निराला के गद्य में जाति विमर्श

जगदीश नारायण तिवारी

जगदीश नारायण तिवारी

शोध छात्र, हिंदी विभाग,पांडिचेरी विश्वविद्यालय 605014  
चलभाष: +91 830 016 0297
ईमेल: jagdishnarrayan@gmail.com 


 निश्चित तौर पर लेखक की रचनाओं एवं विचारों में समाज की झलक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। समाज और लेखक के बीच का यह संबंध घनिष्ठ होता है। सामाजिक आलोचनाओं के साथ लड़ते-झगड़ते एवं उससे सीख लेते हुए रचना और विचारों में परिपक्वता आती जाती है। कभी समाज रचना से प्रभावित होता है तो कभी लेखक या रचना समाज से। ऐसे में निराला का भी साहित्य समाज से अछूता कैसे रह सकता था। निराला ऐसे साहित्यकार थे जो स्वतंत्र विचार रखते थे। और बंधनों में रहकर तो जीना उन्होंने सीखा ही नहीं। जहाँ कविता में वे छंदों से उसकी मुक्ति चाहते थे वहीं दीन-दुखियों से वे संवेदनात्मक स्तर पर सीधे जुड़कर  अपना आत्मीय संबंध बना लेते थे। कथा साहित्य में भी उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों के विरूद्ध जमकर लेखनी चलाई तथा अपना विरोध भी प्रकट किया। निराला हिंदी साहित्य के ऐसे साहित्यकार हैं जिन्हें उस युग से ज्यादा उससे बाद के युगों में समझा गया और निरंतर समझने का प्रयास अनवरत रूप से गतिशील है क्योंकि ऐसे साहित्यकार विरले ही होते हैं जिन्हें हर युग एवं काल में पढ़ा व समझा जाता है।

            निराला को किसी ने महाप्राण कहा तो कोई उन्हें विरुद्धों का सामंजस्य कहता। कोई फक्कड़ कहता तो कोई अक्खड़। यह सब उपाधियाँ उन्हें प्राप्त हुईं। सामाजिक बंधनों का उन्होंने खुलकर विरोध किया। वे कदम-कदम पर सबको चुनौती देते चलते थे। निराला कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे डॉ शिवगोपाल मिश्र बताते हैं वे कहते – कान्यकुब्ज कुल में मांसाहार तथा शराब पीना वैद्य है। निराला खुलकर मांस तथा मद्य का प्रयोग करते। जो लोग चिढ़ते उन्हें चिढ़ाने के लिए मांस-मद्य का प्रयोग अवश्य करते।1  अपनी ही तरह वे समाज को भी देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि न किसी जाति का बंधन हो और न गरीबी। समाज के बारे में उनकी सोच एकदम अलग थी – समाज जब तक गतिशील है सृष्टि के नियमों में बंधा हुआ है, तब तक वह निष्कलुष नहीं, कारण वही सृष्टि सदोष है। परंतु चूँकि समाज निर्मलत्व की ओर गतिशील है, इसीलिए उसके अंगो से हर तरह के कलुष निकालने की चेष्टाएँ की गई। इसीलिए समाज शासकों ने अनेकानेक विधानों द्वारा उसे बचाने का प्रयत्न किया।2 

            वर्णाश्रम धर्म एवं हिंदू समाज की अनेक रूढ़ियों को वे मिटाना चाहते थे जिसे उन्होंने कथा साहित्य के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया। वे कहते कि अंग्रेजों ने सबकुछ मिटा दिया अब जो है वो ऐसा ही है – यहाँ की ब्राह्मण वृत्ति में शूद्रत्व, क्षत्रिय कर्म में शूद्रत्व और व्यवसायी जो विदेशों का माल बेचने वाले हैं कुछ और बढ़कर शूद्रत्व अख्तियार कर रहे हैं। अदालत में ब्राह्मण और चांडाल की एक ही हैसियत, एक ही स्थान, एक ही निर्णय। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपने घर में ऐंठने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य रह गए। बाहरी प्रतिघातों ने भारतवर्ष के उस समाज-शरीर को, उसके व्यक्तित्व को, समूल नष्ट कर दिया; बाह्य दृष्टि से उसका अस्तित्व ही न रह गया।3  

