कहानी: घड़ा


-विवेक मिश्र


विशाल उठकर बिस्तर पर बैठ गए। उनके माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं। विशाल तेज़ी से बेडरूम से निकल कर ड्राइंगरूम में आ गए। शीतल फ़ोन पर बात करने में व्यस्त थीं। विशाल ने कमरे के कोने में रखे घड़े को उठाया और ड्राइंगरूम से निकल कर लॉन में आ गए। शीतल भी विशाल के पीछे-पीछे बाहर आ गईं। वह विशाल से कुछ कह पातीं तब तक विशाल ने उस बड़े राजस्थानी घड़े को, जिस पर कच्चे पर चटक रंगों से फूल-पत्तियाँ और बेल-बूटे बने थे, ज़ोर से ज़मीन पर दे मारा।

विशाल हाँफ़ रहे थे और शीतल उनकी बाँह पकड़े हतप्रभ खड़ी थी। घड़े के छोटे-छोटे टुकड़े लॉन में बिखर गए थे।

आज जब विशाल घर लौटे थे तब वह बहुत ख़ुश थे और शीतल का हाल जानने के लिए उत्सुक लग रहे थे। विशाल ने घर आते ही पूछा था, “क्या कहा डॉक्टर ने? कैसा है बेबी? … सब नार्मल तो है न?” शीतल ने आश्वस्ति के भाव चेहरे पर लाते हुए कहा था “हाँ सब ठीक ही है, वज़न, ब्लड प्रेशर … आज अल्ट्रा साउंड भी करवाया … सचमुच विशाल, कैसा विचित्र अनुभव है, अपने ही भीतर पलते बच्चे की तस्वीर स्क्रीन पर देखना, उसके छोटे-छोटे हाथ-पैर, पैर तो ऐसे चल रहे थे जैसे उसे मालूम हो कि हम उसे देख रहे हैं। कितना अजीब लगता है अपने भीतर एक और दिल को धड़कते हुए देखना, मैं तो अपने आँसू नहीं रोक सकी, … बस अब मैं उसे देखना चाहती हूँ”।

विशाल की आँखें उत्सुकता और कौतुहल से भरी थीं। उन्होंने शीतल को बीच में ही रोक कर पूछा, “कोई समस्या तो नहीं है, सब ठीक है न? काश मैं भी तुम्हारे साथ चल पाता, … एनी वे, फ़ाइनली क्या कहा डॉक्टर ने?”

शीतल ने विशाल के कन्धे पर टँगे बैग को उतारते हुए कहा, “डॉक्टर ने कहा बेबी बिल्कुल ठीक है, बस थोड़ा खाने-पीने का ध्यान रखना है, मौसम बदल रहा है न, और मेरा गला भी कुछ ठीक नहीं, इसलिए ठंडी चीज़ें खाने और फ़्रिज का पानी पीने को मना किया है।”

शीतल ने कमरे के कोने में रखे एक नए राजस्थानी घड़े की ओर इशारा करते हुए कहा, “देखो, हास्पिटल से लौटते हुए मैं यह घड़ा भी ले आई, अब इसी का पानी पियूँगी”।

विशाल की दृष्टि घड़े पर पड़ते ही उन्हें ऐसा लगा जैसे उनकी आँखों में कुछ चुभ रहा हो। कमरे के कोने में रखे मिट्टी के घड़े पर कच्चे पर चटक रंगों से फूल-पत्तियाँ बनी थीं। शीतल ने विशाल की ओर देखते हुए पूछा, “सुन्दर है न?”

विशाल ने कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ़ शीतल की ओर देखा, एक बार फिर घड़े को देखा और बेडरूम की ओर बढ़ गए। उनके पीछे शीतल भी बेडरूम में आ गईं। शीतल ने पूछा “क्या हुआ तुम्हें?”

विशाल ने थोड़ा रुक कर उत्तर दिया, “तुम भी कमाल करती हो, आजकल पानी पीने के लिए कौन घड़ा घर में रखता है… वो भी इतना बड़ा! कुछ भी उठा लाती हो। फ़्रिज का पानी नहीं पीना था तो एक छोटी सी सुराही ले आतीं … पर यह इतना बड़ा फूल-पत्तियों वाला राजस्थानी घड़ा… हटाओ इसे वहाँ से।”

