राष्ट्रीयता और भारत-भारती

अचला पाण्डेय

डॉ० अचला पाण्डेय


राष्ट्रीय चेतना राष्ट्र की एकता, अखण्डता और सामर्थ्य का परिचायक है और विकास पथ पर इसकी समवेत यात्रा के सहज प्रवाह का परिचायक है। किसी भी राष्ट्र की रचना, पहचान और अभ्युदय में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका संबंधित राष्ट्रीय चेतना की होती हैं। यह उस देश में व्याप्त सक्रिय विविध प्रकार की चिन्तन धाराओं, संस्कृतियों एवं गतिविधियों का समेकित पुंज होता है। इसके माध्यम से राष्ट्र की गतिशीलता और महत्ता का समकालीन समाज और विश्व को बोध रहता है। इस बोधगम्यता में और इस चेतना की अभिव्यक्ति में साहित्य एवं साहित्यकारों की भूमिका सदैव से ही प्रेरक और विस्तारक रही है।

 राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक भावना है। किसी देश-प्रदेश के निवासियों की यह भावना और विश्वास है कि वे एक हैं और अपना भविष्य उज्ज्वल करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं, इसी का नाम राष्ट्रीयता है। यह साहित्यरूपी सरिता से निकलकर मानवता के मैदान को सींचती हुई वैचारिक भावभूमि में विलीन हो जाती है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता नैसर्गिक रूप से एक व्यवस्थित समाज में निःसृत है, जिसमें कोई देश और समाज अलग नहीं रह सकता। राष्ट्र होने की पहली शर्त उसकी स्वतंत्रता है, दूसरी जनता की राष्ट्र के प्रति निष्ठा है, जनता का सांस्कृतिक अंतर्सम्बन्ध है।

साहित्य की सभी विधाओं में समान रूप से राष्ट्रीयता के स्वर सुनाई पड़ते हैं। भारत के भजन-कीर्तन, संस्कृति के स्वर, देश प्रेम और मातृभूमि की गौरव गाथा हर सदी में पढ़ने को मिलती है। यहाँ प्रकृति वन्दन की सनातन परम्परा है। हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालखण्ड में अलग-अलग मानवीय वृत्तियाँ रचना की प्रेरक रही हैं। “कभी यह वृत्ति राजा अथवा आश्रयदाता की वीर-भावना थी, तो कभी भक्ति और फिर कभी रीति और आधुनिक काल से यह वृत्ति राष्ट्रीयता की रही है, जिसके सर्वाधिक सशक्त और प्रतीक कवि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त कहे जा सकते हैं ”।1

            मैथिलीशरण गुप्त आधुनिक हिन्दी काव्य क्षेत्र में राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के प्रतिनिधि कवि हैं। उनका सम्पूर्ण काव्य उस युग की राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना विकास के प्रत्येक चरण से प्रभावित होता गया, नवजागरण को योगदान देता गया। गुप्त जी के काव्य में व्यक्त युगीन संदर्भों को समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों को स्मरण करना अपरिहार्य है। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजी शासन द्वारा स्कूलों, कालेजों में तथा ईसाई मिशनरियों के माध्यम से पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान और धर्म-दर्शन का प्रचार हो रहा था। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के आक्रमण से सोई हुई (परास्त ) भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जगाया, उसे अपने अतीत को पहचानने के लिए विवश किया। भारतीय जनमानस ने अनुभव किया कि पश्चिम के विचार और उसकी जीवन पद्धति में ज्ञान-विज्ञान को छोड़कर ऐसी कोई विशेषता नहीं जिसे आत्मसात किया जा सके। परिणामस्वरूप अतीत के गौरव के प्रति जनमानस में श्रद्धा उत्पन्न होने लगी और व्यक्ति अतीत से भविष्य के प्रति शक्ति प्राप्त करने की ओर प्रवृत्त होने लगा। पराधीनता के कारण जो हीन भावना जगत में उत्पन्न हो गयी थी, वह दूर होकर आत्मविश्वास से सम्पन्न होने लगी।

