सिद्ध-नाथ साहित्य में सामाजिकता

दीप प्रकाश (दीपक कुमार)

विभागाध्यक्ष, हिंदी; गोरूबथान गवर्नमेंट कॉलेज; कलिम्पोंग, पश्चिम बंगाल

               समाज एक ऐसी इकाई है जिसका प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कला के हर क्षेत्र पर पड़ता है। कई बार समाज कला के विभिन्न रूपों को प्रभावित भी करता है और खुद उससे प्रभावित भी होता है। रचनाकार समाज से विमुख होकर रचना कर ही नहीं सकता। रचयिता के मन में समाज सदैव विद्यमान होता है, रचयिता की वैचारिकी उसके समाज से ही निर्मित होती है। मकीवर एवं पेज के अनुसार ‘समाज रीतियों एवं कार्यप्रणालियों, अधिसत्ता एवं पारस्परिक सहयोग, अनेक समूहों एवं विभाजनों, मानव व्यवहार के नियंत्रणों एवं स्वतंत्रताओं की व्यवस्था है। यह सतत परिवर्तनशील जटिल व्यवस्था है जिसे हम समाज कहते हैं। यह सामाजिक संबंधों का जाल है और निरंतर परिवर्तनशील है।’ इस परिभाषा में दो बातें साफ़ तौर पर नजर आती हैं कि समाज एक सामासिक कार्यप्रणालियों कि व्यवस्था है और सतत परिवर्तनशील है। सिद्धों और नाथों के यहाँ यही परिवर्तनशीलता नजर आती है। वे अपने समय और समाज की सामासिक कार्यप्रणालियों का सम्यक निरीक्षण करते हुए उसके परिवर्तनगामी तत्व पर जोर देते हैं।

हर समाज का अपना एक मानदंड होता है जिसके अनुसार सामाजिक व्यवस्था चलती है या यूँ कहें कि चलायी जाती है। समयानुरूप इन मानदंडों में परिवर्तन होता आया है। जब बुद्ध अवतरित हुए उस समय वैदिक कर्मकांड का बोलबाला था। समाज की अपनी कार्यप्रणाली थी लेकिन बुद्ध के अवतरण के पश्चात् उसमें बदलाव आया। बुद्ध के साथ ही एक नयी समाज व्यवस्था ने जन्म लिया जो अपने पूर्ववर्ती व्यवस्था के मुकाबले अधिक व्यावहारिक थी। लेकिन जैसा कि ऊपर कहा गया है कि समाज परिवर्तनशील होता है। अतः बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद पुनः सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन देखा गया और ये उत्तरोत्तर चलती रही। लेकिन ये सामाजिक मानदंड होते क्या हैं और किस तरह निर्मित होते हैं? ‘बियरस्टेड ने सामाजिक मानदंड को एक प्रमाणित कार्यप्रणाली का रूप माना है। उनके  अनुसार यह समाज स्वीकृत तरीका है और इसके कई प्रकार हैं। यथा- जनरीतियाँ, रूढ़ियाँ और कानून। सामाजिक मानदंड को सामान्य बनाम विशिष्ट के रूप में वर्गीकृत किया गया है।’ जनरीतियाँ अनौपचारिक मानदंड होते हैं और आवश्यकता अनुसार बदलते रहते हैं, रूढ़ियाँ समाज के द्वारा एक निश्चित कालावधि में निर्धारित होती हैं और प्रकृति में अपरिवर्तनशील होती हैं, कानून औपचारिक होते हैं और सर्वमान्य होते हैं। इन्हीं सब के बीच एक रचनाकार की वैचारिकी का जन्म होता है। ये सभी मानदंड प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सहायक होते हैं सामाजिक चेतना के विकास में। विषमताओं के बीच ही विरोध का जन्म होता है। जब कोई रचनाकार अपने समय एवं समाज में व्याप्त तमाम जनरीतियों, रूढ़ियों, नियम-कानूनों आदि का सम्यक अवलोकन करता है और उसे अपनी रचना का आधार बनाता है तो वह उस रचनाकार की सामाजिक चेतना का परिचायक होता है।

अब यहाँ एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि ‘सामाजिक चेतना’ आखिर होती क्या है? किस आधार पर हम किसी की वैचारिकी में सामाजिकता का आंकलन करते हैं। सामाजिक चेतना की अवधारणा को भलीभांति समझने के लिए हमें पहले चेतना को समझना आवश्यक है। विलियम हैमिलटन के शब्दों में कहा जाये तो चेतना को परिभाषित नहीं किया जा सकता। हम केवल उसका अनुभव कर सकते हैं कि वो क्या है। लेकिन उसे किसी और को उसी रूप में बता नहीं सकते जैसा कि हम उसे अनुभव करते हैं। ‘चेतना शब्द का प्रयोग मनोवैज्ञानिक तथा दार्शनिक अर्थ में ही किया जाता है। चेतन मानव की प्रमुख विशेषता चेतना है जिसे वस्तुओं, विषयों, व्यवहारों का ज्ञान भी कहा जा सकता है।’ किसी व्यक्ति की चेतना वह शक्ति है जिसके माध्यम से वह अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं को अनुभव करता है, उसका सम्यक अवलोकन करता है और फिर उसका विश्लेषण करता है। जिस दृष्टि से व्यक्ति समाज को देखता है उसकी विवेचना करता है उसे उस व्यक्ति की सामजिक चेतना कह सकते हैं। 

