व्यतीत हुए के बीच में

प्रताप दीक्षित

प्रताप दीक्षित

(उसने अपने प्रेम के लिए जगह बनार्इ / बुहार कर अलग कर दिया तारों को / सूर्य चन्द्रमा को रख दिया एक तरफ़ / वनलताओं को हटाया / उसने पृथ्वी को झाड़ा-पोंछा / और आकाश की तहें ठीक कीं / उसने अपने प्रेम के लिए जगह बनार्इ - अशोक वाजपेयी)

पहाड़ के कस्बेनुमा शहर से बस चली तो समय पर थी, लेकिन रास्ते में बस बिगड़ जाने, मरम्मत होते यहाँ पहुँचने तक आकाश सुरमर्इ हो आया था। तड़़के सुबह का पहाड़ आँखों में ही नहीं दिल-दिमाग में तारी था। वहाँ की भोर की भीगी सी उजास अभी तक उसके साथ थी। उसने स्टेशन के चारों ओर क्षितिज तलाशने की कोशिश की। सामने की ऊँची छतों के पीछे झाँकते आसमान का टुकड़ा गुलाबी आभा से रोशन था। उसे लगा उसका उतना ही हिस्सा उसके साथ है, बाकी वहीं छूट गया है।

स्टेशन आने पर मालूम हुआ कि ट्रेन पाँच घंटे लेट थी। कुली ने प्रतीक्षालय में सामान रख दिया था। वह पुत्र विभु को, छुट्टियों के बाद, बोर्डिंग स्कूल छोड़ कर लौट रही थी। पति इस बार भी साथ नहीं आ सके थे। उनके व्यवसाय की व्यस्तताएँ असीमित थीं। अधिकतर घर से बाहर रहते। शहर में होने पर भी बिजनेस मीटिंग्स, सरकारी-गैरसरकारी कार्यालयों में संपर्क। कड़ी प्रतिस्पर्धा थी। शुरुआत के दिनों में उसे अजीब लगता, लेकिन अब आदत हो गर्इ थी। वह तो एकमात्र पुत्र को इतनी दूर भेजना भी नहीं चाहती थी। अभी उम्र ही क्या थी? लेकिन यशवंत को बेटे के भविष्य के साथ ही अपने स्टेटस की भी चिंता थी। उसके समकक्ष लोगों के पुत्र-पुत्रियाँ शिमला, मसूरी, ऊटी आदि में बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ रहे थे। ‘सब लोग तो एफोर्ड नहीं कर सकते हैं न?’ पति ने कृति को समझाने की कोशिश की थी। उसे मानना ही था। किसी बात पर प्रतिरोध करना तो उसने जाने कब बंद कर दिया था। वह पति के साथ पार्टियों में जाती। घर पर आयोजित पार्टियों में मेजबान का रोल निभाती। पति की गैरमौजूदगी में फोन-काल्स रिसीव करती। परंतु इस व्यस्तता के बावजूद लगता कहीं कुछ छूट गया है। परंतु क्या? उसे मालूम नहीं था। उसका सितार, पेंटिंग, पुराने रिश्तेदार, यहाँ तक कि मायका भी एक तरह से छूट सा गया था। यशवंत को उसके अपने स्तर से कम लोगों में न तो रुचि थी, न ही किसी प्रकार का लाभ दिखार्इ देता। आखिर वे एक ऐसे समय में रह रहे थे जहाँ प्रत्येक कार्य-व्यवहार, संबंध, यहाँ तक मुस्कराने या ‘हैलो’ कहने तक का प्रतिफल और मूल्य रोज तय होता। कृति को लगता उसकी सत्ता, इस व्यतीत हो रहे समय से एकदम अलग है। वह इस सबसे निरपेक्ष तटस्थ दृष्टा मात्र है।

