साक्षात्कार: सुधा ओम ढींगरा

अमेरिका निवासी हिन्दी साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, और सम्पादक सुधा ओम ढींगरा से अनुराग शर्मा की वार्ता


सुधा ओम ढींगरा
अनुराग: सुधाजी, अपने बचपन, परिवेश, और प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में कुछ बताइए?

सुधा ओम ढींगरा: एक साहित्यिक, सकारात्मक सोच वाला बेहद खुशहाल परिवार था मेरा। इस परिवेश ने मुझे बहुत निर्भीक और सक्षम बनाया तथा सकारात्मकता घुट्टी में पिलाई। तीन 'पी' तभी से मेरे साथ हैं यानी प्रेम-पेशेंस-प्रेयर।

पोलियो सर्वाइवर हूँ। अपंग होने से तो बच गई पर एक टाँग कमज़ोर रही। बारह वर्ष तक घर में शिक्षा हुई और साथ-साथ मेरा इलाज चलता रहा। परिवार ने किसी तरह की कुंठा भीतर पनपने नहीं दी। किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते हार्मोंज़ के बदलाव और व्यायाम ने; जो मुझे करवाया जाता था तथा कत्थक नृत्य ने शरीर हृष्ट-पुष्ट कर दिया। चलते समय पाँव और क़दमों का संतुलन कैसे रखना है, इसका मुझे प्रशिक्षण दिलवाया गया। यह भी एक तरह का व्यायाम था; जिसने मेरी चाल साध दी। युवावस्था से लेकर उस समय तक किसी को पता नहीं चला कि मैं पोलियो सरवाईवर हूँ, जब तक कि मैंने बताया नहीं। छुपाने वाली बात नहीं थी, लेकिन मुझे किसी की सहानुभूति नहीं चाहिए थी। मैंने महसूस किया था कि लोग यह जानने के बाद मेरी चाल और हावभाव ही देखते रहते और पीठ पीछे कहते 'हाय बेचारी'। और अपने लिए 'बेचारी' मुझे नहीं सुनना था। 'बेचारी' शब्द का दंश वैसे ही मुझे चुभता जैसे बचपन में 'लंगड़ी' का मुझे चुभता था। बचपन में कभी खेलने के लिए बच्चों के साथ हो लेती तो गिर जाती। बहुत गिरती थी उस समय। कुछ बच्चे सहानुभूति के लिए आते, कुछ लंगड़ी-लंगड़ी कहते। बड़े होकर मेरी चाल-ढाल से किसी को पता नहीं चलता था। हाँ कभी-कभी बहुत थकी होती या कमज़ोर टांग वाला पैर आगे रखा जाता तो गिर जाती। इसका भी मैं ख़याल रखती। इससे मेरे आत्मविश्वास को बल मिला।

पदमश्री डॉ. मोटूरि सत्यनारायण के साथ
अब बताने में मुझे कोई झिझक नहीं, मैंने जीवन में इतना कुछ पा लिया है कि अब कोई क्या सोचता है, इसकी परवाह नहीं बल्कि दूसरों को प्रोत्साहित करना चाहती हूँ।

पापा वामपंथी विचारधारा के थे और मम्मी कांग्रेसी। दोनों ने आज़ादी की लड़ाई में खूब बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था। होश सँभालते ही माँ-पापा को दूसरों के लिए जीते देखा। दोनों सोशल एक्टिविस्ट और रिफॉर्मर थे। भिन्न-भिन्न विचारधारा के होते हुए भी मैंने दोनों को समाजसेवा कार्य में इकट्ठे कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते देखा।

मुझसे साढ़े दस साल बड़े भाई ने सोशलिस्ट विचारधारा को अपनाया और मेरा धर्म, कर्म, सोच-विचार सब मानवता के लिए है। मम्मी, पापा और भैया तीनों डॉक्टर थे। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं पर मैं जो कुछ भी हूँ, उनकी बदौलत हूँ।

अनुराग: साहित्य से पहला परिचय कैसे हुआ? परिवार में कौन-कौन लेखन से जुड़े थे?

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी, घर में बहुत बड़ी-लाइब्रेरी थी। सबको पढ़ने का बेइंतिहा शौक था। पापा पंजाबी के शायर थे और भैया उर्दू के। हिन्दी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेज़ी की पुस्तकों की भरमार थी। पढ़ने-लिखने पर कोई रोक-टोक नहीं थी।

मेरा ऐसा मानना है, लेखन एक नैसर्गिक प्रतिभा है। कुछ मूलभूत प्रवृत्तियों के साथ ही देह को स्वरूप मिलता है। लिखने के बीज इंसान के अन्दर होते हैं… परिवेश, हालात-परिस्थितियाँ और अनुभव जब उन्हें खाद पानी देते हैं तो वे फूट पड़ते हैं… मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ।

बचपन की शरारतों और खेलों से वंचित रही। खेल नहीं सकती थी, इसलिए माँ-पापा ने कागज़-कलम, रंग और ब्रश मेरे नन्हे- नन्हे हाथों में पकड़ा दिए। ब्रश छूट गया, कलम ने मेरे हाथों को चुन लिया। उसी से बेरंगे बचपन में रंग भरने लगी। कल्पना का इंद्रधनुष कागज़ों पर बिखरने लगा। भीतर का लावा छितरने लगा। नन्हे हाथ बड़े हो गए। वातावरण में फैले विचलित स्वर बेचैन करते तो दूर दराज़ तथा करीब की ध्वनियों को कागज़ पर उकेर कर मुक्त होती और अपनी बसाई दुनिया में कछुए की तरह स्वयं को समेट लेती। मेरा वह संसार मेरे लिए एक सुदृढ़ ढाल बन गया। मैं यही कह सकती हूँ कि लिखना कब साथ हो लिया जान ही नहीं पाई। खाना-पीना, ओढ़ना-बिछाना हो गया। इश्क करती हूँ इससे। यह इश्क अब साँसों में बस गया है। आक्सीजन है मेरी। प्रकृति की अठखेलियाँ, बादलों का उमड़-घुमड़ कर रोमांस रचाना, सूरज-चाँद का आँख-मिचौली खेलना, पक्षियों का कलरव, पत्तों की सरसराहट, हवा के तेवरों के साथ कहीं किसी के भीतर की पीड़ा, विश्व के कोनों में छिपे वंचित वर्ग का दर्द स्वयं कलम पर आ बैठता है। दर्द कहीं भी करवट बदले, उसकी आहट मेरे तक पहुँच जाती है। मेरी पीड़ा बन लेखनी में उतर आती है।

प्रज्ञाचक्षु मौसी की छत्रछाया में मेरा बचपन बीता है। उन्हें कहानियाँ सुनाने का बड़ा शौक था और वे बहुत रोचक तरीके से कहानियाँ सुनाती थीं। मैं भी बाहर की हर बात, हर घटना उन्हें कहानी बना कर सुनाती। कहानियाँ सुनते-सुनाते मैं कब कहानी लिखने लगी, पता ही नहीं चला।

पापा छह भाई थे। दूसरे नंबर के भाई यानी मेरे ताऊजी बहुत प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। साहित्यकार तो कभी मरता नहीं। आज भी साहित्य में उनका बहुत नाम है। उनका बेटा भी नामी लेखक था। पर वे नहीं चाहते थे मैं लेखन में आऊँ, बहुत विरोध किया उन्होंने, तो मैंने भी कभी उनका नाम नहीं लिया। स्वयं ही अपने रास्ते तलाशे हैं।
डॉ. कमल किशोर गोयनका के साथ


अनुराग: उसके बाद?