सरहपा और मत्स्येन्द्रनाथ जिस कालखण्ड में अवतरित होते हैं उसमें सामाजिक रूढ़ियाँ अपने चरम पर थीं। समाज चतुर्वर्ण की अपेक्षा विभिन्न जातियों में बंट चुका था। जो बौद्ध धर्म कभी वैदिक रूढ़ियों और कर्मकांडों के विरुद्ध खड़ा हुआ था वो स्वयं रुढ़िवाद का शिकार हो चुका था। जिस ईश्वरीय सत्ता के विरुद्ध बुद्ध खड़े हुए थे उनके अनुयायियों ने उन्हें ही ईश्वर का रूप बना दिया और फिर बौद्ध धर्म में भी कर्मकांड का समावेश हो गया। उसके नियम कानून इतने कठोर हो गये थे कि उसमें सामान्य जन का प्रवेश लगभग असम्भव सा हो गया था। हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात राजनैतिक केन्द्रीय सत्ता का ह्रास हो गया। बौद्ध धर्म की सीमायें धीरे-धीरे संकुचित होने लगीं। इस संक्रमणकालीन स्थिति का फायदा उठा कर ब्राह्मण धर्म ने फिर से अपने पैर पसारने शुरू किये। सरहपा का जिस समय प्रादुर्भाव हुआ वह सबसे माकूल समय था एक नयी व्यवस्था को जन्म देने के लिए। अराजकता के गर्भ से ही नयी व्यवस्था का जन्म होता है। सरहपा ने अपने समय की तमाम प्रचलित मान्यताओं का अपने समय और समाज की आवश्यकता अनुसार अवलोकन किया और एक नए मार्ग का अनुशीलन किया। जिसे सहज मार्ग कहा जाता है। मत्स्येन्द्रनाथ ने भी योगिनी कॉल मार्ग का अनुशीलन किया। ये दोनों ही मार्ग साधनात्मक मार्ग हैं फिर भी सामाजिक उपादेयता की दृष्टि से इनका बहुत महत्त्व है।

                                जैसा कि तृतीय अध्याय में कहा जा चुका है कि सरहपा किसी भी पूर्व प्रचलित मान्यताओं को यूँ ही स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे अपने अनुभव या साधना से पुष्ट करते हैं फिर ग्रहण करते हैं। यहाँ सरहपा में परिष्कार की भावना लक्षित होती है। यही नहीं सरहपा ने अपने दोहाकोश के प्रारंभ में ही पूर्व प्रचलित सभी दर्शनों या आचार पद्धतियों का विरोध करते हुए उनकी तीक्ष्ण आलोचना की है।

                                 अपने समय के प्रचलित सभी सम्प्रदायों और उनकी साधना पद्धति में व्याप्त आडम्बरों को ख़ारिज करते हुए सरहपा एक ऐसे साधना पद्धति की नींव डालते हैं जो सर्वसामान्य के लिए ग्राह्य व् सुगम हो। सरहपा ने जिस पद्धति का आग्रह किया उसे ‘सहजयान’ या सहजिया संप्रदाय के रूप में जाना जाता है। दरअसल सहजयान कोई पृथक संप्रदाय न होकर ‘वज्रयान’ का ही रूप है। इसका पृथक कोई साहित्य भी नहीं मिलता। वज्रयान के दोहाकोश और चर्यागीत ही इसका आधार है। “the sahajiya school is an affshoot of Vajrayana। There is no exlcusive literature belonging to sahajyana। On the other hand the sahajiya poets of dohas and songs recognize the well known text of Vajrayana as their authority।”1  (bhattacharya, n।n, history of tantric religion, 1982, p-69) ऐसा करते हुए सरहपा सामाजिक विद्रोही के रूप में नजर आते हैं। उनका सम्पूर्ण साहित्य (जो उपलब्ध है) इसी बात पर जोर देता है कि किस तरह समाज में हाशिये के लोगों को आधार दिया जा सके। जिस ईश्वरीय सत्ता को आधार बनाकर वर्षों से उनका शोषण किया जाता रहा है, उन्हें उनके मूल अधिकारों से वंचित रखा गया। उस ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देकर सरहपा ने जनसामान्य के लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया है।

    सरहपा द्वारा रचित दोहाकोश, जिसका संपादन राहुल सांकृत्यायन जी ने किया है, और चर्यापद में वर्णित पांच पद कुल मिलाकर यही साहित्य हमें प्राप्त होता है। जिसके आधार पर हम उनके सामाजिक चिंतन का स्वरूप निर्धारण कर सकते हैं। यद्यपि सरहपा वैयक्तिक साधना पर जोर देते हैं लेकिन उनकी वैयक्तिकता समाज से विमुख नहीं थी। वे ऐसी साधना पद्धति चाहते थे जिसे विशेष व्यक्ति ही नहीं बल्कि सामान्य व्यक्ति भी अपना सके और स्वयं को जरा-मरण के भंवरजाल से मुक्त कर सके। भारतीय इतिहास के मध्यकाल में इस तरह का आग्रह बहुत मायने रखता है। ‘मध्यकाल में धर्म व्यक्ति को केंद्र बनाकर चलता था और लोकपक्ष को अभिव्यक्ति देनेवाला धर्म जाति व्यवस्था, नैतिक मर्यादा, सामाजिक अनुशासन सभी को गौण मानने लगता है।’2

   सिद्ध सरहपा मूल रूप से एक साधक थे कोई स्वतंत्र लेखक नहीं। उनकी रचना प्रधानतः उनकी साधना पद्धति को ही प्रसारित करती है। लेकिन उनकी साधना पद्धति जिस वैचारिकी पर आधारित थी वो क्रांतिकारी थी। अतः उनकी सामाजिक चेतना को एक साधक की भांति ही समझने की आवश्यकता है। जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में कार्यरत होता है उसी के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त भी करता है। सरहपा ने अपने साधनात्मक रचनाओं के जरिये अपनी सामाजिक चिन्तना को अभिव्यक्ति दी है। वो समरसता की बात करते हैं-
जब्बै मन अस्तमन जाई, तन टुट्टे बंधन।
तब्बै समरस मध्ये, न शूद्र न ब्राह्मण। 3  (दोहाकोश, सं-सांकृत्यायन, राहुल, दोहा सं 95, पृष्ठ-3)

