संत रविदास के काव्य में मानवतावाद

 - इन्द्रजीत पासवान
सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, आर्य महाविद्यालय, लुधियाना (पंजाब), भारत
दूरभाष: 141000198144, 141000179933

इन्द्रजीत पासवान
संत रविदास जी को भक्त रविदास, गुरू रविदास, रैदास, रोहीदास और रूहीदास के नामों के साथ भी जाना जाता है। वह 15वीं सदी में हुए। उनकी रचना का भक्ति-विचारधारा पर गहरा प्रभाव पड़ा। वह एक समाज-सुधारक, मानववादी, धार्मिक मानव, चिंतक और महान् कवि थे। उन का सम्बन्ध दुनियावी तौर पर कुटबांढला चमार जाति के साथ था। उन के 40 शब्द श्री गुरू ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। इस के इलावा भी उनकी रचना मिलती है। उनकी रचना ईश्वर, गुरू, ब्रह्मांड और कुदरत के साथ प्रेम का संदेश देती हुई मानव की भलाई पर जोर देती है। शूद्र, अतिशूद्र कही जानी वाली जातियों के बीच पैदा होने वाले कवियों की एक लंबी परंपरा रही है। इस परंपरा के एक महत्वपूर्ण कवि संत रैदास हैं। उन्होंने वर्ण-जाति व्यवस्था को निर्णायक चुनौती दी और एक ऐसे समाज का स्वप्न देखा जिसमें कोई ऊँच-नीच न हो और जहां हिंदू-मुस्लिम के आधार पर कोई भेदभाव न हो, जहां मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार जन्म नहीं, बल्कि उसके मानवीय गुण हों । रैदास संत परंपरा के कवि हैं। इन संत कवियों के काव्य का आधार बौद्ध धम्म की मानवीय करूणा और समता की विचारधारा रही है। कंवल भारती के शब्दों में कहें तो, संत काव्य का वास्तविक आधार बौद्ध धर्म है। बौद्ध धर्म के पतन के बाद जो बुद्ध वचन परंपरा से जन-जीवन में संचित थे, संत काव्य उन्हीं की अभिव्यंजना हुई है। इसका सबसे प्रबल प्रमाण यह है कि सन्तों का साहित्य जीवन की स्वीकृति का साहित्य है, उसमें पीड़ित जन का आक्रोश और आवेश, सुखी समाज की आकांक्षा, और शोषक श्रेणी के प्रपंचों पर आघात है, और सबसे बढ़कर समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। भक्ति की परम्परा उतनी ही प्राचीन है जितना की आदिम मनुष्य। जब संसार में कार्ल मार्क्स नहीं था, जब संसार में द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का चिन्तन नहीं था, तब भी मुनष्य अन्याय के विरूद्ध लड़ता था और यह संघर्ष मध्यकाल के सन्तों में हमें दिखाई देता है। ...वे सब निम्न जातियों की मुक्ति के लिए उठे हुए स्वर थे। यह स्वर मानवता का स्वर था और भारत में भी वैष्णव चिन्तन इसका मूल था जिसने सबमें समन्वय फैलाने का यत्न किया।”1 जाति से चमार होने के बावजूद भी रैदास जी ने भक्ति मार्ग के जरिए मानवीय चेतना को समाने रखा। यही कारण है कि उनके समकालीन एवं गुरू भाई सन्त कबीर जी ने रविदास जी को ‘सन्तन में रविदास सन्त है’ कहकर इसी तथ्य को स्पष्ट किया है। सन्त कबीर का ही यह वचन
निरवैरी निहकांमता, सांई सैती नेह।
बिषियां सूं न्यारा रहे, संतन का अंग एह।।
संत रविदास जी पर अक्षरशः चरितार्थ होता है।”2

प्रकारान्तर से सभी संतों ने समाज-कल्याण की मान्यता को स्वीकार किया था और अपने जीवन के आदर्शों तथा पथ में इसे उतारा था। कबीर ने भी अपनी वाणी का विस्तार समाज कल्याण के लिए किया था। संत चरणदास ने अपने गुरू के विचारों की श्रोतस्विनी जगत् की प्यास बुझाने के लिए प्रवाहित की थी। रैदास ने तत्कालीन समाज की पीड़ा को समझा था और व्यावहारिक रूप से उसका समाधान निकाल कर अपनी वाणी के माध्यम से उस समाधान को सामान्य जनता में प्रसारित किया। ‘‘रविदास जी स्वभावतः मानवतावादी थे। आजकल के समाजसुधारकों की तरह प्रचारक नहीं थे। उन्होंने अनेक पदों में अपनी शोषित और दलित जाति को याद किया है। वे प्रभु-पारायण, जातीयता के कट्टर विरोधी, तथा मानव समानता के उदारवादी संत थे।”3

