कहानी: मौत एक कस्बे की

उर्मिला शुक्ल

उर्मिला शुक्ल

चारों और जंगल से घिरे इस कस्बे की एक सर्द सुबह, कुहरे में लिपटा सूरज तनिक बाहर झाँकता और फिर अपने लिहाफ में जा छुपता। ऐसे में भला मेरी क्या बिसात।  सो मैं बार- बार उठने का संकल्प लेती, मगर मेरा संकल्प बार-बार भहरा जाता।

दिन काफी चढ़ आया था, मगर ठंड कह रही थी कि बस मैं ही हूँ। उस दिन रविवार था सो चिंता की कोई भी नहीं थी. पूरा दिन अपना था। तो क्यों न एक नींद मार ली जाय, सोच कर मैंने फिर लिहाफ तान लिया। मगर लिहाफ की गर्मी भीतर तक उतरती इससे पहले कालबेल ने दखल दी।

"उफ़ ! कौन आ गया इतनी ठंड में?" सोचकर लिहाफ़ से जरा सा मुँह बाहर निकाला कि ठंड की एक लहर भीतर तक उतरती चली गई। "ऊँह होगा कोई। कुछ देर में अपने आप लौट जायेगा" सोचकर लिहाफ़ और कस लिया। मगर लिहाफ़ से सर्दी रुकती है, आवाज़ नहीं। अब कालबेल लगातार चीत्कार रही थी।

"कौन? कौन है?" स्वर में कुछ-कुछ झुंझलाहट उतर आयी थी। बेमन से चप्पल घसीटे और दरवाज़ा खोलते ही…
"कुछु सुनेव आपमन? मास्टर साहब बीत गिन। (नहीं रहे)" पड़ोस वाले भाई साहब थे।

"रात किन जो सोयिन त सोतेच रहि गिन ..."

वे कह रहे थे मगर मैं कुछ सुन नहीं पा रही थी। मेरे भीतर कुछ हो रहा था, जिसमें उनकी आवाज़ ही नहीं बाहर का सारा कुछ गुम हो चला था। मेरे कान कुछ भी सुनने की स्थिति में नहीं थे।

"बड़ धरमी पुरुस रहिन। अभी भला जाये के उम्मर रहिस!" भाई साहब कह रहे थे। उनके होंठ हिल रहे थे। उनकी आवाज़ भी कानों तक पहुँची मगर कोई अर्थ न दे सकी। क्योंकि अब मेरे बाहर भीतर अतीत था। मास्टर साहब से जुड़ा अतीत …।

मास्टर साहब! हाँ, सारा कस्बा उन्हें इसी नाम जानता था। उनके इस नाम ने इतनी ख्याति पायी थी कि उनका असली नाम ही खो गया था। और बच्चे-बूढ़े सभी के लिए वे मास्टर साहब ही बन गये थे। 'जीवन प्रकाश' अपने इस नाम को सार्थक किया था उन्होंने। वे जीवनभर दूसरों का अँधेरा ही समेटते रहे। इस कोशिश में उनका अपना कितना कुछ पीछे छूटता चला गया था। गाँव-घर, नाते-रिश्ते सब। एक बार जो यहाँ आये तो फिर यहीं के होकर रह गये। लोगों में इतना डूबे कि खुद को भी भूल गये। उन्हें कभी लगा ही नहीं कि उनका कुछ निजी भी है। देना और सिर्फ देना ही तो जानते थे वे। उनकी इसी आदत के चलते काकी दाई अक्सर नाराज़ हो जातीं।

"बस! एकठन कमंडल खंगे हे। धर लेव। हम मन त तुंहर कुछु लागबेच नई करन।" कभी-कभी वे कहतीं।

मगर मास्टर साहब की सरल सौम्य मुस्कान के सामने उनका ये आक्रोश ठहर ही नहीं पाता था। वैसे यह आक्रोश भी तो ऊपरी ही था। भीतर से तो जीवन उन्हीं का अनुगामी था। अब आँखों में काकी दाई उभर आयीं थीं - गोरा रंग, गोल चेहरा। माथे पे सिंदूरी बिंदी और कोष्टउहन लुगरा (हथकरघा की साड़ी) और चूड़ियों भरी कलाइयाँ। मगर आज? सूना माथा और चूड़ीविहीन कलाइयों की कल्पना से मुझे सिहरन सी हुई और मेरी तंद्रा टूटी।