 अपनी सामाजिक चिन्तना में सरह विद्रोही है। समाज में एक विशेष वर्ग को बड़े संरचनात्मक ढंग से दबाया गया है, उन्हें उनके मूल अधिकारों से वंचित रखा गया है, यहाँ तक कि जिस ईश्वर ने सबको बनाया उसी ईश्वर के घर में उनके जाने पर भी पाबन्दी लगा दी गयी। ब्राह्मणों के द्वारा ईश्वरीय सत्ता का भय दिखा कर या फिर एक ऐसी कल्पना के जरिये जो व्यक्त नहीं है उस समुदाय का अंतहीन शोषण किया गया और उन्हें यकीन दिलाया गया कि ये सब जो उनके साथ हो रहा है ये उनके ही पूर्व जन्म में किये पापों का प्रायश्चित है। अपनी बात को पुष्ट करने के लिए ब्राह्मण वर्ग वेदों का सहारा लेता था। जिन लोगों को पढ़ने-लिखने तक कि मनाही थी उनके समक्ष ब्राह्मण वर्ग वेदों की मनमानी व्याख्या कर उनके भीतर भय का संचार करते थे। सरह ने इसका तीक्ष्ण विरोध किया है और कहा है कि जो लोग ऐसी अवधारणा प्रस्तुत कर रहे हैं वे स्वयं इसका भेद नहीं जानते, सिर्फ जानने का ढोंग करते हैं-
ब्राहमण न जानते भेद, यों ही पढ़ें ये चारो वेद।
मट्टी पानी कुस लेई पढंत, घर ही बैठी अग्नि होमंत। 4

                                                   सरहपा ने अपने समय में प्रचलित सभी सम्प्रदायों और धर्म के वाह्याडम्बरों पर तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। फिर चाहे बौद्ध हों, पाशुपत हों, ब्राह्मण हों, शैव हों या फिर कोई भी। कोई भी उनकी विद्रोही नजर से बच नहीं पाया।

ब्राह्मण:
“काज बिना ही हुतवह होमें| आँख जलावें कडुए धुंए।
एकदंडी त्रिदंडी भगवा भेसे| ज्ञानी होके हंस उपदेसे|।”5 अर्थात बिना किसी विशेष प्रयोजन के होम वगैरह करते हैं और कड़वे धुंए से अपनी आँखों को जलाते हैं और कष्ट पाते हैं। कोई एकदंडी तो कोई त्रिदंड लगाता है और भगवा पहनता है। ऐसे लोग ढोंग करते हैं क्यूंकि इन सब चीजों से मोक्ष या ब्रह्म की प्राप्ति नहीं होती। (दोहाकोश, सं-सांकृत्यायन, राहुल, दोहा सं  2, पृष्ठ-3)

पाशुपत:
“शैव साधू लपेटे राखी, ढोते जटा भार ये माथी।
घर में बैठे दीवा बालें, कोने बैठे घंटा चालें।”6 अर्थात, जितने भी शैव साधु हैं वे अपने शरीर पर श्मशान की राख लपेटे रहते हैं और अपने माथे पर भारी जटा बांधते हैं। सरह कहते हैं कि वे घर में बैठ कर घंटा बजाएं क्यूंकि इन सब पाखंडों से मोक्ष नहीं मिलता। (दोहाकोश, सं-सांकृत्यायन, राहुल, दोहा सं 4, पृष्ठ-3)

जैन:
क्षपणक ज्ञान-विडम्बित भेसे, आतम बाहर मोक्ष उपदेसे।
यदि नंगे नि होई मुक्ति, तो शुनक-शृगालहु 7 अर्थात, जैन क्षपणकों के ज्ञान की यह अवस्था है कि वे आत्मा के बाहर मोक्ष का उपदेश देते हैं। नंगे होकर घूमने से मोक्ष नहीं मिलता। (दोहाकोश, सं-सांकृत्यायन, राहुल, दोहा सं 6, पृष्ठ-3)

बौद्ध:
जो जासु जेन होई संतुष्ट, मोक्ष्क की लब्भे पानि नहाये।
क्या तंह दीपे क्या नैवेद्ये, क्या तंह कीजे मन्त्रही भावे। 8 अर्थात, जो जैसा हो संतुष्ट पर मोक्ष क्या पानी में नहाने से मिलता है या दीप या नैवेद्य से। चाहे जितना भी मंत्रोच्चार करलें मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। ये सब वाह्य चीजें हैं जबकि मोक्ष आतंरिक तत्व है। (दोहाकोश, सं-सांकृत्यायन, राहुल, दोहा सं 12-13, पृष्ठ-5)

                                                           सरह या दूसरे अन्य सिद्धों के यहाँ इस शोषण के विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष विरोध उनके प्राप्त साहित्य में दिखायी नहीं पड़ता लेकिन जिस तरह से उन्हों पूर्वप्रचलित मान्यताओं और ब्राह्मणवादी अवधारणा का खंडन किया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरहपा इस व्यवस्था के विरुद्ध थे। उनकी साधना पद्धति भी इसी ओर संकेत करती है। सरह की साधना और साहित्य का सबसे अधिक प्रभाव उसी जनसमुदाय पर पड़ता है जो इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था से शोषित थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी कहा है कि सिद्धों का प्रभाव अशिक्षित जातियों में अधिक था।

