कहानी: प्रभाव

मुहम्मद हनीफ़

- मुहम्मद हनीफ़

शायद यह उनकी छुट्टी का अंतिम दिन था। गुनगुनाते हुए उन लम्हों को याद कर रहा था जो उन्होंने साथ गुजारा था। वक्त ठहरते नहीं, न ही इसे रोका जा सकता। क्या अजीब होती है यह स्मृति, ये बीते क्षण भी मानो कभी कभी याद करने की कोशिश करने पर भी यादें नहीं आती और अनायास याद आ जाने पर यादें जाती ही नहीं। आज एहसास हुआ था उसे पहली बार।
नहीं बेटा, तुम नहीं समझतीं।
कुछ समझा करो।
क्या समझने को कहते हो बाबा?
हाँ बेटा बैठो। इत्मीनान से बैठो। जिंदगी इसका नाम नहीं जिसे हम जीते हैं, जिंदगी उसका नाम है जिसके लिए हम जीते हैं।
ओहो, बाबा, तुम भी न, हद से ऊपर हो ।
नहीं, सुजाता, मैं ठीक कह रहा हूँ ।
लेकिन, बाबा, समझते क्यूँ नहीं।
क्या समझूँ, क्या? क्या??? यही न, कि मेरी उम्र चली गई, बाल पक गये। मैं... नहीं बेटे ऐसा कुछ भी नहीं होता। यादें नहीं मरतीं। स्मृति हमेशा आँखों में छाई रहतीं, समाये रहतीं, जैसे बादल में मेघ।
लेकिन, बाबा वह तो अब बूढ़ी हो चुकी होगी।
इससे क्या? मेरी भी तो उम्र जाती रही। उम्र के साथ साथ इंसान की ही तरह यादें भी परिपक्व हो जाती बेटे। फिर तो...
क्या?
मुहब्बत, वह नहीं जिसे आज के लड़के लड़कियाँ पार्क में करते हैं। अरे वह तो वासना है, पागलपन है, पशुता है।
कैसे?
बेटे, जल तब तक स्वच्छ और पीने लायक होता जब तक उसमें पाँव नहीं लगते। पाँव लगने पर, घिटोरने पर नीचे की कीचड़ ऊपर आकर पानी को मटमैला और गन्दा कर देता है, जिससे पीने लायक नहीं रहता। प्रेम भी यही है। जब तक इसमें वासना नहीं है, प्रेम है। वासनायुक्त प्रेम, प्रेम नहीं होता। अरे यह तो शारीरिक तृप्ति है, जो प्रेम रूपी गंगा को दूषित कर देता है।
फिर तो... पति-पत्नी का प्रेम क्या प्रेम नहीं है? इसका भी तो सम्बन्ध शारीरिक सम्बन्ध से जुड़ा है।
देखो सुजा... इसको इस तरह समझो। पति और पत्नी का सम्बन्ध शारीरिक है, लेकिन केवल इसका सम्बन्ध शरीर से नहीं है। इसका सम्बन्ध शरीर से, विचार से, मन से, कर्म से, भावी सन्तान से और धर्म के साथ साथ जीवन और आध्यत्म से है, जिसकी स्वीकृति परमब्रह्म से प्राप्त है, ऐसे में यह प्रेम प्लेटोनिक है, शाश्वत है।
अच्छा बाबा, समझ गई बट, अब तो बस करो!
देखते ही बाबा, सुजा के साथ पाकुड़ पहुँच चुके थे। सामने एक विशाल पेड़ आज भी मानो स्मृति को कैद किये चुपचाप मौन खड़ा था। सुजा को इशारे से रोकते उन्होंने कहा– देखो सुजा, यहीं मेरी पहली मुलाकात स्मृति से हुई थी। काफी चंचला थी वह। चुलबुल, और हाँ, किसी-किसी बात पर काफी गम्भीर भी। अच्छा बाबा, अभी जब तुम यहाँ आये हो तो कैसा फील कर रहे हो?