सुधा ओम ढींगरा: पाँच वर्ष की आयु में आकाशवाणी की बाल कलाकार बन गई थी और बाल स्तम्भों में लिखती हुई पत्रकारिता जगत में प्रवेश कर गई थी। बहुत छोटी उम्र में दैनिक समाचार पत्र पंजाब केसरी, जालंधर के लिए इंटरव्यू स्तम्भ में साक्षात्कार लेने लगी थी। परिवार नहीं चाहता था कि मेरी शारीरिक कमज़ोरी मेरे व्यक्तित्व पर हावी हो। आत्मविश्वास में कमी आए। कला और साहित्य को मैं नैसर्गिक प्रतिभा मानती हूँ। परिवार ने शायद प्रकृति की इस ऊर्जा को, जो मेरे भीतर थी, पहचान लिया था। मुझे भिन्न-भिन्न माध्यमों से प्रेरित किया और प्रोत्साहित किया। मैं किशोरावस्था तक, रेडियो, रंगमंच की कलाकार बन चुकी थी और बाद में टीवी की कलाकार बनी।

युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते अख़बारों में मेरी रिपोर्टिंग, विभिन्न स्तम्भों, साक्षात्कारों के साथ कहानियाँ, यहाँ तक कि धारावाहिक उपन्यास भी छप गया था। वह समय ऐसा था, जब अख़बारों में छपना बड़े गर्व की बात थी। समाचार पत्रों के साहित्यिक संस्करण बहुत चाव से पढ़े जाते थे। उस समय का लिखा कुछ भी पुस्तक रूप में नहीं आया। शायद पुस्तक छपवाने की ओर ध्यान ही नहीं गया, इस बात का मुझे रंज है। यह नहीं कि उस समय के लिखे को मैंने ख़ारिज कर दिया। हालाँकि मैं मानती हूँ, वह अनुभवहीन भावुक लेखन था। पर लोगों ने बहुत पसंद किया था। उन रचनाओं को अब भी पढ़ती हूँ तो लगता है, थोड़ा ठीक करके उन्हें छपवा लूँ।

1982 में शादी के बाद अमेरिका आई। तो कुछ समय के लिए लेखन रुक गया। यहाँ के संघर्ष में लिख नहीं पाई। पर उतने वर्ष अनुभव बहुत समेटे। अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा। हिन्दी साहित्य उपलब्ध नहीं था। फिर जब कलम उठाई तो लेखन की धार यथार्थ के धरातल पर खड़ी पाई, अनुभवों ने उसे गम्भीर चिंतन दे दिया था और संघर्ष के थपेड़ों ने उसे तराश दिया था।

विदेश में रहते हुए वर्षों बीत गए पर आज भी लिखते हुए हवेली के बरामदे में बैठी नन्ही बच्ची सी प्रश्नों का कोलाहल भीतर महसूस करती हूँ। देशवासियों का हर दर्द रुलाता है। शोषित पीड़ित स्त्री मुझ से अलग कहाँ है। जिनसे कहानियाँ सुन-सुन कर कल्पना ने उड़ान भरनी सीखी, प्रज्ञाचक्षु मौसी; जिनकी छत्रछाया में बचपन बीता, को याद कर लिखती हूँ। स्मृतियाँ मथती हैं। दो देशों की संस्कृतियों का तनाव छीजता है। अच्छाइयों, बुराइयों, विसंगतियों, विद्रूपताओं और पूरे विश्व के आम इंसान; जिनमें प्रताड़ित महिलाएँ अग्रिम पंक्ति में हैं, के लिए लिखकर राहत महसूस करती हूँ। 'बेचारी' शब्द अपने लिए नहीं सुनना चाहती थी। देश-विदेश की हर उस महिला के साथ हूँ, जिसे 'बेचारी' बना दिया जाता है, उसका दर्द सह नहीं पाती और लेखनी हो लेती है उसके साथ।


अनुराग: कभी आपने भी हिंदी में पीएचडी की थी। आज आपकी कृतियों पर शोध हो रहे हैं। यह यात्रा कैसे तय हुई? प्रमुख पड़ाव क्या-क्या थे?
कवयित्री सुधा ओम ढींगरा

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी सच कहूँ तो मैं अपनी यात्रा का आनंद लेती हूँ, मुझे तो यह भी पता नहीं चल रहा कि यह यात्रा तय कैसे हो रही है? मैंने कभी कुछ निर्धारित नहीं किया। कर्मशील हूँ। ईश्वर प्रदत्त प्रेरणा से जो भी कार्य सामने आता है, उसे कर लेती हूँ। अध्यात्मवाद में रुचि है, जीवन में आलतू-फ़ालतू की गुंजले और कुंठाएँ नहीं पालती। बहुत सरल और सदा सोच है। यही मेरी कार्य शैली में है। चुपचाप अपना काम करती रहती हूँ।

एक दिन सुषमा शेखर नाम की लड़की का फ़ोन आया कि वह प्रवासी साहित्य पर पीऍच.डी कर रही है; एक दो अन्य लेखकों के साथ उसने मुझे भी लिया है। उसी ने मुझे बताया कि दयालबाग़ एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड यूनिवर्सिटी), दयालबाग़, आगरा से रेशू पाण्डेय ने मेरी कहानियों पर एम.फ़िल किया है; जिसका मुझे पता भी नहीं था। उसके बाद तो कई एम.ए, एम.फ़िल और पीएच.डी करने वाले विद्यार्थियों का पता चला।


अनुराग: आपने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा है। इनमें से कौन सी विधा आपकी प्रिय है?

सुधा ओम ढींगरा: साहित्य का सागर इतना गहरा है और उसके तल तक जा कर ही कुछ खोजा जा सकता है। खोजने की प्रक्रिया के मार्ग साधना और समाधि हैं जो अध्ययन, निरंतर लेखन और एकाग्रता से ही मिल पाते हैं। मैं हर विधा में अपने-आपको झोंक देती हूँ, हर सृजन के बाद निचुड़े नींबू सी हो जाती हूँ और बच्चे को जन्म देने के बाद निढाल जच्चा सी। पर यह नहीं कह सकती कि फलाँ विधा मेरी प्रिय है। हर विधा में रचना के बाद लगता रहता है, कहीं कमी रह गई। सर्वोत्तम आना अभी शेष है, कब, किस विधा और रचना में, इसका उत्तर मेरे पास नहीं है। और फिर मैं तो एक जिज्ञासु विद्यार्थी हूँ। हर रोज़ परिपक्वता और मेरे अनुभवों में कुछ मात्रा बढ़ती रहती है। शायद सर्वोत्तम देने की ललक ही मुझे खोज की राह पर चला रही है। मेरे लिए लेखन एक यात्रा है मंजिल नहीं।


साहित्यकार सुशील सिद्धार्थ के साथ
अनुराग: एक स्त्री की साहित्य यात्रा एक पुरुष से किस प्रकार भिन्न है?