                                                       इन्हीं आडम्बरों में उलझा कर ब्राह्मणों ने समाज में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। सरह की उक्तियाँ अपने समकालीन सिद्ध साधकों की अपेक्षा अधिक तीखी थीं। इन्होनें भस्म्पोत आचार्यों, पूजा-पाठ करते पंडितों, जैन क्षपणकों आदि सभी की आलोचना की है और सहज जीवन या आचार पद्धति को प्रसारित किया है। सरहपा ब्राह्मणवादी वैदिक कर्मकांड के विरोधी और विषमतामूलक समाज की जगह सहज मानवीय व्यवस्था के पक्षधर थे। सरह का विरोध हर प्रकार के कर्मकांड से था फिर चाहे वो बौद्ध ही क्यों न हों। उन्होंने बौद्ध साधकों के आडम्बरों का भी खुलकर विरोध किया है-

तासु परिज्ञाने अन्य न कोई। अपर गगने आसक्त सोई।
सहज छाडि निर्वाणे धायेउ। नहिं परमार्थ एकउ साधेउ।9

                                                           किसी भी व्यक्ति के सामाजिक चिंतन को परखना हो तो यह देखना जरुरी होता है कि वो अपने समय में प्रचलित अन्य मान्यताओं के प्रति कैसी राय रखता है। अगर वह अपने विचारों में पहले से प्रचलित मान्यताओं के प्रति विद्रोह की भावना रखता है तो वो परिवर्तन कामी है। उसमें प्रगतिशीलता है। समय के साथ समाज में व्याप्त मान्यताएं नैतिक रूप से क्षीण होती जाती हैं जो चीज अपने शुरुआती दौर में जितनी क्रांतिकारी होती है वो उतनी ही पतित भी होती है। सरहपा ने भी अपने समय में प्रचलित कुरीतियों का विरोध किया है। कई जगह उनका विरोध व्यंग्य के रूप में दिखाई देता है तो कहीं सीधे-सीधे मुठभेंड होती है। मानव समाज में कई सिद्धांत प्रचलित हैं उन्हीं में से एक सिद्धांत सामाजिकता का भी है। ‘सब सिद्धांतों और अभ्यासों की कसौटी मनुष्य होता है और मनुष्य की कसौटी सामाजिकता। मनुष्य की सामजिकता की कोशिशों को ही हम मानव सभ्यता कहते हैं।’10

     जिन सिद्धों को सांप्रदायिक कह कर ख़ारिज कर दिया गया उन सिद्धों ने अपने समय में  कितना परिवर्तनकामी कार्य किया है ये लोक में उनके प्रभाव से ही जाना जा सकता है। सरहपा का साहित्य अपने समय का संचित प्रतिबिम्ब है।

साहित्य सदा अपने समय-समाज के अनुरूप होता है। जिस प्रकार किसी पेड़ की जड़ देखने में रमणीक तो नहीं लगती लेकिन पेड़ को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। ठीक वैसे ही सिद्ध साहित्य काव्य के धरातल पर उच्च कोटि का न सही लेकिन परवर्ती हिंदी साहित्य वहीँ से अपनी जीविका के साधनों को ग्रहण कर आगे बढ़ता है। समाज में प्रत्येक व्यक्ति का मत अलग-अलग होता है और जाहिर है कि उसके द्वारा सृजित साहित्य में उसका ही मत सर्वोपरी होगा। अतः यह कहना कि सिद्ध साहित्य सांप्रदायिक है, बिलकुल अनुचित है। साम्प्रदायिकता क्या है? अगर अपने वृत्ति विशेष या मत विशेष को अभिव्यंजित करना साम्प्रदायिकता है तो फिर सम्पूर्ण विश्व साहित्य सांप्रदायिक होगा। भारतीय संस्कृति और समाज एक अजायबघर है जिसमें न जाने कितनी ही संस्कृतियाँ और समाज मिलकर एकाकार हो गये। सिद्ध साहित्य भी उसी भारतीय संस्कृति का सहज विकास है।

सिद्ध साहित्य का उद्भव शास्त्रीय अलौकिकता के विरुद्ध व्यावहारिक लौकिकता के रूप में हुआ। लोकसामान्य के बीच उन्हीं की भाषा में एक ऐसे मत का विकास हुआ जो ये मानता था कि ईश्वर कोई बाह्य जगत की वस्तु नहीं बल्कि अंतर्जगत का है, जो सहज रूप से प्राप्य है। तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में जहाँ धार्मिक स्थलों में प्रवेश पाना भी सभी के लिए संभव न था और ईश्वर पर तो जाति विशेष का ही अधिकार था, ऐसे में समाज में ये विकल्प प्रस्तुत करना कि इनसे अन्यत्र भी ईश्वर की सत्ता है। एक क्रांतिकारी मत था जिसे व्यापक जनसमर्थन भी मिला। सरहपा के यहाँ सहजता का आग्रह है फिर चाहे वह आचार का हो या विचार का। इनके साहित्य में ज्ञान तत्व के साथ साथ व्यव्हार तत्व भी है। यही कारण है कि सरहपा की रचनाओं में लोक मुहावरों या सहज लोकज्ञान दृष्टव्य होता है। ये किसी भी प्रकार के बंधन को अस्वीकार करते हैं और मुक्ति की कामना रखते हैं। जिस खुलेपन को हम आधुनिक युग की देन मान रहे हैं उस स्वतंत्रता का आग्रह सरह आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व करते दिखाई देते हैं। जिसे भोग की संज्ञा दी गयी है समाज में उसे वे योग की संज्ञा देते हैं। भौतिक जगत को ही सबकुछ मानने वाले सरह चार्वाकों के समकक्ष नजर आते हैं-
देखहु सुनहु पईसहु स्वादउ, सूंघउ भ्रमहु बईठहु उट्ठउ।
आलमाल व्यवहारे बोल्लहु, मन छोडि एकाकार न चल्लउ।11