ओह! बिल्कुल भिन्न। मेरी सांसें तेज होने लगीं है, लगता है मैं फिर उसी उम्र में आ गया, जिस उम्र में यहाँ मिला था। इसी लॉन पर बैठा करता था, यही जगह, यही पेड़। दीवारें भी वही है, कुछ भी नही बदला। सब कुछ वही है। लेकिन....
लेकिन, क्या??
हाँ सुजा, क्या बताऊँ? एक अजीब किस्म का स्फुरण मेरे हृदय में हो रहा है ... लगता है, यहीं बैठा रहूँ। बैठा रहूँ, शायद वह आ जाये। सचमुच यह जिंदगी एक 'सरल करो', के जटिल प्रश्न की तरह होता है, जिसमें अनेक क्रियायें यथावत, विधिवत करनी होती है। थोड़ी सी चूक से उत्तर गलत निकल आता है, फिर भी उत्तर सरल ही होता है।
फिर तो बाबा... वो आपकी नहीं बन सकी तो उसे याद क्यों करते हैं?
बचपन देवतुल्य होता और इसके अंदर मौजूद देवशक्ति कभी नहीं मरती, बेटे। देखो, सुजा, तुम एक बार और सिर्फ एक बार मुझे ले चलो। मैं उसे देखना चाहता हूँ। बहुत दिन हो गए, बहुत रातें गुजर गई। बहुत, बहुत ....
ये कम्बख्त दिल भी न अजीब चीज होती है, सब कुछ पुराने हो जाते हैं, लेकिन ये दिल न कभी पुराना, न ही कभी धूमिल होता। जितनी भी कोई कोशिश कर ले और बहाने बना ले या कुछ कह ले बट, एक बार जिस किसी की भी तस्वीर इस तसव्वुर में बैठ जाए तो फिर उतरने का नाम ही नहीं लेती।
ओह, बाबा... तुम भी न अजीब पागल हो बाबा ।
नहीं, मैं पागल नहीं हूँ और न ही कोई पागलपन है। कल, आई मीन, जब तुम भी मेरी उम्र में पहुँचोगी तो इस बात का एहसास करोगी कि मैं कहाँ तक सही हूँ ।
चलो फिर... आपकी बात मन जाती हूँ, कहते सुजा ने बाबा को अपनी गाड़ी पर बैठा लिया।
सुजा आज पहली बार यह महसूस कर रही थी कि भले ही इंसान समय के साथ-साथ अपने आप को एजस्ट कर ले, लेकिन उन बीते क्षणों, और लम्हों को कभी नहीं भूल पाता, जिन्होंने उसके जीवन को झकझोरा हो। गाड़ी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी और वह कमला दास की "माय मदर एट सिक्सटी सिक्स" को याद कर रही थी, जबकि कमला जी अपनी माँ के साथ कोचीन एयरपोर्ट जा रही थी और उनकी माँ ऊँघती जा रही थी, जो एक खुली मौत की भांति प्रतीत हो रही थी। सुजा शीशे में कभी बाबा को देखती, कभी बाहर के नजारे देखती तो कभी उनकी उन भावना के साथ हो जाना चाहती, जिसकी अरमानों को पूरा करने के लिए, बाबा को साथ लेती जाने लगी थी।
तुमको क्या लगता उन सारे जनों को भी ऐसा ही लगता होगा जो अपनी उम्र में किसी से प्यार कर चुका होता और वह नहीं मिल सकी होती?
हाँ, ऑफ़ कॉर्स। बट, वो प्यार जो पहला हो, पाकीज़ा हो, प्रदूषित न हो। चलो सुजा, आज मैं तुमको ऐसी जगह ले चलता हूँ जहाँ स्मृति ने मुझे अपनी जिंदगी की पहली स्मृति दी थी।
बाबा, मैं समझ नहीं सकी।