कुली के टोकने पर वह ख्यालों से लौटी थी। अक्सर ऐसा होता। वह अचानक कहीं खो सी जाती। कुली सामान सम्हलवा, गाड़ी आने पर आने को कह कर, चला गया था। कोने की तरफ एक र्इज़ी-चेयर पर वह बैठ गर्इ। उच्च श्रेणी के प्रतीक्षालय में भी भीड़ थी। इसके बाद भी वेटिंगरूम उसे एकांतिक और आश्वस्त करता प्रतीत हुआ। प्रतीक्षारत सभी यात्री एक-दूसरे से निर्लिप्त रहते, दूसरे से अपेक्षारहित। वह तो कभी कहीं भी अपने एकांत का मायालोक रच लेती, जिसके निविड़ आलोक में उसका नितांत निजी एकांत महफूज़ रहता। किसी यात्री के मोबाइल की घंटी बजी थी। वह ‘हैलो-हैलो’ कर रहा था। शायद सिग्नल न आने के कारण बात नहीं हो पा रही थी। उसे हँसी आर्इ - इस आविष्कार ने कितनी अपनी उपयोगिता सिद्ध की है और किस हद तक प्राइवेसी का हरण, यह तय नहीं हो सका है। यशवंत को ही घर और ऑफिस में फोन होने पर भी तीन-तीन सेल-फोन रखने पड़ते। कोर्इ न कोर्इ बजता ही रहता। वह खाने की टेबिल पर होता या बाथरूम में, घंटी बजने पर वह उसे बाथरूम में ही मोबाइल पकड़ा देती या वह खुद तौलिया लपेटते निकल आता। यहाँ तक अंतरंग-क्षणों में भी जब मोबाइल बजता तब कृति को झुंझलाहट से ज्यादा हँसी आती। यद्यपि विभु के जन्म के बाद यशवंत की व्यस्तता-तनाव के चलते ऐसे अवसर अब कम ही आते।

जाने कितना समय बीत गया था। विश्रामालय के विशाल परिसर में गिने-चुने लोग ही रह गए थे। तभी एक कुली ने बगल की कुर्सी पर किसी का सामान रखा था। यात्री ने कुली को पैसे देने के बाद कुर्सी पर से बैग हटा कर बैठने की जगह बनार्इ थी। एक साथ दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा और चौंके गये थे,
‘कृति?’
‘रोहित?’

बारह वर्षों के बाद पहली बार एक-दूसरे को देख कर पहली प्रतिक्रिया और हो भी क्या सकती थी। उसकी आँखों पर चश्मा लग गया था, बाल कट कर कंधों तक रह गए थे। रोहित के कनपटी के बाल सफेद होने लग गए थे। दुबला तो वह पहले भी था। सुरुचिपूर्ण वस्त्रों के बाद भी कुछ बीमार सा दिख रहा था।
‘रोहित, दुबले हो गए हो! बीमार थे क्या?’
‘कैसी हो कृति? खुश हो ना!’
‘मैनें जहाँगीर में तुम्हारे चित्रों की प्रदर्शनी, मिले पुरस्कारों और तुम्हें अकादमी की फेलोशिप मिलने के बारे में सुना था।’
‘यशवंत नहीं दिख रहे हैं?’

हवा में केवल प्रश्न तैर रहे थे उत्तर किसी के नहीं। बीत गए समय के असंख्य पलों के संबंध में सब कुछ जान लेने की आतुरता। क्यों होता है यह? क्या मिलेगा इससे? शायद दोनों ने ही यह एक साथ सोचा था। उनके बीच आजकल ट्रेनों के लेट चलने, मौसम जैसे औपचारिक संवादों के बाद मौन पसर गया था। अचानक वह उठा, ‘आता हूँ अभी!’ कह कर बाहर चला गया था। कृति ने स्मृतियों के रिमोट से अतीत को रिवाइंड किया था। बारह वर्ष पहले का अतीत अपने सम्मोहन, विद्रूपता और अदम्य आकर्षण के साथ दस्तक दे रहा था।