देखा तो सामने कोई नहीं था। भाई साहब जाने कब चले गये थे। मगर मैं? मुझमें इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि अपने कमरे तक लौट सकूँ। अभी कुछ देर पहले तक जिस ठंड से बचना चाह रही थी, वह अभी भी थी। बिल्कुल वैसी ही, मगर मैं वहीं दरवाजे पर खड़ी थी, बिल्कुल जड़। न जाने कितनी देर तक मैं यूँ ही खड़ी रही। फिर कमरे में लौटने लगी, तो पैर साथ ही न दें। बहुत देर तक एक ही स्थिति में रहने में खड़े रहने से पैर सुन्न हो चुके थे। और मन भी। जैसे तैसे पैर घिसटते हुए कमरे तक पहुँची। ऐसा लग रहा था मानो मीलों लंबा सफर तय किया किया हो भीतर पहुँच कर भी मन अस्थिर ही रहा। मास्टर साहब से जुड़े प्रसंग उभरते रहे, उनसे मेरी पहली मुलाकात …

विद्यालय में मेरा पहला दिन था। स्टाफ के अन्य लोगों की तरह उनके लिये भी मैं अजनबी ही थी। मगर ज्वाइनिंग के बाद वे मुझे अपने घर ले गये। पहले तो मुझे डर लगा। एक अनजान व्यक्ति के साथ? अख़बारों में पढ़ी, लोगों से सुनीं अनेक घटनायें याद हो आयीं। सोचा मना कर दूँ। मगर …

"डेरा झन बेटी ! तोर असन मोर बेटी हे "कहते उन्होंने मुझे देखा था।

मैं सन्न! "तो व्यक्ति का मन पढ़ना भी इन्हें आता है।" लगा जैसे मेरी चोरी पकड़ ली गई हो मन में डर तो था मगर मैंने ऊपरी मन से कहा, "नई सर अइसना बात नई हे।"

कहने को कह तो दिया मगर मन का भय अभी भी बरकरार था। और घर पहुँचते ही काकी दाई और केतकी ने ऐसा अपनाया कि लगा ही नहीं कि ये किसी और का घर है। लौटते समय ढेर सा स्नेह और आशीर्वाद मेरे साथ था। फिर तो कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं अपने घर से अपनों से दूर हूँ। मैं ही नहीं मेरे जैसे न जाने कितने ही लोगों की छाया थे वे। घटनायें चलचित्र सी चल रहीं थीं मगर उनमें कोई तारतम्य नहीं था। कभी कोई उभर आती, तो कभी कोई। घटनायें लगातार कौंध रहीं थीं और मुझे वहाँ जाना था, उस घर में ……।

मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी. कैसे? कैसे सामना कर पाऊँगी मैं? मगर जाना तो था ही। सो आतीत को जैसे तैसे पीछे ठेल कर मैं तैयार हुई। पैरों में चप्पल डाल दरवाजा बंद करने लगी। मगर ताला था कि बंद ही नहीं हो रहा था। बार-बार चाबी घुमाने के बाद भी ताला खुला का खुला। हाथों में जैसे ताकत ही नहीं थी। देर तक चाबी और ताले से जूझने के बाद ताला बंद हुआ।

अब सड़क पर घिसटते कदमों से मैं उस घर की ओर बढ़ रही थी। मगर कदम साथ नहीं दे रहे थे। एक तो गाँवनुमा कस्बे की कच्ची सड़क, उस पर रात भर की बारिश। चिखला इतना  कि सड़क पर गैरी सी मती थी। चलने की कोशिश में चप्पल चिपक-चिपक जाती। और मन? मन तो साथ दे ही नहीं रहा था। किसी तरह मैं उस द्वार तक पहुँची।

