कहानी: सब कुछ होते हुए

सुदर्शन प्रियदर्शिनी

सुदर्शन प्रियदर्शिनी

सब कुछ होते हुए भी एक उदासी सी क्यों घेरे रहती है आठों पहर। एक अनमनापन, एक खालीपन ... क्यों मारता रहता है अंदर ही अंदर? अंदर-बाहर, बाहर-अंदर, कहीं भी तो ठौर नहीं जहाँ इस अकुलाहट को तृप्ति मिले। लगता है निर्निमेष क्षितिज की ओर निरुदेश्य ताका किये जाये और कोई इस चुप्पी की रेशमी कोमलता को छुए तक नहीं। या झन्न से कोई कही कुछ तोड़ दिया जाय और डट कर फटकार हो जाय ... लेकिन तब भी शायद तृप्ति नहीं होगी।

 वह बहुत सोचती है कि उस के पास क्या नहीं है, दुनिया में सामाजिक होने के सभी तौर-तरीके ... साज-सामान, गृहस्थी में पूर्णता के सारे सुख ... फिर क्या है जो फिर भी रीता है, क्या है जो फिर भी पूर्णता चाहता है? प्रकृति की कैसी सम्पदा है, रिक्तता हो तो बटोर लो, भराव हो तो बिखेर दे। प्रकृति में जितना सम्पृक्त हुआ जा सकता है उतना ही उस से असम्पृक्त भी। आज बसंत है फिर भी बसंत की वह ललक कहाँ है? वह धानी रंग की अपनी खिलखिलाहट कहाँ है? आज कहीं दिखाई नहीं देती। क्या यह उदासी अपने अंदर ही अंदर तिल-तिल टूट जाने की है या छिन्न-छिन्न जीवन की बूँद-बूँद रिस रिस कर रिक्त हो जाने की! यह उदासी आज के खिले नए यौवनोन्मादित चेहरों के बीच अपने चेहरे के गुम हो जाने की है या गली-गली के पत्तों के खड़-खड़ कर उजड़ जाने की है? समझ नहीं आता, समझ नहीं आया उसे कभी भी।

आज के चेहरे में अपना अतीत होता हुआ चेहरा, उम्र के निशानों से रौंदा हुआ वर्तमान, क्या यही उस की उदासी का कारण है? या मरे हुए संबंधों को ढोने की सड़ांध इस का कारण है? या पति पत्नी के आपसी संबंधों का सपाट-समतल जमीन हो जाने के कारण है? जब पति-पत्नी के आपसी रिश्ते और पत्र सार्वजनिक रैक में रखे जा सकते है तब यह सम्बन्ध मात्र मुखौटा मात्र रह जाते हैं, जिन्हें बच्चों के लिए पति-पत्नी के नकाबों में जिया जाता है।

उस का यह अनमनापन शायद इसी मूल्यहीनता के कारण है जो व्यक्ति-व्यक्ति में आज समाहित है, जो आपसी सम्बन्धों की एक खाई है, जो व्यक्ति को देख कर व्यक्ति के मुँह चुराने की है, जो औपचारिकता के घेरों में घिरी मात्र बनावटीपन की है।

अतीत के क्षितिज में कितना कुछ है जिसे आँखें देखती अघाती नहीं! बसंत के दिन ... धानी रंग की चुनरिया को लेकर साइकिल पर उड़ना, किसी की दृष्टि पड़ते ही छुई-मुई हो जाना, सखियों की खिलखिलाहट -- पतंगों का सर पर भंवरों की तरह उड़ना, साइकिल से उचक-उचक कर डोर पकड़ना, कच्चे-पक्के पेड़ों की डालियों पर झूल जाना ... लगता है वह बचपन बचपन था, आज का बचपन तो चौखटे में बंधा, स्कूल ड्रैस में तैनात, घंटियों पर आमादा, सभ्यता के चोंचलों से सजा-सजाया है। इस में उन्मुक्तता तो लेशमात्र को भी नहीं है। बचपन की यह अतिरिक्त सजगता ... कहीं व्यक्ति को कितना छोटा और बौना बना रही है। उसे लगता है उसने भी तो यही सब कर रखा है! क्या इसी की अनुभूति उसे सालती है कि क्यों वह अपने बच्चों को खुले में नहीं छोड़ती! क्यों उन्हें बेतहाशा भागने, पेड़ों पर चढ़ने, उतरने नहीं देती ... लेकिन ... तब यह सब कहाँ था! यह यंत्र की दौड़ कहाँ थी! यह भीड़ कहाँ थी ... यह बेतहाशापन यह पल-पल रीतती जिंदगी कहाँ थी! वहाँ तो थी उन्मुक्त विशाल खेतों की हरियाली, जहाँ मेड़ों पर उचककर, बंधकर चलने में भी एक चुहल थी।

यह सब जब वह सोचती है तो कहीं और भी अभावों से भर उठती है। वह छोटे से आँगन में उगा हुआ अमरुद का पेड़ ... छितरे पत्तों में से झरती ठंडी बयार और पैरों के नीचे अपने ही साये। बिल्कुल सीमित सुविधाएँ। जकड़ कर रखने वाले नियम, और घर की चारदीवारी।