         सरहपा के यहाँ नीति, योग, साधना, लोकव्यवहार आदि सभी रंगों का समाहार है यही नहीं सरह कहते हैं जिस तरह नमक पानी में घुलमिल जाता है और फिर अलग नहीं किया जा सकता वैसे ही अगर हम अपने मन को परमतत्व में विलीन कर दें फिर उसे कोई अलग नहीं कर सकता-
जिमी लवण विलीजै पानिये, तिमी यदि चित्त विलाई।
आपहिं दीखे परहिं सम, तब समाधियें काह।12

यहाँ भक्ति का वही रूप दिखाई देता है जो एक भक्त से अपेक्षित होता है और ये मार्ग नीरस नहीं बल्कि करुणा से युक्त है-
करुणा रहित जो शून्यहिं लागा, नहिं सो पावे उत्तम मार्गा।13

सरहपा ने जो रचा है उससे हम उनकी सामाजिकता को नहीं आंक सकते। दरअसल, सिद्धों और नाथों की सामाजिकता उनकी रचनाओं के वैचारिक आधार में है। जिस समय सरहपा अवतरित होते हैं वो बौद्ध धर्म के अवसान का समय है। अपने समय में बौद्ध धर्म एक क्रांति की तरह था जिसने सभी को प्रभावित किया लेकिन जब उसका पतन हुआ तब उसके जैसी कोई अन्य अवधारणा स्पष्ट नहीं हो पाई थी जो समाज को उस रूप में बाँध के रख सके। ऐसे समय में सिद्धों और नाथों ने ये जिम्मेवारी उठाई और समाज में उपेक्षित वर्ग को अपने विचार के केंद्र में रखा। जिस तरह से सरहपा और अन्य सिद्धों ने सहज जीवन पद्धति को प्रचारित-प्रसारित किया उसका प्रभाव उस वर्ग पर सर्वाधिक पड़ा जो शास्त्र और अलौकिकता के बोझ तले दबे हुए थे।

                                सहज साधना, परमपद, देह ही तीर्थ, महासुख आदि पद ऐसे हैं जिन्होंने शोषित-दलित जनता को अपनी ओर आकर्षित किया। ये पद महज शब्द नहीं हैं बल्कि उन लोगों के लिए एक विकल्प की तरह हैं जिन्हें ब्राह्मणवादी व्यवस्था में घुटन महसूस हो रही थी। सरहपा अपनी दृष्टि में साफ़ थे। वे बार-बार सहज जीवन, सहज साधना पद्धति पर बल देते हैं। ब्राह्मण धर्म के विशेषत्त्व को खुली चुनौती थी उनकी सहज साधना। क्यूंकि विशेषत्व को सहजता से ही ख़त्म किया जा सकता था और वही उन्होंने करने की कोशिश भी की। समाज में जिस वर्ग को निकृष्ट मान कर उन्हें तिरस्कृत कर दिया गया था उन्होंने उस वर्ग को सम्मान के साथ जीने का सहज माध्यम उपलब्ध कराया। ‘सहजिया कल्ट ऑफ बंगाल एंड पञ्च शाखा ऑफ़ ओड़िसा’ के लेखक परितोष दास लिखते हैं कि सहज संप्रदाय में “कोई कष्ट नहीं, कोई उपवास नहीं, कोई कर्मकांड नहीं, कोई शुद्धिकरण नहीं और न ही समाज के कोई जरुरी नियम, न ही किसी को लकड़ी, पत्थर और मिटटी से बने भगवान की तस्वीर के झुकना जरुरी है, सिर्फ एक अनिवार्यता है और वो है समाधिस्थ होकर अपने शरीर की उपासना करना जहाँ सारे भगवान बसते हैं।”14

(no sufferings, no fasting, no rites, no bathing, no purification nor other rules of society are necessary, nor does anybody need to bow down before the images of gods which are made of woods, stone or mud; but he should with concentration offer worship to his own body, where all gods reside।)

                                        जिस दर्शन को परवर्ती मध्यकालीन संतों ने आधार बनाया वही दर्शन प्रस्तुत कर रहे थे सरहपा और अन्य सिद्ध। “वे कवि थे, वे निरंकुश समय के राजपुत्र, जो सत्य के साक्षी भी रहे और उसके उद्घाटक भी।”15 सरहपा के चार पद चर्यापद में संकलित हैं। इन पदों में व्यक्त तथ्यों से हम उस समय के सामाजिक चिन्तना को रेखांकित कर सकते हैं। “बौद्ध धर्म जब अपने लोकायत दर्शन को भूलकर एक जड़ित कर्मकांड में तब्दील होने लगा, बुद्ध की पूजा होने लगी, ब्राह्मण धर्म के आदर्शानुसार उन्हें भगवान की उपाधि दी जाने लगी, सामान्य जन के लिए जब इनके नियम कानून कठिन होने लगे तब लोगों का झुकाव पुनः ब्राह्मण धर्म की ओर होने लगा। जाति-वर्णहीन बौध धर्म जब अपना आदर्श खो बैठा।”16 (शमशुल आलम सायेद। चर्यापद: तात्विक समीक्षा, पृ-225) यही वो वक़्त था जब वज्रयानी सहजिया और कौल योगीयों का प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने पुनः समाज को जाति रहित वर्णहीन समाज की ओर अग्रसारित किया।