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी यह प्रश्न आपने ऐसा पूछा है जिस पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। बस इतना कहना चाहूँगी कि स्त्री-पुरुष की प्राकृतिक भिन्नता जीवन के हर क्षेत्र में रहती है। हमारी पारिवारिक और सामाजिक संरचना ऐसी है कि पुरुष के लिए हर कार्य आसान कर दिया जाता है; जबकि उसी कार्य के लिए स्त्री को संघर्ष करना पड़ता है। लेखिका को पारिवारिक, सामाजिक मोर्चों पर जूझते हुए, भावना के कई पड़ाव पार करते हुए लेखन के लिए समय निकालना पड़ता है। संवेदनशीलता के धरातल पर भी महिला पुरुष से बेहतर महसूस कर सकती है। एक अरसे तक स्त्री लेखन को बेहतर दर्जा नहीं दिया गया। साहित्य और साहित्यकार समाज से अलग तो नहीं हैं। समय-समय पर साहित्य में पुरुष सत्ता का प्रभाव भी अपना रंग जमाता रहा है। लेखिका अगर घर-परिवार की बात लेखन में करती है तो सामाजिक श्रेणी में रख दी जाती है और उसका लेखन दोयम दर्जे का बना दिया जाता है। और अगर लीक से हट कर विषय चुनती है, अपने अस्तित्व, अपनी अस्मिता, होंद और मानसिक तथा शारीरिक स्वतंत्रता की बात करती है तो आलोचनाओं के घेरे में आ जाती है। स्त्री और पुरुष दोनों के पेशेवर होने से अब परिस्थितियाँ थोड़ी भिन्न हो गई हैं। फिर भी स्त्री को अधिक समायोजन करना पड़ता है।


अनुराग: प्रवासी साहित्य की क्या विशेषता है? क्या उसमें भी आगे श्रेणियाँ या वर्ग विभाजन है?

सुधा ओम ढींगरा: प्रवासी लेखक साहित्यिक राजनीति और गुटबंदी से दूर हैं। किसी विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं लिखते अतः जो लिखते हैं, किसी दबाव में नहीं, आज़ाद ख़यालों और आज़ाद सोच से लिखते हैं। प्रवासी साहित्यकारों का वैश्विक विषयों पर दर्शन बहुत स्पष्ट है। दो संस्कृतियों के टकराव और द्वंद्व से पैदा हुई ऊहापोह के उपरांत सोच, समझ और नज़रिया बेहद निखर चुका है। प्रवासी साहित्य में दृष्टि की व्यापकता वैश्विक सरोकारों के प्रति अत्यंत सजग है। विदेशी परिवेश, कथ्य, विषय और शैली पाठकों को नयापन देते हैं। प्रवासी साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. कमल किशोर गोयनका ने मुझे 'वैश्विक रचनाकार: कुछ मूलभूत जिज्ञासाएँ' के लिए इंटरव्यू देते हुए प्रवासी साहित्य की विशेषताएँ यूँ बताईं- 'हिन्दी के इस साहित्य का रंग रूप, उसकी चेतना, संवेदना एवं सृजन प्रक्रिया भारत के हिन्दी पाठकों के लिए एक नई वस्तु है, एक नए भावबोध एवं नए सरोकार का साहित्य है। एक नई व्याकुलता, बेचैनी तथा एक नए अस्तित्व बोध व आत्मबोध का साहित्य है; जो हिन्दी साहित्य को अपनी मौलिकता एवं नए साहित्य संसार से समृद्ध करता है। विदेशों में रहने वाले हिन्दी के साहित्यकार अपने देश के प्रति अधिक सजग एवं समर्पित हैं। इस साहित्य में एक ऐसी भारतीयता है जो स्वदेश -परदेश के द्वंद्व से जन्म लेती है और एक नया परिवेश, एक नई जीवन दृष्टि तथा जीवन जीने का नया सरोकार देती है। हिन्दी की मुख्य धारा का यह साहित्य अंग है और अपनी पहचान भी रखता है।'

अनुराग जी इसमें श्रेणियाँ या वर्गविभाजन तो नहीं है पर एक दिन इसके सही मूल्याङ्कन के लिए देश विभाजन ज़रूर होगा। गिरमिटिया साहित्य, ब्रिटेन, अमेरिका, कैनेडा, डेनमार्क का प्रवासी साहित्य।

ढींगरा फ़ाउण्डेशन के सम्मान समारोह में

अनुराग: क्या प्रवासी साहित्य के मुख्य पात्र शिक्षित मध्य या उच्च वर्ग तक सीमित हैं या उसमें अन्य वर्गों को भी समुचित प्रतिनिधित्व मिला है, उदाहरण के लिये, अवैध आप्रवास, अशिक्षित श्रमिक वर्ग, या पति का साथ देने के लिये अपनी भरी-पूरी नौकरी छोड़कर एच4बी पर आकर घर में रह रही उच्चशिक्षित आधुनिक नारियों को?

सुधा ओम ढींगरा: प्रवासी साहित्य के पात्र हर वर्ग के हैं। शिक्षित मध्य या उच्च वर्ग के साथ अवैध आप्रवास, अशिक्षित श्रमिक वर्ग तक हैं। हाँ पति का साथ देने के लिये अपनी भरी-पूरी नौकरी छोड़कर एच4बी पर आकर घर में रह रही उच्चशिक्षित आधुनिक नारियों को लेकर कोई कहानी लिखी गई है, इसका मुझे ज्ञान नहीं। मैंने ऐसी कोई कहानी नहीं पढ़ी।

अनुराग जी प्रवासी साहित्य सिर्फ प्रवासी भारतीयों की समस्याओं, परेशानियाँ, द्वंद्व, सरोकारों को लेकर ही नहीं लिखा गया इसमें स्थानीय चरित्र, सामाजिक विसंगतियाँ और विद्रूपताएँ भी हैं। कई कहानियाँ तो पूरी तरह से स्थानीय पात्रों को लेकर ही लिखी गई हैं। मेरी कहानी 'सूरज क्यों निकलता है...?' होमलेस, ग़रीबी रेखा से नीचे वाले, फ़ूड स्टैंप्स पर जीने वाले वर्ग की कहानी है। सरकारी सुविधाओं का किस तरह से दुरुपयोग किया जाता है, इसका चित्रण है। 'फ़ंदा क्यों...?' अवैध आप्रवास, अशिक्षित श्रमिक वर्ग की कहानी है। तेजेन्द्र शर्मा, स्व. नीना पॉल, कादम्बरी मेहरा, उषा राजे सक्सेना, अनिल प्रभा कुमार, सुदर्शन प्रियदर्शिनी और अर्चना पैन्यूली की कई कहानियाँ स्थानीय लोगों की समस्याओं पर हैं।

दरअसल प्रवासी हिन्दी साहित्य सिर्फ प्रवासी भारतीयों का साहित्य ही नहीं बल्कि पूरे विश्वबोध का साहित्य है।


अनुराग: क्या आप अपने को 'प्रवासी साहित्यकार' मानती हैं? क्यों?

