आधुनिक ब्रजभाषा काव्य का सामाजिक सरोकार

विजय कुमार प्रधान

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग,
वनस्थली विद्यापीठ (राजस्थान)


देसकाल अनुसार भाव निज व्यक्त करन में ।
मंजू मनोहर भाषा या सम कोउ न जग में ।।
--पंडित सत्य नारायण 'कविरत्न'

भाषा विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम होने के साथ-साथ समाज और संस्कृति की संवाहिका भी है। किसी भी भाषा का सम्बन्ध समाज से इतर नहीं है। भाषा आभ्यंतर अभिव्यक्ति का विश्वसनीय माध्यम है। यही नहीं वह हमारे आभ्यंतर के निर्माण, विकास, हमारी अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का भी साधन है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परंपरा से विच्छिन्न है।1 भाषाई-संकट के दौर में लोक भाषा, जन भाषा व साहित्य भाषा को लेकर पुनःचिन्तन करने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया जहाँ अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बन चुका है, वहाँ भाषाई चर्चा किसी भी समाज के लिए उन्नत संकेत है। ब्रजभाषा साहित्य का प्राचीन इतिहास रहा है। इसी से ही हिंदी साहित्य समृद्ध है। ब्रजभाषा साहित्य की चर्चा समाज और संस्कृति के लिए परम आवश्यक है। केवल ब्रजभाषा साहित्य ही नहीं बल्कि समस्त भारतीय लोक-भाषा साहित्य को पुनः विमर्श पटल पर रखना प्रत्येक साहित्य प्रेमी का कर्तव्य है। साधारणतः ब्रजभाषा काव्य को लेकर एक आम धारणा है कि यह केवल शृंगार और वात्सल्य रस की भाषा है, जबकि आधुनिक ब्रजभाषा काव्य में प्रतिबिंबित समाज बहुआयामी है।

भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन एवं विभिन्न ऐतिहासिक प्रवर्तनों की संवाहिका के रूप में ब्रजभाषा देश की राष्ट्रीयता अखंडता एवं सामाजिक चेतना की सुत्रधारिणी रही है। उसने देश की भौगोलिक विविधताओं को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य किया है। लगभग 275 वर्ष पूर्व कच्छ के महाराजा ने एक ब्रजभाषा विद्यालय की स्थापना की थी, जिसे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बंद कर दिया। केरल के राजा स्वाति ब्रजभाषा में काव्य रचना करते थे। गुरु नानक के पद एवं गुरुगोविंद सिंह के सरस सवेये ब्रजभाषा में मिलते हैं। बंगाल के कवियों ने उसमे 'ब्रजबुली' नाम से कवितायें लिखी हैं।2 साहित्य और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध रहा है। हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का आरम्भ भारतेंदु युग से होता है। भारतेंदु से पूर्व रीतिकालीन कवि राजाश्रित होने के कारण शृंगारिकता विवशता थी। परन्तु आधुनिक काल का कवि विवश नहीं था। भारतेंदु काल के मुकाबले में आधुनिक ब्रजभाषा कविता जीवन के अधिक समीप है।

खड़ी बोली में रचित प्रगतिवादी कविता में यथार्थवादी चिंतन बहुत बाद में आया, ब्रजभाषा कविता में 60-70 वर्ष पूर्व इसे भारतेंदु युग में देखा जा सकता है। भारतेंदु युगीन कवियों ने महंगाई, अकाल, टैक्स और धन का विदेश प्रवाह, जाति-भेद, विदेशी वेश-भूषा, बाल विवाह, राजनीतिक क्षेत्र में पराधीनता और दास्ताँ आदि तमाम विषयों को अपनी कविता में चित्रित किया है। "अब नहीं यहाँ खाने भर को भी जुटता/ नहिं सिर पर टोपी नहिं बदन पर कुरता? है कभी न इसमें आधा चावल चुरता , नहिं साग मिलै नहिं कंद मूल का भुरता।'' --प्रेमघन की कविता हो या ''तब लखि हों जहं रह्यो एक दिन कंचन बरसत/ तहं चौथाई जन रूखी रोटिहुकहु तरसत/ जहां आमन की गुटली अरु बिरछन की छाल/ ज्वार-चुन मंह मेलि लोग परिवारहिं पालैं/ नौन तेल लकरी घासहु पर टिक्स लगे जहं/ चना चिरोंजी मोल मिले जहं दीन प्रजा कह।''--प्रताप नारायण मिश्र की कविता हो सभी में सामाजिक स्वर मुखर है।

भारतेंदु युग के पश्चात पंडित श्रीधर पाठक, अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिओध', सत्यनारायण कविरत्न, वियोगी हरि, दुलारेलाल भार्गव, उमाशंकर वाजपेयी 'उमेश' की कविताओं में सामाजिक समस्याओं मुखरता से अभिव्यक्त किया गया है। जीवन और जगत की व्यापक अनूभूति पाठक के मन को प्रभावित करती है - ''छन-छन छीजत न देखहिं समाज-तन/ हेरहिं न विधवा छटूक होत छतियां/ जाति को पतन अवलोकहिं न आकुल व्है/ भूलि न विलोकहिं कलंकी होत कुल मान।'' (हरिऔध)