अब ऊपर-ऊपर टंगे आँतों से यह शहरी-जीवन के प्रतीक टीवी एंटेना ... क्या इन्होंने ही जीवन की रिक्तता को बढ़ा नहीं दिया है! सिनेपट पर देखते-देखते हर चेहरा पहचाना लगता है ... लेकिन सिनेपट की सी दूरी भी तो चेहरों के बीच कितनी बढ़ गई है। आप सामने वाले से बात नहीं कर सकते, क्योंकि वह देखने में घमंडी है। आप पड़ौस में उठ बैठ नहीं सकते क्योंकि इस से आप के बुद्धिजीवी होने को ठेस लगती है। आप हर एक से घुल-मिल नहीं सकते क्योंकि आप के आसपास उपवनों को घेरने वाली कंटीली तारों वाली फेंस बंधी है और आप उसी में बंधे रहने को विवश हैं, चाहे अपने आप में अवश हो जाय।

यह सब से कटा हुआ जीवन भी कितना उदास कर जाता है उसे क्षण-क्षण। अतीत के क्षितिज पर सुदूर एक लाली का चँदोवा दीखता है। कभी वह चँदोवा उसे भरा-भरा लगता था ... चाहे उस ने भी तब लीलने का काम ही किया था।

एक बार उस पर आरोप लगा कि उस ने अपने प्रोफेसर की होने वाली पत्नी को धमकी भरी चिट्ठियाँ लिखी हैं कि वह स्वयं प्रोफेसर को चाहती है इस लिए वह उस के रास्ते से हट जाये।

सुन कर वह सिमट गई थी। सुन्न हो गई थी। छुई-मुई थी लेकिन अंदर से कही ऊँची हो गई थी। क्या उस के आकर्षण ने प्रोफेसर को इस हद तक उसे बदनाम करने का साहस दे दिया है। वह इतनी शर्मीली होकर भी आक्रोश से भर उठी थी। प्रोफसर शुक्ला को सामने देखते ही बिफर पड़ी थी, "और कोई लड़की नहीं मिली आप को बदनाम करने के लिए?"

प्रो. शुक्ला सकपका गए थे।  मैं-मैं करते उन के हलक से बात नहीं निकली थी।

"आप में ऐसा क्या है जो मैं आप की पत्नी को पत्र लिखूंगी?" ... और प्रोफेसर के समक्ष उस समय के अपने साहस नहीं - बल्कि दुःसाहस पर आज उसे हँसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है।

प्रो. शुक्ला ने सिर्फ यही कहा था, "आप के यह कहने पर तो मैं स्वयं अपनी नजरों में गिर गया हूँ। आप के विषय में तो मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता।"

छानबीन करने के बाद मालूम हुआ था कि बहाने से प्रिंसिपल ने उसकी जो कॉपी रक्खी थी - उस की लिखावट उस पत्र से कुछ मिलती-जुलती थी।

पर आज वह सोचती है कि काश! वह सच हो सकता, या उस में इतना साहस होता कि वह कुछ तोड़ सकती या विद्रोह कर अपने अंदर के दुष्ट को शांत कर सकती। लेकिन इस सब के लिए प्रो. शुक्ला उसे बहुत बौने लगे थे और वह ऐसे बौने व्यक्तित्व की ओर आकृष्ट तो हो नहीं सकती थी।

जिंदगी ने बौने व्यक्ति से अतिरिक्त भी कुछ दिखाया था, जब वह स्वयं किसी की आँखों के आमंत्रण पर एक दिशा में बह गई थी। वह तो शायद बढ़ती चली जाती - उन ललछौंही आँखों के तीखे आकर्षण में ... लेकिन उसे मालूम हुआ कि वह जादुई आकर्षण का खिंचाव संध्या के एक बिल्लोरी धूप के टुकड़े के समान था जो आप के पलक झपकते ही न जाने कहाँ दुम दबा कर भाग जाता है। पर अरुण ने उसे ऐसी ललछौंही आँखों से क्यों देखा किया! क्यों एक बार उस ने नासापुटों के निकट तक खींच कर उस के गुलाबी होंठों को छूना चाहा ... वह तो छू ही लेता अगर वह लज्जावश छुई-मुई न हो जाती। लेकिन ऐसा क्यों किया अरुण ने! तब उसने तो उस को लेकर सपनों का अम्बार अपनी आँखों में भर लिया था। पर अरुण ने उस के सारे फूलों को धूलि में बिखेर दिया। कब और कैसे सब कुछ हो गया ... उस की सपनीली आँखें इस की गहराई नहीं नाप पायी। यह तब के लिए ही नहीं भविष्य के लिए भी हो गया था कि उस का विश्वास टूट गया था।

एक दिन उस की सहेली करुणा ने बताया था, "शोभा! तू किस मिसरी की डली को अपने पानी में घोल रही है, अरे वह तो हर लड़की को मिसरी की डली समझता है और ..."