उन्होंने कहा है ऊँचे कुल में जन्म लेने से मानव ऊँचा नहीं होता। अच्छे कर्म करने से ही ऊँचा होता है। उन्होंने स्वयं को बार-बार चमार कहा है। यह उनकी महानता का परिणाम है क्योंकि इष्ट के प्रति दीनता और विनम्रता से ही भक्ति का प्रसाद प्राप्त होता है।”4

वर्तमान समय में संत रविदास के काव्य की मानवीय प्रासंगिकता एक दूसरे रूप में भी हमारे सामने आती है। कुछ मूल्य ऐसे होते है जो काल एवं स्थान से परे होते हैं। वे सदैव अनुकरणीय हैं। ऐसे मूल्यों को शाश्वत मूल्य कहते हैं। सत्य एक शाश्वत मूल्य है। कला शाश्वत मूल्यों की अभिव्यकित करता है और समाज में उनका प्रसार करता है। सामाजिक नियन्त्रण शाश्वत मूल्यों पर आधारित रहता है .... इस शाश्वत मूल्य से मानव व्यवहार सदैव से संचालित एवं प्रामाणित होता चला आया है।”5 मानवीय शाश्वतता की महागाथा रचने वाले संत रैदास की वाणी में उनकी परिस्थितिजन्य अनुभव कूट-कूट कर भरा हुआ है। यही कारण है कि संत रैदास आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस युग में थे।

संत रैदास में समाज को सुधारने की चेष्टा दूसरे ढंग से सामने आती है। वे कबीर की तरह आक्रामक वाणी से सुधार लाने की बात नहीं करते। वे अपनी वाणी में अत्यन्त विनम्रता से मनुष्य के मन का उस वृत्ति का परिष्कार करना चाहते हैं जिसके चलतेे कुरीतियाँ उत्पन्न होती हैं। वे बार-बार स्वयं को चमार कहकर अपनी वस्तुस्थिति से मुँह नहीं मोड़ते।
‘‘मेरी जाति कमीनी, पाति कमीनी ओछा जनमु हमारा।
तुम सरणागति राजा रामचंद कहि रविदास चमारा।।”6

संत रविदास की वाणी में कहीं आक्रोश था बदले की भावना नहीं झलकती। इन विभाजक रेखाओं को पाटने के लिए उन्होंने सहज रास्ता अपनाया।
‘‘रविदास राति न सोईये, दिवस न करिये स्वाद
अह निस हरि जी सुभारिये, छोड़ि सकल प्रतिवाद।”7

उनकी महानता को देखते हुए परमसंत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने कहा था कि, ‘‘रविदास जी ने अपने आप को मिटा कर दूसरों को जीवन-दान देना सिखाया था। मानवता के कल्याण के लिए स्वयं को कष्टों की भट्टी में जलाना रविदास जी का ही काम था। रविदास जी की प्रभु-भक्ति की तड़प हरिजनों के लिए प्रभु के मन्दिर के द्वार खुलवाने में थी। रविदास जी की अमृत-रस से भरी हुई वाणी जहाँ तपते हुए हृदयों को शीतल करने का काम देती है, वहाँ वही वाणी प्राणिमात्र के लिये समानता और बराबरी के द्वार खोलने वाली है।”8

रविदास ने तत्कालीन समाज में फैले आडम्बरों व कर्मकांडों का खुलकर विरोध किया। भले ही उनका स्वर कबीर की तरह प्रहारात्मक नहीं है। तथापि वे मिथ्याचारी व आडम्बरों का निर्वाह करने वालों को पूर्णतया अस्वीकार करते हुए उनके जीवन को व्यर्थ व थोथा कहते हैं तथा नाम स्मरण को ही जीवन का सार मानते हैं-
थोथी काया थोथी माया, थोथा हरि बिन जनम गवाया।
थोथा पंडित थोथी बानी, थोथी हरि बिन सबै कहानी।।9
थोथा मंदिर भोग बिलासा, थोथी आन देव की आसा।
साचा सुमरन नांव बिसासा, मन बच कर्म कहै रविदासा।।10

उन्होंने अपनी वाणी के माध्यम से मध्यकालीन सामाजिक चेतना को एक नयी दिशा दी तथा अपने उच्च व सात्विक विचारों व उदात्त मूल्यों से तत्कालीन समाज को एक नया आलोक प्रदान किया। हर दृष्टिकोण से रैदास की वाणी में निहित मानवीय मूल्य प्रासंगिक हैं।
चैरह सौं तैंतीस की मादा खुदी पंदरास।
दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास।।11