 उन्होंने यह भी बताया कि हमारा समाज किस कदर रूढ़ियों से ग्रस्त है लोगों की प्रवृत्तियाँ बदल रही हैं, सबके सब लालची हैं, एक दूसरे पर दोषारोपण करना उनकी आदत सी हो गई है –ब्राह्मणों को तो गालियाँ सभी देते हैं, पर ब्राह्मण बनने का इरादा कोई भी नवीन संगठित जाति नहीं छोड़ती। इस तरह ब्राह्मणों की प्रतिष्ठा बढ़ती ही जाती है। लोगों में जैसे ब्राह्मणत्व का लालच बढ़ गया हो।4   निराला रामकृष्ण मिशन से प्रभावित थे और विवेकानंद जी का उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा। वे कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने कहा है – ये भारत के उच्चवर्ण वाले लोगों, तुम्हें देखता हूँ तो जान पड़ता है, चित्रशाला में तस्वीरें देख रहा हूँ। तुम लोग छायामूर्तियों की तरह विलीन हो जाओ, अपने उत्तराधिकारियों को (शूद्रों को) अपनी तमाम विभूतियाँ सौंप दो, नया भारत जग पड़े।”5

            निराला ने जहाँ काव्य में दलितों शोषितों एवं सामान्य जनता का पक्ष लिया वहीं गद्य में भी जमींदारों के अत्याचार, कृषकों की दयनीय स्थिति, बेकारी की समस्या जैसे प्रश्नों को उभारा। उन्होंने समाज के उपेक्षितों अपने निकट बैठाया है और उनके गुणों को परखा है। ऐसे ही पात्रों को उन्होंने अपने कथा-साहित्य में नायक और नायिका के रूप में स्वीकृति देकर समाज के यथार्थवादी स्वरूप को उद्घाटित करते हुए भी आदर्श की प्रतिष्ठा की है।6  जमींदार किस-किस तरह से किसानों एवं सामान्य जनता का शोषण करते हैं। यह उनका नजदीक से देखा गया विषय था। जिसे उनकी तीव्र एवं पैनी नजरों ने कथा साहित्य में वर्णित किया – पिछड़ी जाति के लोगों पर क्रूर व्यवहार करने वाले इन सवर्णों को भी जमींदार के खेत में हल जोतने के लिए लाचार होना पड़ता था। इस स्थिति का परिचय देते हुए निराला ने निरुपमा में इसका एक विवरण प्रस्तुत किया है – गुरुदीन तिवारी, शीतल पाठक, मन्नी सुकुल, ललयी मिशिर, कामता दूबे आदि मुख्य सब के सब जन जोत रहे थे। सुरेश के गाँव आने पर शिष्टाचार करने के लिए गए थे। हली के लिए पकड़ लिए गए। कुछ और भी किसान थे। जमींदार के खेत पहले बोये जाते हैं, कायदा है, बुलाने पर लोग चले गए।”7 

            निराला अपने ही समाज से वहिष्कृत कर दिए गए थे क्योंकि वे उस समाज के नियमों को सदा तोड़ते रहते थे। जिसके कारण वह समाज उन्हें स्वीकार नहीं कर पाता था। जिसका जिक्र उन्होंने इस प्रकार किया – वे अपने को आउटड्रॉप समझते थे – मैं बाहर कर दिया गया हूँ, भीतर भर दिया हूँ, वे चाहते तो बड़े मजे से पुरोहीत वर्ग का अंग बनकर या शासक वर्ग की सेवा करते हुए सुख के साथ जी सकते थे। लेकिन उन्होंने जो रास्ता चुना, वह उन्हें इसी दशा तक पहुँचा सकता था – ब्राह्मण समाज ज्यों अछूत8  यह विद्रोही व्यक्तित्व उनमें ही पनप सकता था जिसके अंदर क्षमता हो। जिसने सबकुछ सहा हो और उसके मर्म को जाना हो। निराला की संवेदना जितनी विस्तृत और समावेशी है, उनकी भाषिक चेतना भी उतनी ही व्यापक है। वे अपने कवित्व को, कथाकारत्व को भी हिंदी के समूचे फैलाव में धड़कते हुए महसूस करना चाहते थे।9