वह बेतरतीब लेकिन शाइस्तगी और अनौपचारिक संबंधों वाला शहर! वह ड्राइंग- पेंटिंग में एमए कर रही थी। ताऊ, चाचाओं वाले भरे-पूरे संयुक्त परिवार में वह अपने को नितांत अकेला पाती। पिता उसके बचपन में ही नहीं रहे थे। माँ एक छोटे से स्कूल में पढ़ातीं। उन्हीं  दिनों आर्ट-कॉलेज की कला-वीथिका में रोहित से मुलाकात हुर्इ थी। मस्त, बेलौस, बेफ़िक्र एक हद तक लापरवाह। उसने सुना था कि वह जेजे आर्ट्स से पढ़ार्इ बीच में छोड़ कर चला आया था। बाद में कभी उसने बताया था - ऐसी जगहों में औपचारिकता हावी रहती है। जरूरत है अनुभूतियों-विचारों को जितनी जल्दी अभिव्यक्ति मिल जाए, उतना अच्छा रहता है। ऐसे में हम केवल अनुकृतियाँ उकेरते रहते हैं, बस! फ़िलहाल वह एक बीमा कंपनी में प्रशिक्षु अधिकारी था। परंतु महत्वपूर्ण था कला में उसका दखल। नगर की कला-वीथिका में उसके कर्इ चित्र प्रशंसित-चर्चित हो चुके थे। कला-समीक्षा पर रोहित के लेख पत्र- पत्रिकाओं में उसने देखे थे।

बाद के दिनों में जब नजदीकियाँ बढ़ी थीं तब उसे मालूम हुआ था। रोहित एक व्यावसायिक-रूढ़िवादी परिवार का इकलौता पुत्र था। परिवार में नौकरी और कला-वला जैसी वाहियात चीजों के लिए न तो जगह थी न उपादेयता। एक बार पिता ने रोहित से पूछा था - क्या मिलता है तुम्हें नौकरी में? और यह पेंटिंग- वेंटिंग? तुम्हारे आगे कितने हैं पंक्ति में! जिंदगी बीत जाएगी हुसैन और रज़ा बनने की चाहत में! रोहित को पिता के मुँह से यह नाम सुन कर आश्चर्य हुआ था। शुरुआती परिचय के बाद उन्हें महसूस हुआ था कि दोनों विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। रोहित अन्तर्मुखी, गंभीर, अल्पभाषी, लापरवाह, एक हद तक निपट आलसी। महीनों बीत जाते रंग-ब्रशों को हाथ तक न लगाता। कभी किसी पेंटिंग पर घंटों तक लगातार जुटा रहता। दिन बीत जाता, चाय के जूठे प्याले, सिगरेट के टोटे चारों ओर फैले रहते। वह एकाग्र योगी की तरह साधनारत रहता। कृति साधारण शक्ल-सूरत लेकिन आकर्षक देह-यष्टि, चेहरे पर लावण्य। लेकिन, लोगों के अनुसार गज भर की जुबान, उन दिनों वह चुप रहना न जानती। चपल, सक्रिय, एक तरह से विद्रोही। अपने कॉलेज में छात्राओं की यूनियन उसी ने संगठित की थी। रोहित और कृति के बीच यह विरोधी प्रतीत होते तत्व बाधक नहीं बने। दोनों ही द्वारा अपने-अपने अंदर के खालीपन को परास्त करने की प्रक्रिया में उनकी नजदीकियाँ बढ़ती गर्इ थी।

