जयशंकर प्रसाद की कहानियों में वृद्धों का मार्मिक यथार्थ


निक्की कुमारी

स्नातकोत्तर- हिन्दी, नेट जेराफ एमफिल;
'छिन्नमता' और 'नर नारी' में स्त्री चेतना का तुलनात्मक अध्ययन
पीएच.डी हिन्दी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

छायावाद के चार आधार स्तंभों में से एक ख्यातिलब्ध रचनाकार जयशंकर प्रसाद (1889-1937 ई.) की प्रतिष्ठा एक कवि के साथ-साथ नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार व निबन्धकार के रूप में रही है। इन्होंने न केवल साहित्य की सभी विधाओं में लेखन कार्य किया बल्कि जिस क्षेत्र में कलम चलाई उसी क्षेत्र में अव्वल दर्जे की प्रतिष्ठा स्थापित की। इन्होंने जीवन में कभी साहित्य को अर्जन का माध्यम नहीं बनाया, अपितु वे साधना समझकर ही साहित्य की रचना करते रहे।
अपने संपूर्ण जीवन काल में एक कहानीकार के रूप में प्रसाद जी ने लगभग सत्तर कहानियाँ लिखी जो विषय की विविधता और कला की उत्कृष्टता के कारण हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। विविध विषयों पर लिखित इनकी कहानियों में दुर्बलता, वेदना, पीड़ा, पथ भ्रष्टता, पतन आदि के साथ-साथ वृद्धावास्थाजन्य मार्मिक यथार्थ का चित्रण भी देखने को मिलता है। वृद्धावस्था को केंद्र में रखकर लिखित ‘ममता’, ‘नीरा’, ‘बेड़ी’ और ‘गुदड़ी के लाल’ कहानियों में प्रसाद जी ने वृद्धावस्थाजन्य जीवन के अनेक मनोभावों यथा संबंधों की निरर्थकता का बोध, जीवन से अलगाव बोध, अकेलेपन, अधूरापन, स्मृति बोध, सुख-दुःख का लेखा, स्नेह, सहानुभूति एवं करुणा आदि का चित्रण किया है। प्रसाद जी द्वारा लिखित अधिकांश कहानियाँ 1925-1937 ई. के दौर की है और जब यह कहानियाँ लिखी गयी तब प्रासंगिक हो या ना हो लेकिन वर्तमान बाजारीकरण के दौर में यह कहानियाँ बहुत अधिक प्रासंगिक है। अपनी कहानियों में प्रसाद जी ने ऐसे वृद्ध पात्रों को चित्रित किया हैं जो किसी घर-परिवार में ना रहकर अकेले रह रहे हैं, यहाँ तक की उनके परिवार का चित्रण भी प्रसाद जी ने नहीं किया। प्रसाद जी द्वारा लिखित उपरोक्त कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि आज के दौर में अकेले रहना वृद्धों की नियति मानकर उन्हें अपने कहानी साहित्य में चित्रित किया है।
वृद्धावस्था में आकर व्यक्ति के सारे संबंध जो युवावस्था में उसे कार्य करने का उत्साह और सम्बल प्रदान करते हैं, सब निरर्थक हो जाते हैं। वृद्धावस्था में संबंधों की निरर्थकता के बोध को जयशंकर प्रसाद ने अपनी कहानी ‘बेड़ी’ में दिखाया है। आज के दौर में पिता-पुत्र के संबंध भी स्वार्थ की बुनियाद पर टिके हैं। कहानी का वृद्ध पात्र अन्धा होने के कारण भिक्षा मांगकर अपना व अपने पुत्र का जीवनयापन करता है। अन्धा होने के कारण बेटा उस काम में उसकी सहायता करता है। यहाँ पर भिखारी की जमा पूँजी उसका अपना बेटा चुराकर भाग जाता है। जिससे पिता पुत्र के संबंधों का खोखलापन उजागर होता है। कहानीकार प्रसाद जी लिखते हैं- “मैं अवाक् होकर देखने लगा, वही बुड्ढा! किन्तु आज अकेला था। मैंने उसे कुछ देते हुए पूछा-क्यों जी, आज वह तुम्हारा लड़का कहाँ है?