            निराला सिर्फ सतही तौर पर समाज सुधार की बात नहीं करते थे वे उसे पहले खुद करते थे ताकि लोगों को विश्वास दिलाया जा सके कि ऐसा हो सकता है – निराला जी की वर्णाश्रम के व्यवस्था के संबंध में एक स्पष्ट उद्घोषणा है वह यह कि कर्मानुसार शूद्र भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बन सकते हैं। निराला का यह मत रहा कि जाति-पाँति का उन्मूलन तभी होगा जब सामंती व्यवस्था ढह जाएगी। निराला ने ब्राह्मण वर्ग के द्वारा शूद्रों के शोषण को देखा है। उन्होंने यह अनुभव किया था कि ब्राह्मणों ने संस्कृति पर एकाधिकार कर रखा था किंतु शूद्रों ने अपनी ऊजस्विता के बल पर अपने आपको श्रेष्ठ बनाया। रैदास एक ऐसे ही शूद्र थे। निराला का व्यक्तिगत जीवन ब्राह्मण और शूद्र के विभेदों से बहुत दूर था, वे चमार, धोबी सभी के मित्र थे। उन्होंने चतुरी चमार के साथ जिस आत्मीयता का अनुभव किया, वह उनकी रचनाओं में प्रकट है। चतुरी-पुत्र अर्जुन को वे अपने पौत्र की तरह मानते थे। अर्जुन के लिए निराला ने मेरे मित्र शब्द का भी प्रयोग किया है।10  सामाजिक रूढ़ियों को किस प्रकार तोड़ा जा सकता है इसे उनकी कहानियों में स्पष्तः देखा जा सकता है। उनकी कहानी कुल्लीभाट ऐसी ही है जिसमें वे मंत्र भी खुद ही पढ़ते हैं और दूसरे धर्म का पालन भी खुद ही – कुल्लीभाट कहानी के उपसंहार पर एक नजर डाली जो प्रत्यक्ष और परोक्ष, अभिधा और व्यंजना, वर्णन और टीका, मंच और नेपथ्य एकसाथ हैः उस खास जीवन और साहित्य के पाताली रिश्ते की द्वंदात्मक और फिर भी अद्वैत रिश्ते की समझ का चरम विस्फोट मंत्र पढ़ते वक्त बार-बार अटकता था क्योंकि पंडिताऊ स्वर नहीं निकल रहा था। कुछ देर सोचता रहा, ब्रजभाषा काल में हूँ, सूरदास का सूरसागर और तुलसीदास की रामायण पढ़ रहा हूँ। अपने आप ऐसा ही मनोमंडल बन गया फिर क्या, अपनी संस्कृत शुरु की। लोग प्रभावित हो गए। खड़े जो जैसे रहे, रह गए, जैसे कवि सम्मेलन में कविता पढ़ते वक्त होता है। ... दूसरे दिन सबेरे, जैसी आदत थी, चिकवे के यहाँ से गोश्त ले आए। देखकर सासु जी ने कहा भैया आज पूडी खाने के लिए कहते थे। मैंने कहा कुल्ली की स्त्री मुस्लमानिन थी; इसलिए प्रकृति ने उनके संस्कारों के अनुसार मुझे गोश्त खाने के लिए प्रेरित किया है इसमें दोष नहीं है।11

            निराला का मानना था कि समस्त समस्याएँ तभी समाप्त हो सकती हैं जब मनुष्यता का गुण मनुष्य में आ जाए। वे बताते हैं – मनुष्यता किसी धर्म विशेष की थाती नहीं है, वह किसी एक भूखंड में आसन मारकर बैठी नहीं दिखाई देती, वह तो सर्वदेशी है और सर्वधर्मावलंबी है। इसी भावना को लेकर निराला ने सम्प्रदायवाद और जातिवाद को अस्वीकार किया और मनुष्यता की अर्चना की। उनके कथा साहित्य में सत्य और असत्य का संघर्ष और अंततः सत्य की विजय सर्वत्र दिखाई देती है।12  