            भारतेन्दु युग में जहाँ कवियों ने केवल भारत की दुर्दशा पर दु:ख व्यक्त किया, वहीं द्विवेदीयुगीन कवियों ने स्वतंत्रता प्राप्ति का संकल्प लिया और उसके लिए आत्मबलिदान की भावनाओं को स्वर दिया। उन्होंने अतीत और वर्तमान के बीच असंगति दिखाकर नए आदर्शों और नए मूल्यों की स्थापना की। इसी युग में गुप्त जी का आविर्भाव हुआ और उनके काव्य विशेष रूप से भारत-भारती में इस चेतना को सशक्त वाणी मिली। रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं कि “राष्ट्रीयता अपने पूरे विस्तार और वेग में मैथिलीशरण गुप्त कh भारत-भारती का उपजीव्य है”।2 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कहते हैं कि गुप्त जी जिस काव्य के कारण जनता के प्राणों में रच बस गये और राष्ट्रकवि कहलाये, वह कृति भारत-भारती है । “हिन्दीप्रेमियों का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली पुस्तक यही है”।3 मेरा मानना है कि इस रचना की विशेषता यह है कि गुप्त जी प्रथमतः भारत के गौरवशाली अतीत का स्मरण कराना चाहते थे, द्वितीयतः अस्मिता की खोज करना और कराना चाहते थे और तृतीयतः स्वाधीनता की आकांक्षा का भाव जन-जन में भरना चाहते थे। इसमें जागरण का स्वर प्रधान है। जनमानस में चेतना जागृत करने के लिए, वर्तमान दुर्दशा के कारणों को जानने के लिए गुप्त जी ने अतीत के वैभवशाली भारत का चित्र अपनी कविताओं द्वारा प्रस्तुत किया-
 “हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी,
 आओ, विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी।” 4

             क्या होंगे अभी से स्पष्ट होता है कि लोगों में वह जिज्ञासा उत्पन्न हो, जिससे वे भारत के सांस्कृतिक गौरव और सभ्यता को जान सकें। गुलामी जंजीरों को तोड़कर स्वतंत्रता में अपना योगदान दे सकें। “विदेशी शासन के विरोध में स्वतंत्रता आंदोलन ने संघर्ष का रूप धारण कर लिया था। ऐसी स्थिति में गुप्त जी की राष्ट्रप्रेम की भावना से लिखा गया काव्य भारत-भारती प्रकाशित हुआ”।5 इसके माध्यम से वे जन चेतना भावना को को जगाने के कार्य में लगे रहे -
 “इस देश के हे दीनबन्धो! आप फिर अपनाइए,
 भगवान! भारत वर्ष को फिर पुण्य-भूमि बनाइए ।” 6
 गुप्त जी कहते हैं कि गौरव भावना को बढ़ाने के लिए कर्त्तव्य भावना से प्रेरित होकर जनता को कार्य करना चाहिए। वे प्रेरित करते हुए कहते हैं कि तुम बहुत सो चुके, उठो जागो, आलस्य का परित्याग करो, अपनी दशा पर विचार करो, हीन किसी भी तरह से मन में व्याप्त न होने दो -
 “हे भाइयों! सोये बहुत, अब तो उठो, जागो अहोs!
 देखो जरा अपनी दशा, आलस्य को त्यागो अहोs!”7

            धर्मांधता यथास्थितिवाद, कूपमंडूकता किसी भी समाज के लिए अच्छी नहीं होती है। समाज जिस स्थिति में है, उसे उसी स्थिति में रहने देना किसी प्रगतिशील व्यक्ति का स्वप्न नहीं होता। भारत-भारती का संदेश चिन्ता में डूबे अकर्मण्य लोगों की उत्साहहीनता समाप्त कर उन्हें कर्तव्य के मार्ग पर अग्रसर करना है। सच्चे मन से किया गया कार्य कभी विफल नहीं होता -
 “सच्चे प्रयत्न कभी हमारे व्यर्थ हो सकते नहीं,
 संसार भर के विघ्न भी उनको डुबो सकते नहीं!” 8
 *** *** *** *** *** *** ***
 “आओ बनें शुभ साधना के आज से साधक सभी,
 निज धर्म की रक्षा करें, जीवन सफल होगा तभी ।” 9