शीतल बिना कुछ कहे विशाल को देखती रह गई। विशाल, जो ऐसे समय में शीतल का हर तरह से ध्यान रख रहे थे। बच्चे के जन्म का उन्हें शीतल से भी अधिक बेसब्री से इंतज़ार था। उन्होंने ख़ुद अपने हाथों से बेडरूम में चारों ओर गोल-मटोल, गोरे-काले-साँवले, हँसते-रोते कई बच्चों के चित्र लगाए थे, … पर आज, अचानक एक घड़े को लेकर विशाल का इस तरह ग़ुस्सा होना, शीतल को कुछ समझ नहीं आया। वह बेडरूम से बाहर आ गईं। विशाल कपड़े बदल कर बेडरूम में ही लेट गए। ऐसे समय में जब वह अपनी पत्नी का इतना ध्यान रख रहे थे, उन्हें भी इस तरह शीतल से बोलना अच्छा नहीं लगा था। पर … वह घड़ा, जिसपर कच्चे पर चटक रंगों से फूल-पत्तियाँ बनीं थीं, उनकी आँखों में अभी भी चुभ रहा था। विशाल ने आँखें बन्द कर लीं, पर अब भी वह उनकी आँखों के सामने था और उन्हें बार-बार एक ऐसे गहरे कुँए में खींचे ले जा रहा था जिसकी गहराइयों में झिलमिलाते पानी पर उन्हें ऐसा ही राजस्थानी बड़ा मिट्टी का घड़ा दिखाई देता, जिसपर कच्चे रंगों से फूल-पत्तियाँ बने थे, वह उस गहरे कुँए के गंदले पानी की सतह पर ऐसे हिलते-डुलते हुए तैरता, जैसे ख़ुद को डूबने से बचाना चाहता हो, पर धीरे-धीरे उसमें पानी भरने लगता और उस घड़े से हाँफ़ती, छटपटाती बुलबुले बनाती हवा बाहर निकलती। घड़ा हार जाता और आख़िर में डूब जाता।

विशाल उस घड़े को, उस कुँए को, उस शाम को भूल जाना चाहते थे, जिस शाम वह राजस्थान में, अपने गाँव ढाँढेसा में, अपनी हवेली के बरामदे में बड़ी बेचैनी से टहल रहे थे। हवेली के भीतर के एक कमरे से किसी औरत के रोने-चीख़ने की आवाज़ आ रही थी। यह विशाल की भाभी की आवाज़ थी। वह गर्भवती थीं और गर्भ नौ महीने से भी ऊपर का हो चुका था। आज दोपहर से ही उन्हें दर्द उठ रहा था। हवेली के भीतर के कमरे में डॉक्टर उनकी जाँच कर रही थी। डॉक्टर ने कमरे से बाहर निकलते ही कहा था, “इन्हें अस्पताल ले जाना होगा, वैसे तो सब ठीक है, लेकिन घर में प्रसव होने पर थोड़ी मुश्किल हो सकती है।” पर विशाल के बड़े भाई साहब ने भाभी को अस्पताल ले जाने से मना कर दिया था। विशाल डॉक्टर को शहर छोड़ने चले गए थे, जो गाँव ढाँढेसा से बीस-बाइस किलोमीटर दूर था।

विशाल डॉक्टर को छोड़कर जब तक हवेली वापस लौटे थे, सूरज डूब चुका था, पर हवेली के बरामदे की बत्तियाँ नहीं जल रहीं थीं। भीतर से भाभी की रोने की आवाज़ें आ रहीं थीं। हवेली के आँगन में कुछ औरतें, भाई साहब के दो ख़ास कारिन्दे और दाई, जिसे डॉक्टर के जाने के बाद जचकी के लिए बुलाया गया था, बैठे थे। भाई साहब भाभी के पास कमरे में थे। आँगन के बीच में एक बड़ा राजस्थानी घड़ा रखा था, जिसपर कच्चे पर चटक रंगों से फूल-पत्तियाँ बनी थीं। हवेली में एक भयावह सन्नाटा तैर रहा था। आज विशाल को उस घड़े पर बने फूल, उसकी गर्दन पर बने बेल-बूटे अच्छे नहीं लग रहे थे।

दाई ने उठते हुए कहा, “मरी हुई छोरी जनी है बींदड़ी ने” और आगे बढ़ते हुए काला कपड़ा घड़े पर ढक दिया। भाभी के रोने की आवाज़ तेज़ हो गई। भाई साहब कमरे से बाहर आ गए। उन्होंने आँगन में बैठे अपने खास कारिन्दों को इशारा किया। दोनों उठकर घड़े की तरफ़ बढ़े। तभी घड़ा काँप उठा।