बाबूजी, भीख में से कुछ पैसा चुरा कर रखता था, वही लेकर भाग गया, न जाने कहाँ गया! उन फूटी आँखों से पानी बहने लगा।”1

जब वृद्ध का बेटा वापिस लौट आता है तब बच्चे की कर्तव्यपरायणता, बाप के स्वार्थ को देखते हैं जो अपने बेटे को पास रखने के लिए उसके पैरों में बेड़ी तक डाल देता है जिससे दुर्घटना में उसके बेटे के प्राण तक चले जाते हैं। इसका चित्रण प्रसाद जी बहुत ही मार्मिक ढंग से करते हैं-

एक ने कहा-चोट अधिक नहीं।

दूसरे ने कहा-हत्यारे ने बेड़ी पहना दी है, नहीं तो क्यों चोट खाता।

बुड्ढे ने कहा-काट दो बेड़ी बाबा, मुझे न चाहिए।

और मैंने हतबुद्धि होकर देखा कि बालक के प्राण-पखेरू अपनी बेड़ी काट चुके थे।”2

       प्रसाद जी द्वारा लिखित ‘ममता’ कहानी की पात्र ममता प्रस्तुत कहानी के शीर्षक को सार्थक करती नज़र आती है। हम देखते हैं कि कर्तव्य के सम्मुख द्वेष टिक नहीं पाता है और कहानी की पात्र ममता अपने पिता के हत्यारे को शरण देने के लिए बाध्य होती है। वृद्धावस्था में जहाँ परिवार, समाज व्यक्ति को धीरे-धीरे नकारता जाता है वहीं प्रशासन भी वृद्धों की उपेक्षा करने में पीछे नहीं रहता है। शासन की निष्क्रियता के कारण भी वृद्धों में असुरक्षा का भाव पनपने लगता है। कहानीकार प्रसाद जी लिखते हैं- “सहसा एक अश्वारोही उसी झोपड़ी के द्वार पर दिखाई पड़ा। वह अपनी धुन में कहने लगा-''मिरजा ने जो चित्र बनाकर दिया है, वह तो इसी जगह का होना चाहिये। वह बुढ़िया मर गई होगी, अब किससे पूछूँ कि एक दिन शहंशाह हुमायूँ किस छप्पर के नीचे बैठे थे? यह घटना भी तो सैंतालीस वर्ष से ऊपर की हुई!”3 वृद्धा ममता अपने अंतिम दिनों में अत्यंत असुरक्षित महसूस करती थी क्योंकि एक तो वृद्धा और ऊपर से विधवा व पिता की हत्या के बाद अकेली रहने को बाध्य। युद्ध में घायल होकर युद्ध से भागे हुए शहंशाह को अपनी झोपड़ी में शरण देने पर शहंशाह ने अपने सैनिकों को आदेश देते हुए कहा कि उस झोपड़ी के स्थान पर एक पक्का मकान बनवा दिया जाए। कहानी की वृद्ध पात्र ममता अपनी झोपड़ी में अपनी अंतिम साँस तक यूँ ही इंतजार करती रही और अंत में “वहाँ एक अष्टकोण मन्दिर बना; और उस पर शिलालेख लगाया गया-“सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उनके पुत्र अकबर ने उनकी स्मृति में यह गगनचुंबी मन्दिर बनाया।”

पर उसमें ममता का कहीं नाम नहीं।”4  

प्रस्तुत कहानी में अधर्म की धर्म पर विजय दिखाई गयी है। वह जगह अशरण को शरण देने से नहीं अपितु हुमायूँ के कारण महत्त्वपूर्ण हुई। अगर वहाँ ममता का नाम होता तो एक मूल्य की प्रतिष्ठा होती।