                      तब सहजिया और अन्य सम्प्रदायों ने समाज को बिखरने और नैतिक पतन से बचाया। अपने समय में इनका बहुत मान सम्मान था। आज भी गाँव-देहात में इनके किस्से प्रचलित हैं। जिन्हें लोकगीतों के माध्यम से जिन्दा रखा गया है। ‘जाग मछंदर गोरख आया’ जैसे लोक मुहावरे आज भी प्रचलित हैं।

चर्यापदों के अर्थ को पूर्ण रूप से समझने के लिए सहजिया बौद्ध संप्रदाय के दृष्टिकोण को समझना बहुत जरुरी है। साधना और दार्शनिक तत्व दोनों ही दृष्टियों से इन पदों का अध्ययन अपेक्षित है। चर्याकार सिद्धों के लिए साधना ही सबसे प्रमुख तत्व था, वैसे वे दार्शनिक तत्व को भी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देते थे। सहजिया बौद्धधर्म की उत्पत्ति महायान शाखा से मानी जाती है यही वजह है कि स्वभावतः महायान बौद्धधर्म की कुछ विशेषताएं सहज रूप से इसमें समाहित हो गयीं हैं। सहजिया साधक का चरम लक्ष्य शून्य की प्राप्ति है; लेकिन वह शून्य क्या है? परमार्थ सत्य के बारे में महायानी दार्शनिक नागार्जुन ने बतलाया है कि उसके सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता कि वह है। फिर यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह नहीं है। इसी तरह यह भी कहना सही नहीं कि वह है भी और नहीं भी है, तथा यह भी कहने का उपाय नहीं है कि है और नहीं भी है इन दोनों में कोई भी सत्य नहीं। इस प्रकार से चतुश्कोटि विनिर्मुक्त जो तत्व है उसी को शून्य कहा गया है। वैसे अन्य बौद्ध दार्शनिकों ने भी इस पर और तरह से विचार किया है। विज्ञानवादी विग्यप्तिमात्रता (विशुद्ध ज्ञान) को ही शून्य तत्व कहते हैं। शून्य ही गगन, रव अथवा आकाश है।

   कालक्रम से ही महायान के स्वरूप में परिवर्तन होते आये हैं। प्राचीन अर्हतगण निर्वाण की प्राप्ति का चरम लक्ष्य मानते थे, लेकिन महायानियों ने बोधिसत्व के आदर्श को ही उच्च माना। महायानियों के अनुसार दुःख से जर्जरित इस संसार के प्राणियों के लिए देह धारण कर करुणा का अवलंबन करना निर्वाण से श्रेयस्कर है। महायानी मानते हैं कि करुणा का आधार अद्वयबोध है। समस्त प्राणियों के साथ अपने को सम्पूर्ण रूप से एक समझना ही अद्वयबोध है। इस करुणा को महायानियों ने अपनी साधना, अपनी विचारधारा का मूलमंत्र स्वीकार किया है। उनका कहना है कि अद्वय की स्थिति ही साधकों के लिए काम्य है। इसमें सभी संकल्प विकल्प विलुप्त हो जाते हैं। इस स्थिति में ज्ञातृत्व, ज्ञेयज्ञ तथा ग्राकत्व ग्राहत्व का ज्ञान नहीं रह जाता। तांत्रिक बौद्धों ने निर्वाण को परम सुख कहा है। उनके अनुसार ‘महासुख’ ही निर्वाण है। वे मानते हैं कि विशेष साधना पद्धति द्वारा चित्त को महासुख में निमज्जित कर देना ही साधक का चरम लक्ष्य होता है। महासुख में निमज्जित चित्त की स्थिति ही बोधिचित्त की प्राप्ति है। चित्त की यह स्थिति ही जिसमें चित्त बोधिलाभ के उपयुक्त होकर तथा उसे प्राप्त कर सभी प्राणियों की मंगलसाधना में लग जाता है।

       साधना की दृष्टि अद्वय बोधि चित्त की दो धाराएँ हैं: प्रज्ञा और उपाय। शुन्यताज्ञान को तांत्रिक बौद्ध साधकों ने ‘प्रज्ञा’ कहा है और इसमें साधक का चित्त संसार का कल्याण करने की ओर अनुप्रेरित न होकर अपनी ही ओर लगा रहता है। करुणा को उन्होंने उपाय की संज्ञा दी है। यह प्रवृत्तिमूलक है और विश्वमंगल की साधना में नियोजित रहता है। इन दोनों के मिलन या युग्म को ही ‘प्रज्ञोपाय’ कहा गया है। इन दोनों के मिलन से ही बोधिचित्त की प्राप्ति होती है। इन दोनों के मिलन की निम्नगा धारा ही सुख दुःख वाली त्रिगुणात्मिका सृष्टि है और उसकी उर्ध्व धारा का अनुसरण कर चलने में महासुख की प्राप्ति होती है। इसे ‘सामरस्य’ कहा गया है। यही परमानन्द भी है।

       इस आनंद को मध्यमिकों ने तत्व माना है लेकिन बौद्ध सहजिया साधकों ने इसे रूप तथा नाम भी प्रदान किया है और इस वासस्थान भी बताया है। उन्होंने इसे नैरात्मा देवी तथा परिशुद्धावाधुतिका कहा है। इसे शुन्यता की सहचारिणी भी कहा गया है। साधक जब पार्थिव माया मोह से शून्य हो जाता है और धर्मकाय में लीन हो जाता है, वह मानों नैरात्मा इन्द्रियग्राह्य नहीं इसलिय एक पद में उसे अस्पृश्य डोम्बी कहा गया है। जो नगर के बाहर अर्थात देह्सुमेरू के शिखरप्रदेश अर्थात उष्णीशकमल में उसका वासस्थान है। यहाँ यह भी ध्यान देना होगा कि दार्शनिक विवेचना करते हुए सिद्धों ने जिन बिम्बों का प्रयोग किया है उससे भी उनके सामाजिक चिंतन व् अवलोकन का पता चलता है-
  नगर बाहिरी रे डोम्बी तोहरी कुड़िया।
छोई छोई जाई सो बाह्य नाडिया।