द्वार पर कोई नहीं था। मन को धक्का लगा। ये वही द्वार था जहाँ लोगों की भीड़ लगी रहती थी। और मास्टर साहब अपने घर को, अपने आपको भूल कर सबकी समस्यायें सुलझाते थे। और, लोग भी तो उन्हें कितना सम्मान देते थे। मगर … जब से यहाँ पंचायत राज आया सारे समीकरण ही बदल गये। और बची खुची कसर पूरी की नये राज्य ने। पिछले कुछ वर्षों से तो जातीयता इतनी हावी हुई कि … सब कुछ बदल गया था।

और मास्टर साहब जैसे लोग बिल्कुल अलग थलग रह गये थे। अब कस्बा पहले जैसा नहीं रहा, बदल गया है ये तो मालूम था, मगर इस कदर …। मैं भीतर गई मगर वहाँ भी कोई नहीं था बस काकी दाई और केतकी ही थीं। मुझे देखते ही केतकी मुझसे आ लिपटी और बुक्का फाड़कर रो पड़ी। लगा कि अब तक बरबस रोका बांध फूट पड़ा हो। उसके हाथ लगातार मुझ्रे कसते जा रहे थे और मैं उन आँसुओं में भीग चली थी। केतकी के आँसू मुझे बहाये ले जा रहे थे। और मैं उसे सम्हालने की कोशिश कर रही थी मगर उसके काँधे पर रखे मेरे हाथों में वह शक्ति ही नहीं थी कि मैं उसे सम्हालती। और शब्द? शब्द तो जैसे खो ही गये थे।

बड़ी देर बाद वह कुछ सम्हली थी। और काकी दाई?…

वे तो जैसे काठ हो गई थीं। मेरे आने पर भी वे दीवार देखती वैसी ही बैठी रहीं चुपचाप। जिन आँखों में ममता की हिलोरें उठा करती थीं उनमें आज असीम सूनापन भर आया था। दीवार को बेधती नजरें न जाने क्या ढूढ़ रही थीं। शायद उसे जो कल तक तो उनके साथ मगर आज …? उनके चेहरे पर अजीब सी कठोरता उभर आयी थी।

दिन कुछ और चढ़ आया था मगर द्वार अभी भी सुना था। बाहर निकल कर देखा घरों के दरवाजे अभी भी बंद थे मगर किसी किसी घर के भीतर से आवाज़ के कुछ टुकड़े उछल कर बाहर आ रहे थे।

"वो मारा SSS! मैं कहता था न कि छक्का ही मारेगा।" ओह! तो आज मैच है। भारत पाकिस्तान मैच ! तभी तो गलियों में कर्फ्यू सा पसरा है। सारा कस्बा मैच देखने में इतना तल्लीन था कि … क्या ये वही कस्बा था जिसे अपनाने के लिये मास्टर साहब ने अपना सब कुछ छोड़ दिया था! यहाँ तक कि रिटायरमेंट के बाद भी अपने गाँव न जा कर यहीं रमे रहे। सोचकर मन कसैला हो उठा था मगर लोगों को बुलाना भी तो जरूरी था सो … सोचा पड़ोसियों को और स्कूल के साथियों को बुलाया जाय। यूँ उन्हें खबर तो लग ही गई होगी मगर फिर भी जिनका घर करीब था उन्हें खबर दी मगर … कहीं क्रिक्रेट देखा जा रहा था, तो कहीं सास बहू के सीरियल और "बस अभी! अभी आते हैं।" के आश्वासन के साथ मैं फिर सड़क पर थी।

दिन चढ़ता ही जा रहा था और काठी - माटी का अब तक कोई इंतजाम न था। जीवन में पहली बार अपने लड़की होने का अफ़सोस हुआ था। मैं कुछ सोच नहीं पा रही थी, शर्मा जी नजर आये।

 स्कूल में गणित अध्यापक। इस कठिन घड़ी में वे मुझे देवदूत से लगे। और वास्तव में वे देवदूत ही साबित हुये - दाह कर्म के लिये लकड़ी खरीदना और उसे श्मशान तक पहुँचना कफ़न  आदि की व्यवस्था …. यह सब उनके बिना तो संभव न था। वे और उनके दोनों साथी तन मन से जुट गये थे। और सच तो ये है कि मास्टर साहब से उनका बहुत परिचय भी नहीं था। अभी पिछले माह ही तो उनकी नियुक्ति हुई थी शिक्षा कर्मी थे वे। मगर लग ही नहीं रहा था कि … कौन कहता है कि दुनिया अच्छे लोगों से खाली हो गई है।