इसी तरह प्रशासन के प्रति उकताहट का भाव प्रसाद द्वारा लिखित ‘नीरा’ कहानी में भी देखने को मिलता है। ‘नीरा’ कहानी का वृद्ध पात्र अपना रोष प्रकट करते हुए कहता है- “जब मैं ‘मोरिशस’ में था, तब हिन्दुस्तान की बातें पढ़ा करता था। मेरा देश सोने का है, ऐसी भावना जग उठी थी। अब कभी-कभी उस टापू की बातें पढ़ पाता हूँ, तब यह मिट्टी मालूम पड़ता है; पर सच कहता हूँ बाबूजी, ‘मोरिशस’ में अगर गोली न चली होती और ‘नीरा’ की माँ न मरी होती...हाँ, गोली से ही वह मरी थी... तो मैं अब तक वहीं से जन्मभूमि का सोने का सपना देखता; और इस अभागे देश! नहीं-नहीं बाबूजी, मुझे यह कहने का अधिकार नहीं। मैं हूँ अभागा! हाय रे भाग!!5  
प्रसाद जी ने वृद्धों की दयनीय स्थिति के लिए मुख्यतः प्रशासन को जिम्मेदार माना है। एक व्यक्ति अपना पूरा जीवन घर-परिवार व देश की सेवा में लगा देता है, ऐसे में घर-परिवार के साथ देश व समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि उसकी असहाय अवस्था में उसको समुचित साधन व स्वाभिमान के साथ जीवनयापन करने के लिए प्रेरित करे। प्रसाद जी अपनी कहानी ‘गुदड़ी का लाल’ में वृद्धा की दयनीय स्थिति के लिए शासन व्यवस्था पर कुठाराघात करते हुए लिखते हैं- “नवयुवक देश-भक्त कहते थे, देश दरिद्र है; खोखला है। अभागे देश में जन्मग्रहण करने का फल भोगती है। आगामी भविष्य की उज्ज्वलता में विश्वास रखकर हृदय के रक्त पर सन्तोष करे। जिस देश का भगवान् ही नहीं; उसे विपत्ति क्या! सुख क्या!”6
वृद्धावस्था में व्यक्ति को अकेलेपन, अधूरापन और अलगाव का कुछ अधिक भान होता है और इन सबको अपनी नियति मानकर वृद्धजन जैसे-तैसे जीवनयापन करने लगते हैं। जयशंकर प्रसाद ने अपनी कहानी ‘नीरा’ में वृद्धों के अलगाव को दर्शाया है- “सहसा बुड्ढे ने सिर उठाकर कहा-मैं इसे मान लेता हूँ कि आपके पास बड़ी अच्छी युक्तियाँ हैं और वर्तमान दशा का कारण आप मुझे ही प्रमाणित कर सकते हैं। किन्तु वृक्ष के नीचे पुआल से ढँकी हुई मेरी झोपड़ी को और उसमें पड़े हुए अनाहार, सर्दी और रोगों से जीर्ण मुझ अभागे को मेरा ही भ्रम बताकर आप किसी बड़े भारी सत्य का आविष्कार कर रहे हैं, तो कीजिए। जाइए, मुझे क्षमा कीजिए।”7  
उपर्युक्त उद्धरण में देव निवास के वक्तव्य और उस पर वृद्ध द्वारा दिए गए तर्क से यह प्रकट होता है कि सर्वथा उपेक्षित रूप में भूख-प्यास से जूझते हुए एकांकी वृद्ध की कोई रूचि युवक के तर्कों और गतिविधियों में नहीं है। वह वृद्ध अलगाव और निर्वासन जैसी स्थिति को भोगने के कारण रुक्षता पूर्वक युवक को चले जाने के लिए कह देता है, क्योंकि उसे लगता है कि विपन्नता और वार्धक्य से जुड़े उसके कष्टों को युवक नहीं समझ पाएगा।
वृद्धावस्था में आकर जहाँ व्यक्ति शारीरिक रूप से असक्त हो जाता है वहीं असुरक्षा का भाव भी कुछ अधिक मन में गहराने लगता है, ‘नीरा’ कहानी का वृद्ध पात्र न केवल शारीरिक बल्कि आर्थिक रूप से भी असक्त और असहाय था लेकिन फिर भी जब कहानी का पात्र देवदास उनकी सहायता करने का आश्वासन देता है तो वृद्ध उस पर विश्वास नहीं कर पाता है और उसकी सहायता ठुकरा देता है- “क्षमा करना! मैं अविश्वासी हो गया हूँ न! क्यों, जानते हो? जब कुलियों के लिए इसी सीली, गन्दी और दुर्गन्धमयी भूमि में एक सहानुभूति उत्पन्न हुई थी, तब मुझे यह कटु अनुभव हुआ था कि वह सहानुभूति भी चिरायँध से खाली न थी। मुझे एक सहायक मिले थे और मैं यहाँ से थोड़ी दूर पर उनके घर रहने लगा था।...