वह टूटी थी, इस लिए नहीं कि अरुण उस का नहीं हो सका बल्कि इस लिए कि वह पहले ही उमा के चक्कर में था। दोनों सुबह और शाम इकट्ठे बिताते थे ... तो उस के साथ उस ने यह खेल क्यों खेला! आज भी लगता है कि उधर बढ़ते-बढ़ते अगर वह ठोकर न लगती तो शायद आज वह पुरुष पर विश्वास कर सकती! काश! वह आज सब पर विश्वास कर सकती है लेकिन पुरुष पर नहीं। वह चाँद को पकड़ने का दम्भ भर सकती है लेकिन पुरुष को बाँधने का दम्भ कोई नारी नहीं कर सकती। पुरुष तो चोर की वह बिसात है कि माल चाहे हाथ न लगे पर मुँह की चाट को वह नहीं रोक सकता।

यह सब सोचते हुए भी कितना खाली-खाली लगता है। क्या यह उसी अतीत का खालीपन है कि कोई झुकते-झुकते ठहर गया, कोई आपको आलिंगन में बांधते-बांधते रुक गया, पर आप की अवश आँखें क्या उम्र भर अतीत हुए अतीत को ही खोजती फिरेंगी?

किस-किस अतीत को लेकर बिसूरूँ - अपने देश की उन गलियों में महकते - मौलशिरी के फूल, चमेली की कलियाँ, धूल धूसरित खेलते बच्चे, अठखेलियाँ करते आमों के वृक्ष, बेरी की डालियाँ और अपने ही आँगन में खड़े दसों लोगों से दुआ-सलाम और भरी-पूरी अंतरंगता से अंदर लौट कर - उमगने को सोचूँ या यहाँ हर समय खाली हथेली को मसकते - अंदर के सूनेपन से संघर्ष की सोचूँ! अपनी मिटटी से विलगने का संत्रास आज तक आत्मा से चिपका है। उतरता ही नहीं। अभावों का भी अपना भरापन होता है। उसे जीना कहते हैं।

इतने भरे-भरे घर में / ऐश्वर्यों सहित रहते हुए / जहाँ काँटा भी न लगे /जहाँ हाथ भी न दुखे / जहाँ पलने पड़े शिशु का सा / मख़मली आभास हो / बाहर भीतर सुख ही सुख / ऊपर-नीचे मसनदी-मखमल बिछे हों / वहाँ भी मन कहीं कैदी सा /बंधा हुआ / सुदूर अपनी माटी से बंधा हुआ / सुबकता कुछ कहता हो / तो समझो वतन की याद आई है।

यही नहीं, पता नहीं कौन-कौन से खलाव है उसके अंदर जो बाहर से तो भर जाते हैं पर अंदर से नहीं पूरते। दाग तो मिट जाते हैं, पर खाई नहीं पटती। इंद्रधुनषी शरीर का आकर्षण तो लुप्त हो जाता है पर प्यास फिर भी प्यास ही रह जाती है। होठों तक आकर लौट जाती है। हलक सूख जाता है पर सिवार भरे जल से प्यास बुझाना नहीं जानते होठ। संबंधों के झरोखों से कहीं वह दैवी हो जाती है तो किसी के लिए अन्यन्त घृणा की पात्र। लेकिन आज तक कोई उस नन्ही कली की अंगुली थामकर उसे भरे आकाश का भरा पन नहीं दे सका। जहाँ दूर तक बिछे तारों का चंदोवा हो और परायी धरती का सूना तारों-रहित आकाश न हो।

आज वह समझ गई है कि प्यार एक महज फलसफा है जिस को चित्रपट पर देखा जा सकता है या कहानियों में पढ़ा जा सकता है। वह सोचती है कि उसकी ऊँचाइयों की ठौर अरुण भी उसे मिल जाता तब भी शायद इतनी ही असन्तुष्टि होती।

हर आदमी में औरत को तोड़ने की एक आदिम शक्ति होती है जिस से वह सुनार की ठुक-ठुक से उसे तोड़ता और अपने अनुरूप तराशता चलता है अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप। जहाँ वह इनकार करे, वहीं उस का प्यार और सौहार्द हवा हो जाते हैं, लेकिन औरत अंदर तक लीलकर भी कैसे जीती और मरती रहती है। मरने को कौन नहीं मरता फिर वह ही क्यों इस पर उदास होती है! शायद उस के अंदर एक विद्रोही है जो इस टूटन को स्वीकार नहीं करता। जो प्यार की सहजता को मानता है पर जबरन अधिकार को नहीं। कोई क्या जाने उस दर्द को, जो औरत हर रात स्याह अंधेरों में अनमनी हो, बेमन के समर्पण में झेलती है। लेकिन उस पुरुष की ऊँचाई में कहीं कोई अंतर नहीं आता।

उसे लगता है वह हर घर के दरीचों से उन बेआवाज आहों को सुन सकती है।

इसी लिए वह सारे दुनियावी सुखों के होते हुए भी अंदर से रीती और खाली होती जाती है क्योंकि वह जानती है कोई भी संतुष्ट कर सकता है, दुलार सकता है, ढक सकता है पर अंदर के खलाव को पूर नहीं सकता ... सब कुछ होते हुए भी!

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