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी मानने या न मानने का विकल्प ही कहाँ हैं हमारे पास। जैसे कि पहले मैं आपको बता चुकी हूँ कि भारत में मैं पत्रकार थी। कविताएँ, कहानियाँ यहाँ तक कि धारावाहिक उपन्यास भी आ चुका था। अमेरिका आने के बाद कुछ देर लेखन में विराम आया। नए देश, नए परिवेश को समझने में मुझे समय लगा। फिर जब कलम उठाई और पहली रचना प्रवासी साहित्यकार के ठप्पे के साथ छपी। बहुत झटका लगा था। अरे यह क्या... वहीं से तो आईं हूँ, देश की बेटी परदेश क्या ब्याही गई... बस बेगानी हो गई। यथार्थ को समझने की कोशिश नहीं की, बस आँखें नम हो गईं।

प्रवासी हूँ, वर्षों से विदेश में रहती हूँ। जिस देश में लेखक रहता है; उस देश का परिवेश, विसंगतियाँ, विद्रूपताएँ, सामाजिक चेतना, जीवन मूल्य, दर्शन सब कुछ उसके लेखन में आता है। प्रवासी लेखकों के लेखन के विषय भी भिन्न होते हैं। लेखनी में कई चित्रण ऐसे आते हैं; जो भारत के पाठकों के लिए अद्भुत होते हैं। एक उदाहरण देती हूँ। यहाँ जब पतझड़ आने वाली होती है, तो वृक्षों से पत्ते गिरने शुरू होने से पहले वे अनगिनत रंगों में परिवर्तित होते हैं। उन रंगों की छटा देखने वाली होती है। दूर-दूर से पर्यटक पत्तों के रंगों की धनक देखने आते हैं। कई रंगों में परिवर्तित हो कर वे गिरते हैं और कई दिन लगते हैं उन्हें गिरने में। अब जब प्रवासी लेखक इनका ज़िक्र प्राकृतिक चित्रण में करेगा तो भारत वासियों को अलग लगेगा। और उसके बाद वे वृक्ष टुंड-मुंड हुए पूरी सर्दियों में पत्तों विहीन खड़े रहते हैं। सर्दियों में अगर बर्फ़बारी रुई जैसी हुई तो इन वृक्षों का नज़ारा ठीक वैसा ही होता है जैसे शिमला, कुफ़री या पहाड़ी प्रदेशों का। बस स्नो से ढके-छुपे। पर अगर तापमान कम है तो शीशे जैसी बर्फ़ पड़ी, जो मेरे यहाँ कई बार पड़ती है तो भारत के पाठकों के लिए दृश्य बदल जाता है। बाग़-बगीचे शीशे जड़ित हो जाते हैं। थोड़ी सी रौशनी में ही चमचमाते हैं; जो पाठक की कल्पना के पंखों को उड़ने के लिए फड़फड़ाते हैं।

कुछ वर्ष पहले ब्रिटेन और अमेरिका के कुछ साहित्यकारों ने प्रवासी लेखक कहे जाने पर बहुत हंगामा किया था। पर अब वे प्रवासी संग्रहों में भी छपते हैं, प्रवासी साहित्य के शोध का हिस्सा भी बन रहे हैं। क्यों वे इनकार नहीं कर पाए? क्या कारण हैं?

अनुराग जी हिन्दी साहित्य के इतिहास के पृष्ठों को पलटें तो समय-समय पर साहित्य के मूल्यांकन के लिए उसे कभी वादों, कभी विमर्शों के खाँचों में बाँटा गया है। छायावाद, रहस्यवाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद और फिर स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श आदि-आदि। प्रवासी साहित्य भी उसी तरह एक खाँचा है।

मुझे बहुत जल्द समझ में आ गया था कि देशवासियों के लिए मैं प्रवासी हो गई हूँ और साहित्य जगत् ने प्रवासी साहित्यकार बना दिया और मेरा लिखा भी प्रवासी हो गया है, तो मैंने उसे स्वीकार किया, इस पर अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं की। हमेशा से मेरी सोच और रास्ते बड़े स्पष्ट होते हैं। कोई ऊहापोह नहीं होती, संभ्रमित नहीं होती। मस्त-मौला सी लेखिका हूँ। शायद महत्त्वाकांक्षी नहीं हूँ; इसलिए बस लिखती रही। लिखना अनिवार्य है। प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या-द्वेष, गुटबंदी से दूर, विमर्श, वादों और विवादों से परे अपना काम करती रही। अभी भी उसी तरह काम कर रही हूँ; इससे बेख़बर कि मुझे और मेरे साहित्य को क्या समझा जाता है। उद्देश्य बस यह रहता है कि मेरा लेखन पाठकों तक पहुँचे। मेरा लिखा अपनी सही मंज़िल पा ले, वह है पाठकों का स्नेह और आशीर्वाद। भारत की साथ-साथ विश्व की सभी पत्रिकाओं में बिना किसी ठप्पे के छपती हूँ। प्रवासी विशेषांकों का संपादन भी किया है और अन्य प्रवासी विशेषांकों में छपी भी हूँ। संपादक जैसा चाहें छाप दें। अंततः तो रचना ने अपना स्थान बनाना है।

मुझे प्रवासी साहित्यकार होने के नाते कई सम्मान मिले हैं। राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्वारा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा का, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का, स्पंदन सम्मान इत्यादि। कई विश्वविद्यालयों में एम.ए, एम फ़िल, पीऍच.डी मेरे साहित्य पर की गई है; जिसे प्रवासी साहित्य कहा जाता है।

दिल्ली में कुछ ख्यातनाम साहित्यकारों के बीच

अनुराग: 'नक़्क़ाशीदार केबिनेट' की रचना प्रक्रिया के बारे में कुछ बताइए।

सुधा ओम ढींगरा: उपन्यास लिखने का विचार वर्षों से भीतर कुलबुला रहा था और अच्छे विषय की तलाश भी जारी थी। जिस विषय के बीज भीतर कभी सन् 1981 में पड़े थे वे समय के थपेड़ों और संघर्ष में कहीं दब कर मुरझा गए थे। इसलिए उपन्यास लिखने का विचार स्थगित होता गया।

मैं प्रताड़ित महिलाओं की कॉउंसलिंग का कार्य करती थी। वहीं मुझे ऐसा विषय मिला, जिसने मेरे संवेगों को तरंगित कर दिया और उपन्यास के लिए सामग्री जुटा दी। कथ्य के बीज पड़ गए और वह बीज मेरे अन्दर धीरे-धीरे पनपने लगे। इसके साथ ही सन् 1981 के बीज भी हरे हो गए, शायद उन्हें उचित खाद पानी मिल गया था। एक दिन लगा कि पूरे ख़ाके को जो मस्तिष्क में है, उसे कागज़ों पर उतारा जाए। एक पहला ड्राफ़्ट तो बनाया जाए। पता नहीं क्यों विचार अड़ियल घोड़े सा अड़ गए। ऐसा लगा जैसे कह रहें हों, 'कर लो जो करना है नहीं उतरता हमें शब्दों में। हम किसी भी तरह, किसी भी रूप में बँधने को तैयार नहीं'। सच में कलम से कोसों दूर भाग गए थे वे विचार, जिनका एक पूरा का पूरा ख़ाका बन गया था। उपन्यास लिखने की चाह थी और कथानक भी था पर इसकी पहली रूपरेखा तक तैयार नहीं हो पा रही थी। कथानक पंजाब और अमेरिका के मध्य, दो संस्कृतियों को लेकर स्वरूप धर चुका था।

हालाँकि जन्मभूमि की खुशबू, सभ्यता, संस्कृति और वहाँ की यादें परछाईं सी पीछा करती लिपटी रहती हैं। फिर भी उपन्यास के चरित्र आकार क्यों नहीं ले पा रहे थे? इसी अंतर्द्वंद्व में समय बीत रहा था।