ठहर नीरा! हाँ तो महाशय जी, मैं उनके घर रहने लगा था। और उन्होंने मेरा आतिथ्य साधारणत: अच्छा ही किया। एक ऐसी ही काली रात थी। बिजली बादलों में चमक रही थी और मैं पेट भरकर उस ठण्डी रात में सुख की झपकी लेने लगा था। इस बात को बरसों हुए; तो भी मुझे ठीक स्मरण है कि मैं जैसे भयानक सपना देखता हुआ चौंक उठा। नीरा चिल्ला रही थी! क्यों नीरा ?...बुड्ढे ने फिर कहना आरम्भ किया-हाँ तो नीरा चिल्ला रही थी। मैं उठकर देखता हूँ, तो मेरे वह परम सहायक महाशय इसी नीरा को दोनों हाथ से पकड़कर घसीट रहे थे और यह बेचारी छूटने का व्यर्थ प्रयत्न कर रही थी।8  वृद्ध का अपने अतीत की घटनाओं और वर्तमान की परिस्थितियों के आपसी तालमेल एवं वर्तमान समाज के नागरिकों की बेरुखी वृद्ध के कथन में स्पष्ट दिखाई देती है।
‘नीरा’ कहानी में यथार्थवादी दृष्टिकोण का अधिक स्पष्ट चित्रण देखने को मिलता है। नीरा और उसके बूढ़े नास्तिक पिता का चरित्र बड़ी कुशलता से चित्रित किया गया है। दरिद्रता और लगातार दु:खों से वृद्ध मनुष्य जीवन के अंतिम पड़ाव में आकर भी नास्तिक बना रहता है और अविश्वास का भाव दिन-ब-दिन उसके मन में अधिक गहराने लगता है। लेकिन जब देवनिवास कहता है- “मैं नीरा से ब्याह करने के लिए प्रस्तुत हूँ।”9  तब सम्पूर्ण जीवन नास्तिक बनकर जीने वाला वृद्ध एक पल में आस्तिक बन जाता है-“बूढ़े को अबकी खाँसी के साथ ढेर-सा रक्त गिरा, तो भी उसके मुँह पर सन्तोष और विश्वास की प्रसन्न-लीला खेलने लगी। उसने अपने दोनों हाथ निवास और नीरा पर फैलाकर रखते हुए कहा-हे मेरे भगवान्!”10  हम देखते हैं कि इनके द्वारा लिखित ‘नीरा’ कहानी की विषयवस्तु अनेक समस्याओं से आवृत्त होकर भी प्रेम परक है। घटना का अंत सुनियोजित और चमत्कारपूर्ण होता है और कथानक उतना ही कलात्मक। डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल लिखते हैं- “समाज के क्षेत्र में प्रसाद का आदर्शवाद प्रेम और विवाह के दो केंद्र बिंदुओं में प्रतिष्ठित है।”11
वृद्धावस्था में आकर वृद्धजन अपने अतीत की स्मृतियों में खो जाते हैं और रह-रहकर अपने बीते पलों को याद करते हैं। वृद्धों की स्मृतियों की आवृत्ति को जयशंकर प्रसाद ने अपनी कहानी ‘नीरा’ में प्रस्तुत किया है, कहानी का वृद्ध पात्र अपनी पत्नी को याद करते हुए उसकी स्मृतियों में खो जाता है- “मेरे लिए तो तुम्हीं ईश्वर हो, तुम्हीं खुदा हो, तुम्हीं सब कुछ हो।’ वह मुझे चापलूसी करते हुए देखकर हँस देती थी, किन्तु उसका रोआँ-रोआँ रोने लगता।12 इसी तरह ‘गुदड़ी के लाल’ कहानी की वृद्धा जीवन की सांध्यबेला में जब अकेली पड़ जाती है और उसका शरीर उसका साथ नहीं देता है तब भी अपने बीते जीवन के बारे में सोचना और यह याद करना कि उसने सदा आत्मनिर्भर जीवन बिताया है, उसे आत्मविश्वास से भर देता है।
वृद्धावस्था में व्यक्ति जब स्वयं को परिवार व समाज में तिरस्कृत होता हुआ देखता है तो वह अपने जीवन का सिंहावलोकन करता है। सिंहावलोकन की इस प्रवृति को जयशंकर प्रसाद ने अपनी कहानी ‘गुदड़ी के लाल’ में चित्रित किया है। ‘गुदड़ी के लाल’ भावपूर्ण मनोवैज्ञानिक कहानी है। प्रत्येक मनुष्य चाहे युवा हो या वृद्ध की यह चाह होती है कि वह आत्मसम्मान और स्वाभिमान के साथ जीवनयापन करे किसी पर बोझ बनकर नहीं। जयशंकर प्रसाद ने अपनी कहानी ‘ममता’ व ‘गुदड़ी के लाल’ की वृद्ध स्त्रियों के माध्यम से इस