यह जो बिम्ब है इसमें कहा गया है कि नगर के बाहर डोम्बी (यानि कि डोम) की कुटिया है। यानि निम्न वर्ण की जातियों का वास स्थान नगर के बाहर हुआ करता था उस समय में भी। इस तरह के जो बिम्ब पदों में मिलते उनसे उस समय की सामाजिक संरचना और उसकी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त सिद्धों की जो साधना पद्धति और उनकी जो दार्शनिक अवधारणा थी उसमें भी समाज महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। करुणा युक्त साधना जो समस्त मानव जाति के लिए मंगलकारी है उसका आह्वान करते हैं सहज सिद्ध। सरहपा ने भी इसी प्रकार की साधना की बात की है।

“सहजयान में भी योग का प्रभाव था, इसी योग धर्म से संलग्न शैव और विभिन्न समाज में प्रचलित, अविकसित लोकसाधना की पूजा-पद्धतियों ने मिलकर एक नए संप्रदाय को जन्म दिया। जिसे नाथ संप्रदाय कहा जाता है।”17 नाथों की संख्या नौ थी यह विदित है। आदिनाथ जो कि स्वयं शिव हैं और उसके बाद मत्स्येन्द्रनाथ जो शिव के ही अवतार माने जाते हैं। बौद्ध तंत्र साधना का केंद्र तिब्बत था तो शैव तंत्र साधना का केंद्र कामरूप। आज भी इस क्षेत्र में मत्स्येन्द्रनाथ के सन्दर्भ बहुत सी मान्यताएं प्रचलित हैं। नाथ संप्रदाय का प्रभाव राजपुताना, गुजरात, पंजाब, बंगाल, नेपाल, आसाम आदि तक फैला था। नेपाल में आज भी मत्स्येन्द्रनाथ को अवलोकितेश्वर कहा जाता है। नेपाली साहित्य में भी मत्स्येन्द्रनाथ का सर्वथा उल्लेख मिलता है। छत्रबहादुर कायस्थ द्वारा रचित ‘बुन्गम लोकेश्वरया म्यें मुना’ नामक रचना में मत्स्येन्द्रनाथ का उल्लेख हुआ है-
“वृधया सलिलस जरम हिनस
खनव यो जर्मया दुवाल न्हां
भगति मफु सिस्य दुख नया त्रासन
मछिन्दरनाथ त्रिभुवन रक्षा याक
सिस्तीथिस्ती जलबिस्ती यकान्हा”18

नेपाल में कई लोककथाएं प्रचलित हैं मत्स्येन्द्रनाथ के बारे में। लोग उन्हें तारणहार के रूप में देखते हैं। नेपाल में रथ-यात्रा या रातो मत्स्येन्द्रनाथ बहुत ही महत्वपूर्ण उत्सव है। यह अप्रैल के महीने में शुरू होकर जून तक चलता है। मान्यता है कि मत्स्येन्द्रनाथ की वजह से ही वर्षा होती है। चूँकि गर्मी के मौसम में नेपाल में वर्षा का बहुत महत्व है। इसी की वजह से वहां कृषि कार्य सुचारू रूप से हो पाता है। इसका तात्विक विश्लेषण जे लॉक ने अपनी पुस्तक ‘रातो मत्स्येन्द्रनाथ’ में की है।

“From a cultural and anthropological standpoint the festival is equally important। It ,is one of the oldest, uninterrupted festivals kept by the people of the Valley, and into the fabric of this cult are woven the many different religious and cultural strands that have shaped the fabric of the cultural life of the Valley। An investigation of the strands which make up this fabric will reward one with an insight not only into this one curious festival, but into the whole cultural history of the people of the Valley।”19

सांस्कृतिक और मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से इस त्योहार का बहुत महत्व है। यह उन प्राचीन त्योहारों में से एक है जिसे घाटी के लोगों ने बचाए रखा है। इस संप्रदाय के धागों ने घाटी के विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक तत्वों को जोड़ा है जिसने घाटी के सांस्कृतिक जीवन को आकार दिया है।

नेपाल एक ऐसा देश है जहाँ कोई बाह्य आक्रमण नहीं हुआ इसलिए यहाँ कुछ भी नष्ट नहीं हुआ। ऐसा नहीं है कि बाहर के लोग यहाँ नहीं आये। बहुत से लोग आये उनके साथ उनकी परम्पराएँ भी आयीं लेकिन नेपाल के लोगों ने उन्हें अपने में आत्मसात कर लिया। नए को अपनाया लेकिन पुराने को छोड़ा नहीं उसे मिटाया नहीं। जॉन लॉक कहते हैं कि “मत्स्येन्द्रनाथ के संप्रदाय ने ही इस सामूहिक और जीवंत परंपरा को साकार किया है।/ The cult of Matsyendranath embodies this complex and living tradition।”20