उनके बीच कब ऐसे संबंध विकसित हुए, जिन्हें लोग प्रेम जैसा कुछ कहते हैं, पता ही नहीं चला था। यह तो बहुत बाद में उसने सोचा था तब शायद सब कुछ समाप्त हो चुका था। उन दिनों तो फुरसत ही नहीं थी इस सबके संबंध में सोचने की। बस एक अचीन्हे रास्ते पर किसी के साथ चलना, अकेलेपन की घनीभूत पीड़ा के क्षण बाँट लेने के प्रयास ऐसा कुछ रहा होगा। विराट ब्रह्मांड में दो अपरिचित सुर एक ही वेवलेंग्थ पर मिलने पर ऐसा होता है। कला-वीथिका, कॉफ़ी-हाउस, नदी-तट की निविड़ एकांत शामें, कम्पनीबाग के घने झुरमुट उनके संकेत-स्थल थे। अनंत बातें और बहसें। वह किसी छुट्टी वाले दिन रोहित के घर चली जाती। शहर के एक उपनगर में मुख्य बस्ती से दूर एक बड़े मकान की आखिरी मंजिल पर एक हालनुमा कमरा, सामने लंबी-चौड़ी खुली छत। कमरा धूप-धूल-हवा से भरा रहता। उसने रोहित के ऐसी उजाड़ जगह, पूरे मकान में अकेले रहने पर सवाल किया था। वह हँसा- ‘यही तो एकांत का वैभव है। सुबह सूरज निकलने और देर शाम डूबते समय पूरा क्षितिज अपनी संपूर्णता के साथ सामने होता है। तुम कलाकारों के लिए आदर्श।’ वह स्वयं, उसके सहपाठी उसके प्राध्यापक ज्यादातर रियल-मूर्त लैंडस्केप, पोट्रेट बनाते। रोहित गंभीरता से कहता, ‘असली चित्रकार तो तुम लोग हो। हूबहू जिसकी चाहे छवि उतार कर रख देते हो। यह नहीं कि हमारी तरह आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींच दीं जिसे आम आदमी समझ भी नहीं सकता।’ कह कर वह मुस्कराता। कृति को लगता रोहित उनका मजाक उड़ा रहा है। उसे सचमुच गुस्सा आ जाता। वह कर्इ दिनों तक रोहित से न बात करती, न मिलती। बड़ा अपने को पिकासो-वानगॉग समझता है! अंतत: वह मना लेता और वह उतनी ही जल्दी मान भी जाती, जैसे इसी की प्रतीक्षा में हो। एक दिन रोहित ने बताया था, ‘जानती हो, विंसेंट वानगॉग ने, सूर्यास्त को पेंटिंग करते हुए, स्वयं को गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी।’ वह काँप गर्इ। उस दिन से उसने रोहित की तुलना कभी वानगॉग से नहीं की थी।

कमरा सुरुचिपूर्ण था। लेकिन जहाँ-तहाँ रोहित के रंग, ब्रश, कैनवेस, किताबें, कपड़े, दीगर सामान फैला होता, कुछ भी जगह पर नहीं। वह अस्त-व्यस्त, धूल से अंटे कमरे की सफार्इ में जुट जाती। रोहित उसे रोकने की असफल कोशिश करता। फिर वे मिलजुल कर नौसिखिए ढंग से खाने को कुछ बनाते, चाहे जैसा बना हो, स्वाद लेते हुए खाते। एक दिन वह बिना बताए आ गर्इ थी। उन दिनो मोबाइल होते नहीं थे। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था। उसने नॉक किया, कर्इ बार। दरवाजा देर में खुला था, जरा सी दरार। रोहित ने बाहर झांकते हुए कहा, ‘तुम इस वक़्त बिना बताए?’ उसने कहा था, ‘मुझे तुमसे मिलने के लिए समय लेना होगा?’ वह वापस जाने को मुड़ी। ‘अंदर आओ!’ उसने दरवाजा खोला था। अंदर स्टूल पर एक लड़की अठारह-उन्नीस साल की बैठी हुर्इ थी। उसके सभी परिधान, अंत:-वस्त्रों सहित, एक कुर्सी पर उतरे हुए थे। नग्नता को छिपाने के लिए उसने गले से नीचे तक एक चादर ओढ़ ली थी। र्इजेल पर शुरू किया गया न्यूड था। वह समझ गर्इ। उसने सुन रखा था कि कुछ लड़कियाँ पैसे के लिए न्यूड-मॉडल बनने के लिए तैयार हो जाती हैं। लड़की अपने कपड़े उठा कर बाथरूम में चली गर्इ थी। उसके बाहर आने तक वह कुछ नहीं बोली। रोहित ने पर्स खोल कर लड़की को कुछ नोट दिए और वह सहमती हुर्इ बिना कुछ बोले चली गर्इ थी। उसके जाने के बाद उसने केवल यह कहा था, ‘यह लड़की कितने पैसे लेती है मॉडल बनने के लिए?’ रोहित का तनाव अब तक कम हो गया था। कृति ने फिर कहा, ‘मैं इस लड़की की जगह मॉडल नहीं बन सकती? इसे जो देते हो उतना ही मुझे दे देना।’ रोहित की आशंका के विपरीत उसकी प्रतिक्रिया, कम से कम, ऊपर से बहुत शांत थी। उसकी हिम्मत पस्त होने से उबरी थी, ‘तुम उसकी हालत जानती हो? उसकी जगह किसी और को लेने पर उसके लिए उस शरीर का उपयोग दूसरी तरह से ही होना रह जाएगा। वैसे समझदारी के लिए तुम्हारा बहुत आभारी हूँ।’