हाँ सुजा, यह वही जग़ह है जहाँ स्मृति ने मेरे लिए एक छोटी-सी घड़ी गिफ्ट की थी और मैं लेने में हिचकिचा रहा था, कहते वह यादों में खो गया। आँखें भरी भरी हो उठीं।
देखो सुजा, देखो। इस आकाश की ऊपरी हिस्से को देखो। कितना मनोरम लगता है। लगता है यहाँ स्वर्ग है, जन्नत है, दुनिया से अलग एक हसरत की दुनिया है, लेकिन...
लेकिन... क्या?
लेकिन, इस ऊपरी आकाश में धूल है, धुआँ है और है एक अवांछित कल्पना जो कभी पूरी नहीं होती।
बाबा, आप इमोशनल हो रहे हैं।
नहीं, ऐसा भी नहीं...
सच मानिये, बिल्कुल आप... कहते सुजा ने सर झुका लिया।
हाँ सुजा...
मैं वाकई स्मृति से प्यार करते करते बहुत दूर निकल गया था। फिर एक दिन मुझे पता चला कि स्मृति को काफी तेज़ बुखार है, और वह हॉस्पिटल में एडमिट है।
मैं उसे देखने हॉस्पिटल गया। देखा, स्मृति बेड पर लेटी कराह रही थी। मुँह फूला-फूला लग रहा था। बाल उलझे-उलझे बड़ी बेतरतीब दिख रही थी। वह मुश्किल से देख पा रही थी। मुझे कुछ अजीब महसूस हो रहा था। उनकी आँखों के कोने से आँसू धीरे-धीरे गाल से होकर गले तक आ रहे थे। मेरे स्वागत के लिए जब उसने हाथ ऊपर करने चाहे तो...
तो क्या बाबा....?
बस चुप करो।
नहीं, बाबा, नहीं.... आज मैं तुम्हारे साथ हूँ। कल तक तुम मेरे साथ थे और आज मैं।
ऐसा भी नहीं सुजा... कोई किसी के साथ किसी भी कदर साथ हो जाये, लेकिन उस बीते लम्हों, बीते क्षणों को वापस नहीं ला सकते।
सच है, बाबा... बट, जख्म का मरहम तो बन सकते हैं न?
यही इंसान की बड़ी भूल है। मरहम घाव को ठीक नहीं कर सकते सुजा। ठीक नहीं। यह तो केवल माइंड सेट है, जो इंसान के मन में बैठा हुआ है।
तो फिर...?
जख्म को ठीक उसके शरीर, उसके हालात ही करते हैं सुजा।
जी, बाबा, ये तो है। चलो अब बहुत देर होने लगी।
जी, कहते बाबा रफ्ता-रफ्ता उस ओर जाने लगे थे, जिस ओर हवा भी दुबक-दुबक कर चली जाती है, अनायास।
जिंदगी भी क्या अजीब पहेली है। बूझो तो सरल और न बूझो तो कठिन। आज सुजा को महसूस होने लगी थी कि जीवन के साथ किसी का लगाव कितना गहरा हो जाता है, जब वह करीब से उसे देखना चाहता है। बाबा अब स्मृति के घर था, जबकि उनकी उम्र सात के दशक से भी ऊपर थी। देखते ही वह पुलकित हो उठी–
अरे कला तुम? कहो कैसे हो?
जी, ठीक हूँ। इधर पता चला कि कोई जॉन्डिस का जड़ी-बूटी से इलाज करता है, तो अपनी पोती के साथ आ गया।
ओह! लेकिन तुमको पता किसने दिया?
किसी ने भी नहीं।
फिर...?
जी, एक दिन अख़बार में आया था जिसे देख आ पहुँचा।
किसे जॉन्डिस है?
मुझको...
अरे अजीब हो, झूठ भी बोलने नहीं आता।
क्यूँ?
झूठ बोलने के लिए कला नहीं विज्ञान की जरूरत होती है।
लेकिन, अब तो वो स्मृति रही नहीं, जब भी हो भूल जाता हूँ।