अब यह सवाल खड़ा होता है कि कामरूप के मत्स्येन्द्रनाथ नेपाल में इतने महत्वपूर्ण कैसे हो गये? दरअसल, इसके सन्दर्भ में बहुत सी कहानियाँ प्रचलित हैं जो नेपाल के ‘नेवारी क्रॉनिकल’ में दर्ज हैं। एक कथा है कि नेपाल में वर्षा नहीं हो रही थी तो वहां के राजा नरेन्द्रदेव ने अपने गुरु से इसका समाधान माँगा। गुरु शान्तिकर वज्राचार्य ने सुझाव दिया कि करुणामय लोकनाथ को नेपाल लाना होगा। अब ये करुणामय लोकनाथ कोई और नहीं बल्कि मत्स्येन्द्रनाथ थे जो कमुनी राज्य के कामरूप में रहते थे। वहां के राजा यक्ष थे और रानी यक्षिणी। फिर राजा नरेंद्रदेव और बन्धुदत्त, जो गुरु शान्तिकर का शिष्य था ने यह बीड़ा उठाया कि वे करुणामय लोकनाथ को वापस नेपाल लायेंगे। फिर वो कमुनी राज्य पहुँचते हैं जहाँ बुद्धदत्त ने अपनी शक्ति से मत्स्येन्द्रनाथ को वशीभूत कर दिया और वे मधुमक्खी का रूप लेकर कामरूप से बाहर निकले फिर नरेन्द्रदेव ने उन्हें कलश में बंद कर दिया और नेपाल लेकर आये। करुणामय लोकनाथ के वापस नेपाल आने से वहां वर्षा हुई। इसी के उपलक्ष्य में वहाँ मत्स्येन्द्रनाथ की यात्रा हर वर्ष अप्रैल महीने में निकाली जाती है। अब इस कहानी का उद्देश्य क्या है? दरअसल मत्स्येन्द्रनाथ का प्रभाव इतना अधिक था या यूँ कहा जाए कि उस समय में योगियों का प्रभाव लोक में इतना अधिक था कि लोग अपनी हर समस्या लेकर उनके ही पास जाते थे या फिर अपनी समस्या का समाधान उन्हीं में देखते थे। लोक समाज में मत्स्येन्द्रनाथ की स्वीकार्यता ही उनके सामाजिक महत्त्व को दर्शाती है।

                           नेपाल के पाटन में जो मंदिर है मत्स्येन्द्रनाथ कि उसे ‘मत्स्येन्द्र देवल’ या ‘ताहा बहल’ कहते हैं लेकिन संस्कृत में इसे धर्मकीर्ति महाविहार के नाम से जाना जाता है और ‘विहार’ बौद्धों के हुआ करते थे। बौद्ध सिद्धों ने ही सर्वप्रथम तंत्र को साधना पद्धति में शामिल किया और फिर हिन्दू सम्प्रदायों ने तत्पश्चात उसे अपनाया। इसलिए कहा जा सकता है कि बौद्ध उत्तर काल में शैव के रूप में उभरे।

“It is possible to declare, without fear of contradiction, that the Buddhists were the first to introduce the Tantras into their religion , and that the Hindus borrowed them from the Buddhists in later times, and that it is idle to say that later Buddhism was an outcome of Saivism।”21

मत्स्येन्द्रनाथ की लोकभाषा में रचित कोई रचना प्राप्त नहीं होती लेकिन फिर भी लोक समाज में उनकी स्वीकार्यता ही उनके सामाजिक स्वरूप को दर्शाती है। आज भी लोक समाज में योगियों को लेकर श्रद्दा और विश्वास का भाव है। ये श्रद्धा या विश्वास यूँ ही प्राप्त नहीं होता उसके पीछे कोई न कोई वजह अवश्य होती है। लोकप्रियता के मामले में सिद्धों से कहीं आगे थे नाथ योगी। कामरूप हो या फिर नेपाल आज भी मत्स्येन्द्रनाथ को आदर के साथ याद किया जाता है।


सन्दर्भ सूची:
1. दास, परितोष, सहजिया कल्ट ऑफ बंगाल एंड पञ्च शाखा कल्ट ऑफ़ ओड़िसा,  1988, पृ. 29.
2. धर्मवीर भारती, सिद्ध साहित्य, पृ. 95
3. दोहाकोश, सं-सांकृत्यायन, राहुल, दोहा सं. 95, पृष्ठ-23
4. सरहपा, दोहाकोश, सं. राहुल सांकृत्यायन, दोहा-1, पृ.03
5. वही, दोहा सं. 2, पृष्ठ-3
6. वही, दोहा सं. 4, पृष्ठ-3
7. वही, दोहा सं. 6, पृष्ठ-3
8. वही, दोहा सं. 12-13, पृष्ठ-5
9. सरहपा, दोहाकोश, सं. राहुल सांकृत्यायन, दोहा-11, पृ. 05
10. प्रेम सिंह, भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ, पृ-44.
11. सरहपा, दोहाकोश, सं. राहुल सांकृत्यायन, दोहा-63, पृ. 17
12. वही, दोहा-46, पृ. 13.
13. वही, दोहा-16, पृ. 05.
14. दास, परितोष, सहजिया कल्ट ऑफ बंगाल एंड पञ्च शाखा कल्ट ऑफ़ ओड़िसा,  1988, पृ. 37.
15. सायेद आलम, शमशुल, चर्यापद: तात्विक समीक्षा, पृ-225.
16. वही, पृ. 225.
17. भट्टाचार्य, मंजुश्री, चर्यापद: बरगीत अरु देह बिचारेर गीत, शोध ग्रन्थ, गुवाहाटी विश्वविद्यालय, पृ.51.
18. कायस्थ, छत्रबहादुर, बुन्गम लोकेश्वरया म्यें मुना, पृ. 2.
19. लॉक, जॉन, रातो मत्स्येन्द्रनाथ, भूमिका, पृ. 5.
20. वही, पृ. 7.
21. भट्टाचार्य, विनयतोष, एन इंट्रोडक्शन तो बुद्धिस्ट एसोटेरिस्म, पृ. 147.

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