            सच्चा साधक वही है, जो अपने धर्म की रक्षा करे। मानव की सहज सामुदायिक भावना ने समूह को जन्म दिया, जो कालान्तर में राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। राष्ट्र एक समुच्चय है और राष्ट्रीयता एक विशिष्ट-भावना है। जिस जनसमुदाय में एकता की एक सहज लहर हो, उसे राष्ट्र कहते हैं। वैसे तो वसुधैव- कुटुंबकम्‘’ का सूत्र साहित्य तथा अन्य कला रूपों में सर्वत्र विद्यमान रहता है, फिर भी अलग-अलग स्तरों पर जीते हुए कभी हम स्थानीयता एवं आंचलिकता के मान बिन्दुओं की तलाश करते हैं तो कभी राष्ट्रीयता के वस्तुतः स्थानीयता, राष्ट्रीयता और वैश्विकता के आयाम इनके प्रस्फुटन में अहम भूमिका निभाते हैं। अथर्ववेद का सूत्र माताभूमिपुत्रोsहमपृथिव्या: अर्थात कवि प्रत्येक व्यक्ति के सामने पृथ्वी-पुत्र होने का आदर्श रखता है। इसी बात को रामायणकार वाल्मीकि राम के द्वारा कुछ इस तरह कहलवाते हैं - “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी एतदर्थ, अपनी जन्मभूमि के प्रति प्रेम की इसी अभिव्यक्ति से राष्ट्र की अवधारणा ने जन्म लिया। जब हम राष्ट्र की बात करते हैं तब उसमें भूमि, जन और संस्कृति सभी समाहित हो जाते हैं। यजुर्वेद इसी राष्ट्र के प्रति जागरूक होने का आवाहन करता है - वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः। अर्थात हम अपने देश में सावधान होकर पुरोहित (नेता) अगुवा बनें। इससे राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता की ध्वनि निकलती है। गुप्त जी देश के कर्णधारों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे देश के नेताओं तुम्हारे ऊपर ही हमारा सब भार है। जीतने पर तुम्हारी जीत होगी, हारने पर तुम्हारी हार होगी -
 “निःस्वार्थ, निर्भय भाव से निज नीति पर निश्चल रहो,
 राष्ट्रेवयं जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा कहो।” 10

            भारत-भारती की भूमिका में गुप्त जी लिखते हैं कि पुरातन और अधुनातन भारत देश में बहुत अन्तर है| “वह एक समय था कि देश ज्ञान कला-कौशल और संसार का शिरोमणि था और एक समय यह है कि इन्हीं बातों का अभाव हो गया है। जो आर्य जाति कभी हमारे संसार को शिक्षा देती थी, वह आज पग-पग पर पराया मुँह देख रही है। जिसका जैसा उत्थान वैसा ही पतन। परन्तु क्या हम अवनति में पड़े रहेंगे? और देखते-देखते जंगली जातियों तक उठकर हमसे आगे बढ़ जाएँ और हम वैसे ही पड़े रहें, इससे अधिक और दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है? क्या हम लोग अपने मार्ग से यहाँ तक डिग गये हैं कि अब उसे पा नहीं सकते? क्या हमारी सामाजिक अवस्था इतनी बिगड़ गई है कि वह सुधारी नहीं जा सकती? संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो सचमुच प्रयत्न से सिद्ध न हो सके। बिना उत्साह के कार्य सिद्ध नहीं हो सकता”।11

 राष्ट्रीयता और विश्वप्रेम में धर्म बाधक नहीं है बल्कि धर्म का उद्देश्य तो विश्व-बंधुत्व भावना बढ़ाने का होना चाहिए। गुप्त जी की अतीत भावना के पीछे यह धारणा है कि हमारा अतीत अत्यंत गौरवशाली और उदात्त रहा है। हमारे पूर्वजों ने भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति की ऊँचाइयों का स्पर्श करके एक महान आदर्श स्थापित किया था। वर्तमान स्थिति में और भविष्य के लिए भी हम उनसे प्रेरित होकर मानव संस्कृति को उज्ज्वल बना सकते हैं। गुप्त जी भारत के गौरव हैं। उन्होंने अपनी लेखनी से लोगों को दिशा-निर्देश दिया है तथा अकर्मण्य लोगों को कर्म के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया है।

 संदर्भ - संकेत

1. हिन्दी काव्य का इतिहास - रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृ० - 142
2. वही, पृ० - 145
3. हिन्दी साहित्य का इतिहास - रामचन्द्र शुक्ल, पृ० - 410
4. भारत-भारती, पृ० - 14
5. हिन्दी साहित्य की विभूतियाँ - मनोरमा राजावत, पृ० - 132
6. भारत-भारती, पृ० - 190
7. वही, पृ० -165
8. वही, पृ० -176
9. वही, पृ० - 177
10. वही, पृ० -180
11. वही, पृ० -7-8

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