बावजूद इतनी तो याद होनी चाहिए?
कितनी...?
जितनी की जरूरत हो।
जरूरत से ज्यादा की जरूरत पालने से मिलता भी क्या है?
सब कुछ, अगर पाना चाहे तो!
देखो यार, अब न कुछ पाने की तमन्ना रही न खोने को कुछ बाक़ी। जिसे पाना था, खो दिया और जिसे खोना था उसे पा लिया।
मतलब?
हर चीज का मतलब नहीं निकलता, कुछ चीजें ऐसी भी होती है जो अबूझ ही रह जाती।
जैसे?
जैसे हवा से हम हैं या मेरी  ही वजह से हवा है?
चलो चाय आ गई, ले लो।
नहीं, मैंने छोड़ दी।
कब से?
बस जब से जीना सीख लिया।
तो जीने से चाय का क्या रिश्ता?
है, बिल्कुल। चाय लोग तब पीते हैं, जब यह महसूस करने लगते हैं कि इसके बगैर जीना मुश्किल है।
आज पहली दफा बाबा इतने खुश थे, जिसका गुमान तक नहीं लगाया जा सकता। आते वक्त सुजा ने उन दोनों की आँखों में समान आँसू के गोल बुंदे देखे, जिन्हें किसी उम्र, किसी पड़ाव और किसी की परवाह नहीं थी। कुरेदने पर बाबा कहने लगे– देखो सुजा, जो हकीकत मैंने आज तक किसी से शेयर नहीं की, वही कह रहा हूँ, उन दिनों मैं काफी स्मार्ट था।
वो तो आज भी हो...
नहीं, सुजा। मजाक नहीं। सिरियसली, आई ऍम ...
अच्छा, बाबा तो फिर...?
उनकी बीमारी का हाल जानने जब हॉस्पिटल पहुँचा तो उसने अपने हाथ ऊपर किये। मेरे नहीं चाहने के बावजूद भी उनके जख्म के निशान देखकर मैंने उससे प्यार कर बैठा। मैं पाक था। मेरे विचार स्वच्छ थे। देखते ही देखते मैंने उससे एक दिन पूछ ही डाला...
अच्छा स्मृति तुमसे एक बात शेयर करूँ...?
बेशक।
अगर किसी को किसी से प्यार हो जाये तो क्या करना चाहिए...?
बस इतनी सी... जी प्यार करना चाहिए।
लेकिन, क्या, इसका इजहार करना चाहिए...?
ऑब्वियस्ली, व्हाई नॉट?
तो तुम भी सुन लो, मुझको तुमसे प्यार हो गया है।
थैंक यू सो मच...
फिर देखते-देखते मैं उसके काफी करीब होता चला गया। एक शाम की बात है। मैं स्मृति के साथ एक खूबसूरत फॉल के चट्टान पर बैठा था। बड़ी सुहानी शाम थी। फरवरी का महीना। न ज्यादा ठंड न ही अधिक गर्मी। हवाएँ मुस्कुराकर हम दोनों का अविवादन कर रहीं थीं, मानों, एक भय और सिहरन मेरे शरीर को झँकझोर रहा था, जो पहले कभी नहीं हुआ था। सांसों में गति थी, जिसका अंदेशा मुझे लग रहा था।
मैंने कहा– सुजा, अगर मैं तुम्हारे साथ जिंदगी गुजारूँ तो कोई दिक्कत?
बट, जिंदगी गुजारना और जिंदगी निभाने में फर्क होता, प्यारे।
जी, होता है। लेकिन मैं जिंदगी भर जिंदगी गुजारना चाहता हूँ।
कहना बहुत आसान होता कला, निभाना बहुत मुश्किल।
बावजूद भी अगर तुम्हारी इजाजत हो तो....
एक शर्त है, पूरी कर पाओगे?
जी...
एक प्रोफेसर बन दिखाओ। मुकम्मल जिंदगी तुम्हारे हवाले, लेकिन....
लेकिन क्या?
विवाह के पहले कोई  स्पर्श तक नहीं।

