लघुकथा : चमक

सुरेंद्र अरोड़ा

सुरेंद्र अरोड़ा


"बहुत हो चुका यार, कितना सहा जाए! अब तो अक्सर अंदर कहीं से आवाज आती है कि ये जिंदगी न होती तो इस संसार में किसी को भी क्या फर्क पड़ता। दुनिया तो तब भी ऐसे ही चलती ही रहती।"

"कुछ नया या अनोखा कहता तो कुछ बात होती। हो सकता है कोई एक या बहुत सारी जिंदगियाँ न भी होतीं तब भी कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। दुनिया का मेला हो या समय का चक्र, दोनों किसी का इंतजार नहीं करते। दोनों ही अपनी अबाध गति से चलते रहते हैं" उसके कानों में यह शब्द गूँजें तो वो किसी गहरे सोच में डूब गया।

"अब कहाँ खो गया?"

उसे कोई जवाब नहीं सूझा। कोई जवाब देने की स्थिति में वह था भी नहीं। थोड़ी देर बाद वह तो नहीं पर उसका अंतर्मन फूट पड़ा। उसकी आँखों में रुके हुए आँसू किसी फ़टे हुए पाइप से निकले जल की तरह बहने लगे। जब काफ़ी देर तक उसके आँसू बह लिए तो उसे लगा वह कुछ हल्का हो गया है। उसने अपने को कुछ कहने की स्थिति में पाया। उसकी मुद्रा में अवसाद की जगह गम्भीरता समा गयी। मिसमिसाहट भरे शब्दों में उसके होंठ हिले, "जब मेरे होने न होने से दुनिया में कोई हलचल ही नहीं होती तो ऐसे वजूद की जरूरत क्या है? क्यों न इसे नष्ट कर दिया जाय?"

"ख्याल तो तेरा अपनी जगह ठीक है पर ये तो बता कि ये कैसे तय होगा कि तू हो या न हो, इस बात का कोई मतलब नहीं है?"

"क्योंकि दुनिया ऐसे ही रहेगी चाहे मैं रहूँ, चाहे मैं न रहूँ।"

"एक साथ दो बातें? चाहे रहूँ, चाहे न रहूँ।"

"हाँ भाई यही सच है चाहे मैं रहूँ, चाहे मैं न रहूँ।"

"मतलब तेरे विचार में न रहूँ की अहमियत ज्यादा है।"

"कहना क्या चाहता है?"

"न रहूँ की जगह रहूँ की अहमियत समझता तो वो कर लेता जो तेरे होने से हो सकता है।"

वह आश्चर्य भरी निगाहों से, समझने की कोशिश करने लगा।

"कुछ अजूबा नहीं बोला है मैंने, तू है इसीलिए तो वह सब है, जिसे तू महसूस करता है। तू महसूस करे, इसीलिए तो वे सब हैं। दुनिया को महसूस करने लायक बना देगा, तो दुनिया तुझे महसूस करने लगेगी, अभी बहुत कुछ है करने को, जिससे लोग तुझे महसूस करें। करता चल वो सब जिसे करने से तुझे ही नहीं दुनिया यह कहने को मजबूर हो जाये कि तू न होता तो यह भी न होता क्योंकि ये तो सिर्फ और सिर्फ तू ही कर सकता था।"

अब उसके पास सिर्फ आँखें और उनके आँसू नहीं थे, आँसुओं की जगह आँखों में एक चमक थी।

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