कहानी: निकिता

वर्षा सरन

वर्षा सरन

निकिता ऑफिस से आने के बाद बहुत थक गई थी। रोज का यही नियम है, दिन भर ऑफिस में काम और जब घर में कदम रखते ही शाम के डिनर की चिंता, बच्चों की पढाई, और घर की सफाई ... सिर्फ काम और काम। शालीन तो कुछ करते नहीं और बस लैपटॉप लेकर बैठ जाते है।

"अरे, मैं भी तो इंसान हूँ,कोई मशीन नहीं... ये इंसान है या पत्थर!" निकिता मन ही मन बड़बड़ाई और उसकी बड़ी बड़ी आँखें नम हो आईं...
किचन में जाकर चाय चढ़ाई, "शालीन तुम चाय लोगे?"
"हाँ! बड़े वाले कॉफ़ी मग में। थक गया हूँ। जरा डिस्प्रिन भी दे देना निकी!"
"और मेरे जो माइग्रेन का दर्द हो जाता है, उसका क्या? और तो और अगले हफ्ते से इनके मम्मी पापा भी आ रहे हैं" निकिता मन ही मन बोले जा रही थी।

लो चाय तो तैयार हो गयी। अब थोड़े से आलू उबलने रख देती हूँ। कृष को आलू के पराँठे ही पसंद हैं रात को।
चाय की दो चुस्कियाँ ही ले पायी थी कि अचानक मारपीट चालू।

"ये कृष भी न! जब-तब रोली से मारपीट शुरू कर देता है। शालीन! जरा बच्चों को देख लो, मेरे तो सर में तेज़ दर्द शुरू हो गया है" निकिता ने ऊंची आवाज़ में कहा।
"तुम तो हो ही डिफेक्टिव पीस" शालीन बोला।
"क्या कहा? मैं डिफेक्टिव हूँ? और तुम तो जैसे .... रहने दो जाओ। तुमसे तो बात करनी भी बेकार है।"

शालीन चाय पी चुका था, और बच्चों को डाँटने उनके कमरे में चला गया।
थोड़ी देर में आवाज़ शांत हो गयी और निकिता डबल बेड पर लेट गयी। आँखें बंद कर सुकून की झपकी ... कितना सुकून हैं इस शांति में! निकिता सोती ही जा रही थी कि अचानक कुकर की सीटी बजने लगी, "उफ्फ्फ! कितनी कर्कश आवाज़ है इसकी"

उधर बच्चों की कचर-पचर बढ़ती जा रही थी। आलस को दरकिनार कर निकिता किचन की ओर बढ़ी। गैस बंद करते ही कुछ आवाज़े और तेज़ हो गईं। शालीन बालकनी में खड़ा शायद फ़ोन पर किसी महिला से बात कर रहा था, "तुम समझती क्यों नहीं हो? मेरी भी कुछ जिम्मेदारियाँ है ... अगर मैं कल नहीं आ पाया तो आज आ जाऊँगा ... गुस्सा मत हो मेरी जान!"
"मेरी जान? ये सब क्या चल रहा है मेरे पीछे?" निकिता चिल्लाई... 
पीछे से तेज़ आवाज़ सुन शालीन ने फ़ोन ऑफ कर दिया, "कुछ नहीं ... ऑफिस में एक नयी लड़की मेरे पीछे  पड़ी है ... और कुछ नहीं..."
"शालीन अब और नहीं। मैंने तो जॉब इसलिए की थी की हमारे  बच्चे शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ेंगे। हम किसी ठीक-ठाक फ्लैट में रहेगे। मैं और तुम अपना लिविंग स्टाइल  मेन्टेन रखेंगे। पर अब मैं अब ये जॉब नहीं करूंगी। दिन-रात खटकने के बाद मुझे क्या मिला? तुम भी भटकने लगे। अब तो सब खत्म सा हो गया ..." निकिता की आंखों से निर्झर अश्रु मोती बिखरने लगे।
"अब ये रोने का ड्रामा बंद करो। आदमी को अगर भूख लगेगी तो कहीं तो जायेगा। तुम तो बीमार, थकी थकी ही रहती हो हमेशा... और जॉब की धमकी किसी और को देना। तुमने खुद ये रास्ता चुना है। मैंने नहीं कहा था।" शालीन अपनी मर्दानगी के घमंड में बोला।
"ठीक है! मैं कल ही अपना इस्तीफ़ा दे दूंगी। फिर देखती हूँ कैसे चलता है ये ऐशो आराम!।
"ठीक है! ठीक है! धमकियाँ किसी और को देना। तुम्हें जो सही लगे वह करो।" शालीन तेज़ आवाज़ में बोला।

आलू के परांठे बीच में ही रह गए और मैगी ब्रेड से काम चला कर सब सोने चले गए। निकिता का सर तो अभी भी फटा जा रहा था
पर वह अपने इरादे को अब डगमगाने नहीं देगी, यह सोचकर उसने आँखें बंद कर लीं।

बच्चों को स्कूल भेज निकिता और शालीन ऑफिस के लिए निकल गए। निकिता ऑफिस पहुची ही थी कि शालीन का फ़ोन आया, "हेलो निकी! जल्दी से कृष के स्कूल आ जाओ। वह बेहोश हो गया है।"
निकिता और शालीन न्यूरोलॉजिस्ट के सामने बैठे थे। कैट स्कैन, MRI की रिपोर्ट आ चुकी थी। कृष अब होश में था। डॉक्टर ने बताया की उसके सर में गाँठें हैं जिनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।
इलाज मंहगा था, दवाइयाँ खर्चीली, डॉक्टर की हर हफ्ते की फीस, घर के सौ ख़र्चे, सिर्फ ख़र्चे और ख़र्चे! पर कृष के बिना कैसे रह पायेगी वह! जीते जी मर जायेगी! इतने सारे विचार एक व्हर्लपूल की तरह दिमाग को मथ  रहे थे।

आँखों से आँसू के मात्र दो मोती ही गिरे। और हाथ में इस्तीफे  का लैटर था जो टुकड़े-टुकड़े हो कर वह डस्टबिन में चला गया।

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