कथ्य का बीज पड़ने और उपन्यास का जन्म होने के अंतराल में मैंने बहुत से विषयों और धर्मों का अध्ययन किया। विशेष कर धर्मों को बृहत रूप में समझने की कोशिश की। इस दौरान मैंने एक बात महसूस की, मुझे कई ऐसे समाचार मिले; जिन्होंने उपन्यास के कथ्य को और खाद-पानी दिया। ये समाचार बेहद दुखदाई थे। पंजाब के गाँवों की ग़रीब लड़कियों को यहाँ लाकर, जिस तरह उनका शोषण किया जाता है। समाचारों में उनकी दास्तान लिखी थी। पढ़ कर मन दुःखी हुआ। इस दुःख में किशोरावस्था और युवावस्था में अपने बुज़ुर्गों से सुनी और आँखों देखी कई कहानियाँ सम्मिलित हो गईं। छुटपन से ही बहुत सजग प्रवृत्ति की थी। कुछ घटित होते देखती या किसी से कुछ सुनती, मेरी कल्पना वहाँ अपना योगदान ज़रूर देती। जिससे अनकहा और अनसुना भी जान जाती। शायद इसी जागरूक प्रवृत्ति की बदौलत, पूरी तरह से परिपक्व हो कर उपन्यास जन्म लेने को तैयार हो गया था। उस दिन मैं बहुत बेचैन थी। अक्सर कुछ लिखे जाने से पहले मेरी ऐसी ही मनःस्थिति होती है। रचना के जन्म से पहले की प्रसव पीड़ा से गुज़र रही थी। अचानक भीतर जमा लावा ज्वालामुखी सा फट पड़ा और कलम बेझिझक, बेख़ौफ़, बिना अवरोध के चलने लगी और 'नक़्क़ाशीदार केबिनेट' उपन्यास के पात्र आकार लेने लगे और मुझे अपने साथ बहा ले गए। कई महीनों तक उन्हीं की तरह सोचा। उन्हीं के पलों को जिया। उनके कष्ट भोगे। वे रोए, मैं रोई। परिस्थितियों की जकड़न में वे जकड़े हुए थे, पीड़ित मैं हुई। उनकी पीड़ा और दर्द से तड़पी। ख़ुशी की बात यह है कि जिस वेदना से मैं गुज़री हूँ, वह पाठकों तक पहुँची। सोनल की त्रासदी, पम्मी की कुर्बानी, सुक्खी का धैर्य और पाश के सपने पाठकों को भाए, तभी तो उपन्यास का तीसरा संस्करण आ चुका है और प्रतिष्ठित कहानीकार, उपन्यासकार और विभोम-स्वर के संपादक पंकज सुबीर ने इस पर एक विमर्श की पुस्तक निकाली है, विमर्श-नक़्क़ाशीदार केबिनेट। जिसमें 50 के करीब आलोचकों, लेखकों, समीक्षकों और पाठकों के लेख, आलेख, आलोचनाएँ, समीक्षाएँ और पत्र हैं।


अनुराग: धन्यवाद! आपकी रचनाओं में सबसे ज़्यादा हलचल किसने मचाई और क्यों?
सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी, लेखन मेरी साधना है। मैं बस लिखती हूँ, साधिका अपना काम करती है, जो भी लिखती हूँ हलचल मचाने के लिए नहीं। हाँ, भीतर की हलचल और द्वंद्व, मेरी लेखनी में उतरता ज़रूर है। वह पाठकों पर क्या छाप छोड़ता है, यह तो पाठक ही बता सकते हैं।


अनुराग: आपकी सर्वप्रिय रचना कौन सी है और क्यों?
सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी, नहीं कह सकती मेरी सर्वप्रिय रचना कौन सी है? मैंने अपनी सभी रचनाओं में स्वयं को झौंका है। सभी के लिए एक सी पीड़ा महसूस की है और फिर लिखने के बाद मैं अपनी रचनाओं से निर्लिप्त हो जाती हूँ। वह पाठकों की बन जाती हैं।


अनुराग: आपके लेखन पर भारत में चल रहे शोधकार्यों के बारे में कुछ बताना चाहेंगी?

सुधा ओम ढींगरा: जो शोधकार्य चल रहे हैं अभी पूर्ण नहीं हुए, उन पर बात करना मैं उचित नहीं समझती। इतनी जानकारी दे सकती हूँ कि दो पीऍच.डी, तीन एम. फिल. और एक एम. ए. हो रही है। जो शोधकार्य हो चुके हैं, वे हैं-
1. डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में अभिव्यक्त समस्याएँ (लघु शोध प्रबंध, एम. ए.), शोधार्थी -निधिराज भडाना, निर्देशक-प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी, चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ।
2. प्रवासी साहित्यकार सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में निहित समस्याएँ (लघु शोध प्रबंध, एम. फिल.) शोधार्थी -रेशू पाण्डेय, निर्देशन-डॉ. (श्रीमती) शर्मिला सक्सेना, दयालबाग़ एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड यूनिवर्सिटी), दयालबाग़, आगरा।
3. सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में प्रवासी जीवन का अध्ययन (लघु शोध प्रबंध, एम. फिल.) शोधार्थी -शहनाज़, शोध-निर्देशक-डॉ. अजय कुमार नावरिया, जामिया मिल्लिया इस्लामिया (केन्द्रीय विश्विद्यालय), नई दिल्ली-110025
4. प्रवासी भारतीयों की समस्याएँ एवं संवेदनाएँ (सुधा ओम ढींगरा की कहानियों के विशेष सन्दर्भ में) (लघु शोध प्रबंध, एम. फिल.) शोधार्थी - प्रसीता पी, शोध-निर्देशक-डॉ. पी. रवि शांति नायर, श्री शंकराचार्य यूनिवर्सिटी ऑफ़ संस्कृत, कालडी, केरला।
5. प्रवासी हिन्दी साहित्य का वर्णात्मक सर्वेक्षण (शोध प्रबंध, पीऍच.डी, तकरीबन सभी प्रवासी लेखक) शोधार्थी-नवनीत कौर, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़।
6. सुधा ओम ढींगरा: रचनात्मकता की दशाएँ-लेखिका वंदना गुप्ता (कहानीकार, उपन्यासकार एवं आलोचक)


अनुराग: दशकों से अमेरिका में रहते हुए आपको दिन-रात अंग्रेज़ी में ही बात करना पड़ता है। ऐसे में अंग्रेज़ी में लिखना स्वाभाविक लगता है। लेकिन आपके साहित्य की भाषा हिन्दी और पंजाबी हैं, ऐसा क्यों? क्या आप अंग्रेज़ी में भी लिखती हैं?