मिट्टी का बेजान घड़ा। बेल-बूटों और फूल-पत्तियों वाला घड़ा। विशाल सोच रहा था क्या किसी और ने भी उस घड़े को काँपते हुए देखा है? घड़ा ही हिला था या धरती हिल रही थी। घड़े की ओर बढ़ते हुए दोनों आदमी ठिठक गए। घड़ा फिर हिला और लुढ़क गया। घड़े में भरा सफ़ेद, घर का पिसा, दरदरा नमक फ़र्श पर फैल गया … दो नन्ही, नमक में सनी मुट्ठियाँ घड़े से बाहर निकल आईं।

भाभी जो कमरे के चौखट से टिकी रो रही थीं, उनकी आँखें ऊपर चढ़ गईं। अब उनकी चीख़ें दहाड़ों में बदलने लगीं। विशाल को लगा जैसे हवेली की दीवारें उनकी दहाड़ों से थर-थर काँप रही हैं। वह घड़े से बाहर झाँकती नन्हीं मुट्ठियों को घड़े से बाहर खींचकर सीने से लगा लेना चाहती थीं। वह उन्हें पकड़ने के लिए बढ़ीं भी, पर कमरे की चौखट को छोड़ते ही आँगन के फ़र्श पर मुँह के बल गिर पड़ीं। उनकी मुँह से निकली चीख़ कई विचित्र सी ध्वनियों में टूट गई, वह यदि कुछ साफ़-साफ़ बोल पातीं तो यही कहतीं “मार डाला मेरी बच्ची को”, लेकिन उस ध्वनि को समेट कर जोड़ा नहीं जा सकता था, क्योंकि अब वह असंख्य टुकड़ों में बँट कर आँगन में तैरती हुई हवेली के बाहर पसरे अंधेरे में विलीन हो गई थी। पर उसके कुछ बारीक रेशे अब भी हवेली की दीवारों से टकरा कर उन्हें झनझना रहे थे।

फ़र्श पर फैला नमक आँगन में खड़े लोगों की आँखों में चुभ रहा था। सब अंधे, गूँगे, बहरे बन कर खड़े थे। अगर कुछ बोल रहा था तो वे थीं दो नन्ही-नन्ही नमक में सनी, घड़े के मुँह से बाहर झाँकती मुट्ठियाँ।

विशाल काँपते पैरों से अपनी आँखें मलते हुए, घड़े की ओर बढ़े, पर भाई साहब ने उन्हें बीच में ही रोक दिया। भाई साहब के दोनों ख़ास कारिन्दों ने मुट्ठियों को पकड़ कर वापस घड़े में ठेल दिया और मुँह पर काला कपड़ा बाँध दिया। औरतें भाभी को उठा कर कमरे में ले गईं। भाभी होश में थीं या नहीं कहा नहीं जा सकता। उनके दाँत भिंचे हुए, आँखें चढ़ी हुई थीं और हाथ-पाँव एक दम ठण्डे पड़ चुके थे।

विशाल की आँखों के सामने जैसे अँधेरा छा गया था। अपनी पूरी शक्ति समेट कर वह अपने पैरों पर खड़े रह पाने की कोशिश कर रहे थे। उनके सामने जो कुछ भी घट रहा था, वह किसी दुःस्वप्न-सा धीरे-धीरे उनकी आँखों के आगे तिर रहा था। उनके कानों में अभी भी भाभी की चीख़ें गूँज रही थीं। उन्होंने ख़ुद को सम्भालते हुए सिर को झटका और हवेली के दरवाज़े की ओर लपके जहाँ से भाई साहब और उनके दो आदमी, आँगन के बीचों-बीच रखे उस घड़े को उठाकर ले गए थे। वह जब तक हवेली के बाहर पहुँचे, भाई साहब की जीप काला धुँआ पीछे छोड़ती हुई हवेली से बाहर निकल चुकी थी। वह पागलों की तरह, गिरते-पड़ते काले धुँए के पीछे भाग रहे थे। पर धुँआ उन्हें पीछे छोड़ कर फ़र्राटे से गाँव के बाहर बने उस मनहूस कुँए पर जा पहुँचा था, जिसके चारों ओर गहरा सन्नाटा था। कुँए की मुँडेर पर एक दीया रोशनी देने की नाकाम-सी कोशिश कर रहा था। भाई साहब की जीप जिस फ़र्राटे से कुँए तक पहुँची थी, उसी फ़र्राटे से वापस हवेली की ओर लौट गई। विशाल कुँए की मुंडेर पर हाथ रखे हाँफ़ रहे थे। दीये की रोशनी में झिलमिलाते कुँए के पानी में बुलबुले उठ रहे थे।

घड़ा डूब चुका था।

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