स्वतंत्रता के पश्चात प्रधानतः खड़ीबोली में ही कविताओं की रचना हुई परन्तु ब्रजभाषा में कविता-लेखन की परंपरा भी क्षीण रूप से जारी रही। तब से लेकर आज तक समाज निरंतर ब्रजभाषा काव्य के केंद्र में है। ब्रजभाषा के आधुनिक कवियों ने समाज में घटित समस्त घटनाओं – आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक उथल-पुथल को वाणी दी है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ब्रजभाषा में कई महत्वपूर्ण कविताओं की रचना की है। उनकी कविताओं में राजनीतिक जीवन का व्यापक अनुभव परिलक्षित होते हैं। उनके द्वारा रचित मुक्तक 'धधकि उठ्यो गंगा को जल है' समाजसेवी जयप्रकाश नारायण पर केन्द्रित है। जब स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर उन्हें जेल में बंद कर दिया था तब उस प्रसंग में जे.पी. के लहर में सारा देश एकत्रित हो गया था। वाजपेयीजी ने लिखा - ''जे.पी. डारे जेल मैं, ताको यह परिनाम/ पटना मैं परलै भई, डूब्यो धरती धाम / डूब्यो धरती धाम, मच्यो कोहराम चतुर्दिक, शासन के पापन को जनता ढोवै धिक्-धिक्।/ कह 'कैदी कविराय' प्रकृति को कोप प्रबल है/ 'जय प्रकाश' हित धधकि उठ्यो गंगा को जल है।।''3

आधुनिक समाज में राजनीति, जीवन का अभिन्न अंग है। मनुष्य के सामाजिक जीवन को राजनीति प्रभावित करती है। इसीलिए कवि समसामयिक राजनीतिक परिवेश से प्रभावित होता है। समकालीन काव्यधारा के कवियों ने राजनीतिक व्यवस्था के मोहभंग को 'संसद से सड़क तक' हो या 'आत्महत्या के विरुद्ध' के माध्यम से अभिव्यक्त किया ही है। ब्रजभाषा का कवि भी अयोग्य राजनीतिक व्यक्तियों की सत्ता लोलुपी प्रवृत्ति को व्यक्त करने में पीछे नहीं है। श्री अवध बिहारी वाजपेयी 'सत्ता महबूबा' में व्यंग्य करते हुए लिखते हैं - ''सत्ता-महबूबा मिलै, रहिये सदा जवान, असी साल को डोकरा, खींचै सबके कान, बुढापा पास न फटके/ नई नबेलिहु मौन, देखि खाला के झटके, / कह 'अनुभव कबिराय' मिल्यो है जोग अजूबा/ रहिये सदा जवान मिलै सत्ता-महबूबा।''4 राजनीतिक विसंगतियों को दर्शाने के लिए ब्रजभाषा में राजनैतिक पैरोडी की भी रचना की गयी है - ''मानुस हौं तो बनौ कोऊ नेता, बसौं नित मंत्रिन के दरबारन।/ जौ पसु हौं तौ बनौकोऊ सांड, चरों हरे खेत, भ्रमौं नित हारन।/ पाहन हौं तो बनौं पुखराज मिनिष्टर जाहि करैं नित धारन।/ जौ खग हौं तो बसेरो करौं, नित संसद भौन असोक की डारन।''5

भाषा किसी का मुँह नहीं जोहती। उसकी सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। ब्रजभाषा में इतनी सामर्थ्य है कि किसी भी ज्वलंत विषय को साहित्य के अभिव्यक्त किया जा सकता है। इसी भावना को प्रमाणित करती कविता है –'बजट प्रतिवेदन'। इस कविता के माध्यम से व्याप्त महंगाई पर व्यंग्य किया गया है। सरकारें बदल जातीं हैं, परन्तु आम जनता को महंगाई से मुक्ति नहीं मिलती - ''वर-विन्यास भये महंगे, रंग रूप रंगाई बड़ी महँगी/ चिकनाई कपोलन की महँगी, बिना काम पढ़ाई बड़ी महँगी/ रस छंद के भाव बड़े महंगे कविताई-मिठाई बड़ी महँगी।''6 समाज की स्थिति को देख कर कवि चिंतित दिखाई देता है। अनैतिकता, मूल्यहीनता, भ्रष्टाचार से सराबोर समाज को देख कर कवि लिखता है - ''लूटि अन्धाधुन्ध रहे, देस के हितैषी बनी/ तिन्हैं रोकिबे को कौन साहस दिखावै आजु?/ कबिन के बाढ़यो है छपास औ पढ़ास रोग/ बिके जात हाथ सुविधा के, को बचावै आजु?/ वारि-हीन मीन जैसे तलफत दीन-हीन/ पीत-पट-वारे को सुजस कौन गावै आजु?''7 आधुनिक समाज की विसंगतियों को यथार्थता के साथ अभिव्यक्त करती है यह कविता। कुछ ही पंक्तियों में सम्पूर्ण समाज की विसंगतियों को उभारती है यह कविता। आधुनिक युगीन ब्रजभाषा काव्य का अध्ययन करने पर यह प्रतीत होता है कि इसमें समाज केन्द्रित कविताओं की बहुलता है। इससे पता चलता है कि ब्रजभाषा के आधुनिक कवि समय के प्रति कितने जागरूक हैं और वे अपनी रचनाओं में समसामयिकता का पूर्ण प्रतिबिम्ब चित्रित करते हैं।
--------------------------------------------------------------------------------------------
सन्दर्भ ग्रन्थ –
1. डॉ. हरिमोहन-राजभाषा हिंदी में वैज्ञानिक साहित्य में अनुवाद की दिशाएँ, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006, पृष्ठ-9
2. डॉ. लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक', हिंदी की जनपदीय कविता, लोकभारती प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002, पृष्ठ-433
3. श्री अटल बिहारी वाजपेयी, वही, पृष्ठ-347
4. वही, पृष्ठ-451
5. श्री सुन्दरलाल अरूणेश, वही, पृष्ठ-503
6. ओमनारायण तिवारी, बजट प्रतिवेदन, वही, पृष्ठ-457
7. श्री महेंद्र कुमार सरल, देस-दसा, वही, पृष्ठ, 480

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।