मगर बाकी लोग? और वे जो मास्टर साहब के पुराने साथी थे, जो सच्चे साथी होने दम भरा करते थे। वे? क्या सब कुछ इतना बदल गया है कि …? अब उन्हें कुछ भी याद नहीं। इतना स्वार्थ सोचकर वितृष्णा सी हुई मगर…

अब द्वार पर दो चार लोग आ गये थे। शायद क्रिकेट मैच खत्म हो गया था। फिर कुछ और लोग आये उनमें कुछ महिलायें भी थीं। सामने वाली गुप्ताइन ने आते ही शिकायत ठोंकी कि इतनी बड़ी बात हुई, और उन्हें किसी ने खबर तक नहीं की?

मन में उभरा, "क्या सच में इस घर के रुंदन का एक कतरा भी उन तक नहीं पहुँचा होगा? घर के ठीक सामने रहकर भी क्या वे इस मौत से सचमुच अनजान रहीं! पूरे मोहल्ले में चलती- फिरती आकाशवाणी के नाम से कुख्यात ये महिला क्या सचमुच इस दुःख से अनजान है?" सोचते हुये मैंने उन्हें देखा तो उनके चेहरे का भाव ! मन किया कि कह दूँ मगर यह समय इन बातों का नहीं था। सो …

फिर तो जो आता यही कहता कि उसे तो खबर ही नहीं मिली ! यह गाँवनुमा कस्बा, जहाँ एक घर का बघार तक सभी घरों में खरखराता है, उसी कस्बे में आज किसी को मौत की खबर तक नहीं हुई वह भी मास्टर साहब की मौत जो … सोच कर मन आहत हुआ।

अब पंडित जी भी आ चुके थे और उनके निर्देशों पर केतकी कर्मकाण्ड के सामान जुटा रही थी - तिल, जौ, आटा, दूध, गुड़, शक्कर। जीवन भर कर्मकांड से दूर रहने वाले मास्टर साहब आज कर्मकांडों के गिरफ्त में थे। आँखों में मास्टर साहब का जीवन उभर आया था, मगर ये समाज और उसके नियम?सचमुच ऐसे समय में ही व्यक्ति कितना विवश हो उठता है आज। पंडित जी कर्मकांडों की फेहरिस्त लिये खड़े थे और हम सब उनके अनुगामी थे।

अब तक द्वार पर बीस पचीस लोग जमा हो चुके थे, मगर विमान बनाने की बात पर सभी मौन थे। फिर किसी ने सलाह दी कि अब तो शहर में रेडीमेड विमान मिलने लगा है तो इतनी झंझट क्यों उसे मंगवा लिया जाय। सो शर्मा जी और उनके साथी विमान के लिए रवाना हुए।

उपभोक्तावाद और बाजारवाद अपने पैर पसार रहा है। उसकी पैठ अब जीवन में गहराई तक हो चुकी है ये तो मुझे मालूम था। उसे कई बार महसूसा भी था, मगर उसकी घुसपैठ श्मशान तक जा पहुँची है, कि उसकी गिरफ्त से अब मृत्यु भी नहीं बच पायी है, यह मालूम न था। मगर आज सब प्रत्यक्ष हो गया था।

अब विमान आ गया था। बाकी सारी तैयारी तो पहले ही हो चुकी थी। तमाम कर्मकांडों के बीच अब शव विमान पर था। मगर कंधा देने की बात पर सब कन्नी काट गये थे। श्मशान तक कंधा देने को कोई तैयार न था। यह सब उसी महान देश में हो रहा था, जिसकी संस्कृति गाथायें गायी जाती रही हैं। जहाँ अर्थी को कंधा देना पुण्य कर्म माना जाता था। मगर यह सब पहले था जब व्यक्ति पाप पुण्य की डोर से बंधा होता था। जहाँ किसी के सुख में न सही, मगर दुःख में भागीदारी अनिवार्य हुआ करता थी। और काठी माटी में तो यह और भी जरूरी होता था, मगर आज? आज उसी देश के एक कस्बे में अर्थी के लिये चार कंधे भी नहीं थे और कंधा देने की समस्या उठ खड़ी हुई थी।