            निराला कभी जानवरों से प्रेम करते थे तो कभी राह चलते लोगों से बातचीत न उन्हें किसी बात की चिंता रहती थी और न किसी से भय अपने इसी स्वभाव के चलते वे ब्राह्मण समाज से लगभग निष्काषित ही कर दिए गए थे। जिसके बारे में बताया जाता है कि – वेदांत के प्रति आकर्षण के बावजूद उपर्युक्त बेगानेपन ने निराला को ब्राह्मण समाज का वाल्तेयर बना दिया। ... वे न केवल अपने दिल में दलितों की पीड़ा महसूस करते थे बल्कि मर्म की तहों तक जाते थे।13  
                         
निराला का वास्तविक समाज कैसा था और उसे कैसा बनना चाहिए। उसमें क्या होना चाहिए क्या नहीं होना चाहिए। कैसै सब लोगों में समानता आए, सभी धर्मों का विकास हो। इसे उनके उपन्यास द्वारा बखूबी समझा जा सकता है – स्त्री समस्या पर  उनके उपन्यास चमेली में उन्होंने दोनों वर्णों शूद्र और सवर्ण की स्त्रियों की तुलनात्मक स्थिति के संकेत उपन्यास में पैनी के तराश के साथ उभरे हैं – एक ओर चमेली है जो अपनी तेजस्विता से अपने सामने वाले को हतप्रभ करती है तो दूसरी ओर पंडित के परिवार की स्त्रियाँ हैं जो व्यभिचार को अपनी स्थिति मानकर स्वीकार करती हैं।14  ग्रामीण रूढ़ियों एवं परंपरा की संकीर्णतावादी सोच को ये बिल्लेसुर बकरिहा में चुनौती देते हैं। और वे उसे दूसरे ढंग से तोड़ते भी हैं। जो काम कान्यकुब्जों के लिए निषिद्ध और घृणित था। उसे बिल्लेसुर से करवाके वे गाँव के लोगों की कुटिलता एवं संकीर्णता मिटाना चाहते हैं जो कि मानवीय करुणा से भरी निराला की मूल्य दृष्टि को बताती है। जाति-पाँति संबंधी व्यवस्था को वे अपने उपन्यास कुल्ली में कुल्लीभाट के चरित्र द्वारा व्यक्त करते हैं। जिसमें कुल्ली निम्न वर्ग के लड़कों को शिक्षा देने का कार्य शुरु करता है। उस दृश्य का वर्णन करते हुए निराला कहते हैं – गड़हे किनारे ऊँची जगह पर मकान के सामने एक चौकोर जगह है, कुछ पेड़ हैं...। उस पर अछूत लड़के श्रद्धा की मूर्ति बने बैठे हैं ... ये पुश्त दर पुश्त से सम्मान देकर नतमस्तक ही संसार से चले गए हैं। संसार की सभ्यता में इनका स्थान नहीं है। ये नहीं कह सकते, हमारे पूर्व कश्यप, भारद्वाज, कपिल, कणाद थे, रामायण महाभारत इनकी कृत्तियाँ हैं; अर्थशास्त्र, कामसूत्र इन्होंने लिखे हैं; अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज इनके वंश हैं। फिर भी ये थे और हैं।15... समाज का सारा विरोध सहकर कुल्ली ने जो किया है वही निराला की दृष्टि में उन्हें एक तेजस्वी नायक का गौरव देता है  अलका उपन्यास में शोषण का संकेत वे एक किसान के माध्यम से देते हैं जिसमें लक्खु की हालत पाले से मुरझाये हुए पेड़ की तरह हो जाती है और बधुआ कृपानाथ की घुड़की सुनकर काँपने लगता है – जो रुपये न रहने का रोंये-रोंये से दिया हुआ उत्तर था।16  इसी तरह दो लोगों के पहुँचने पर उनके खाने की व्यवस्था एक ब्राह्मण के यहाँ की जाती है। उस घर की स्त्री पूछती है ये लोग किस जाति के हैं उसके सवाल पर ब्राह्मण कहता है – कोई जात है इनके? ... रंगे स्यार हैं, पेट का धंधा कर रखा है। इस उपन्यास में जिस तरह से वे जाति एवं शोषण आदि के प्रश्नों को उठाते हैं वह उनके उपन्यास को विशिष्ट और रोचक बनाता है तथा सामान्य जनता को सच्चाई स रूबरू करवाता है। निराला के उपन्यासों के संबंध में रामखेलावन चौधरी ने लिखा है – निराला के तीनों उपन्यासों की कथाएँ नारी जीवन के संघर्ष से संबंध रखती हैं। अप्सरा में वेश्या पुत्री कनक को अपने जन्म से संबंधित परिस्थितियों के विरूद्ध संघर्ष करना पड़ता है.... अलका में निराश्रिता शोभा गाँव में जमींदार के कुचक्र का शिकार हो जाती है... निरुपमा में एक कोमलाँगी सुशिक्षिका और सच्चरित्रा बंगाली बाला की कथा है, जो घर के भीतर ही अपने मामा और भाई के कुचक्र एवं षड्यंत्र का शिकार हो जाती है.... उपर्युक्त घटनाओं पर दृष्टिपात करने से निराला पर दो प्रभाव स्पष्ट दिखलाई पड़ते हैं – एक है बंगला के यशस्वी लेखक शरतचंद्र जी का और दूसरा है हिंदी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद जी का।17