समस्या का चित्रण किया है। ‘ममता’ कहानी की वृद्ध पात्र ममता को जब पता चलता है कि उसकी बरसों की बसाई झोपड़ी को उजाड़ कर वहाँ भव्य भवन का निर्माण होगा तो वह इस सदमें को सहन नहीं कर पाती है, हालांकि भवन का निर्माण वृद्धा के रहने के लिए ही होने वाला था लेकिन वह अपने स्वाभिमान का त्याग नहीं कर पाती है। प्रसाद जी लिखते हैं- “अश्वारोही पास आया। ममता ने रुक-रुककर कहा-''मैं नहीं जानती कि वह शहंशाह था, या साधारण मुगल पर एक दिन इसी झोंपड़ी के नीचे वह रहा। मैंने सुना था कि वह मेरा घर बनवाने की आज्ञा दे चुका था! भगवान ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल, मैं अपने चिर-विश्राम-गृह में जाती हूँ!”
वह अश्वारोही अवाक खड़ा था। बुढ़िया के प्राण-पक्षी अनन्त में उड़ गये।”13   
आत्मसम्मान व स्वाभिमान का भाव आज के दौर में वृद्धों की बहुत बड़ी समस्या बन गयी है, पूरा जीवन मान-सम्मान से गुजारने के बाद वृद्धावस्था में जब उनको अनुपयोगी मानकार उनके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार होता है तो वे टूट जाते हैं और जीने की चाह खत्म हो जाती है। ‘गुदड़ी के लाल’ कहानी की बुढ़िया किसी भी काम को करने में असहाय होने पर भी किसी से माँगकर नहीं खाना चाहती। प्रसाद जी लिखते हैं- “बुढिय़ा सबसे यही कहा करती थी- “मैं नौकरी करूँगी। कोई मेरी नौकरी लगा दो।’’ देता कौन? जो एक घड़ा जल भी नहीं भर सकती, जो स्वयं उठ कर सीधा खड़ी नहीं हो सकती थी, उससे कौन काम कराये? किसी की सहायता लेना पसन्द नहीं, किसी की भिक्षा का अन्न उसके मुख में पैठता ही न था। लाचार होकर बाबू रामनाथ ने उसे अपनी दुकान में रख लिया।”14 अपनी वर्तमान विपन्नता के बावजूद वृद्धा अपने सम्पूर्ण जीवन का लेखा-जोखा लगाती रहती है और स्वाभिमान के रूप में जमा अपनी पूँजी को गवांना नहीं चाहती है।
वृद्धावस्था के कारण उसका शरीर कमज़ोर पड़ चुका है लेकिन आत्मसम्मान आज भी वही है जो कभी उसकी युवावस्था में हुआ करता था। वह वृद्धावस्था में भी नौकरी करना चाहती है। यहाँ तक कि वह अपनी बेटी का भी नहीं खाना चाहती। वृद्धा का मानना है कि बेटी का खाकर उसकी कर्जदार क्यों बनूं। हालांकि यह एक मिथक है कि बेटी का खाने से पाप चढ़ता है और इस वजह से भी हमारे भारतीय समाज में आज बहुत से वृद्धों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। प्रसाद जी लिखते हैं- “बुढिय़ा की बेटी थी, वह दो पैसे कमाती थी। अपना पेट पालती थी, परन्तु बुढिय़ा का विश्वास था कि कन्या का धन खाने से उस जन्म में बिल्ली, गिरगिट और भी क्या-क्या होता है। अपना-अपना विश्वास ही है, परन्तु धार्मिक विश्वास हो या नहीं, बुढिय़ा को अपने आत्माभिमान का पूर्ण विश्वास था।...अपनी बेटी से सम्भवत: उतना ही काम कराती, जितना अमीरी के दिनों में कभी-कभी उसे अपने घर बुलाने पर कराती।”15
वृद्धा जीवन भर के संचित अभिमान धन को एक मुट्ठी अन्न की भीक्षा पर नहीं बेचना चाहती और इस बैचेनी में अपने प्राण तक त्याग देती है। प्रसादजी लिखते हैं- “नहीं बेटा! अभी तुम्हारा काम मैं अच्छा-भला किया करूँगी।’’ बुढिय़ा के गले में काँटे पड़ गये थे। किसी सुख की इच्छा से नहीं, पेन्शन के लोभ से भी नहीं। उसके मन में धक्का लगा। वह सोचने लगी, ‘‘मैं बिना किसी काम के किये इसका पैसा कैसे लूँगी?’’ क्या यह भीख नहीं?’’ आत्माभिमान झनझना उठा। हृदय-तन्त्री के तार कड़े होकर चढ़ गये।”16