‘मैं तुम्हारे चेहरे पर उड़ती हवाइयाँ देख समझ गर्इ थी। मैं चित्रकला की विद्यार्थी हूँ। मुझे मालूम है यह सब। इसमें मेरी समझदारी कम तुम्हारे जैसे बुद्धू पर विश्वास ज्यादा है। वैसे एक बात बताओ यदि मेरी जगह कोर्इ और होता तब? क्या कोर्इ और निरापद रास्ता नहीं हो सकता? कम से कम बाहर से ताला बंद कर सकते थे। जो होता ताला बंद देख लौट जाता।’ उसे सचमुच अगाध भरोसा था उस पर। कला- प्रदर्शनियों में जाने कितनी आधुनिक, एक से एक सुन्दर-फैशनेबिल लड़कियाँ रोहित पर टूटी पड़तीं।

लेकिन उसे चिन्ता न होती। उसे चिढ़ाने-खिजाने के लिए अवश्य वह बाद में उस पर आँखें तरेरने का अभिनय करती। रोहित के चेहरे पर बच्चों सी मासूमियत उतर आती और वह पिघल जाती। आज उसकी घबराहट और तनाव देख वह अपना नाराजगी का अभिनय शुरू भी न कर सकी थी।

ऐसी ही एक दोपहर, इन सब कामों से निपट, वह थक कर चूर हो गर्इ थी। बेड के सिरहाने से पीठ लगा कर बैठ पाँव सीधे कर सुस्ता रही थी। सामने पसरा हुआ था अंतहीन प्रतीत होता ऊब भरा खाली समय। रोहित र्इजेल पर रंग-ब्रश लिए, उससे बेखबर, मग्न था। आज उसने किसी काम में उसका हाथ नहीं बँटाया था। वह झुंझलार्इ - ‘कितने खुदगर्ज हो तुम! लगता है आज ही पूरा कर लोगे?’ रोहित ने बात अनसुनी की। तभी बाहर की धूल भरी हवाएँ तेज आंधी में बदल गर्इ थीं। कमरा धूल से भर जाता कि कृति ने दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर परदे खींच दिए थे। कमरा अंधेरे जैसी गझिन सुरमर्इ उजास से भर गया था। कमरे के अभेद्य धुंधलके में बंद आँखों से रोहित को अपने पास महसूस किया था। उसने फुसफुसा कर कुछ कहने की कोशिश की लेकिन अगले ही पल वह भूल गर्इ कि उसे क्या कहना था। उसे लगा कि वे किसी एकांत द्वीप पर युगों से ऐसे ही बैठे हैं। समय थम गया था। चुक गए शब्दों के बीच उन्होंने स्पर्श की नर्इ लिपि और भाषा आविष्कृत की थी। पहल शायद कृति की ओर से रही होगी। रोहित पर तो, पहले ऐसे अवसर मिलने पर भी, बेचारगी-शर्म तारी हो जाती। वह निरन्तर सिगरेट पर सिगरेट पीने लगता। उसे झुंझलाहट होती और उस पर लाड़ भी आता। पहली बार चुम्बन लेने के बाद उसका चेहरा लड़कियों की तरह शर्म से लाल हो गया था। देर तक उससे आँखें चुराता रहा। धड़कते दिल, पसीने, सांसों और लरजते शरीरों के बीच उन्होंने, एक-दूसरे के अन्तर्मन की गहराइयों में, स्वयं को तलाशना चाहा था। उसकी देह के कैनवेस पर रोहित की बेतरतीब-अनाड़ी सांसों ने कितने अमूर्त चित्र उकेरे थे। कैलिडोस्कोप के अनेक रंगों से पल-पल बनती-बदलती आकृतियों को वह पकड़ नहीं पा रही थी। उसने प्रयास करना बंद कर स्वयं को शिथिल छोड़ दिया। दिव्य कामनाओं के अन्वेषण की युगल यात्रा में उसे प्रतीत हुआ कि कुछ शेष नहीं बचा है, सिवाय भारहीन शून्यता के। उसे लगा कि बहुत देर हो चुकी है। उसे चादर से बाहर आने में संकोच हुआ, बगल में रोहित तो नहीं है? रोहित कमरे में नहीं था। उसने कपड़े पहने-संवारे। उठ कर खिड़की-दरवाजे खोले थे। रोहित छत पर सिगरेट पी रहा था। बाहर की आंधी भी थम चुकी थी। रह गए थे नि:शेष हो गए अव्यक्त शब्द मात्र। शाम घिर आर्इ थी। वह स्तब्ध उस आकाश को देख रही थी- साफ, नीला, एक बादल का टुकड़ा भी नहीं, गुंजरित शून्य, जिसमें कुछ नहीं घुमड़ता।