            निराला किस तरह नवजागरण चाहते थे इस पर दृष्टि डालते हुए रामविलास शर्मा अपनी पुस्तक भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश में कहते हैं – जातीयता का समर्थन और जातीय संकीर्णता का विरोध, राष्ट्रीयता का समर्थन और उससे ऊपर उठकर विश्व मानवता का समर्थन, ये दोनों बातें रवीन्द्र नाथ ठाकुर में हैं और निराला में भी हैं। जिस तरह जातीय जागरण का नेतृत्व ठाकुर ने किया था वह आदर्श निराला के सामने भी था और यह आदर्श उनके साहित्यिक जीवन के प्रारंभिक दौर में सुनिश्चित हो गया था।18 निराला की दृष्टि अपने युग से आगे के बारे में सोचती है। समाज की कतिपय घटनाओं को वे परिवर्तन का एक चरण मानते हैं। और विधवा विवाह के अलावा जातिगत परिवर्तनों को भी वे भविष्य के रूप में देखते हैं – वर्तमान सामाजिक परिस्थिति पूर्ण मात्रा में उदार न होने पर भी विवाह आदि में जो उल्लंघन कहीं-कहीं जो देखने को मिलते हैं वे भविष्य के शुभ चिन्ह प्रकट कर रहे हैं। ... इसके साथ ही नवीन भारत का रूप संगठित होता जाएगा, और यही समाज की सबसे मजबूत श्रृंखला होगी।19  वे दलितों एवं अन्य वर्गों के प्रति सिर्फ सहानुभूति नहीं रखते अपितु उनके सुख-दुख में शामिल भी होते थे, उनके साथ खात-पीते भी थे। “समय-समय पर लोध, पासी, धोबी और चमारों का ब्रह्म भोज भी चलता रहा | घृतपक्व मसालेदारलार मांस के खुशबू से जिसकी भी लार टपकी, आप निमंत्रित होने को पूछा | इस तरह मेरा मकान साधारण जनों का अड्डा, बल्कि house of commons हो गया |”20 उनके कथन एवं कर्म में समन्वय था। वे कहते हैं कि जब नए निर्माण होंगे तो स्वयं पुरानी चीजें समाप्त होती जाएँगी। वे मनुष्य को सच्चा होने में विश्वास रखते थे। सुविधायुक्त जीवन से उनका सामंजस्य नहीं बैठता था – प्रगतिशील चेतना से व्याप्त उनका कथा साहित्य एक ओर जहाँ उन्हें सामाजिक भूमिकाओं की सतहों को भेदने वाली दृष्टि देता है। वहीं अन्य काव्यरूपों में उनके प्रखर पांडित्य, कलामर्मज्ञता तथा गहरी सूझ-बूझ का पता चलता है। निराला की बौद्धिकता अतिशयता थी। प्रखर कल्पना शक्ति को उन्होंने बौद्धिकता का सबल आधार दिया था।21 