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित इन कहानियों में घटना बहुत न्यून होती है। प्रसाद जी थोड़ी सी सामग्री पर अपनी अद्भुत शैली से अपना भवन निर्मित करते हैं। वे एक छोटी-सी बात को भी कवित्वमय ढंग से चित्रित करते हैं। प्रसाद जी द्वारा रचित इन कहानियों में वृद्धावस्था की समस्याएँ भले ही सीधे तौर पर नहीं दिखती हो किन्तु वृद्धावस्था, जो कि पूर्ण जीवन की एक अनिवार्य अवस्था है, का उल्लेख अत्यंत मार्मिक ढंग से हुआ है। वृद्धावस्था से संबंधित इन सभी कहानियों में कमजोर व रोगग्रस्त शरीर में आत्मसम्मान बचाते हुए स्वाभिमान से जीने की चाह स्पष्ट दिखती है। हर काल में परिस्थितिजन्य कुछ नवीन समस्याएँ उभरती हैं किन्तु वृद्धावस्था की कुछ चुनौतियाँ प्रत्येक देशकाल व वातावरण में प्रासंगिक रहना अवश्यंभावी है। इसीलिए ये कहानियाँ आज के दौर में भी अपनी सार्थकता का बोध कराती है। 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची :-
1. जयशंकर प्रसाद, बेड़ी, जयशंकर प्रसाद की अमर कहानियाँ, प्रभात प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 134
2. वही,...पृष्ठ संख्या 135
3. जयशंकर प्रसाद, ममता, जयशंकर प्रसाद की अमर कहानियाँ, पेज न. 8-9
4. वही,...पेज न. 8-9
5. जयशंकर प्रसाद, नीरा, जयशंकर प्रसाद की अमर कहानियाँ, पृष्ठ संख्या 96
6. जयशंकर प्रसाद, गुदड़ी के लाल, जयशंकर प्रसाद की अमर कहानियाँ, पृष्ठ संख्या 58
7. जयशंकर प्रसाद, नीरा, जयशंकर प्रसाद की अमर कहानियाँ, पृष्ठ संख्या 100
8. वही,...पृष्ठ संख्या 99
9. वही,...पृष्ठ संख्या 100
10. वही,...पृष्ठ संख्या 100
11. डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल, हिंदी कहानी की शिल्प विधि का विकास, पृष्ठ 226
12. जयशंकर प्रसाद, नीरा, जयशंकर प्रसाद की अमर कहानियाँ, पृष्ठ संख्या 99
13. जयशंकर प्रसाद, ममता, जयशंकर प्रसाद की अमर कहानियाँ, पेज न. 9
14. जयशंकर प्रसाद, गुदड़ी के लाल, जयशंकर प्रसाद कीअमर कहानियाँ, पृष्ठ संख्या 57
15. वही,...पृष्ठ संख्या 57
16. वही,...पृष्ठ संख्या 59

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