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी, इतने वर्ष हमें अमेरिका में रहते हो गए, आज भी हमारे घर में हिन्दी बोली जाती है। मेरा बेटा डॉक्टर है और उसने कॉलेज में माइनर हिन्दी ली थी। वह जब भारतीय बुज़ुर्ग रोगियों के साथ हिन्दी, पंजाबी में बात करता है तो खुश हो कर बताता है कि उसे जब अनुवादक नहीं लेना पड़ता तो सभी डॉक्टर हैरान होते हैं। पंजाबी वह दादा-दादी और नाना-नानी के साथ बोलता था।

अंग्रेज़ी कितनी भी बोल लूँ, उसमें लिखने का मज़ा नहीं आता। बहुत बार कोशिश की पर निराश हुई; क्योंकि सोचती अभी भी हिन्दी में हूँ।

हिन्दी, पंजाबी दोनों सहेलियाँ मुझे बहुत सुकून देती हैं। इनका साथ मुझे बहुत सुख और आनंद देता है।


अनुराग: आपने अमेरिका में हिन्दी पढ़ाई भी है, उसके बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताइए।

सुधा ओम ढींगरा: मैंने यूनिवर्सिटी में हिन्दी बहुत पहले पढ़ाई थी; तकरीबन अस्सी के अंत में। तब और अब के हिन्दी विभागों, पढ़ाने के तरीकों और विद्यार्थियों में बहुत अंतर आ चुका है। अगर कोई अंतर नहीं आया तो वह है हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में पढ़ना और पढ़ाना। उस समय पढ़ाने के अनुभवों से एक बात महसूस की थी, यहाँ के जन्मे- पले भारतीय मूल के छात्रों को हिन्दी भाषा की तरफ तभी आकर्षित कर सकते हैं, अगर यह सहज और सरल तरीके से उन तक पहुँचाई जाए। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी, सेंट लुईस में हिन्दी पढ़ाते हुए एहसास हुआ कि भारतीय मूल के होते हुए भी, यहाँ के छात्र हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में सीखते हैं, अतः शुद्ध हिन्दी की बजाए सरल हिन्दी में उन्हें पढ़ाना पड़ा। मैंने जब हिन्दी फिल्मों के गीतों और फिल्मों के उन दृश्यों का सहारा लिया, जिनसे मैं विद्यार्थियों को हिन्दी की शब्दावली, व्याकरण, रिश्ते, महीने, वर्ष आसानी से और जल्दी से सिखा सकी, तो कक्षा में बच्चों का प्रवेश बढ़ गया। बहुत से अहिन्दी भाषी परिवारों के बच्चे भी हिन्दी क्लासों में प्रवेश लेने लगे। गीतों में संस्कृति भी होती है और आसान से आसान ढंग से हिन्दी पढ़ाने में फिल्मी गीतों का उपयोग कर मैंने यह पाया कि इस तरह से एक तो कक्षा जीवन्त हो उठती थी और दूसरा व्याकरण उन्हें तुरंत समझ में आती थी।

यहाँ तो भाषाएँ खेल-खेल में सिखा दी जाती हैं - मेरे सामने पब्लिक ब्राडकास्टिंग सर्विसिज़ के कार्यक्रम ''सेसमी स्ट्रीट'' का उदाहरण था, जिसमें तरह-तरह की कठपुतलियाँ खेलतीं, आपस में बातचीत करते हुए ही बच्चों को अंग्रेज़ी सिखा जाती हैं।


अनुराग: लेखन के अलावा, सम्पादन, हिन्दी समिति, कवि सम्मेलन जैसे राष्ट्रव्यापी आयोजन, जनसेवा, और शोधछात्रों की सहायता, इन सबके लिये समय चाहिए जो कि सीमित है। इतना सब आप कैसे कर पाती हैं? समय-प्रबंधन के बारे में कुछ टिप्स हमारे पाठकों को भी दीजिये न!

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी, भारत में मैं पत्रकार थी, कुछ कहानियाँ, कविताएँ और एक धारावाहिक उपन्यास भी लिखा था। टीवी, रेडियो और रंगमंच की कलाकार थी। वहीं का सीखा समय-प्रबंधन यहाँ काम आया। प्राथमिकताओं की प्रमुखता, अनुशासन और समय की पाबन्दी मुख्य बातें हैं। पत्रकारिता 'डेड लाइन' के अनुशासन में बंधी होती है। पत्रकार घड़ी की सुई की टिकटिक के साथ काम करता है। निर्धारित समय में उसे अपनी रिपोर्टिंग, कवरेज, लीड या स्टोरी पूरी करनी होती है। समय की पाबन्दी बहुत अर्थ रखती है। थोड़ी सी चूक पत्रकार को पत्रकारिता जगत् में पछाड़ देती है। जिस समाचार की आज माँग है, समय रहते उस सूचना को जनता तक नहीं पहुँचाया गया, तो दूसरे दिन उसका कोई महत्त्व नहीं रहता। पत्रकारिता में प्रतिस्पर्धा, बाज़ारवाद के चलते पत्रकार का जीवन तेज़ रफ़्तार से भागता है।

काम में उसी तेज़ रफ़्तार को मैंने छोड़ा नहीं है। हर कार्य की 'डेड लाइन' सामने रख लेती हूँ। अगर हम किसी भी काम का निर्धारित समय नहीं रखेंगे तो काम कभी समाप्त नहीं होगा। रात सोने से पहले दूसरे दिन के कामों की एक लिस्ट बन जाती है, दूसरे दिन उन कामों को निपटाने की पूरी कोशिश करती हूँ। मेरी सोच बड़ी स्पष्ट है, उसे भटकने नहीं देती और प्रतिबद्धता के साथ अपना कार्य पूर्ण कर लेती हूँ। पर कविता, कहानी और उपन्यास के लिए 'डेड लाइन' काम नहीं करती, उनके लिए स्वयं को स्वतंत्र छोड़ देती हूँ।


अनुराग: आपके भीतर का लेखक आपकी सम्पादक की भूमिका में कितना सहायक होता है? या फिर इस रूप में आप एक लेखक से भिन्न व्यक्ति होती हैं या इनमें किसी प्रकार का पूरकत्व है?

सुधा ओम ढींगरा: पत्रकार, कहानीकार और उपन्यासकार यानी भीतर बैठे हरेक 'कार' को अनुभवों ने बड़ी मुस्तैदी से अपना-अपना कार्य करना सिखा दिया है और अलग-अलग खाँचे डगमग नहीं होते। सोच की स्पष्टता ने बहुत सहायता की है। इसी तरह सम्पादक और लेखक का टकराव नहीं होता। अनुराग जी एक बात ज़रूर कहूँगी कि मेरे भीतर का लेखक जब तक पत्रिका की सामग्री के चुनाव में सहायता करता है, उसे साथ रखती हूँ, जब वह कठिनाई पैदा करने लगता है तो उसे परे कर देती हूँ। पत्रिका की सामग्री निश्चित करते हुए सम्पादक की भूमिका आरम्भ होती है, तब मैं अपना भी लिहाज़ नहीं करती। अनुशासन के साथ कार्य करती हूँ। मेरे साथी पंकज सुबीर भी मेरी तरह के हैं। पठनीय अशुद्धियाँ और सामग्री के संपादन में समझौता नहीं किया जाता। पत्रिका की गुणवत्ता सबका पहला उद्देश्य रहता है। पत्रिका से जुड़े सभी लोग एक टीम की तरह काम करते हैं, मुझे टीम में काम करना बहुत अच्छा लगता है।


अनुराग: क्या आपके बच्चे आपकी रचनाएँ पढ़ते हैं? आगामी पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्य से जोड़ने के लिये क्या किया जाना चाहिये?