समस्या उठी तो समाधान भी निकला, हमारे यहाँ तो हर समस्या का समाधान है, लोगों ने सलाह दी कि मेटाडोर गाड़ी बुला ली जाय। शहर के कई मेटाडोर वाले यही धंधा करते हैं। शव को मेटाडोर से श्मशान तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है। रही बात कंधा देने की, तो गली के मोड़ तक अर्थी को कंधा देकर यह रस्म भी पूरी कर ली जाय। शर्मा जी एक बार फिर शहर मेटाडोर के लिये रवाना हुये। इन सब बातों के बीच काकी दाई बिल्कुल चुप थीं। वे अभी लगातार दीवार को ही देख रही थीं।

मेटाडोर आ गई। शव को नहलाना, नये कपड़े पहनना, मास्टर जी की पसंद की हर चीज उनके शव के पास रखी गई, ऐसे ही तमाम कर्मकान्डों के बाद अब शव अपनी यात्रा के लिए तैयार था। जब अर्थी उठने का समय आया तब एक समस्या और उठी, मुखाग्नि की।  मुखाग्नि कौन देगा अब यह सवाल सामने था। मास्टर साहब का कोई बेटा तो था नहीं और अपने गाँव-घर से, परिवार से उनका कोई संबंध रहा नहीं, सो वहाँ से कोई आया ही नहीं था, न भाई, न भतीजा और न ही कोई रिश्तेदार कोई नहीं आया। ऎसे में मुखाग्नि का सवाल बहुत विकट था।

फिर सलाह हुई लोगों ने तय किया कि मुखाग्नि शर्मा जी से दिला दी जाय। वे भले ही उनके रिश्तेदार नहीं हैं पर ब्राहमण तो हैं हीं और उम्र में उनके बेटे जैसे ही हैं। पंडित जी भी मान गये, "ले न का होइस। सरमा जी उंखर बेटच असन …" पंडितजी की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि … "नई!" अब तक चुप रहने वाली काकी दाई की आवाज अचानक घर से निकलकर द्वार तक फ़ैल गई थी। अब वे उठ कर दरवाजे पर आ गई थीं। उनका वो एक शब्द "नई" अभी भी तक मेरे कानों में गूँज रहा था। मैंने आज तक उन्हें कभी इतनी तेज आवाज में बोलते नहीं सुना था। बाकी लोग भी चकित थे और नाराज भी ये पुरुषों का क्षेत्र था। यहाँ औरत की दखलंदाजी नागवार गुजरी थी मगर …।

"केतकी देही आगी। कोन कथे उंखर कोन्हों नई ये. केतकी हय न। उंखर अंस, उंखर बेटी।" कहते हुए उनके चेहरे पर एक दृढ़ता थी। और देखते देखते ये बात घर से दुवारी और दुवारी से सारे कस्बे में फ़ैल गई।

पंडित जी पहले तो अकचाये "ऐसा कैसे हो सकता है?" और फिर उन्हें समझाने लगे " देखो मास्टरिन ये कोई फिल्म नहीं, जहाँ नारी स्वतंत्रता या नारी चेतना के लिये ऐसी कहानियाँ लिखी जाती हैं। ये तो जिंदगी है मास्टरिन, गाँव गंवई की जिंदगी, जहाँ गोत-गोतियारी समाज और संस्कृति ..."

"कइसन संस्कृति महराज? ये ही जेमा आज एक आदमी के मउत-माटी बर चार कांधा तक नई जुरे? ये ही संस्कृति जेमा बेटी के कोंहों गिनतिच नई हे। कोई भी आगी दे सकथे, फेर बेटी नही। काबर?"