उनके प्रस्तावित विवाह में दोनों ही परिवारों को अनेक आपत्तियाँ थीं - जाति, सामाजिक स्तर के अलावा भी। शायद निर्णय के अधिकार पर नियंत्रण। परंतु दोनों की जिद से वे आधे मन से तैयार हो गए थे। रोहित ने तो अदालत में शादी के लिए कहा था परंतु कृति को पारंपरिक तरीके से बाजे-गाजे के साथ विदा होने की धुन सवार हो गर्इ थी। लेकिन सप्तपदी के ठीक पहले रोहित के पिता द्वारा प्रस्तुत, परंपरा के अनुसार लेन-देन की बात, धीरे-धीरे तर्क, विवाद और रोहित के ताऊ द्वारा बारात वापसी की धमकी तक आ गर्इ थी। देर तक कृति सब्र किए रही फिर अचानक विस्फोट सा हुआ था। कृति के मन में दबी कौन सी कुंठा या आक्रोश था। वह विवाह के वस्त्रों में ही मंडप तक पहुँच कर रोहित के पिता, रिश्तेदारों को दहेज-लोलुप बताते हुए रोहित को भी उसके चुप रहने और क्लीवता के लिए फटकारते हुए शादी से इनकार कर दिया था। रोहित को कुछ कहने का मौका नहीं मिल सका था। बारात लौट गर्इ थी। उसके मन में कहीं रहा होगा कि इस पागल लड़की से अब मैरिज-रजिस्ट्रार के दफ्तर में ही मुलाकात होगी।

कृति की रोती हुर्इ माँ को संकट से उबारने के लिए यशवंत ने इसी वेदी पर विवाह का प्रस्ताव किया था। विधुर यशवंत दूर के रिश्ते में इस परिवार के दामाद लगते थे। कृति से पंद्रह साल बड़े लेकिन अपनी उम्र से बहुत कम दिखते, आकर्षक व्यक्तित्व, धनी-मानी, शिक्षित यशवंत को सबने सराहा था। कृति की जिद, विद्रोह, रोहित के परिवार से प्रतिशोध या अकेली-बेसहारा माँ की आँखों से झरते आंसुओं में छिपी याचना, जाने क्या था कि वह असमंजस में होते हुए भी तैयार हो गर्इ थी।

वह रोहित की आवाज से वर्तमान में वापस आर्इ थी। उसके हाथ की ट्रे में कॉफ़ी के दो कप, स्नैक्स थे। वह बहुत देर से, जब से वेटिंग रूम में आर्इ थी, चाय-कॉफ़ी जैसा पीना चाह रही थी। इस कॉफ़ी की आदत भी उसे रोहित के साथ-संगत में पड़ी थी। पहले वह चाय भी कम ही पीती थी। कॉफ़ी में उसे जली हुर्इ रोटी की महक आती। रोहित हँसता - यदि कलाकार बनना है तो बियर या मार्टिनी नहीं तो कॉफ़ी की शुरुआत तो कर ही देनी चाहिए। लेकिन तुम्हारे कलैंडरनुमा, देवता-भगवानों के चित्रों के लिए, तो तुम्हे तुलसी की पत्तियाँ लेनी होंगी। वह खीझ जाती, रोने को हो आती। उसके चित्रों के विषय, बहुत सारे उसके सहपाठियों- प्राध्यापकों की तरह, सहज रियलिस्टिक लैंडस्केप, पोर्ट्रेट या भारतीय मिथक होते। उसे उन दिनों अमूर्त चित्र समझ में न आते थे। कॉफ़ी के साथ चॉकलेट बिस्किट, उसे लगा रोहित को अभी तक उसकी पसंद याद है। पता नहीं रोहित ने कैसे उसके मन की बात समझ ली। पहले भी तो वह बिना कुछ कहे सब कुछ जान लेता था।

