधान बाज़ार चाहता है। इस संदर्भ में लेखिका रजनी कुलश्रेष्ठ लिखती हैं, “सदियों से एक चुप्पू सभ्यता की मुरीद इस स्त्री ने ‘वर्जीनिया वुल्फ़’ के शब्दों में कहें तो, एक अतिवाद के निराकरण के लिए दूसरे अतिवाद की स्थापना की?”

प्रकृति संस्कृति रचती है। काल एवं स्थानानुसार प्रकृति के बदलते स्वरूप ने संस्कृति का स्वरूप बदला है। स्त्री संस्कृति है और पुरुष सभ्यता। किसी भी काल के समाज के संस्कार स्त्री में प्रतिध्वनित होते हैं। वह स्वभावत: नैसर्गिक होती है... आचरणत: निसर्ग। पुरुष कृत्रिम आरोपण कर सभ्यता विकसित करता है। सभ्यता और संस्कृति का तादात्म्य नवोन्मेष व नवोत्थान हेतु अनिवार्य है। नारी का प्रकृतिस्वरूपा होना प्रसाद की अनेक रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है। प्रसाद की नारी उर्वरा, सबला और ज्योतिर्गमयी है। ‘कामायनी’ की श्रद्धा मनु की प्रेरणा है जो उसे जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँचाती है। उसकी चंचलता के सम्मुख अडिग खड़ी रहती है। आन्द्रे रीच के शब्द समाधानस्वरूप प्रतीत होते हैं:  “जब स्त्री एक संस्कृति के रूप में विकसित होगी तभी मानव समाज में क्रांति होगी, नई सोच, नई दृष्टि, नए विचार विकसित होंगे, सत्ता, बुद्धि और भावना के नए आयाम उद्घाटित होंगे।”
      सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में:
            “तुम्हारे रोम रोम से नारी। मुझे है स्नेह अपार
             तुम्हारा मृदु उर ही सुकुमारी। मुझे है स्वर्गागार।”
                    “तुम्हारी सेवा में अनजान
                    हृदय है मेरा अंतर्ध्यान
                    देवी, माँ! सहचरी! प्राण!”
आभार:
1. गोंड: अनुराधा पॉल
2. आदमी की निगाह में औरत: राजेन्द्र यादव
3. मधुमती (अप्रैल–मई 2014)
4. औरत कल आज और कल: आशारानी व्होरा
5. आज़ाद औरत कितनी आज़ाद

'फूल-सी कोमल वज्र सी कठोर' (मुकुल प्रकाशन, प्रथम संस्करण वर्ष 2016) में पूर्व-प्रकाशित

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