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी, मेरा एक ही बेटा है, जो यहीं जन्मा पला है। हिन्दी बोल लेता है, उसे यह पता होता है कि माँ ने कौन सी कहानी में क्या लिखा है? उपन्यास का कथ्य क्या है? पढ़ नहीं पाता, डॉक्टर है, बहुत व्यस्त रहता है। अभी करियर बना रहा है।

सरल भाषा ही युवा पीढ़ी को अपनी तरफ आकर्षित करती है। भाषा, संस्कृति और साहित्य से जोड़ने के लिये सरल मार्ग ही अपनाना होगा।


अनुराग: हिन्दी की वर्तमान स्थिति के बारे में ओबैदुल्ला अलीम का शेर एकदम सटीक बैठता है:
पढ़ता नहीं है अब कोई, सुनता नहीं है अब कोई; हर्फ़ जगा लिया तो क्या, शेर सुना लिया तो क्या।

आजकल जो लिखते हैं, वे ही एक दूसरे को पढ़ते हैं। ऊपर से सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति-वार्धक्य की स्थिति उत्पन्न कर दी है। ऐसे में एक अच्छा लेकिन साधनहीन लेखक क्या करे?

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी इस बात से सहमत नहीं कि जो लिखते हैं वे ही सिर्फ़ एक दूसरे को पढ़ते हैं, अगर पाठक ना हों तो किताबों के दो-दो, तीन-तीन संस्करण कैसे आएँ? मेरे जैसी नाचीज़ की ही कई किताबों के दो तीन संस्करण आए हैं, बड़े लेखकों की तो बात ही और है। अंग्रेज़ी पाठकों के आँकड़े देख कर ही कहा जाता है कि हिन्दी के पाठक कम हो गए हैं। दोनों को एकसम नहीं रखा जा सकता। दोनों की तुलना भी नहीं की जा सकती। हिन्दी भाषा की त्रासदी है कि इसे अपने ही देश में वह राजकीय सम्मान नहीं मिला, जो अंग्रेज़ी को मिला है। यहाँ तक कि हिन्दी लेखकों के बच्चे तक अंग्रेज़ी में लिखते-पढ़ते और उसे महत्त्व देते हैं।

सोशल मीडिया ने तो हिन्दी को विश्व के कोने-कोने तक फैलाया है। सोशल मीडिया की ही देन है कि पूरे विश्व के हिन्दी प्रेमी, पाठक और साहित्यकार आपस में जुड़ पाए हैं। प्रवासी साहित्यकारों को तो इससे बहुत लाभ हुआ है। उनके लेखन की पहुँच और पहचान दूर-दूर तक हो पाई है।

ब्लॉग बना कर हर कोई अपने मन की बात कह सकता है। अपना लेखन उन ब्लॉग्स पर पोस्ट कर सकता है। सोशल मीडिया पर नए पुराने बहुत से लेखकों की जानकारी, उनकी कहानियाँ, कविताएँ, लेख, व्यंग्य और उपन्यास कहने का भाव है कि कई साहित्यिक विधाओं की रचनाएँ अनगिनत हिन्दी वेब साइट्स, बेब पोर्टल पर मिलेंगी। साहित्यिक रचनाएँ दूर-दराज़ बैठे शोधार्थियों, विद्यार्थियों को उपलब्ध हो जाती हैं।

कई बार सोशल साइट्स पर अधकचरी रचनाएँ भी मिलती हैं। पर यह हर शताब्दी में हुआ है और होता रहेगा। समय की छलनी सब छानती रहती है। समय से बड़ा पारखी कोई नहीं है। अंतर सिर्फ इतना है कि अंतरजाल के युग में इसका स्वरूप बड़ा लगता है। एक अच्छे लेकिन साधनहीन लेखक के पास भी मोबाइल होता है और छपने की कोई समस्या नहीं। प्रकाशित पत्रिकाओं में नहीं तो अन्तरजाल की पत्रिकाओं में छप सकते हैं। वैसे अच्छे लेखक की पहचान हो ही जाती है।


अनुराग: वर्तमान हिन्दी साहित्य और अपशब्दों का अंतर मिटता जा रहा है, या शायद बलपूर्वक मिटाया जा रहा है। अपशब्दों की बढ़ती हुई वर्तमान साहित्यिक स्वीकृति के बारे में आप क्या कहेंगी?

सुधा ओम: अनुराग जी, जहाँ तक मैं समझ पाई हूँ, साहित्य समाज का दर्पण होता है। उपन्यास के पात्र हों या कहानी के पात्र, वे समाज से ही लिए जाते हैं। अगर पात्र ठेठ ग्रामीण क्षेत्र के हैं तो अपशब्द उनकी बोलचाल का हिस्सा होते हैं। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्र में माँ अपने बच्चे को लाड़ से मोआ, मरजाना कहती है या जब बुलाती है तो भी इन शब्दों का प्रयोग करती है। कृष्णा सोबती का उपन्यास 'मित्रो मरजानी' में 'मरजानी' उन्होंने लाड़ से कहा है हालाँकि यह अपशब्द है। ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास 'हम न मरब' में पात्रों के संवादों की स्वाभाविकता के लिए अपशब्द आए हैं। मैं सिर्फ़ तथ्य सामने रख रही हूँ। हालाँकि साहित्यिक भाषा बोलचाल की भाषा से अलग रही है। पर अब समय बदल गया है, युवा पीढ़ी जन मानस की भाषा का प्रयोग करने लगी है। बलपूर्वक तब कहा जाता है अगर पात्र व चरित्र की मांग नहीं पर उससे अपशब्द बुलवाए गए हैं।


अनुराग: अपशब्दों से मेरा अभिप्राय, और मेरी चिंता साहित्य में पात्रों के मुख से यौनिक गालियों आदि के वर्णन की प्रवृत्ति से है।

सुधा ओम ढींगरा: अनुराग जी बात वही है जो बोल्ड और अश्लील लिखने की है। मेरी तुच्छ सी बुद्धि तो यही सोचती है कि बोल्ड विषय होता है और लेखन को अश्लील शब्दों का चयन और उनकी अभिव्यक्ति बनाती है। लेखक की प्रतिभा, कहन शैली और शिल्प कहानी के बोल्ड विषय को भी क्लासिक बना देते हैं। पंकज सुबीर की कहानी 'अँधेरे का गणित' इसका अच्छा उदाहरण है। गे समस्या को लेकर, एक बोल्ड विषय पर सिर्फ बिंबों के माध्यम से कहानी का ताना-बाना बुना गया है। कई बार साधारण से विषय को भी अश्लील बना दिया जाता है, शब्दों का सही चुनाव नहीं किया जाता।

सोशल मीडिया पर फैले लेखन में आपको पात्रों के मुँह से ऐसे अपशब्द मिलेंगे पर जैसे कि मैंने पहले कहा साहित्य का सागर अथाह गहरा है, इसमें भीतर तक डुबकी लगानी पड़ती है। ये लेखक तैरना सीख रहे हैं। अभी तो दाएँ, बाएँ, उलटा-सीधा तैर रहे हैं, आपकी चिंता जायज़ है पर थोड़ा समय दीजिए। वक़्त सब साफ़ कर देगा।

अनुराग: आज जब चेतन भगत जैसे सफल लेखक हिन्दी को रोमन में लिखे जाने की बात कहते हैं तो आपको कैसा लगता है?