रविदास की भक्ति में मानव व्यवहार के संबंधों की व्याख्या ‘समाज’ के सम्बन्ध में हुई है। डॉ योगेन्द्र सिंह लिखते हैं, रैदास जी की विचारधारा आज भी प्रचलित सामाजिक अन्तर्विरोधों एवं समस्याओं का समाधान निकालने में एक सीमा एक सहयोग दे सकती है। विशेषतः उनका जीवन, विचारधारा तथा अभिव्यक्ति शैली यदि आज के परिप्रेक्ष्य में समझी जाये तो आजकल के समाज सुधारकों एवं अग्रणी व्यक्तियों के प्रति वह पर्याप्त मागदर्शक बन सकती है। ..इन्हीं विशेषताओं ने उनको अपने युग का ही नहीं सदा सर्वदा के लिए एक महान् विचारक, चिन्तक तथा समाज सुधारक के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है।”12

सही मायने में देखें तो संत रैदास समूची मानवता के प्रणेता बनकर उभरे हैं। वे दिखावा पसंद नहीं करते बल्कि नाम स्मरण के बाहरी धरातल पर नाम और नामी की एकता स्थापित करते हैं, अर्थात् पद और पदार्थ का ऐक्य घोषित करते हैं। पद और पदार्थ की एकता का आधार है प्रत्यय यानी विश्वास। रविदास इसी विश्वास की प्रतिष्ठा अन्धविश्वास के उच्छेद से करते हैं-
जहं अन्ध बिस्वास है, सत्त परख तहं नांहि।
‘रविदास’ सत्त सोई जानि है, जौ अनभउ होई मन मांहि।।13
एकमेक एक रस का विवेचन करते हुए वे कहते हैं-
धरम अधरम मोच्छ नहिं बंधन, जरा मरन भव नासा।
द्रिस्टि अद्रिस्टि गेय अरू ज्ञाता, एकमेक है रविदासा।।14

अस्तु, रविदास की वाणी में मानवता का स्वर एकता के रूप में भक्ति के रूप में, सामाजोत्थान और कल्याण भावना के रूप में उभरा है। उनकी अमृतवाणी हिंदी साहित्य की एक अमूल्य निधि है। वह सत्य सनातन धर्म की एक ऐसी अनुपम थाती है जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता संत रैदास की जीवन दृष्टि पूर्ण वैज्ञानिक है। वे सभी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता देखते हैं। उनके अनुसार स्वराज ऐसा होना चाहिए जिसमें किसी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो। संत रैदास साम्यवादी, समाजवादी व्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि पराधीनता से देश, समाज और व्यक्ति की सोच संकुचित हो जाती है और संकुचित विचारधारा वाला व्यक्ति बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय की अवधारणा को व्यवहारिक रूप प्रदान नहीं कर सकता। उनके मन में समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति गहरा आक्रोश था। इसीलिए वे आजीवन सामाजिक कुरीतियों, वाह्य आडम्बर एवं रूढ़ियों से लड़ते रहे। संत रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत थी। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों की शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान सहज ही हो जाता था। उनकी वाणी का प्रभाव इतना व्यापक था कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके अनुयायी हो गये थे। संत रैदास अपने समय से बहुत आगे थे। क्रान्तिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युगबोध की सार्थक अभिव्यक्ति के कारण उनका विचार दर्शन आज भी प्रासंगिक है। आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची 
1 रांगेय राघव – “संगम और संघर्ष” किताबमहल प्रकाशन, प्र. स. 1953, पृष्ठ 12,13
2 आचार्य पृथ्वी सिंह आज़ाद - “युग प्रवतक संत गुरू रविदास” दीपक पब्लिशर्ज़,
  जालन्धर, प्र. स. 1983, पृष्ठ 30
3 डॉ मीरा गौतम – “संत रविदास की निर्गुण भक्ति” निर्मल पब्लिकेशन्स, दिल्ली, प्र. स. 1998, पृष्ठ 97
4 वही, पृष्ठ 98
5 तोमर एवं शर्मा, “समाजशास्त्र के सिद्धान्त”, श्रीराममेहरा एंड कम्पनी, आगरा, द्वितीय संस्करण, प्र. स. 1973, पृष्ठ 287
6 संत रविदास – “गुरू ग्रन्थ साहिब” - पृष्ठ 659
7 योगेन्द्र सिंह – “संत रैदास” लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्र. स. 1998, पद 32
8 दलित बंधु, रविदास अंक 1933, लाहौर
9 डॉ बी पी शर्मा – “संत गुरू रविदास वाणी”, पद-51, पृष्ठ 90
10 वही, पृष्ठ 90-91
11 पृथ्वी सिंह आज़ाद - “संत रविदास दर्शन” 1972, पृष्ठ 164-165
12 योगेन्द्र सिंह - “संत रैदास” लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्र. स. 1998 पृष्ठ117
13 पृथ्वी सिंह आज़ाद - “रविदास दर्शन”, पृष्ठ 33
14 डॉ बी पी शर्मा - “संत गुरू रविदास वाणी, पद 28

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।