"क्योंकि बेटी परगोतिया (दूसरे गोत्र) होती है। हाँ दमाद होता तो चल जाता। इतनी समझदार तो आप भी हैं न!" कहते हुये पंडित जी ने अपना पक्ष
तो रखा मगर उनके भीतर का आक्रोश चेहरे पर झलक आया था।

"बेटी परगोतिया होती है। और दामाद? वह भी तो? मगर वह चल जाता है और वो भी न हो तो कोई भी चलेगा, मगर बेटी? बेटी नहीं चलेगी! वाह रे ये समाज और इसके ये नियम ! नहीं ! मुझे ये मंजूर नहीं।" सोच रही थीं वे कहना भी चाहती थीं मगर …
"महराज! मुखाग्नि त केतकीच देही। ये ओखर फर्ज हे अउ हक भी। मोर बर बेटी अउ बेटा दुनो बरोबर हें।" कहते हुये उनके आवाज आवाज में ठहराव था। चेहरे पर था एक निश्चय।

पंडित जी कुछ देर तक तो खड़े रहे फिर बोले, "ठीक है! पर मैं इस अधर्म में साथ नहीं दूँगा।" कहते हुये उन्होंने मौजूद लोगों की और देखा और फिर अपना थैला उठाकर चले गये। और उनके पीछे पीछे कुछ लोग और फिर बाकी लोग भी चले गये।

अब हर द्वार, हर गली और हर नुक्कड़ पर बस एक ही बात थी, "अइसना अधरम! चच च च बिचारा मास्टर ओखर जिनगी अउ माटी दुनो बेकार। सहीच म कलजुगे आ गे हे।"

द्वार सूना हो गया था और अर्थी सामने पड़ी थी, मगर काकी दाई वैसी दृढ़ थीं। उनके चेहरे पर विचलन नही थी। क्या ये वही काकी दाई थीं! जिनकी दुनिया रसोईघर तक सीमित थी? उस घर में कितनी गोष्ठियाँ होती थीं, कितनी बहसें हुआ करती थीं। राजनीति और समाज से जुड़े कितने सवाल उठते और कितने जवाब तलाशे जाते, किसी भी बहस में, किसी भी ऐसी बात में कोई हिस्सेदारी नहीं रही। और आज! एकाएक इतना बड़ा फैसला, वह भी इतनी दृढ़ता के साथ! आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी में डूबी मै उन्हें, उनके इस नये रूप में देख रही थी। सचमुच वे मास्टर साहब की अनुगामिनी थीं। सही अर्थों में उनकी संगिनी थीं ये बात आज साबित हो गई थी।

अब द्वार पर हम लोग ही बचे थे। शर्मा जी और उनके साथियों का साथ अभी भी हमारे साथ था, हर तकलीफ हर समस्या में साथ, "आप फ़िक्र मत कीजिये। मैं द्वार पर मेटाडोर ले आता हूँ।" कहते हुए वे चलने लगे।

"नहीं! मेटाडोर नई लागय" काकी दाई की ये बात सुनकर शर्मा जी ठिठक गये। उन्होंने कुछ कहा तो नहीं मगर उनकी आँखों में सवाल उभर आये थे। वे कुल तीन लोग ही थे और …
"मय हंव न बेटा। ओमन जिनगी भर मोर बोझा ल बोहिन। आज मोर पारी हे" कहते हुये वे अर्थी को कंधा देने के लिये आगे बढ़ीं।

"काकी दाई आप! आपकी ऐसी हालत नहीं है कि … फिर मैं हूँ न। मैं दूँगी कंधा" कहती मैं अर्थी की और बढ़ने लगी कि उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया, "नई बेटी! आज मोल मोर फरज निभान दे।" और वे अर्थी की और बढ़ गयी थीं। मैं देख रही थी उन्हें और उनकी दृढ़ता को। वहाँ कोई वाद नहीं था, कोई विमर्श भी नहीं था। थी तो बस एक दृढ़ता, एक संकल्प। शर्मा जी और उनके साथी भी पल भर को भौचक रह गये मगर अब वे उनके साथ हो चले थे। अर्थी उठी। मास्टर साहब की अर्थी। मेटाडोर पर नहीं, चार कंधों पर। और उन चार कंधों में एक कंधा उसका था जिसके साथ उन्होंने जीवन मरण तक साथ निभाने के वचन दिये थे। आज वे उसी वचन को निभा रही थीं।

1 comment :

  1. मार्मिक, पर यथार्थ .... बेहतरीन

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