सुधा ओम ढींगरा: यह बात पुरानी हो गई, इस पर बहुत कुछ कहा सुना गया है। हिन्दी देवनागरी में ही लिखी जाएगी, किसी के कहने से कुछ नहीं होता।

अनुराग: हिन्दी के कुछ साधक कवि और कपि में अंतर नहीं समझते, सामान्य शब्दों को ठीक से कह-लिख नहीं सकते, फूहड़ चुटकुलों को कविता या लघुकथा बनाकर प्रस्तुत करते हैं। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि हिन्दी का एक संकट टके सेर भाजी, टके सेर खाजा का भी है?

सुधा ओम ढींगरा: इस समय विश्व परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। बाज़ारवाद और वैश्वीकरण ने जीवन मूल्यों, भाषा और संस्कृति को प्रभावित किया है। राहें तलाशी जा रही हैं। ये भटकन के भाव है, स्थाई नहीं। जैसे कि मैंने पहले कहा, मैं बहुत सकारात्मक सोच और विचारों वाली हूँ, हिन्दी भाषा पर ऐसा कोई बड़ा संकट नहीं है। हिन्दी भाषा अपने आप में बहुत सुदृढ़ और समृद्ध है।


अनुराग: हिन्दी साहित्य में सुदर्शन हों या दिनकर, किसी को भी नोबल नहीं मिला। संयुक्त राष्ट्र में अरबी तक एक मान्यताप्राप्त भाषा है, परंतु हिन्दी नहीं। आपकी नज़र में इसका क्या कारण है? संसार की एक प्रमुख भाषा होते हुए भी हिन्दी उपेक्षित क्यों है?

सुधा ओम ढींगरा: विश्व की अन्य भाषाओं के प्रति वहाँ के लोगों की जो प्रतिबद्धता है, वह हिन्दी वालों की अपनी भाषा के प्रति नहीं है।


अनुराग: हिंदी की संस्थाएँ, दुनिया भर में उपस्थित हैं, लेकिन हिंदी फिर भी कराह रही है। यह हिंदी संस्थानों की भी असफलता है। हिन्दी के उत्थान में उनका क्या उत्तरदायित्व बनता है और वह कैसे याद दिलाया जाए?

सुधा ओम ढींगरा: शंकर-शंभु कव्वाल की कव्वाली है-
रस्ते अलग-अलग हैं ठिकाना तो एक है,
मंज़िल हरेक शख्स को पाना तो एक है।

अनुराग जी, हिन्दी के उत्थान के कई रास्ते हैं। उन्होंने वह अपनाया, आपने कुछ और, मैंने कोई और। भाषा की जड़ें अगर अपने देश में मज़बूत हों तो उस भाषा का फलना-फूलना आसान होता है। विश्व में हिन्दी को कराहते नहीं, बढ़ते पा रही हूँ। शायद मैं बहुत आशावादी हूँ, हर कार्य में सकारात्मकता अधिक देखती हूँ।


अनुराग: पंडित सुदर्शन की 'हार की जीत', चंद्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था', प्रेमचंद की 'ईदगाह', आदि ऐसी कहानियाँ हैं जो कभी पुरानी नहीं पड़तीं। इनमें क्या खास है जिसे अपनाकर वर्तमान हिन्दी लेखक अपने लेखन में सुधार कर सकें?

सुधा ओम ढींगरा: साहित्य समय के साथ चलता है। आज तेज़ रफ़्तार का समय है। औद्योगिकी और प्रौद्योगिकी का युग है। निःसंदेह कहानी की कहन शैली और शिल्प में परिवर्तन आए हैं। कहानी में कई प्रयोग हो रहे हैं। कालजयी रचनाएँ तो जितनी बार भी पढ़ें, कुछ सीखने को मिलता है। बचपन से यह बात घर में सुनती आई हूँ कि लिखने की इच्छा हो रही हो तो पहले कालजयी साहित्य की कुछ पुस्तकें पढ़ो, भीतर विचारों की उथल-पुथल को सही दिशा मिल जाएगी और अगर अच्छा लिखना है तो खूब अच्छी किताबें पढ़ो। जैसे कि मैंने पहले कहा, मेरा जन्म एक साहित्यिक परिवार में हुआ है, तो वहाँ की साहित्यिक चर्चाओं में की गई कई गहन बातें अनायास ही भीतर घर कर गई हैं। यहाँ भी मैं बहुत पढ़ती हूँ और घर में एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी है।


अनुराग: सुधा जी, आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। आपके समय के लिये हार्दिक धन्यवाद!
सुधा ओम ढींगरा: मुझे भी आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। आपने मुझे चुना और बातचीत की, आभारी हूँ!

8 comments :

  1. एक ज्ञानवर्धक और रोचक साक्षात्कार. सुधा जी ने जिस तरह अपने पोलियो पर विजय पाकर अपने लेखन से अपने को सशक्त बनाया, वो सराहनीय है.आज सुधा जी अपने लेखन से सफलता के जिस शिखर पर ओ पहुंची हैं, उसमें उनका आत्मविश्वास और प्रतिभा का ही योगदान है.अनुराग जी को इस साक्षात्कार को पाठकों तक पहुँचाने के लिए बधाई. पुष्पा सक्सेना.

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  2. बहुत सुंदर !
    सुधा जी को बहुत ही निकट से जानने का अवसर मिला !
    पत्रिका और अनुराग जी दोनों को बधाई !

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  3. जितने सधे हुए प्रश्न उतने ही सधे हुए उत्तर| साहित्य की भाषा का प्रश्न मेरे मन में भी था, सुधा जी ने सही उत्तर दिया|कई बार कोई कहानी पढ़ कर या कविता पढ़ कर हम सोचते हैं --साहित्य कहां जा रहा है ? क्या अगली पीढ़ी इसे पढ़ेगी ? साक्षात्कार में इन सभी विषयों पर चर्चा हुई है| सुधा जी और अनुराग जी को बधाई|

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  4. प्रिय अनुराग जी , आपके प्रश्न पूछने और सुश्री सुधा ढींगरा के उत्तर देने का

    अंदाज़ बहुत ही पसंद आया है। समीर लाल ` समीर ` जी की रसोई के क्या

    ही कहने हैं ! `सेतु` वाकई सेतु को साकार कर रहा है। बकौल दाग़ का शे`र

    है - साथ शोखी के कुछ हिजाब भी है , इस अदा का कहीं जवाब भी है।

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  5. सुधा जी का साक्षात्कार अच्छा लगा इससे उनके जीवन की खट्टी मीठी बातें और संघर्ष से भरा जीवन सरलता से समझा जा सकता है ज़ुल्फ़िक़ार

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  6. उच्चकोटि का साक्षात्कार। यह कार्य तभी सम्भव है,जब रचनाकार के रचनाकर्म से साक्षात्कार लेने वाला परिचित हो।
    रामेश्वर काम्बोज

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  7. अनीता शर्मा शंघाईFebruary 12, 2018 at 10:06 AM

    ज्ञानवर्धक व रोचक साक्षात्कार के लिये सुधा जी व अनुराग जी को बहुत बहुत बधाई। रामेश्वर जी ने सही कहा यह उच्चकोटि का साक्षात्कार है। सँभालने लायक है।

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  8. अनीता शर्मा शंघाईFebruary 12, 2018 at 10:07 AM

    ज्ञानवर्धक व रोचक साक्षात्कार के लिये सुधा जी व अनुराग जी को बहुत बहुत बधाई। रामेश्वर जी ने सही कहा यह उच्चकोटि का साक्षात्कार है। सँभालने लायक है।

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