                        निराला की वाणी में ओज एवं औदात्य था तो उनकी दृष्टि में दर्शन एवं साहित्य भरा हुआ था। हृदय में करुणा एवं ममता थी तो उनका शरीर सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर था। चाहे व चतुरी चमार का लड़का अर्जुन हो या देवी कहानी की वह दुखिया स्त्री हो, चाहे सुकुल की बीबी हो या ज्योतर्मयी। समाज के दुख को उन्होंने देखा ही नहीं भोगा भी था। एक ओर विद्रोह था तो दूसरी ओर सामंजस्य था। दुखियों तथा दलितों के लिए अपने समाज का भी त्याग किया तथा बुद्धिजीवी वर्ग से प्रतिरोध भी किया। ये सब विशेषताएँ निराला में एक साथ थीं जो उन्हें समाज के प्रत्येक पक्ष को देखने और उसकी तह तक जाने का आधार प्रदान करती थी। और वे वहाँ तक गए भी। कुल्ली एवं बिल्लेसुर के साथ वे सुर में सुर मिलाते थे तो चतुरी चमार को सबसे बड़ा पद प्रदान करते थे। समाज के निम्न वर्ग के साथ उठना-बैठना तथा उन्हें ही अपने साहित्य में वर्णित कर समाज के सामने प्रस्तुत करना निराला के सामाजिक दृष्टिकोण का ही परिचायक है। अंत में डॉ. रामविलास शर्मा के उस कथन के साथ ही मैं इसे समाप्त कर चाहता हूँ जो कभी समाप्त नहीं हो सकता है। शर्मा जी कहते हैं – नए मानवतावाद के प्रतिष्ठापक निराला के साहित्य में मनुष्य वीर, क्रांतिकारी, योद्धा, कवि, निरंतर संघर्षशील साथ ही अंतरद्वंद, गलानि और पराजय से पीड़ित साधारण मनुष्य भी है।22 निराला ऐसे समाज का निर्माण चाहते थे जहाँ हर एक प्रकार की स्वतंत्रता एवं समानता हो।

संदर्भ ग्रंथ
1. ऐसे थे हमारे निराला, डॉ. शिवगोपाल मिश्र, तक्षशिला प्रकाशन दरियागंज नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2002, पृ. सं.-75
2. निराला संचयिता, सं., रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2001, पृ.स.-324
3. निराला संचयिता, सं., रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2001, पृ.स.-319
4. वही, पृ.सं.- 319
5. वही, पृ.सं.- 327
6. कथा-शिल्पी: निराला, डॉ. बलदेव प्रसाद मेहरोत्रा, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1984, पृ.सं.-39
7. वही, पृ.सं.-41
8. निराला एक पुनर्मूल्यांकन, सं. ए.अरविंदाक्षन, आधार प्रकाशन पंचकूला हरियाणा, प्रथम संस्करण -2006, पृ.सं.-152
9. निराला संचयिता, सं., रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2001, पृ.स.-12
10. कथा-शिल्पी: निराला, डॉ. बलदेव प्रसाद मेहरोत्रा, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1984, पृ.सं.- 41,42
11. निराला संचयिता, सं., रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2001, पृ.स.- 23,24
12. कथा-शिल्पी: निराला, डॉ. बलदेव प्रसाद मेहरोत्रा, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1984, पृ.सं.- 43
13. निराला एक पुनर्मूल्यांकन, सं. ए.अरविंदाक्षन, आधार प्रकाशन पंचकूला हरियाणा, प्रथम संस्करण -2006, पृ.सं.-151
14. निराला एक पुनर्मूल्यांकन, सं. ए.अरविंदाक्षन, आधार प्रकाशन पंचकूला हरियाणा, प्रथम संस्करण -2006, पृ.सं.-175
15. कुल्लीभाट,निराला,राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नई दिल्ली,चौथा संस्करण-2015, पृ.सं.-79
16. वही, पृ.सं. – 171
17. वही, पृ.सं.- 165
18. कथा-शिल्पी: निराला, डॉ. बलदेव प्रसाद मेहरोत्रा, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, प्रथम संस्करण 1984, पृ.सं.- 54
19. निराला संचयिता, सं., रमेश चंद्र शाह, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2001, पृ.स.- 26
20. चतुरी चमार: निराला राजकमल प्रकाशन सं. 2014 पृ.सं.- 16
21. वही, पृ.सं.- 198

22. वही, पृ.सं.- 349

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