शर्त मंजूर है, कहते मैंने ठान लिया। अभी-अभी मैंने एम् ए फर्स्ट क्लास किया था। नई उमंग थी, नया उत्साह। सुजा की बातें मुझ पर प्रभाव डाल दीं। मैं उम्मीद और चाहत लिए ठाकुर के बॉलकोनी में था।

जी, सर। इंग्लिश से हूँ।
आपको पता होने चाहिए, ठाकुर शोले फिल्म को इक्यावन दफे देख चुका है। आई मीन, ठाकुर साहब हूँ, ठाकुर।
जी, सर। हुक्म....
मेरे पास हुक्म नहीं, हौसला और हासिल का जज्बा चाहिए।
जी, सर....
अगर तुम मेरा एक काम कर दो तो तुम्हारी नोकरी पक्की, वरना...
वरना?
वरना तुम्हारा भी हिसाब-किताब सही।
जी...
देख, कला। तुमको इतना ही काम सौंपता हूँ कि आर्म्स की सप्लाई तुम करोगे। मेरा एक गैंग है, अगर तुमने अपने काम भी वफादारी दिखाई तो तुम्हारा काम पक्का।

मुझको पता था कि ठाकुर साहब ने नया कॉलेज खोला था और उसमें इंग्लिश का एक स्थान खाली था। अपनी स्मृति को पाने के लिए मैं कुछ भी कर गुजरना चाहता था। मैंने गलत होते हुए भी हामी भर दी। कद में और उम्र में छोटा होने के कारण सभी प्यार से मुझे छोटू कहकर पुकारने लगे। कभी-कभी इंसान जाने अनजाने, चाहे भावनावश हों अथवा प्रभाववश कुछ गलतियाँ कर बैठते, जिसका खामियाजा, जिसका प्रभाव बहुत दूर और बहुत देर तक दिमाग में समाए रहता है।

 एक रात की बात है, मैं मिर्जाचक से भागलपुर आ रहा था। मेरे साथ, मेरी ही तरह के साथी भी थे। अचानक एलार्म की सीटी बजती एक गाड़ी सामने रोक दी गई। सारे के सारे साथीगण ने दौड़ना शुरू कर दिया। मैं शुरू से ही साहसी और सत्य पर विश्वास करता रहा। पुलिस की गाड़ी ने मेरी गाड़ी की सर्च की। गाड़ी में अवैध अस्त्र थे। मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। लाख कहने पर भी मेरी एक भी न सुनी गई। थाने में मेरी पिटाई भी की गई, जिसके दाग देखो सुजा इस हाथ के ऊपर है, दिखाया। सुबह हुई। पूरा अख़बार "कला चौधरी, उर्फ़ छोटू की हुई गिरफ्तारी" से रंगा था। जब यह खबर स्मृति के कानों तक आई तो पहले तो वह खूब रोई, फिर मेरे साथ किसी भी तरह का सम्बन्ध नहीं रखने की कसम खा ली। किस-किस तरह के होते हैं इंसान। कोई साथी के लिए दुनिया छोड़ देता, तो कोई दुनिया के लिया साथी। यह सब समय का ही प्रभाव था सुजा कि बहुत मशक्कत के बाद मेरी रिहाई हुई। मैंने प्रण लिया कि किसी भी कीमत पर मैं प्रोफेसर बन दिखाऊंगा, लेकिन किसी अन्य के बल-बूते पर नहीं, किसी और के प्रभाव से नहीं, अपनी मेहनत, अपनी लगन और जूनून से। माथे पर बोझ ले लेने पर भारी महसूस होता है, और जब भी बोझ हटा दो, माथा हल्का हो जाता है। इंसान बुरा से बुरा ही क्यों न हो अगर दिल से चाह ले, संकल्प ले, तो कभी भी सही हो सकता। तुमने जेल की दीवार पर लिखी तहरीर देखी होगी "एवेरी सेंट हेज ए हिस्ट्री एंड एवेरी क्रिमिनल हेज ए फ्यूचर"। मैंने मेहनत की और फिर नेट क्वालीफाई किया फिर प्रोफेसर बना। इस दरम्यान मेरी सारी तमन्ना जो सहेज कर मैंने जिसके लिए रखा था, खो दी। स्मृति ने शादी रचा ली। सच कहता हूँ सुजा, वह रात मुझे कयामत सी लग रही थी, जिस रात को स्मृति दुल्हन बनकर ससुराल जा रही थी। समय बीतते गये। मैंने भी साठ की सेवा पूरी कर ली, लेकिन यादें वहीं खड़ी की खड़ी रहीं, शायद मेरी ही इंतजार कर रही हों।

       देखो सुजा, आज जब मैं जिंदगी के ऐसे पड़ाव पर स्मृति से मिलकर जा रहा हूँ एक अध्यात्म मेरे सीने में जाग्रत हो रही है, और वह है– खुद को समझने की, खुद को समझाने की। इंसान चाहे लाख भी बुरा क्यों न हो, उनके अंदर कोई न कोई अच्छाई होती है, जरूरत है, उस अच्छाई को अपना आइडियल बनाने की, अपनाने की, उसका प्रभाव अपने आप की जिंदगी में ढालने की।

बस करो बाबा, बस। अब बर्दाश्त नहीं कर सकती, कहते सुजा उस वार्म रिसेप्शन को याद कर रही थी, जो स्मृति ने कला को दे रखी थी।

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