‘तुम खुश हो न!’ रोहित ने आहिस्ता से दुबारा पूछा लेकिन उसे अपने प्रश्न की निरर्थकता का भी अहसास हुआ - क्या किसी के दु:ख या सुख को जानना इतना आसान होता है कि पूछा, देखा और जान लिया? वह मुस्कुरार्इ जिसका अर्थ भले ही अनिश्चित था परंतु उसकी तहों के पीछे गहरी उदासी दीवार में नमी की तरह उभर आर्इ थी। कृति ने कहना चाहा - क्यों पुरुष अपनी पूर्व प्रेमिका से हमेशा यही प्रश्न पूछता है? क्या उसके मन में किसी विपरीत उत्तर की प्रत्याशा छिपी रहती है? लेकिन वह यह सब न कह कर खिलखिलार्इ थी, ‘क्यों कैसी दिख रही हूँ। आखिर सुखी जीवन के लिए समृद्धि, पति, पुत्र सभी कुछ तो है न मेरे पास।’ उसे स्वयं लगा कि कितने अरसे बाद वह इतने जोर से हँसी थी। लोग उनकी ओर देखने लगे थे। तभी जैसे सुलगती राख को कुरेदने से धुआँ फूट पड़ा हो, ‘त्याग का मूल्य चुका पाना इतना आसान होता है क्या? विवाह-वेदी से ठुकरार्इ गर्इ पितृ-हीन लड़की से विवाह कोर्इ कम त्याग की बात है? अच्छा यह बताओ, उस दिन तुम चुप क्यों रह गए थे?’ उसने भर आर्इ आवाज और आँखें छिपाने के लिए चेहरा घुमा लिया था।

रोहित ने कहना चाहा - तुमने मौका ही कहाँ दिया था कुछ कहने का? स्वयं निर्णय ले लिया था। लेकिन वह चुप रहा। शायद उसे दोषी मान कर ही अपने को अपराधमुक्त महसूस कर सके कृति। उसके जीवन में कुछ पल सुख के इसी बहाने आ सकें। वह चुप रहा।

कृति सहज हो आँखें पोंछ सहज हो मुस्कुरार्इ थी, ‘तुम्हारी पत्नी कैसी है?’ तभी एनाउन्समेंट हुआ - यात्रीगण कृपया ध्यान दें। नर्इ दिल्ली से चल कर चेन्नर्इ जाने वाली गाड़ी संख्या 2616 ग्रांड ट्रंक एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नम्बर एक के स्थान पर प्लेटफॉर्म नम्बर तीन पर आ रही है। यात्रियों को होने वाली असुविधा के लिए खेद है।

रोहित ने मदद की पेशकश की, ‘तुम्हें सामान लेकर दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने में दिक्कत होगी। मैं चल कर छोड़ देता हूँ। उसने उसका सामान उठाने का उपक्रम किया।

‘मेरा कुली आता ही होगा। तुम्हारी ट्रेन भी तो इसी प्लेटफॉर्म पर आने वाली है। तुम्हें फिर वापस आना होगा। समय भी कम है।’

उसका कुली आ गया था। कुली ने सामान उठा लिया था। उसके प्रश्न का उत्तर नहीं मिला था। उसने सोचा रोहित की पत्नी कैसी होगी? उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से रोहित की ओर देखा। उसके मुँह से निकला था, ‘जीवन में प्लेटफॉर्म बदलना इतना आसान क्यों नहीं होता?’

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